8th मार्च को हम अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने जा रहे हैं.मैं आज इस
मंच से वर्तमान समाज के सर्वाधिक ज्वलंत समस्या का समाधान आपके समक्ष रख
रही हूँ .
इस समस्या से नारी को अपने सबसे प्रारम्भिक दौर यानि उसके इस खूबसूरत दुनिया में कदम रखने से और कभी-कभी तो कदम रखने के पूर्व ही रूबरू होना पड़ता है जिसका उसे कोई पूर्वाभास तक नहीं हो पाता.वह समस्या है ----" गर्भ में ही उसे सुला दिया जाना और अगर वो इस जगत में आ भी जाए तो उसे भरपूर ख़ुशी से ना अपनाना" .
कहीं हम भी इस समस्या का कारण या परिणाम तो नहीं .?जानने के लिए पढ़िए यह ब्लॉग..............................
दोस्तों, हम सब इस सच्चाई से वाकिफ हैं कि हमारे देश भारत में लिंगानुपात संतोषजनक नहीं है.यह ठीक है कि सन 2000 में यह 927 /1000 था और अब 2001 में यह 933/1000 हो गया है पर आज भी कुछ राज्य ऐसे हैं जहाँ लड़कियों की संख्या गिरती जा रही है हरियाणा में यह 820/1000 है तो पंजाब में यह लिंगानुपात 793/1000 है.हमारा समाज एक पुरुष प्रधान समाज माना जाता है पर मैं आप सभी से एक प्रश्न पूछना चाहती हूँ.क्या महिलाओं से जुडी हर समस्या की वज़ह केवल पुरुष ही है?क्या महिलाएं कुछ अंश के लिए भी इन समस्याओं के लिए जिम्मेदार नहीं हैं?यहाँ मैं स्वयं से जुडी अनुभूति का ज़िक्र करना चाहती हूँ .
बात सन 1998 की है जब मुझे प्रथम बार जननी बनने का सुख प्राप्त हुआ .आप सोच रहे होंगे इसमें कौन सी नयी बात है?हर विवाहिता, माँ बनकर ही संपूर्ण नारी बनती है.ठीक सोचा आपने;; पर मेरे लिए यह बात किसी गहरी परिणति से जुड़ गयी थी . अस्पताल के ऑपरेशन theater में अर्ध्चेत्नावस्था में जब मुझे ज्ञात हुआ कि इस दुनिया में आने वाला शिशु एक कन्या है तो मेरी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली,एक तो surgery की असहनीय पीड़ा और उससे भी ज्यादा एक पुत्री होने के अतीत का कटु अनुभव---"बचपन में मैं कुशाग्रबुधि थी, दसवीं की कक्षा में टॉप किया था, विज्ञान शाखा से पढ़ना चाहती थी पर पुत्री के पिता होने से उपजे डर ने उन्हें एक कठोर निर्णय लेने पर विवश किया "मैं तुम्हे आगे पढने के लिए बाहर नहीं भेज सकता" मेरे सारे मंसूबों ने दम तोड़ दिया. मैंने उस कठोर फैसले तथा उसके बाद की पापा की नसीहत "बिटिया लडकी की इज्ज़त उस कांच के सदृश होती है जिस में अगर एक बार दरार आ गयी तो वह उम्र भर के लिए विकृत ही माना जाता है"की गहराई पर उस वक्त लेश मात्र भी ध्यान नहीं दिया था,पर आज उस नसीहत और फैसले की नजाकत को समझ सकती हूँ .पापा की प्रेरणा और हौसलाफजाई से बारहवीं मैंने कला संकाय से पूरा किया c .b.s e से टॉप दस विद्यार्थियों में स्थान पाया merit certificate भी प्राप्त हुआ; उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाना चाहती थी पर फिर वही कठोर निर्णय.मैंने भी समझौता कर लिया पर आगे की पढ़ाई में भी सर्वोत्तम देने के जुनून को विराम नहीं दिया ;पिता का दुःख समझ सकती थी.मैंने अर्थशास्त्र से M A की डिग्री ली और फिर B ed पूरा किया .एक अध्यापिका बन कर ही सर्वोत्तम देने कि पूरी कोशिश की."खैर .............
जब आँखें खुली तो बच्ची को उसके पिता की गोद में पाया उनकी आवाज़ सुनाई दी"देखो,इसकी आँखों में कैसी गहरी चमक है"मैंने बच्ची की तरफ देखा यकीनन "" एक पुरुष के प्रथम बार पिता बनकर हर्षातिरेक में की गयी ये भावपूर्ण अनुभूति की सजीव अभिव्यक्ति और एक माँ की छुपी हुई चिरस्थायी ममता का गहन प्रभाव ही था "मुझे सच में उसकी आँखों में गहरी चमक दिखाई दी .लबों से आहिस्ता से एक शब्द बाहर आया "दीप्ताक्षी,दीप्त +अक्षि (shinning eyes )तब तक पिताजी(father -in -law ) भी आ चुके थे उन्होंने मेरी नम आँखें देख वज़ह पूछा .मैंने कहा" असहनीय पीड़ा की वज़ह से रोना आ गया".पर ये सच कहा जाता है" माता-पिता की आँखें कभी धोखा नहीं खाती" उन्होंने जिंदगी की कशमकश में काफी अनुभव एकत्र किया होता है. यही वज़ह थी कि पापा की अनुभवी आँखों को भी मेरी आंतरिक पीड़ा समझते देर नहीं लगी.
एक सप्ताह बाद जब हॉस्पिटल से मैं घर आई तो देखा घर में बहुत सी स्त्रियाँ सोहर (उत्तर प्रदेश में गाया जाने वाला एक लोकगीत जो कि घर पर पुत्र होने की ख़ुशी में गाया जाता है)गा रही थी .पंडाल सजे थे .पता चला कि पिताजी और घर पर सभी भाइयों ने बच्ची के जन्म की ख़ुशी में एक शानदार पार्टी का आयोजन किया है वो सबके लिए अनमोल थी. पापा ने एक ही फैसला लिया"इस बच्ची की प्रतिभा की राह में कोई सामाजिक
भय,दकियानूसी परम्पराएं,अभाव कभी अवरोधक नहीं बनेगें"
मैं बचपन से इंदिरा गांधीजी से बहुत प्रभावित थी कोई मुझे पूछता था "बड़ी होकर क्या बनना चाहोगी?" मेरा ज़बाब होता था "इंदिरा गाँधी" यकीनन इंदिरा प्रियदर्शिनी का प्रभाव अब भी खत्म नहीं हुआ था .और उस दिन हम दोनों ने एक निर्णय लिया," यही हमारी पहली और आखिरी संतान होगी और मैंने उसे नाम दिया "प्रियदर्शिनी"..
अब आप ही बताइये, मेरी सोच को एक नवीन आयाम देने वाले इसी घर ,परिवार,समाज के पुरुष ही तो थे. पापा आज इस दुनिया में नहीं हैं;इसी सितम्बर महीने में वे चिरनिद्रा में सो गए मगर उनकी ख्वाहिश थी कि उनकी यह पोती एक सफल डॉक्टर बने.यह मेरी जिंदगी कि सबसे अहम् घटना थी इसलिए सही सोच वाले पुरुषों के प्रति समाज हमेशा नतमस्तक रहता है ;वे ही समाज को एक नयी दिशा देते हैं ;अगर एक नारी माँ,बहन ,बेटी बनकर अपनी जिम्मेदारी निभाती हैं तो एक पुरुष भी पिता,भाई ,पुत्र, बनकर अपनी जिम्मेदारी सफलता पूर्वक निभाता है .सच तो ये है कि इसमें हर रिश्ता क्रमशः एक-दूजे का पूरक है........
बस इसलिए इस अनुभव से प्रेरित होकर मैंने यह कविता लिखी है "कस्तूरी की खोज में मृग की भटकन सी बेटी "
भोर में खिले ताज़े फूल पर पड़ी, ओस सी होती है बेटी .
दरख्त की शाख पर उगी नाजुक, कोंपल सी होती है बेटी
.............................................................................
पूनम की रात को रोशन करती ,पूर्ण चाँद सी होती है बेटी
प्यार से पनाह दो तुम इसे, तुम्हारा अंश ही होती है बेटी
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तुम्हारे आशियाने को अपनी खुशबु से महकाती,फूल सी है बेटी
हर क्षण घर को अपने मधुर संगीत से चह्काती,बुलबुल सी है बेटी
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दो घरों को जोड़ने वाली मजबूत, सेतु और इज्ज़त है बेटी
खुशियों से एक नहीं दो , आशियाने को करती ज़न्नत है बेटी
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यह ज़रूर है कि हर मंदिर,हर दरगाह की नहीं होती मन्नत है बेटी
पर समझ लो खुदा के घर से तुम्हारे दर, खुद ही आई नेमत है बेटी
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घर-चौखट की मर्यादा बनने को, हर सांचे में ढलती है बेटी
दरिया सी हरदम आगे ही अपने, मंजिल तक बढ़ती है बेटी
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काश भर लेते अंक में हमें कभी, इसी ख्वाहिश में जीती है बेटी
उन्नत समाज की विडम्बना कि गर्भ में ही सुला दी जाती है बेटी
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रीति-रिवाज़ की वेदी पर क्यों, हम ही चढ़े ?आज पूछती है बेटी
हुनर होने पर भी क्यों आगे हम न बढे? कहकर सिसकती है बेटी
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हमारे ही लिए क्यों सवालों के सारे घेरे ? दुःख से चीखती है बेटी
दहेज़ जैसे अभिशाप के दंश,क्यों हम सहें ? मूक ये सोचती है बेटी
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बेपरवाह परिंदों सा उड़ना है, खुला आसमान चाहती है बेटी
अपनी संभावनाओं को स्वयं के, सहारे ही तलाशती है बेटी
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समेटो न हमें दकियानूसी लकीरों में, लगाती गुहार है बेटी
तुम तो हमें ख़ुशी से अपनाओ माँ, करती मनुहार है बेटी
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जीवन को कंटीली राह बनाने वाली,नहीं होती कभी शूल है बेटी
सृष्टि का सृजन करने के लिए भी क्या नहीं अनिवार्य मूल है बेटी ?
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अब भी सम्हल जाओ ,सुनो आहट आने वाले कल की क्योंकि...........?!!!!!!!!
फिर,ज्येष्ठ की कडकती तपन में, छांह सी खोजी जाएगी बेटी
तपते मरुभूमि में बूंद भर जल की चाह सी, तलाशी जाएगी बेटी
भूले-भटके बियाबान जंगल में सही राह सी, कहीं खो जायेगी बेटी
कस्तूरी की खोज में भटकते मृग की, बस चाह सी हो जायेगी बेटी ............
एक नवीन आयाम ,एक नयी सोच की सुक्ष्म सी रोशनी के साथ
यमुना पाठक का आप सबको कोटि-कोटि धन्यवाद
इस समस्या से नारी को अपने सबसे प्रारम्भिक दौर यानि उसके इस खूबसूरत दुनिया में कदम रखने से और कभी-कभी तो कदम रखने के पूर्व ही रूबरू होना पड़ता है जिसका उसे कोई पूर्वाभास तक नहीं हो पाता.वह समस्या है ----" गर्भ में ही उसे सुला दिया जाना और अगर वो इस जगत में आ भी जाए तो उसे भरपूर ख़ुशी से ना अपनाना" .
कहीं हम भी इस समस्या का कारण या परिणाम तो नहीं .?जानने के लिए पढ़िए यह ब्लॉग..............................
दोस्तों, हम सब इस सच्चाई से वाकिफ हैं कि हमारे देश भारत में लिंगानुपात संतोषजनक नहीं है.यह ठीक है कि सन 2000 में यह 927 /1000 था और अब 2001 में यह 933/1000 हो गया है पर आज भी कुछ राज्य ऐसे हैं जहाँ लड़कियों की संख्या गिरती जा रही है हरियाणा में यह 820/1000 है तो पंजाब में यह लिंगानुपात 793/1000 है.हमारा समाज एक पुरुष प्रधान समाज माना जाता है पर मैं आप सभी से एक प्रश्न पूछना चाहती हूँ.क्या महिलाओं से जुडी हर समस्या की वज़ह केवल पुरुष ही है?क्या महिलाएं कुछ अंश के लिए भी इन समस्याओं के लिए जिम्मेदार नहीं हैं?यहाँ मैं स्वयं से जुडी अनुभूति का ज़िक्र करना चाहती हूँ .
बात सन 1998 की है जब मुझे प्रथम बार जननी बनने का सुख प्राप्त हुआ .आप सोच रहे होंगे इसमें कौन सी नयी बात है?हर विवाहिता, माँ बनकर ही संपूर्ण नारी बनती है.ठीक सोचा आपने;; पर मेरे लिए यह बात किसी गहरी परिणति से जुड़ गयी थी . अस्पताल के ऑपरेशन theater में अर्ध्चेत्नावस्था में जब मुझे ज्ञात हुआ कि इस दुनिया में आने वाला शिशु एक कन्या है तो मेरी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली,एक तो surgery की असहनीय पीड़ा और उससे भी ज्यादा एक पुत्री होने के अतीत का कटु अनुभव---"बचपन में मैं कुशाग्रबुधि थी, दसवीं की कक्षा में टॉप किया था, विज्ञान शाखा से पढ़ना चाहती थी पर पुत्री के पिता होने से उपजे डर ने उन्हें एक कठोर निर्णय लेने पर विवश किया "मैं तुम्हे आगे पढने के लिए बाहर नहीं भेज सकता" मेरे सारे मंसूबों ने दम तोड़ दिया. मैंने उस कठोर फैसले तथा उसके बाद की पापा की नसीहत "बिटिया लडकी की इज्ज़त उस कांच के सदृश होती है जिस में अगर एक बार दरार आ गयी तो वह उम्र भर के लिए विकृत ही माना जाता है"की गहराई पर उस वक्त लेश मात्र भी ध्यान नहीं दिया था,पर आज उस नसीहत और फैसले की नजाकत को समझ सकती हूँ .पापा की प्रेरणा और हौसलाफजाई से बारहवीं मैंने कला संकाय से पूरा किया c .b.s e से टॉप दस विद्यार्थियों में स्थान पाया merit certificate भी प्राप्त हुआ; उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाना चाहती थी पर फिर वही कठोर निर्णय.मैंने भी समझौता कर लिया पर आगे की पढ़ाई में भी सर्वोत्तम देने के जुनून को विराम नहीं दिया ;पिता का दुःख समझ सकती थी.मैंने अर्थशास्त्र से M A की डिग्री ली और फिर B ed पूरा किया .एक अध्यापिका बन कर ही सर्वोत्तम देने कि पूरी कोशिश की."खैर .............
जब आँखें खुली तो बच्ची को उसके पिता की गोद में पाया उनकी आवाज़ सुनाई दी"देखो,इसकी आँखों में कैसी गहरी चमक है"मैंने बच्ची की तरफ देखा यकीनन "" एक पुरुष के प्रथम बार पिता बनकर हर्षातिरेक में की गयी ये भावपूर्ण अनुभूति की सजीव अभिव्यक्ति और एक माँ की छुपी हुई चिरस्थायी ममता का गहन प्रभाव ही था "मुझे सच में उसकी आँखों में गहरी चमक दिखाई दी .लबों से आहिस्ता से एक शब्द बाहर आया "दीप्ताक्षी,दीप्त +अक्षि (shinning eyes )तब तक पिताजी(father -in -law ) भी आ चुके थे उन्होंने मेरी नम आँखें देख वज़ह पूछा .मैंने कहा" असहनीय पीड़ा की वज़ह से रोना आ गया".पर ये सच कहा जाता है" माता-पिता की आँखें कभी धोखा नहीं खाती" उन्होंने जिंदगी की कशमकश में काफी अनुभव एकत्र किया होता है. यही वज़ह थी कि पापा की अनुभवी आँखों को भी मेरी आंतरिक पीड़ा समझते देर नहीं लगी.
एक सप्ताह बाद जब हॉस्पिटल से मैं घर आई तो देखा घर में बहुत सी स्त्रियाँ सोहर (उत्तर प्रदेश में गाया जाने वाला एक लोकगीत जो कि घर पर पुत्र होने की ख़ुशी में गाया जाता है)गा रही थी .पंडाल सजे थे .पता चला कि पिताजी और घर पर सभी भाइयों ने बच्ची के जन्म की ख़ुशी में एक शानदार पार्टी का आयोजन किया है वो सबके लिए अनमोल थी. पापा ने एक ही फैसला लिया"इस बच्ची की प्रतिभा की राह में कोई सामाजिक
भय,दकियानूसी परम्पराएं,अभाव कभी अवरोधक नहीं बनेगें"
मैं बचपन से इंदिरा गांधीजी से बहुत प्रभावित थी कोई मुझे पूछता था "बड़ी होकर क्या बनना चाहोगी?" मेरा ज़बाब होता था "इंदिरा गाँधी" यकीनन इंदिरा प्रियदर्शिनी का प्रभाव अब भी खत्म नहीं हुआ था .और उस दिन हम दोनों ने एक निर्णय लिया," यही हमारी पहली और आखिरी संतान होगी और मैंने उसे नाम दिया "प्रियदर्शिनी"..
अब आप ही बताइये, मेरी सोच को एक नवीन आयाम देने वाले इसी घर ,परिवार,समाज के पुरुष ही तो थे. पापा आज इस दुनिया में नहीं हैं;इसी सितम्बर महीने में वे चिरनिद्रा में सो गए मगर उनकी ख्वाहिश थी कि उनकी यह पोती एक सफल डॉक्टर बने.यह मेरी जिंदगी कि सबसे अहम् घटना थी इसलिए सही सोच वाले पुरुषों के प्रति समाज हमेशा नतमस्तक रहता है ;वे ही समाज को एक नयी दिशा देते हैं ;अगर एक नारी माँ,बहन ,बेटी बनकर अपनी जिम्मेदारी निभाती हैं तो एक पुरुष भी पिता,भाई ,पुत्र, बनकर अपनी जिम्मेदारी सफलता पूर्वक निभाता है .सच तो ये है कि इसमें हर रिश्ता क्रमशः एक-दूजे का पूरक है........
बस इसलिए इस अनुभव से प्रेरित होकर मैंने यह कविता लिखी है "कस्तूरी की खोज में मृग की भटकन सी बेटी "
भोर में खिले ताज़े फूल पर पड़ी, ओस सी होती है बेटी .
दरख्त की शाख पर उगी नाजुक, कोंपल सी होती है बेटी
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पूनम की रात को रोशन करती ,पूर्ण चाँद सी होती है बेटी
प्यार से पनाह दो तुम इसे, तुम्हारा अंश ही होती है बेटी
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तुम्हारे आशियाने को अपनी खुशबु से महकाती,फूल सी है बेटी
हर क्षण घर को अपने मधुर संगीत से चह्काती,बुलबुल सी है बेटी
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दो घरों को जोड़ने वाली मजबूत, सेतु और इज्ज़त है बेटी
खुशियों से एक नहीं दो , आशियाने को करती ज़न्नत है बेटी
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यह ज़रूर है कि हर मंदिर,हर दरगाह की नहीं होती मन्नत है बेटी
पर समझ लो खुदा के घर से तुम्हारे दर, खुद ही आई नेमत है बेटी
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घर-चौखट की मर्यादा बनने को, हर सांचे में ढलती है बेटी
दरिया सी हरदम आगे ही अपने, मंजिल तक बढ़ती है बेटी
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काश भर लेते अंक में हमें कभी, इसी ख्वाहिश में जीती है बेटी
उन्नत समाज की विडम्बना कि गर्भ में ही सुला दी जाती है बेटी
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रीति-रिवाज़ की वेदी पर क्यों, हम ही चढ़े ?आज पूछती है बेटी
हुनर होने पर भी क्यों आगे हम न बढे? कहकर सिसकती है बेटी
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हमारे ही लिए क्यों सवालों के सारे घेरे ? दुःख से चीखती है बेटी
दहेज़ जैसे अभिशाप के दंश,क्यों हम सहें ? मूक ये सोचती है बेटी
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बेपरवाह परिंदों सा उड़ना है, खुला आसमान चाहती है बेटी
अपनी संभावनाओं को स्वयं के, सहारे ही तलाशती है बेटी
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समेटो न हमें दकियानूसी लकीरों में, लगाती गुहार है बेटी
तुम तो हमें ख़ुशी से अपनाओ माँ, करती मनुहार है बेटी
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जीवन को कंटीली राह बनाने वाली,नहीं होती कभी शूल है बेटी
सृष्टि का सृजन करने के लिए भी क्या नहीं अनिवार्य मूल है बेटी ?
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अब भी सम्हल जाओ ,सुनो आहट आने वाले कल की क्योंकि...........?!!!!!!!!
फिर,ज्येष्ठ की कडकती तपन में, छांह सी खोजी जाएगी बेटी
तपते मरुभूमि में बूंद भर जल की चाह सी, तलाशी जाएगी बेटी
भूले-भटके बियाबान जंगल में सही राह सी, कहीं खो जायेगी बेटी
कस्तूरी की खोज में भटकते मृग की, बस चाह सी हो जायेगी बेटी ............
एक नवीन आयाम ,एक नयी सोच की सुक्ष्म सी रोशनी के साथ
यमुना पाठक का आप सबको कोटि-कोटि धन्यवाद