एक चित्र प्रतियोगिता में शरीक होने के लिए आमंत्रित लोगों से भरा एक
विशाल कक्ष...प्रतियोगी लगभग हर उम्र के...8 वर्ष से 50 वर्ष तक ..विषय था -'माँ' कैनवास पर .
मानस पटल पर समाई अनुभवों की गंगोत्री से रंगों की पावन धारा, कूची का सहारा ले कर कैनवास पर बिखरती ,ब्रह्माण्ड की सर्वाधिक स्नेहमयी छवि के रूप में जन-जन को तृप्त करने को तैयार हो रही थी...जितने कैनवास..पतितपावनी गंगा के उतने ही रूप.
अब विजेता चित्रों को पुरस्कृत करने की बारी आई.व्यवस्था यह रखी गई कि पुरस्कृत चित्र सभी को दिखाए जाएंगे और विजेता प्रतिभागी की माता मंच पर आकर अपने अनमोल शब्दों से जन मानस को कृतज्ञ करेंगी.
उदघोषणा हुई ....तृतीय पुरस्कृत चित्र की....सर पर आँचल..स्नेह सिक्त नयन....खुले अधरों पर मानो दबी-दबी सी प्रार्थनाएं....माथे पर सिंदूरी लालिमा की बिंदी,,...घने कुंतल में रक्तिम सिन्दूर की सीधी लकीर..ओह!!!यही तो है माँ का रूप जो देवियों में भी सदा से दृष्टिगोचर है...लोग मंत्र मुग्ध थे.पुरस्कृत होने के लिए सर्वथा उचित...माता मंच पर बुलाई गई.माँ ने विजेता 45 वर्षीय पुत्र को गले से लगा लिया .....कांपते होठों से अनकहे शब्दों से सब कुछ कहती मंच से विदा ले लिया.
अब..द्वितीय पुरस्कृत चित्र....बिलकुल विपरीत ..उनमें ना रंगों की चमक थी ना ही नयनों में आशा..केश करीने से संवारे पर सुहाग की लालिमा ग़ुम थी...मस्तक पर तेज़ था पर सूर्य सी बिंदी ना थी...आँखों में गहरा सूनापन...अधरों पर अंतहीन दर्द की दास्ताँ...चित्र देख कर लोग व्यथित हुए सोच रहे थे....यह वैधव्य की पीड़ा है या परित्यक्ता की वेदना ? ऐसी व्यथा...इतनी पीड़ा कि सबके नयन भर गए.माता को मंच पर आने का निवेदन किया गया...गहन चुप्पी...माँ नहीं आई..आती भी कैसे ??? 10 वर्षीया बिटिया की उस विधवा माता को तो वक्त के थपेड़े 'संघर्षों के झंझावातों में उड़ाकर पिछले वर्ष ही कभी वापस ना आने के लिए बेटी से कोसों दूर ले जा चुके थे.
अब उदघोषणा हुई प्रथम पुरस्कृत चित्र की..जब चित्र पर लोगों की नज़र गई तो लोग भौंचक थे..कुछ की तो चीख निकल गई.दर्प से दहकता कठोर चेहरा..नेत्रों में सब कुछ जान लेने की उत्कंठा मानो त्रिकालदर्शी होने का आभास दे रही हों.. मुखर अधर ....मानो तरकश से बेबाक शब्दों के तीर बस छूटने को तैयार हों...काले मेघ से घने केश की सज्जा पर ध्यान जाने पर उस खूबसूरती को बिगाड़ते माथे पर बने दो बड़े-बड़े सींगों पर अधिक ध्यान आकर्षित हो रहा था.सींगों वाली माँ....इतनी भयावह ...सर्वाधिक अस्वीकार्य छवि... लोग यह रहस्य नहीं समझ पा रहे थे.उसी चित्र में ऊपर दोनों किनारों पर बने रक्तिम सिंदूरी आभा लिए दो सूर्य अवश्य सब का ध्यान आकर्षित कर रहे थे.
माता मंच पर बुलाई गईं,उनसे प्रथम प्रश्न पूछा गया,"क्या आपको अपनी इस छवि की ज़रा भी कल्पना थी?."हाँ" बेहद ही शांत और संयत शब्दों में माँ ने ज़वाब दिया और कुछ कहने की इज़ाज़त ले कहा,"माँ एक ऐसा शब्द है जो संतान की नज़र में उसकी बढती उम्र के साथ अपनी परिभाषा,अपनी छवि,अपने अर्थ परिवर्तित करता जाता है.शिशु के लिए वह पूरी दुनिया है जिससे वह प्रथम साक्षात्कार करता है ;बाल उम्र के लिए माँ ,संतान की जिद पूर्ति,बाल सुलभ इच्छाओं को मानने वाली जादुई छडी है जो दिन रात की परवाह किये बिना उसके असंभव जग को भी अपनी कथा,कहानियों से संभव करते रहने में सफल होती है.किशोरावस्था में बचपन के परियों वाले तिलिस्म और कल्पना जगत से तो वह बाहर आ जाता है पर असली कठोर दुनिया की कल्पना के नभ में परिंदों सा उड़ना चाहता है,माँ जानती है उसके पंख इतने मज़बूत नहीं ,आकाश की ऊंचाईयों की सीमा मापने के सही पैमाने का उसे ज्ञान नहीं,मज़बूत शिकारी परिंदों की ताकत का उसे अंदाजा नहीं.. इस दरम्यान माँ संतान के प्रति बेहद रक्षात्मक हो जाती है और यहीं उसकी छवि संतान की नज़रों में डरावनी हो जाती है...यही प्रयास उसे सींगों वाली माँ बना देता है.
युवावस्था में वह किशोरावस्था में लगाए गए बंदिशों की भाषा के अर्थ समझने लगता है,माँ उसे प्यारी लगने लगती है . प्रोढ़ावस्था उसे माँ के और भी नज़दीक ला देती है क्योंकि अब वह अपनी संतान की परवरिश के दौर से गुज़र रहा होता है. कैनवास में उकेरे दो सूर्य यही बता रहे हैं कि माँ संतान के उदय के वक्त स्वयं सिंदूरी आभा लिए उदित होती है,और संतान के परवरिश की यात्रा में दहकते, प्रचंड ,प्रखर होते हुए पुनः उसी लालिमा को प्राप्त कर लेती है.
और अंत में उस माँ ने अपनी 16 वर्षीया बिटिया की डायरी में उसके द्वारा लिखी कविता के अंश पढ़ कर सुनाये ..............
माँ...तेरी पीड़ा,
मेरे जन्म के वक्त की
मेरे रूह में भी समाई थी
रोई थी जब मैं
सोचा था सब ने...
मैं दुनिया में आने से सहम गई हूँ.
नहीं समझा तब भी किसी ने
कि मेरा वह प्रथम रूदन
तेरी प्रसव पीड़ा के
दर्द का ही एहसास था..
......
माँ..मेरी परवरिश से
छलके तेरे आंसू की हर बूंद से
ऐसी दरिया बना दूंगी
जो सिक्त कर देगी
शुष्क बंजर दिलों को भी
तेरे त्याग के शमशीर को
पोंछ दूंगी अपने वजूद से
तेर अधरों की मुस्कान से
सुवासित कर दूंगी जग को
बस...तेरी बाहें फ़ैली रहे
सदा मेरे लिए.
मैं साक्षी हूँ माँ
तुम्हारी पीड़ा, त्याग ,खुशी के
एक-एक पल की.
........
मैंने देखा था .....
मेरे जन्म के साथ
तुम उदित हुई थी
आशा,उत्साह की रक्तिमा से
तुम भीगी हुई थी
मेरी वृद्धि दर वृद्धि
परवरिश की आवश्यकता से
तुम दहकती गई
त्याग,क्षोभ की
प्रचंडता ,प्रखरता से
तुम तपती गई
और फिर......जैसे -जैसे
मैं जीवन के सोपान चढ़ती गई
तुम भी प्रचंडता की पीत ज्वाला से
सिंदूरी आभा में पुनः रंगती गई
मेरे मंजिल पाने के सोपान पर
तुम उसी रक्तिमा से भीगी हुई थी
जो थी तुम्हारे गर्व की,
आत्मसम्मान की
अपने परवरिश के
आत्मविश्वास की.
.......
सच माँ...
तुम तो वह सूर्य हो
जो क्षमता रखती हो
जन्म देने की
अपने जैसे कई सूर्य को
मैं उसी सूर्य की बस
एक छवि हूँ
साक्षी हूँ....
तेरे स्नेह की स्निग्धता की
क्रोध की प्रचंडता की
त्याग के दर्पता की
गर्व की प्रखरता की
क्योंकि मैं तुम्हारा अंश हूँ
मैं तुम्हारा अंश हूँ....
पूरे कक्ष में सन्नाटा था..इतनी चुप्पी कि लोगों की सांसें और धड़कन भी साफ़-साफ़ सुनाई दे जाएं...और फिर कक्ष तालियों की गडगडाहट से गूंज उठा.यह सम्मान था ,उन सभी माओं को जो अपनी संतान की परवरिश में एक सूर्य सी भूमिका निभाती हैं.
क्या आपकी नज़र में इस चित्र को प्रथम पुरस्कार से नवाज़ा जाना न्यायोचित था ?????
मानस पटल पर समाई अनुभवों की गंगोत्री से रंगों की पावन धारा, कूची का सहारा ले कर कैनवास पर बिखरती ,ब्रह्माण्ड की सर्वाधिक स्नेहमयी छवि के रूप में जन-जन को तृप्त करने को तैयार हो रही थी...जितने कैनवास..पतितपावनी गंगा के उतने ही रूप.
अब विजेता चित्रों को पुरस्कृत करने की बारी आई.व्यवस्था यह रखी गई कि पुरस्कृत चित्र सभी को दिखाए जाएंगे और विजेता प्रतिभागी की माता मंच पर आकर अपने अनमोल शब्दों से जन मानस को कृतज्ञ करेंगी.
उदघोषणा हुई ....तृतीय पुरस्कृत चित्र की....सर पर आँचल..स्नेह सिक्त नयन....खुले अधरों पर मानो दबी-दबी सी प्रार्थनाएं....माथे पर सिंदूरी लालिमा की बिंदी,,...घने कुंतल में रक्तिम सिन्दूर की सीधी लकीर..ओह!!!यही तो है माँ का रूप जो देवियों में भी सदा से दृष्टिगोचर है...लोग मंत्र मुग्ध थे.पुरस्कृत होने के लिए सर्वथा उचित...माता मंच पर बुलाई गई.माँ ने विजेता 45 वर्षीय पुत्र को गले से लगा लिया .....कांपते होठों से अनकहे शब्दों से सब कुछ कहती मंच से विदा ले लिया.
अब..द्वितीय पुरस्कृत चित्र....बिलकुल विपरीत ..उनमें ना रंगों की चमक थी ना ही नयनों में आशा..केश करीने से संवारे पर सुहाग की लालिमा ग़ुम थी...मस्तक पर तेज़ था पर सूर्य सी बिंदी ना थी...आँखों में गहरा सूनापन...अधरों पर अंतहीन दर्द की दास्ताँ...चित्र देख कर लोग व्यथित हुए सोच रहे थे....यह वैधव्य की पीड़ा है या परित्यक्ता की वेदना ? ऐसी व्यथा...इतनी पीड़ा कि सबके नयन भर गए.माता को मंच पर आने का निवेदन किया गया...गहन चुप्पी...माँ नहीं आई..आती भी कैसे ??? 10 वर्षीया बिटिया की उस विधवा माता को तो वक्त के थपेड़े 'संघर्षों के झंझावातों में उड़ाकर पिछले वर्ष ही कभी वापस ना आने के लिए बेटी से कोसों दूर ले जा चुके थे.
अब उदघोषणा हुई प्रथम पुरस्कृत चित्र की..जब चित्र पर लोगों की नज़र गई तो लोग भौंचक थे..कुछ की तो चीख निकल गई.दर्प से दहकता कठोर चेहरा..नेत्रों में सब कुछ जान लेने की उत्कंठा मानो त्रिकालदर्शी होने का आभास दे रही हों.. मुखर अधर ....मानो तरकश से बेबाक शब्दों के तीर बस छूटने को तैयार हों...काले मेघ से घने केश की सज्जा पर ध्यान जाने पर उस खूबसूरती को बिगाड़ते माथे पर बने दो बड़े-बड़े सींगों पर अधिक ध्यान आकर्षित हो रहा था.सींगों वाली माँ....इतनी भयावह ...सर्वाधिक अस्वीकार्य छवि... लोग यह रहस्य नहीं समझ पा रहे थे.उसी चित्र में ऊपर दोनों किनारों पर बने रक्तिम सिंदूरी आभा लिए दो सूर्य अवश्य सब का ध्यान आकर्षित कर रहे थे.
माता मंच पर बुलाई गईं,उनसे प्रथम प्रश्न पूछा गया,"क्या आपको अपनी इस छवि की ज़रा भी कल्पना थी?."हाँ" बेहद ही शांत और संयत शब्दों में माँ ने ज़वाब दिया और कुछ कहने की इज़ाज़त ले कहा,"माँ एक ऐसा शब्द है जो संतान की नज़र में उसकी बढती उम्र के साथ अपनी परिभाषा,अपनी छवि,अपने अर्थ परिवर्तित करता जाता है.शिशु के लिए वह पूरी दुनिया है जिससे वह प्रथम साक्षात्कार करता है ;बाल उम्र के लिए माँ ,संतान की जिद पूर्ति,बाल सुलभ इच्छाओं को मानने वाली जादुई छडी है जो दिन रात की परवाह किये बिना उसके असंभव जग को भी अपनी कथा,कहानियों से संभव करते रहने में सफल होती है.किशोरावस्था में बचपन के परियों वाले तिलिस्म और कल्पना जगत से तो वह बाहर आ जाता है पर असली कठोर दुनिया की कल्पना के नभ में परिंदों सा उड़ना चाहता है,माँ जानती है उसके पंख इतने मज़बूत नहीं ,आकाश की ऊंचाईयों की सीमा मापने के सही पैमाने का उसे ज्ञान नहीं,मज़बूत शिकारी परिंदों की ताकत का उसे अंदाजा नहीं.. इस दरम्यान माँ संतान के प्रति बेहद रक्षात्मक हो जाती है और यहीं उसकी छवि संतान की नज़रों में डरावनी हो जाती है...यही प्रयास उसे सींगों वाली माँ बना देता है.
युवावस्था में वह किशोरावस्था में लगाए गए बंदिशों की भाषा के अर्थ समझने लगता है,माँ उसे प्यारी लगने लगती है . प्रोढ़ावस्था उसे माँ के और भी नज़दीक ला देती है क्योंकि अब वह अपनी संतान की परवरिश के दौर से गुज़र रहा होता है. कैनवास में उकेरे दो सूर्य यही बता रहे हैं कि माँ संतान के उदय के वक्त स्वयं सिंदूरी आभा लिए उदित होती है,और संतान के परवरिश की यात्रा में दहकते, प्रचंड ,प्रखर होते हुए पुनः उसी लालिमा को प्राप्त कर लेती है.
और अंत में उस माँ ने अपनी 16 वर्षीया बिटिया की डायरी में उसके द्वारा लिखी कविता के अंश पढ़ कर सुनाये ..............
माँ...तेरी पीड़ा,
मेरे जन्म के वक्त की
मेरे रूह में भी समाई थी
रोई थी जब मैं
सोचा था सब ने...
मैं दुनिया में आने से सहम गई हूँ.
नहीं समझा तब भी किसी ने
कि मेरा वह प्रथम रूदन
तेरी प्रसव पीड़ा के
दर्द का ही एहसास था..
......
माँ..मेरी परवरिश से
छलके तेरे आंसू की हर बूंद से
ऐसी दरिया बना दूंगी
जो सिक्त कर देगी
शुष्क बंजर दिलों को भी
तेरे त्याग के शमशीर को
पोंछ दूंगी अपने वजूद से
तेर अधरों की मुस्कान से
सुवासित कर दूंगी जग को
बस...तेरी बाहें फ़ैली रहे
सदा मेरे लिए.
मैं साक्षी हूँ माँ
तुम्हारी पीड़ा, त्याग ,खुशी के
एक-एक पल की.
........
मैंने देखा था .....
मेरे जन्म के साथ
तुम उदित हुई थी
आशा,उत्साह की रक्तिमा से
तुम भीगी हुई थी
मेरी वृद्धि दर वृद्धि
परवरिश की आवश्यकता से
तुम दहकती गई
त्याग,क्षोभ की
प्रचंडता ,प्रखरता से
तुम तपती गई
और फिर......जैसे -जैसे
मैं जीवन के सोपान चढ़ती गई
तुम भी प्रचंडता की पीत ज्वाला से
सिंदूरी आभा में पुनः रंगती गई
मेरे मंजिल पाने के सोपान पर
तुम उसी रक्तिमा से भीगी हुई थी
जो थी तुम्हारे गर्व की,
आत्मसम्मान की
अपने परवरिश के
आत्मविश्वास की.
.......
सच माँ...
तुम तो वह सूर्य हो
जो क्षमता रखती हो
जन्म देने की
अपने जैसे कई सूर्य को
मैं उसी सूर्य की बस
एक छवि हूँ
साक्षी हूँ....
तेरे स्नेह की स्निग्धता की
क्रोध की प्रचंडता की
त्याग के दर्पता की
गर्व की प्रखरता की
क्योंकि मैं तुम्हारा अंश हूँ
मैं तुम्हारा अंश हूँ....
पूरे कक्ष में सन्नाटा था..इतनी चुप्पी कि लोगों की सांसें और धड़कन भी साफ़-साफ़ सुनाई दे जाएं...और फिर कक्ष तालियों की गडगडाहट से गूंज उठा.यह सम्मान था ,उन सभी माओं को जो अपनी संतान की परवरिश में एक सूर्य सी भूमिका निभाती हैं.
क्या आपकी नज़र में इस चित्र को प्रथम पुरस्कार से नवाज़ा जाना न्यायोचित था ?????