Wednesday, November 27, 2013

7 अंकों वाला love

प्रिय पाठकों
पूरे विश्व को एड्स जैसी बीमारी से सचेत और सजग करने के हेतु एक दिसंबर 'विश्व एड्स दिवस' के रूप में मनाया जाता है.पिछली बार इस दिवस पर मैंने 'प्रेम की दैहिक भाषा 'ब्लॉग लिखा था.यूँ तो इस रोग की कई वज़हें हैं पर विवाह व्यवस्था और उसकी शुचिता से भी इसकी रोकथाम कुछ हद तक अवश्य सम्भव है.सात फेरे;सात वचनों वाली भारतीय विवाह संस्था की शक्ति,मर्यादा,पवित्रता पूरे विश्व पटल पर एक मिसाल है यह दो व्यक्तियों,दो वंशों ,दो परिवारों के मिलन के साथ ही अत्यन्त उत्कृष्टता से आध्यात्मिक शक्तियों का भी मिलन है.इसी भाव पर आधारित कुछ प्यार मनुहार की लघु कविताएँ लिख रही हूँ.
1)
बड़ी/छोटी गोल दुनिया
दायरा तुम्हारा है अत्यंत बड़ा
समाते हैं उसमें दुनिया जहां के लोग
परिवार से सम्बंधित
कार्यालय से सम्बंधित
तुम सब की चिंता में मग्न
ज़ेहन में तुम्हारी ...
कई कामों की रूप-रेखा.
पर.........
मेरी दुनिया का दायरा
बहुत सिमटा हुआ है
वह है...
मेरे माथे की छोटी सी गोल बिंदी में
तुम्हारे लिए रचती  गोल रोटी में

अच्छा लगता है जीना मुझे
अपनी इन छोटी-छोटी
गोल दुनिया में
जो समेट लेती है
तुम्हारी वो बड़ी सी दुनिया.
2)
सुवासित लम्हे
एक रात जब भर लिया था
मैंने
अपनी हथेलियों को
रातरानी के फूलों से
और....
महक उठी थी दरो-दीवार
तुमने पूछा....
भाते नहीं क्यों तुम्हे कभी
सुन्दर,महकते लाल गुलाब??
भा जाते हैं बस...
रजनीगंधा,मधुमालती
हरसिंगार,रातरानी और पारिजात.
मैंने धीरे से कहा
क्योंकि.......
ये सभी खिलते हैं बहुतायत से
ठीक तुम्हारे प्यार की तरह
आधिक्य में,
खुशबुओं से लबरेज़
मेरे छोटे-छोटे लम्हों को
सुवासित कर जाते हैं.
3)
पूर्ण विराम
तुम साथ हो मेरे....
ख्वाहिश नहीं मुझे अब कोई
तुम्हे छूना,तुम्हे निहारना
सम्पूर्णता से तुम्हे पाना
अपनी खुशी,अपने आंसू को
'मैं' से 'हम' में
तब्दील होते देखना
मेरी हर ख्वाहिश में
लगा देता है पूर्ण विराम.
4)
सेलिब्रेशन
नहीं करती नज़रअंदाज़...
तुम्हारी किसी बात को मैं
तुम्हारी छोटी से छोटी खुशी
हैं मेरी ज़िंदगी के हार के
छोटे-छोटे फूल की मानिंद
जब-जब पिरोती हूँ
उन छोटे-छोटे फूलों को
हाथ चलते हैं
पर मन....
उस हर खुशनुमा पल को
करता है सेलिब्रेट
बन जाता है जब पूरा हार
जीवन स्वयं हो जाता है
'एक सेलिब्रेशन'.
5)
लॉन्ग ड्राइव
एक पल जो ...
बेइंतहां भाता है मुझे
लॉन्ग ड्राइव पर जाना तुम्हारे साथ
तुम्हारे पसंदीदा गानों पर
तुम्हारा मंद-मंद मुस्काना
उन्हें कपकम्पाते लबों पर सजाना
मैं तुम्हे निहारते सोचती हूँ
कैसा चुम्बकीय आकर्षण है
तुम्हारे व्यक्तित्व में
तुम्हारी निगाहें पल भर को
हट जाती हैं सड़क से
क्या सोच रही हो ????????
पूछ बैठती हैं
मेरा चोर मन कहता है
देखो...देखो....
छूटे जा रहे हैं नदी-नाले शहर -गाँव
इमारतें जंगल और उद्यान
तुम हंस कर कहते हो
छूट जाने दो
बाज़ार गालियां दरो दीवार
बस हमारा साथ ना छूटे
ना आये कभी
इस लॉन्ग ड्राइव का गंतव्य
इसकी मंज़िल दूर और दूर होती जाए
वो सामने दिखते ...
क्षितिज की तरह .

6)
छोटी-छोटी खुशी
कहते हो यह अक्सर तुम
दिल से कभी लगाया ना करो
दुनिया जहां की...
छोटी-छोटी बातों को
रहो खुश हमेशा
हंसती-खिलखिलाती
हर उठती-गिरती लहरों में
क्योंकि.....
मेरी ज़िंदगी
चलायमान,गतिशील है
दुनिया जहां की
छोटी-छोटी बातों से नहीं
बल्कि..........
तुम्हारी छोटी-छोटी
खुशियों से.
7)
नुमाइश
ठन्डे मौसम में देर रात
कंप्यूटर स्क्रीन पर....
उभर रही थी तकरीरें
हमारे प्रेम की इबारतें
धीरे-धीरे..........
तुम जागे आधे नींद से
पूछा...
नहीं आओगी सोने ??????????
टाइप कर रही हूँ
पहुंचा रही हूँ
हमारे प्यार को
जग के कोने-कोने में
मुस्काते हुए कहा था मैंने...
उनींदी आँखों से अस्फुट से शब्दों में
कहा तुमने...
प्यार को प्यार तक ही रहने दो
नुमाईश में यह
तोड़ देता है दम

थम गई की बोर्ड पर
कपकम्पा कर उंगलियां
फड़फड़ा कर बंद हो गई
लाल डायरी.
कितना सच कहा तुमने !!!!!!!!!!!!!
तुम्हारा सारा प्यार...
कैद कर लिया अंतस में मैंने
कभी जगजाहिर ना करने के लिए .

Sunday, November 17, 2013

डैंड्रफ वाला तोता

दोस्तों ,मुझे टी.वी पर लोगों की ज़रूरतों,अभिरुचियों,चाहतों को प्रतिबिंबित करते...उत्पाद के प्रति लुभाते... आकर्षित करते ...विज्ञापन सदा ही आकर्षित करते है..उत्पादों के प्रति आकर्षण हो ...कोई ज़रूरी नहीं पर अधिकाँश विज्ञापनों के भाव से प्रभावित होती हूँ .आजकल चुनावी महापर्व या यूँ कहें चुनावी महासमर के मौसम में सबसे ज्यादा आकर्षित कर रहा है 'डैंड्रफ वाले तोते' का विज्ञापन ..."जिसमें छत से पपड़ी गिरने की सत्यता को एक तोता बताता है जबकि मीडिया उस तोते को 'डैंड्रफ वाले तोते' के रूप में खबर बनाने की जल्दी में होता है".सम्बंधित उत्पाद में तो मुझे कोई रुचि नहीं ...हाँ,मीडिया पर किये व्यंग से सरोकार रखती हूँ और जब उन्नाव जिले के डाँड़ियाखेड़ा गाँव में साधू शोभन सरकार के स्वप्न के फलस्वरूप खुदाई का कार्य और उसकी कवरेज लेते मीडिया की भूमिका देखा तो इस विज्ञापन का व्यंग और भी मुखर लगा.सच कहूं ,अगर जमीन भी विज्ञापन वाले तोते की तरह बोल सकती तो चीख कर कहती,"प्रजातंत्र के चौथे स्तम्भ,तुम अपनी असली भूमिका क्यों भूल रहे हो ?बंद करो 'साधू,स्वप्न और सोने 'सरीखे अंधविश्वास की कवरेज."ऐसा ही कुछ वर्ष पूर्व हुआ था जब गणेश जी द्वारा दूध पीने की खबर बगैर सोचे ,समझे, मनन किये पूरे देश में फ़ैल गई थी तब भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने ही फूर्ति दिखाई थी.स्वामी विवेकानंद जी के शब्दों में ,"मैं आप सब को अन्धविश्वास,मूर्ख देखने की बजाय चाहूँगा कि आप सब घोर नास्तिक बन जाएं क्योंकि नास्तिकता जीवन तो है जिससे हम कुछ बन सकते हैं पर यदि अन्धविश्वास में फंस गए तो बुद्धि चौपट हो जाती है,सोचने की शक्ति क्षीण हो जाती है जीवन का ह्रास हो जाता है. पर जमीन नहीं चीखी.. अपने कुछ अन्य स्तम्भ के साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सक्रिय रहा.
यह अन्धविश्वास के साथ पलायनवादिता ही तो है कि एक स्वप्न के सच को तलाशा जाए ...जबकि कई सच रोज जाहिर होते हैं और मौत बन कर दफ़न हो जाते हैं ..
.सच को गहराई में दफ़न कर देना और स्वप्न को गहराइयों से निकालने की कोशिश करना ...जाने कैसा विरोधाभास है जिसे मीडिया कारण सहित पूरी निष्पक्षता से दिखाने के बजाय किसी खेल की कमेंट्री के सदृश जुबान देकर ,अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह कर चुप्पी साध लेता है..प्रिंट मीडिया के लिए तो फिर भी प्रेस कौंसिल ऑफ़ इण्डिया जैसी नियामक संस्था है पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर कोई नियंत्रण नहीं है.दो चार दिन पूर्व एक चैनल ने डेल्ही से २३८ किलो मीटर दूर भानगढ़ के किले के रहस्य पर ध्यान लगाया हालांकि बार-बार कहा गया हम वैज्ञानिकता पर विश्वास करते हैं अन्धविश्वास को बढ़ावा नहीं देना चाहते पर साथ ही दीवारों पर बनी आकृति,टीम के साथ जो आदरणीया महिला थीं किले के अंदर उनकी तबीयत खराब होने की बात को वे ना बताएँ ऐसा भी नहीं हुआ. उनके अनुसार ,"चाँद पर पहुँचने के युग में चांदनी रात में भूतों की मीटिंग ' को पास के गोलकवास गाँव में किसी ने नहीं देखा था ; हाँ ,सुना ज़रूर था."फिर ज़रुरत क्या है ऐसी खबरों की ,जब गाँव के निवासी ही उस किले से जुडी डरावनी बातों को सच में देखे जाने से इंकार कर रहे हों .देश विदेश से जुडी तमाम खबरें हैं उन्हें दर्शकों तक पहुंचाना ज्यादा ज़रूरी है.बजाय अंधविश्वास से जुडी खबरों को दिखाने के .मेरी समझ से ऐसी जगह जहां अँधेरा हो,चमगादड़ उड़ रहे हों ,किसी की भी तबीयत बिगड़ सकती है.
अब ऐसा क्या किया जाए कि मीडिया स्वतंत्र भी हो और प्रजातंत्र के चौथे स्तम्भ की महत्त्वपूर्ण भूमिका को भी निभा सके .इसके लिए इस चौथे स्तम्भ को स्वयं चार बातों पर ध्यान केंद्रित करना होगा...खबरों के प्रकृति की सत्यता और निष्पक्षता,स्वयं की सजगता,अभिव्यक्ति की स्पष्टता,तथा भाषा प्रयोग में शिष्टता .
दूसरी अहम् बात 24 *7 की खबर प्रणाली बंद करनी होगी.समाचार चैनल के नाम पर वाद-विवाद,आरोप-प्रत्यारोप,मनोरंजन,बाबाओं ,ज्योतषियों के कार्यक्रम पर रोक लगानी होगी.किसी भी खबर की कवरेज निकालने और बार-बार प्रसारित करने के इस पॉपुलैरिटी सिन्ड्रोम से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को बचना चाहिए.
मुझे याद है जब आठवीं कक्षा में पढ़ती थी तब पापा हर दिन समाचार पत्र पढने को कहते क्योंकि खबर पढने के साथ शब्दों का भण्डार उनकी वर्तनी की शुद्धता खुद ब खुद हम सीख सकते थे,साथ ही वे हमें रेडियो पर प्रसारित खबरें सुनने को भी प्रेरित करते थे. कहते ,शब्दों के उच्चारण में सुधार होगा और वाक् शैली परिष्कृत होगी.फिर दूरदर्शन प्रचलन में आया तो उनका कहना था अब तुम समाचार सुन कर ज्ञान वृद्धि के साथ उच्चारण ,भाव,शब्द समझने के साथ बोलने की तहज़ीब भी
सीख सकोगी.सच था हम समाचार उदघोषक/उदघोषिकाओं से शालीन,शिष्ट भाषा, विचार-विमर्श के दौरान बातचीत की तहज़ीब सीख पाते थे आज भी कुछ चैनल बेहद अच्छे हैं लोक सभा,राज्य सभा टी.वी ,डी.डी भारती में प्रसारित बहस,विचार विमर्श बहुत ही आकर्षक होते हैं.पर अन्य कुछ चैनल में बेबाकी के नाम पर जो वाक् युद्ध चलता है वह चौथे स्तम्भ की मज़बूती पर प्रश्न चिन्ह छोड़ता है.
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चूँकि बच्चों- बड़ों, स्त्री -पुरुष ,गाँव शहर तक अपनी सहज पहुँच रखता है अतः उसे अत्यंत संजीदा ,सजग ,तार्किक और निष्पक्ष हो कर खबरों को पहुँचाना होगा.किसी भी मुद्दे पर विचार-विमर्श,बेबाक बहस के नाम पर ऐसा कुछ भी ना दिखाएँ जिसकी प्रति मिनट के कवरेज से दर्शक को कुछ भी
हासिल होने वाला नहीं है.समाचार ना तो क्रिकेट मैच होते हैं ना ही किसी फ़िल्म की कहानी जिसे देखने और दिखाने के लिए हर शॉट...हर कोण के साथ बार बार प्रसारित किया जाए.अगर हिंसा की खबर है तो उसे बार-बार दिखाने से अन्य संवेदनशील स्थानों पर भी हिंसा हो सकती है ..अतः ऐसे समाचार हर कोण से दिखाने की कोई ज़रुरत नहीं .पहले इतने चैनल नहीं थे तो प्रतियोगिता,टी.आर .पी .,आय ( revenue )की कोई आपाधापी भी नहीं थी,बिहारी के दोहे की तरह (सतसैया के दोहे ज्यों नायक के तीर,देखन को छोटे लगे,घाव करे गम्भीर)समाचार सारगर्भित,विषय केंद्रित,संक्षिप्त और प्रभावकारी होते थे.बिना शब्दों के आडम्बर और अतिश्योक्ति के जटिल से जटिल विषय प्रस्तुत होते थे .जब १९७१ में भारत-पाक युद्ध चल रहा था,लोगों से धैर्य रखने के साथ ,रात में घरों की बिजली बंद रखने की हिदायत दी गई थी...पूरी प्रमाणिकता के साथ खबरें जनता तक पहुँचती थी पर आज की तरह...सावधान,खबरदार...कोई है....जैसे शब्दों से आपके आस-पास के डर भय संशय,अशांति को और भी भयावह नहीं बनाया जाता था.सबसे पहले खबर मैंने दिखाया...मैं सबसे तेज....मेरी खबरें सर्वाधिक प्रमाणिक...ये कैसी प्रतियोगिता है ?मुझे जमशेदपुर की ओर जाने वाली ट्रेन में एक चाय वाला याद आता है ,वह कहता था,"खराब से खराब चाय पीयो"और सारे ग्राहक उसे बुला कर चाय खरीदते.कोई नेता...कोई चैनल तो यह कर के देखे ...मैं खराब से खराब नेता हूँ...मैं घटिया से घटिया चैनल हूँ...देखो लोग स्वयं खींचे आयेंगे ऐसे नेता ऐसे चैनल की तरफ.
एक दर्शक होने के नाते मैं अपेक्षा करती हूँ कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने खबरों के दौरान यह ध्यान रखे कि स्टूडियो में आये मेहमान के शब्दों को आरोप-प्रत्यारोप ,गरम बहसबाजी में परिवर्तित होने के पहले ही कैमरा बंद कर दे.खबरें इस तरह प्रसारित करे कि जनता में स्थानीय,राष्ट्रीय,अंतराष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में जीने का उत्साह आये.उस खबर की प्रमाणिकता ठोस रहे. खबरों द्वारा नेताओं की जन्म कुंडली नहीं ;देश के लिए उनके द्वारा किये गए कार्यों और नीतियों की कुंडली जनता के समक्ष रखी जाए...तभी देश का चौथा स्तम्भ जिम्मेदार माना जा सकेगा .
तुम हुंकार की वर्णमाला गढ़ो
पर कोई अक्षर छूट ना जाए...
तुम अवाम की आवाज़ बनो
पर आवाज़ वो घुट ना जाए...
तुम हर पटकथा के कथाकार बनो
पर कोई किरदार खो ना जाए...
तुम सत्य की मूरत बनो
जो जितनी सुन्दर सामने से हो
सुन्दर
उतनी ही हो
पृष्ठ से भी
(प्रायः मूरत सिर्फ सामने से सुन्दर होती है)

तुम्हारी सत्यता,निष्पक्षता में
ना हो सके संशय की कोई गुंजाईश




तुम पर हमें है दम्भ




क्योंकि ....तुम हो
प्रजातंत्र के चौथे स्तम्भ.

'पेन ड्राइव' में बंद ज़िंदगी

कल....
बेचैन..बेसब्र..
भरपूर तलाशा ज़िंदगी को.

ठहाकों में अपनों के...
मुस्कराहटों में बच्चों के.

सोचा......
देख लूँ आईना ही
शायद मिल जाए ज़िंदगी.

अपनी आँखें भी कहाँ देख पाती हैं
अपने ही चेहरे को !!!
सहारा लेना पड़ता है
किसी निर्जीव दर्पण का
या फिर......................

किसी बेहद करीबी की
बोलती आँखों का
जिसमें दिख सके
छवि अपनी पाक-साफ़
नहीं मिला ...ऐसा कोई करीबी .
आईने में दिखती..
अपनी तस्वीर में भी
पा सकी ना मैं ज़िंदगी.
पाती भी कैसे ?????
मिट गई थी वो
सजीवता के पन्नों से
प्राण भरे ....सभी एहसासों से
वक्त ही कहाँ है आज ??
सांस लेने का इस सजीवता को .

..........
थकी,क्लांत,मायूस नज़रें
टिक गई मेज़ पर
थिरक गई लब पर
एक फीकी मुर्दनी हंसी
बच्चों के ...
पसंदीदा चॉकलेट के मानिंद
पड़ा था एक पेन ड्राइव
और........................
उसकी प्राणहीन सूक्ष्मता में
बंद पडी थी ज़िंदगी.

दोस्तों,ज़िंदगी के बड़े-बड़े एहसास आज सिमटते जा रहे हैं...जीवन यांत्रिक हो गया है...यांत्रिकता का यह प्रसार हर विस्तार को अपने में समेट कर बेहद सूक्ष्म रूप देता जा रहा है.गीत,संगीत,मनोरंजन ,ज्ञान,अपनों से जुडी यादों से लबरेज तस्वीरें ,अपने अनुभव सभी एक छोटे से पेन ड्राइव में बंद होते जा रहे हैं...यह तकनीक की चरम कुशलता है ...दीर्घ को लघु करने की निपुणता है ...इसका स्वागत किया जाना चाहिए बस यह ध्यान रखना है ...ज़िंदगी की सजीवता,आत्मीयता सूक्ष्म और निर्जीव ना होने पाये .

Sunday, November 10, 2013

मैं आज भी उतना ही मासूम हूँ! (14 nov children's day)

बच्चे वक्त से पूर्व बड़े हो रहे हैं...उनकी मासूमियत कहीं खो रही है...वे बड़ों की बात नहीं सुनते....पीढ़ियों का अंतराल बढ़ रहा है....ऐसी कई शिकायतें लगभग हर समारोह,आयोजन ,पब्लिक फोरम में लोगों के बीच विचार विमर्श का मुद्दा बन रही हैं.अगर ये शिकायतें अल्पांश में भी सही हैं तो इसके लिए दोषी कौन है ?????????
शिक्षाविद श्रीमान नारायण जी ने यही प्रश्न उठाया था.
"After all who are these students/children  ?Are they not our brothers & sisters or sons & daughters ?? If there is something wrong with them,surely there is very wrong with us also.In other words condemnation of the student/children is in a sense condemnation of ourselves.We cannot shirk our responsibility in this regard.The fault lies partly with the system of education,partly with the teachers of educational institutions,partly with the existing social conditions & partly also with the conditions obtaining in our homes.  "

संस्कार और मूल्यों के कोई 'crash course  ' नहीं होते;ये परिवार,समाज और देश की आबो-हवा में घुले होते हैं जिन्हे बच्चे ऑक्सीजन की तरह हर पल ग्रहण करते रहते हैं.हवा जितनी शुद्ध होगी ...उतनी ही सशक्त नई पीढ़ी का जन्म होगा...बुजुर्ग  पीढ़ी के जिम्मेदार लोग तो सदियों से मूल्यों के संवाहक बने हैं .गलती दूसरी पीढ़ी या व्यस्कों से हो रही है जो कभी नौकरी का दबाव ,कभी समयाभाव कभी गृहस्थ जीवन की आपाधापी का हवाला देकर सबसे पहले जिस जिम्मेदारी की उपेक्षा कर रहे हैं -वह है पारिवारिक मूल्य और उससे जुड़ा बचपन.

दो महीने पूर्व अपनी बिटिया को हॉस्टल छोड़ कर लौट रही थी.सामने की बर्थ पर एक युवा दंपत्ति और उनका आठ वर्ष का पुत्र बैठा था.मैं अपने पतिदेव के साथ बिटिया के बचपन ,उससे सम्बंधित कई यादों को बांटने में मशगूल हो गई जैसा कि मैं हमेशा करती थी.अचानक सामने ध्यान गया तो मायूस हो गई.युवा दंपत्ति में पति किसी कांफ्रेंस की चर्चा के लिए मोबाईल में व्यस्त थे ;पत्नी लैप टॉप पर किसी मूवी में और बीच में बैठा बच्चा कभी मोबाईल की तरफ तो कभी लैप टॉप की तरफ देखता ;;ज़रुरत और समझ के अनुसार ढिशुम-ढिशुम की आवाज़ निकालता...हेल्लो हेल्लो करता और फिर खिड़की के कांच से बाहर देखने की कोशिश करता .सफ़र में संवाद तो चल रहा था पर एकतरफा और पूर्णतः यांत्रिक.मैं सोच रही थी ये दंपत्ति अपने बचपन के दिनों की बातें,बच्चे के एहसासों की बातें कर सफ़र को कितना जीवंत और यादगार बना सकते हैं...मन नहीं माना और आज्ञा लेकर उनसे रूबरू हुई और आपस में संवाद और जुड़ने का महत्व समझाया .थोड़ी देर में ही वह छोटा सा परिवार बेहद जीवंत हो उठा ....ए.सी के उस बंद डब्बे में भी बचपन खुल कर सांसें लेने लगा...माता-पिता के बचपन के पंख उस बच्चे में गज़ब का उड़ान भरने लगे....मुझे तसल्ली हुई....अपनी बिटिया से दूर होने का कष्ट भूल गई.
आज बचपन समाज के हर क्षेत्र से गायब हो रहा है...विज्ञापन,सिनेमा,धारावाहिक गाने,नाटक,बचपन को समय पूर्व परिपक्व साबित करने की कवायद में जुट गए हैं.कुछ इस मशहूर शेर के अंदाज़ में.....
"जुगनुओं को  दिन के उजाले में परखने की जिद करें....

बच्चे इस दौर के किस कदर चालाक हो गए हैं"

अब गाने अगर 'छोटा बच्चा जान कर हमको ना समझना रे' होंगे ....विज्ञापन के पापा ईश्वर की प्रार्थना से मच्छर भगाने की बात करें और बच्चा कहे हाँ, ईश्वर ने प्रार्थना टेबल के नीचे से सुन ली'....बच्चों के लिए बने धारावाहिक शिन चान का किरदार बड़ी-बड़ी बात करे तो आप ही बताइये बचपन स्वयं को कैसे बचा पायेगा ?कहाँ गए वो 'दादी माँ दादी माँ मान जाओ 'सरीखे पारिवारिक मूल्यों पर आधारित गाने....अमूल की मासूम बच्ची जैसी छवि और विज्ञापनों में क्यों नहीं दीखती....मोगली जैसे किरदार क्यों गायब हो रहे हैं....गिल्ली डंडा,कबड्डी,पोशमपाई जैसे खेलों ने क्यों दम तोड़ दिया ..और बंद कमरों के बंद बक्से में बेहद हिंसक रूप में पुनर्जन्म कैसे ले लिया है......इनमें से प्रत्येक प्रश्न का ज़वाब सिर्फ और सिर्फ दूसरी पीढ़ी के पास है.
ईश्वर ने बच्चों को सिर्फ वंश वृद्धि या मानव जाति की शाश्वता बरकरार रखने के लिए धरती पर नहीं भेजा है ...बच्चे ही हैं जो हमें दबाव और तनाव के क्षण में भी निश्चलता,निष्कपटता,के साथ बेशर्त प्यार और सत्यता का पाठ पढ़ाते हैं.जो व्यक्ति बचपन के जितना करीब रहता है 'वह उतना ही सहज,संतुलित,मासूम और बेफिक्र होता है.

एक मशहूर शायर का शेर याद आता है
मालूम ना था इतने फूल होंगे ऐ ज़िंदगी तेरी बाहों में

हमने तो अपना बचपन गुज़ारा था काँटों भरी राहों में "

पर इस फूल और काँटों की भी समझ बड़े होने पर आती है... हम तुलनात्मक,समीक्षात्मक होने लगते हैं ..बचपन की उन यादों को मौजूदा समय से तुलना कर बैठते हैं और तब एहसास होता है कि बचपन में कितने फूल और कितने कांटे थे ...निश्छल,निर्भय ,निश्चिन्त बचपन को तो इनका एहसास भी नहीं होता.
जैसा कि सुभद्रा जी की पंक्तियाँ कहती हैं .....
"ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी
बनी हुई थी आह, झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी

चिंता रहित खेलना खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद



कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद "

एक पुस्तक में कहीं पढ़ा था
"You may give them your love but not your thought;for they have their own thoughts.
you may house their bodies but not their souls;for their souls dwell in the house of tomorrow,


which you cannot visit ,not even in your dreams "
पर मेरा मानना है कि बच्चों से पूरी संज़ीदगी से संवाद कायम रखने ,उन्हें वक्त देने से ,वे अपने स्वप्न की दुनिया में बड़ों को सहर्ष ले जाते हैं.
इस दीपावली मेरी बिटिया घर नहीं आ पाई,उसने मुझे कुछ मोमबत्तियां पार्सल किये जो mentally challenged  बच्चों ने बनाये थे साथ में एक चिट्ठी जिसमें लिखा,"माँ,मैं इन बच्चों के लिए कुछ करना चाहती हूँ."मुझे दो बातों से तसल्ली हुई...प्रथम ,समाज के प्रति उपजी उसकी संवेदनशीलता और दूसरा, अपने एकाकीपन को अवसाद ना बनाकर प्रेरणा बनाने की उसकी कुशलता .
सच है पीढ़ियों का अंतराल,मासूमियत को असमय परिपक्वता की दहलीज़ पार कराने की कवायद हम जैसे दूसरी पीढ़ी की भयंकर भूल है ...तीसरी पीढ़ी को कभी दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि प्रथम और तीसरी पीढ़ी को जोड़ने वाली सेतु दूसरी पीढ़ी है एक घर में एक कुत्ता पाला गया,घर पर १० वर्षीया बच्ची ने उसका नाम नेट पर खोज कर रखा 'aron 'बच्ची की दादी ने उस पालतू कुत्ते को अपनी समझ से पुकारना शुरू किया 'अहिरावण' (पौराणिक नाम) दोनों ही अपनी-अपनी जगह सही थे अब ज़रुरत थी दोनों कड़ियों को जोड़ने की अतः बच्ची के पिता ने सेतु का काम किया बच्ची और दादी दोनों ही उस पालतू को दोनों नाम से बुला लेती हैं.अगर दूसरी पीढ़ी सजग और संवेदनशील है तो फिर पीढ़ी अंतराल की बात ही कहाँ रह जाती है ?उद्योग जगत में भी y-gen x-gen,baby boomers के बीच पीढ़ी अंतराल की बात होती है पर एक दूसरे को समझना आज आधुनिक तकनीक के माध्यम से कितना आसान हो गया है ...face book,ब्लॉग साइट्स ,सोशल नेट वर्किंग साइट्स जैसे साधनों से ५०-५५ वर्ष का व्यक्ति 20-25 के युवा से जुड़ रहा है बच्चों से जुड़ रहा है मूल्यों के संवाह के लिए इससे सशक्त माध्यम कहाँ मिल पायेगा .बस इन सभी साधनों की सही इस्तेमाल की ज़रुरत है.
ज़रुरत है अपने अनुशाषण ,अपने मूल्यों की तरफ बच्चों को जबरजस्ती खींचने की कोशिश के बजाय स्वयं ही मूल्य बन जाने की ताकि इन मूल्यों , संस्कारों तहज़ीब को बच्चे आबो-हवा और फ़िज़ाओं से प्राकृतिक रूप में ग्रहण कर लें .....बच्चों से जुड़ने,उनकी दुनिया में विचरण करने के लिए सर्वप्रथम उन्हें समझना ज़रूरी है.बच्चे आज भी उतने ही मासूम हैं जितने हम जैसी दूसरी और दादा जी नाना जी जैसी तीसरी पीढ़ी के ज़माने में हुआ करते थे....गलती बड़ों से हो रही है ....उन्होंने अपनी आँखों के चश्में से बच्चों को देखना और परखना शुरू कर दिया है ....हर बच्चा कहता है.....
कैसे पहचाना मैंने बोलो अपने पराये की सीमा
किससे सीखा मैंने इस झूठ फरेब का करिश्मा
जब-जब चाहा मैंने तुमको पाया सिर्फ खिलौना
तुम्हारे शानो शौकत ने किया इस कदर मुझे बौना
मैं आज भी उतना ही मासूम हूँ ,उतना ही निश्छल
छीनता जा रहा क्यों मेरा बचपन हर क्षण पल-पल ??

"God sends children for another purpose than merely to keep up the race ...it is to enlarge our hearts and to make us unselfish and full of kindly sympathies and affections to give our soul higher aims.....my soul is grateful to the lord as He has gladdened the earth with little children."(J.L.Nehru)