Friday, August 16, 2013

ये सात झीने,बारीक परदे

अङ्क सात के महत्व से कोई इनकार नहीं कर सकता.सात फेरे,सात वचन,सात दिन,सात रंग,सात सुर,सप्त ऋषि,सप्त वृतियां,सप्त धातु,सप्त धन्य,सप्त लोक,सप्त सिन्धु,सप्त स्नान,सप्त व्यसन,सप्त गोत्र,भक्ति के सप्त सोपान वगैरह...वगैरह.
पर आज मैं जिन सात बारीक झीने पर्दों की बात करने जा रही हूँ वे हम सब को उद्वेलित करते हैं,हम इनके आर-पार  देख भी पाते हैं पर स्पष्ट कभी भी नहीं .ये सात झीने परदे हैं...


जीवन, मृत्यु, प्रेम, वक्त, रिश्ते, अनुभव और सत्य.


जीवन
मनुष्य हार के लिए नहीं बना
पर जीवन हार-जीत है ही कहाँ .
जीवन तो एक संगीत है
इसे प्रस्फुटित करने के साज़
जुदा-जुदा हैं
वेणु,ढोल,सितार,वीणा
झांझ,मंजीरे,जल तरंग पर
जीवन की धुनें
बजती हैं अलग-अलग अंदाज़ में
सब बेहद कर्णप्रिय,बेहद मधुर
बस महारत साज पर चाहिए .
मृत्यु
बंद पलकों के कोरों से
उस दिन भी छलके थे आंसू
जब तुम्हारे मौत की कल्पना ने
तपा दिया था मुझे
सूनी पलकों के कोरों पे
ठिठक गए हैं वे आंसू
तुम्हारे मृत शरीर की शीतलता ने
बर्फ बना दिया है मुझे
शायद ये शुरुआत है मृत्यु को
सहजता से लेने की.
प्रेम
ज़िंदगी की ज़द्दोज़हद में
कहाँ सूख जाती हैं प्रेम की दरिया
वो कौन सी मरूभूमि है
जो सोख लेती है बूँद-बूँद
जब तक मालूम होता है पता
दरिया मरूभूमि में तब्दील हो जाती है
अच्छा होता जो ये सूखती नहीं
अपितु मरूद्यान का सृजन कर जाती
कम से कम प्रेम का कुछ अंश तो
शेष बचा पाती.
वक्त
बुलंद होता है तो बस
एक ही शय--- 'वक्त'
चिर सत्य
'समय बलवान होता है
'
तभी तो...
एक वक्त आता है कि
बड़ी ही सहजता से मानने लगते हैं
वो सारी बातें जिन का
कभी पूरी सशक्तता से
विरोध किया करते थे हम .
अनुभव
अनुभव क्या है ??
ज़िंदगी के बगीचे से
चुने हुए फूल
दर्द का एहसास देते
चुभते हुए कांटे
महत्व तो इनका तब है
जब जीवन सुवास बन जाए
उनका क्या कहूँ जिनके लिए
अनुभव एक 'कंघे' समान
मिलता भी है तब
जब सर के सारे बाल झड जाते हैं
फिर भी निराशा क्यूँ
पश्चाताप,ग्लानि क्यूँ
इतनी संवेदनशीलता तो हो
कि कंघे से औरों के
केश संवार सके .
सत्य
क्यों मिलती है ज़िंदगी
टुकड़ों-टुकड़ों में
कितना कठिन होता है
इन बिखरे टुकड़ों को समेटना
इन्हें मिलाकर एक
संपूर्ण सार्थक आकृति बनाना
कितना भी जतन करो
टूटे ,बिखरे टुकड़ों में से कुछ
गुम हो ही जाते हैं
और ज़िंदगी की विकृति
कठोर सत्य बन
मुंह चिढा जाती है.
रिश्ते
रिश्ते वन के वृक्ष नहीं
जो बस यूँ ही बढ़ते जाएं
जल,मिट्टी की कुदरती कृपा पर
पल्लवित-पुष्पित होते जाएं
रिश्ते होते हैं...
वाटिका के पुष्पदार पौधे
चाहिए इन्हें विशेष देख-रेख
हर रिश्ता.......
अपने स्वभाव,गुण,प्रकृति अनुसार
देख-भाल चाहता है
ज़रुरत है उसे मिले
उसके ही अनुरूप प्यार और दुलार.
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Sunday, August 11, 2013

दोहराओ मुझॆ बार-बार


गलतियां शायद हो जाती हैं खुदा से भी
तभी तो बार -बार बना कर वो
मिटा देता है अपनी ही खुदाई
ये बनती मिटती दुनिया...
ये बनते मिटते लोग ही...
सबूत हैं इस बात के कि
कमी खुदा की खुदाई में
भी रह ही जाती है ..
गलती उन हाथों से भी
हो ही जाती है.

प्रिय दोस्तों यह ब्लॉग मुझे पुनः प्रकाशित करने पर विवश होना पडा . पूर्व की की गई गलतियों को सोचने और पछताने की जगह उस इतिहास से सबक लेकर ,उसकी अच्छाइयों को अपना कर और बुराईयों को त्याग कर आगे बढ़ना ही ज़िंदगी जीने का असल हौसला है.यदि सचेत होकर,पूरे होश में प्रत्येक कार्य किया जाए तो बहुत सारे अनावश्यक कार्यों और अपराधों या बुराईयों से बचा जा सकता है.मूल्यों पर जीवन जीना आदर्शवाद नहीं बल्कि होश पूर्वक जीने की राह होती है जिसे अपनाना बेहद ज़रूरी है.
कहते हैं लोग ये
ज़रुरत नहीं ..इतिहास को दोहराने की
मैं इतिहास..कहता हूँ
दोहराओ मुझॆ बार-बार
क्योंकि....
सृजन बात नहीं, हर किसी के वश की
सृजन हुनर नहीं, हर किसी हस्त की
सृजन को नहीं ज़रुरत किसी इतिहास की
उसकी बुराइयां,उसकी अच्छाइयों सी ही है मौलिक
वही सृजन एक दिन विध्वंश होगा
ज़रुरत होगी नव निर्माण की
तब हर नव निर्माण को
लेनी होगी उधार में
अच्छाइयां अपने इतिहास की
ताकि अच्छा.....बेहतर बन सके
बेहतर..............सर्वोत्तम बन सके

ज़ेहन में सम्हाल कर रखनी होगी
गल्तियाँ इतिहास की..
ताकि वह बन ना सके
अंग नव निर्माण का
एहसास ही कहाँ हो पाता है
वर्तमान को
अपनी गलतियों का
जो बेसबब उससे बस
होती जाती हैं...................
मैं, इतिहास ही देता हूँ ..
बोध और अवसर
एक सुधार का...
यह ज़रूर है कभी-कभी
वर्त्तमान की गल्तियाँ
इतिहास बन
हो जाती हैं बोझिल...अति बोझिल
फिर भी मैं
कुछ हद तक तो सहायक
हो ही जाता हूँ
एक सुन्दर रूपांतरण का ...
.ज़रूरी है कि....
मेरा विस्मरण ना हो
दोहराया जाऊं बार-बार
ताकि हो बेहद मज़बूत..
हर नवनिर्माण की नींव
विकास का क्रम भी यही कहता है..
है यही व्यवहारिकता

इतिहास ज़रूरी है.
जो अपने इतिहास अपनी जड़ों से
सीखता है जितना
परिष्कृत,रूपांतरित होता है उतना
जीवन में सृजन अल्प और निर्माण है अधिक
इसलिए बनी रहेगी सदा
इतिहास की प्रासंगिकता
नहीं है यह कोई गड़े मुर्दे उखाड़ना
यह है....
अच्छाइयों का जतन
बुराईयों का दफ़न
अतः...
मुझे विस्मृत ना करो
मैं ज़रूरी हूँ
एक बेहतर निर्माण के लिए
एक बेहतर समाज के लिए
मैं इतिहास कहता हूँ
दोहराओ मुझॆ बार-बार
दोहराओ मुझॆ बार-बार
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उलझ जाती हूँ मैं

सूरज ने तोड़ा दम तो निकला चाँद
मिटी गम भरी सिसकी तो निकली हंसी
रात ने ली विदाई तो हंसी किरण
ग़मज़दा हुआ मन तो निकले आंसू
आज भी ठीक उन्ही दिनों की तरह
उठती रही लहर
केंद्र से कगार तक
एक ..दो..तीन.....जाने कितनी बार
उठती,गिरती,बिखरती...
चलता रहा क्रम
इस क्रम में ऐसा क्या था
जो मुझे जोड़ रहा था
तोड़ रहा था.....
उन लहरों के साथ
बिखरती रही मैं भी
सोचती रही ...
लहरें आती हैं ..जाती हैं
ये वही लहर है या हर वक्त
कोई नई लहर आकर
मिटा जाती हैं ..
अपने पहले आई लहर के निशाँ
ठीक जन्म -मृत्यु के खेल के मानिंद
हर बार उलझ जाती हूँ मैं
इस रहस्य में ..
जब-जब मेरा कोई अपना
बहुत अपना
मेरा साथ छोड़ता है
हमेशा हमेशा के लिए
उस दुनिया में जाने के लिए
जहां से कभी कोई भी
आता नहीं लौटकर .
क्या है ये जीवन ???
दो नदियों का संगम
या फिर

क्षितिज का एहसास...?
वो मन कहाँ से लाऊं !!!!
जो जीवन की मिठास चूम सके
मधुर रस में भी झूम सके

मदहोश हो कर नाच सके
रोकर भी मुस्करा सके
कैसे जीत हासिल करूँ
अपने सारे दुःख,विषाद
वेदनाओं पर
सुना है ..

वक्त हर प्रश्न का ज़वाब है...
वक्त हर मर्ज़ की दवा है ...
इंतजार है उसी वक्त का
जिसके आँचल में छुप मैं
जी भर रो सकूँ
ताकि फिर से दे सकूँ ज़माने को
खुशियों की सौगात
आत्मविश्वास की लौ
बह सकूँ निर्बाध....
प्रवाहमयी यमुना बन
सदा की भांति.