Thursday, November 10, 2011

एकाकीपन में स्वयं की तलाश

रविन्र्रनाथ टैगोरे की एक पंक्ति है "यदि तोमार डाके सुने केऊ न आशे तोबाई एकला चलो रे " यह सच है अकेलेपन के डर से घबराना या हताश होना अपनी  संचित शक्ति से मुंह  मोड़ना है .एकाकीपन में भी गज़ब की शक्ति होती है इतिहास गवाह है की अधिकतर नयी खोज अकेलेपन की गोद में ही संभव हुई .किसी ने खूब कहा है
अकेला चला था अकेला चलूँगा,सफ़र के सहारों न दो साथ मेरा ,
सहज मिल सके वो नहीं लक्ष्य मेरा,बहुत दूर है मेरी निशा का सवेरा
अगर थक गए हो तो तुम लौट जाओ, गगन  के सितारों न दो साथ मेरा
अकेलेपन की इस स्थिति  से मायूस होकर हिम्मत हार जाने वालों के लिए ये छोटी सी कविता है    
अकेलेपन  के घोर सन्नाटे में खुद को पा लेने का उल्लास है
सच है शांति  और एकाकीपन में ही,गिनी  जाती हरेक सांस है
जमीं  के भीतर पड़ा वो एक बीज,भले रवि के रश्मि से वंचित है
पर एक विशाल तरु की संभावना, उसने रखी  स्वयं में संचित है
इस एकाकीपन को बनाएं हम,कैसे उपयोगी और सरस क्षण
वश में सब हमारे ही तो है, भर लें सुविचारों से जब हम ये मन
मन का दीप आलोकित कर ,एकाकीपन की आज तम हर लें
हर पल सकारात्मकता से भर,आओ मुट्ठी में यह जग कर लें
औरों का अनुपस्थित  होना,सम्पूर्णता से अपनी उपस्थिति है
पुरे ब्रह्माण्ड का रीतापन भर दे,एकाकीपन में ऐसी  वो शक्ति है
स्वयं के एकाकीपन में ही हम ,जग का दामन भर सकते हैं
सबको प्रेरित जो कर जाये,ऐसी कृति का सृजन  कर सकते है
खोजें,सोचें,आओ रूबरू हों,आज अपने खोये हुए व्यक्तित्व से  
दफ़न पड़े शौक  जगा कर अब ,भर दें जग अपने अस्तित्व से
साहित्य की वो सर्वोत्तम रचना ,अकेलेपन में ही लिखी गयी थी
चित्रकार की अद्भुत, अनुपम कृति भी एकांत में ही रची गयी थी