Tuesday, December 31, 2013

like...comment...share ;happy...new...year

एक शायर की जुबां में...
साल बदला नज़ारे वही हैं,बदनसीबी के मारे वही हैं
सिर्फ बदले हैं अपने कैलेण्डर,चाँद सूरज सितारे वही हैं.
एक महिला को एक जादुई लैंप मिला,उसे हाथ लगाते ही सामने एक जिन्न प्रकट हुआ..और .तीन इच्छाएं पूछी.महिला ने कहा,"मैं चाहती हूँ कि मेरा पति सिर्फ मुझे ही देखे...मैं उनकी ज़िंदगी में अपने तरह की इकलौती अमानत रहूँ...सवेरे उठते ही जिस पर उनकी पहली नज़र पड़े वह मैं ही होऊं.जिन्न ने उस महिला को स्मार्ट फोन बना दिया.
सच है आज आप कहीं भी हों पूजास्थल,समारोह,मैय्यत हर जगह आप का स्मार्ट फोन और उस पर फेस बुक ,व्हॉट्स ऐप जैसी सुविधाएं प्रत्येक इंसान की संगिनी हुई जा रही हैं. फेस बुक पर तीन क्लीक लाइक,कमेंट,शेयर.....ध्यान से देखा जाए तो ज़िंदगी में इन तीनों का अत्यंत महत्व है.अगर ये तीनों ही ज़िंदगी से नदारद हो जाए तो पहले से ही उदास चेहरों में बहुत सारी शिकायतें लिए भटकने वाले लोग पूरी धरती को उदास कर दें.एक पुजारी भाव-भंगिमा पर उपदेश दे रहे थे.उन्होंने कहा,"जब आप स्वर्ग की बात करते हैं तो आप के चेहरे पर चमक होती है ;जब आप करूणा की बात करते हैं तो आँखें सजल दीखती हैं;जब आप दान की बात करते हैं तो देने की संतुष्टि आपको आभा मय बना देती है.एक भक्त ने पूछा,"जब नरक की बात करते हैं तो क्या होता है?"पुजारी ने कहा,"वह आपका रोज का सामान्य चेहरा है."सच है दोस्तों ,रोज़मर्रा की ज़िंदगी में जब हम दूसरों की छोटी छोटी अच्छी बातों को पसंद(like) करना...उन पर अपनी स्वस्थ प्रतिक्रिया (comment)देना और उसे अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाने लगते हैं तो ज़िंदगी बहुत खूबसूरत हो जाती है
बस यही संकल्प लिया है मैंने .....दूसरों की अच्छी बातों को पसंद कर उस पर स्वस्थ प्रतिक्रिया दूंगी और उसे जन मानस की भलाई के लिए
शेयर कर दूंगी.
(trio of like,comment,share)
इसके लिए मैं कई उदाहरण से अपनी योजनाएं तैयार करूंगी.
१) कहीं पर पढ़ी एक बहुत प्यारी सी घटना याद आ रही है ...
एक सामाजिक विज्ञान की शिक्षिका ने एक दिन कक्षा में विद्यार्थियों को अपने friends के नाम लिखने के साथ उसकी जो बात उन्हें अच्छी लगती है उसे कागज़ पर लिखने को कहा.सप्ताहांत में उस शिक्षिका ने सभी विद्यार्थियों के नाम पर अलग-अलग लिस्ट बनाई और उन पर दूसरे बच्चों द्वारा उनके बारे में कही बातों को लिख कर मौलिक कागज़ सम्बंधित दोस्तों को दे दिया.बच्चे आपस में यह जानकार बहुत खुश हुए कि उनके कुछ सहपाठी जिन्हे वे करीब नहीं समझते थे वे उन्हें चाहते हैं.यह समूह ज़िंदगी के कई वर्षों के बहाव में आगे बढ़ गया.वर्षों बाद उनमें से एक छात्र युद्ध में शहीद हो गया इत्तफाकन उसकी यह टीचर उसके अंतिम यात्रा में पहुँची ...एक सैनिक ने परिचय पूछा और बताया,"संजय आपकी बहुत बातें करता था ."तभी संजय के पिता ने अपनी ज़ेब से एक पर्स निकाल कर उसमें से पीले पड़े एक कागज़ दिखा कर कहा,"यह कागज़ अंतिम समय संजय के पास था.यह सुन्दर काम करने का आप को बहुत-बहुत शुक्रिया " वहाँ संजय के कुछ सहपाठी भी थे उनमें से एक ने कहा,"उस दिन दिया हुआ कागज़ मेरी डेस्क पर आज भी रखा है."एक महिला ने कहा,"मेरे पति ने ऐसा कागज़ अपने शादी की अल्बम में लगा रखा है."एक ने आंसू पोछते हुए कहा,"मुझे लगता है कि हम सब के पास अपनी-अपनी लिस्ट सुरक्षित है."
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(संकलित )
यह दोस्तों की बात को लाइक करना था .... बात बहुत छोटी थी पर कितनी गहरी थी.
मैं ऐसे ही छोटी-छोटी बातों से लोगों को करीब और मधुर रिश्तों के लिए तैयार करूंगी.
२) एक और दृष्टांत देती हूँ.
एक बार एक वृद्ध व्यक्ति 19th शताब्दी के प्रसिद्ध कवि और कलाकार दांते गैब्रियल रोसिटी के पास कुछ स्केच और कलाकृतियां दिखाने गया,रोसिटी ने उन्हें ध्यान से देखा और उदार भाव से कहा कि इन तस्वीरों में योग्यता नज़र नहीं आती .अब दुखी वृद्ध व्यक्ति ने कुछ ऐसी कलाकृति दिखाई जो एक विद्यार्थी ने बनाई थी.रोसिटी उन स्केच को देखा कर झूम गया और कहा ,"इन्हे बनाने वाले विद्यार्थी में बहुत प्रतिभा है.एक कलाकार के रूप में उसे प्रोत्साहन और सहायता की ज़रुरत है अगर वह इसी में करियर बनाये तो उसका भविष्य सुरक्षित है... क्या वह विद्यार्थी तुम्हारा पुत्र है ?"उस वृद्ध ने दुखी हो कर कहा,"यह मेरी ही कलाकृतियां हैं...आज से ४० वर्ष पूर्व की हैं.काश यह पसंदगी (लाइक) और तारीफ़ मैंने पहले सुनी होती ,दरअसल किसी की तारीफ़ और पसंद के अभाव में हतोत्साहित होकर मैंने सालों पहले यह काम छोड़ दिया था पहले की दिखाई कलाकृति की अयोग्यता उसी का परिणाम है."
मैं अपने घर-परिवार समाज में सभी को अच्छे कार्य करने पर यथोचित प्रोत्साहन दूंगी.
३) एक अन्य उदाहरण 19th सदी की शुरुआत में लन्डन का एक युवक लेखक बनाना चाहता था पर वह सिर्फ चार साल स्कूल गया था ;पिता क़र्ज़ ना चुकाने के कारण जेल में थे और वह चूहों से भरे एक वेयरहाउस में बोतल पर लेबल लगाने का काम करता था.फिर भी कहानी पर कहानी लिखता गया,एक दिन उसकी एक कहानी स्वीकार कर ली गई..हालांकि बदले में पैसा ना मिला पर सम्पादक ने उसकी तारीफ़ की ....सम्मान दिया .वह इतना रोमांचित हुआ कि सडकों पर बौराया घूमता रहा..इस पसंद ( like )और तारीफ़ ने उसकी ज़िंदगी बदल दी अगर यह ना हुआ होता तो वह ज़िंदगी भर बोतल में लेबल लगाने का काम करता उस युवक का नाम था-चार्ल्स डिकेंस.मनोवैज्ञानिक जेस लायर एक जगह लिखते हैं,"प्रसंशा मनुष्य के ह्रदय के लिए सूर्य के सुखद प्रकाश की तरह है.इसके बिना हमारे व्यक्तित्व का पुष्प नहीं खिल सकता."
सच है "जिस इंसान के काम को जितना ज्यादा पसंद किया जाता है वह उतना ही परिपूर्ण इंसान बन जाता है."
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(-नार्मन विंस्टन पील)
मैं अपने साथी ब्लोग्गेर्स के विचारों को यथोचित सम्मान दूंगी.
४) अब दूसरी बात कमेंट की आती है..यह भी जीवन में ज़रूरी है.अपने सहयोगियों या विरोधियों की प्रतिक्रिया का निष्पक्षता से विश्लेषण किया जाए तो हमें बहुत सी हितकारी बातें हाथ लग सकती हैं.झेन फ़कीर ने प्रतिक्रिया का बखूबी प्रयोग किया है-जब कोई शिष्य उनसे दीक्षित होता तो गुरु कहते _जाओ,हमें पा लिया,अब कुछ दिन हमारे विरोधी के पास रहो,हमारा दूसरा पक्ष वहाँ नज़र आयेगा,लेकिन जाना निष्पक्ष होकर.इस बात की पूरी सम्भावना रहेगी कि विरोधी कुछ मामलों में सही रहेंगे.हमारा और विरोधी का पक्ष मिलकर एक तीसरा पक्ष बन जाए जो और भी श्रेष्ठ हो सकता है." तो यह है कमेंट का प्रभाव.एक बात और अगर प्रतिक्रिया स्वरुप कुछ सच भी कहना हो तो सुनने में प्रीतिकर हो यह ध्यान रखना ज़रूरी है.एक शिक्षिका की कहानी याद आती है जो एक छात्र के परिवार की तस्वीर के विषय में प्रतिक्रिया सुन रही थी उनकी सहकर्मी ने कहा कि इस तस्वीर वाले बच्चे के बालों का रंग परिवार के अन्य सदस्यों से अलग है और उस बच्चे को बुलाकर पूछा क्या तुम्हे गोद लिया गया है.? उस बच्चे को इस बात का अर्थ नहीं पता था.पहली शिक्षिका ने समझ लिया बच्चे पर प्रश्न के रूप में यह प्रतिक्रिया गहरा असर डालेगी अतः बीच में बोलते हुए कहा,"क्या तुम माँ के पेट में पालने की बजाय उनके दिल से पैदा हुए हो.?बच्चे ने कहा ,"हाँ"और उसकी आखें खुशी से छलछला गईं..
(-
(संकलित )
मैं अपने प्रति किसी की प्रतिक्रिया का आकलन कर तदानुसार अपने स्वभाव में सुधार करूंगी.....साथ ही दूसरों के प्रति राय बनाने में शब्दानुशासन पर ध्यान दूंगी.
५) अब बात करती हूँ शेयर करने की.कुछ लोग अपने मन की बात या अच्छी बात को लोगों तक पहुंचाने को बेमानी मानते हैं.अगर कोई उनसे अपने कष्ट भी शेयर करे तो अतिव्यस्तता का बहाना कर देते हैं यह भूल जाते हैं कि लोग उन्हें महत्वपूर्ण मान कर अपनी बात कहना चाह रहे हैं.रोटरी क्लब के लंच में शहर के दो डॉक्टर एक बुजुर्ग जो कई वर्ष पूर्व रिटायर हो गए थे और दूसरा शहर का सबसे लोकप्रिय युवा डॉक्टर था.बेहद व्यस्त दीखता युवा डॉक्टर देर से आया और कहा,"काश मेरा फोन बजाना बंद हो जाए.बुजुर्ग ने सुना और कहा,"आज से २० वर्ष पहले मैं भी यही सोचता था ,पर तुम ईश्वर को धन्यवाद दो कि तुम्हारा फोन बज रहा है...इस बात पर खुश हो कि लोग तुम्हे चाहते हैं उन्हें तुम्हारी ज़रुरत है.फिर वह बुजुर्ग डॉक्टर निराश हो कर बोले,"अब मेरे पास कोई फोन कॉल नहीं आते,किसी को मेरी ज़रुरत नहीं मैं गुजरा वक्त हो गया हूँ."
-(-नार्मन विंस्टन पील)
मैं अपने दोस्तों,परिवार के सदस्यों को आवश्यकता पड़ने पर मदद के लिए तैयार रहूंगी... उनके फोन कॉल्स की उपेक्षा नहीं करूंगी.
दोस्तों,ये सच है.... जीवन अत्यंत छोटा है....साल के बदलते कैलेण्डर की तरह .मैं स्वयं के साथ सभी को जीवन का हर लम्हा जीने के ज़ज्बे से
भर देने का संकल्प लेती हूँ ."
.....किसी शायर की पंक्तियों में........
रोशनी की ज़ीनत थी घर में जिस कैलेण्डर से
एक साल ही रहकर वो भी उतर गया......
प्राचीन काल में श्रुति या सुनकर ही विद्या आगे एक से दूसरे तक पहुँचती थी फिर आज संकोच क्यों ???
हाँ, एक संवेदनशील नागरिक होने के नाते मेरा कर्त्तव्य बनता है कि किसी भी प्रकार के नकारात्मक और समाज के लिए अहितकारी विचार
को रिजेक्ट कर उसका प्रसार रोकने की जिम्मेदारी भी समझ सकूँ.
लाइक,कमेंट,शेयर की ऐसी शुद्ध ,निर्बाध त्रिवेणी बहाऊँ कि......
अबकी बरस नारी चीत्कार नहीं गूंजे खुशियों भरी चूड़ी की खनक
नारी अस्मिता ना हो तार-तार,रहे बची लाज भरी सिंदूरी चमक
दुःख ना हो इतना दर्दीला कि किसी भी बात पर जाए नयन छलक
लोभ,लिप्सा वासना की चाह नहीं हो ससम्मान जीवन जीने की ललक
पौरूष ऐसा दिव्य हो जाए कि ना छुपे,छुपाये उससे कोई भीगी पलक
करूंगी सारे अधूरे वादे पूरे कि फिर ना रह जाए कहीं कोई दिली कसक
हर स्थान बनाऊं इतना सुवासित कि हो गुलाब की हर पंखुरी सी महक
हर शख्श को करूँ आनंदित कि जैसे चमन में परिंदों के खुशी की चहक
खुशियां बिखेरूँ कण-कण में कि धरा में ही मिल जाए स्वर्ग की झलक
२०१४ अबकी बरस ऐसी तब्दीलियां ला कि दशकों तक गूंजे तुम्हारी धमक .

you don't need to be perfect...you don't need infinite wisdom...you don't need endless
patience or humility...you don't have to be a saint...you only have to want to live a life that's
full & true ...to rise up ,to greet your own unique destiny.
-paulo coelho

उषा की पहली किरण के दस्तक से तो खुल जाते हैं हर दरवाज़े
ये दुआ है कि हमें ज़िंदगी शिद्दत से जीना सीखा दे ये नया साल
दुआ यह भी कि सबके जीवन में ढेरों खुशियां लाये ये नया साल
" ईश्वर हम सब  को जीवन का हर लम्हा जीने के ज़ज्बे से भर दें ."

Friday, December 27, 2013

प्रीत की नदी-'यमुना'

शुरुआत Jess.c.scott की एक सुन्दर सी पंक्ति से करती हूँ.....
"when someone loves you ,the way they say your name is different.you know that your name is safe in

their mouths."
इस ब्लॉग को लिखने की प्रेरणा मुझे अपने एक साक्षात्कार में पूछे गए एक मनोरंजक प्रश्न से मिली.प्रश्न था,"आपका नाम यमुना है ,क्या आप इस नाम की पौराणिक महत्ता जानती हैं..क्या नाम के व्यक्तित्व पर पड़ने वाले प्रभाव से आप इत्तिफाक रखती हैं."
प्रश्न सुनते ही dale carnegie का कथन मानस पटल पर उभर आया


"names are the sweetest & most important sound in any language."
दोस्तों,अपना नाम सबको बहुत प्रिय होता है क्योंकि यही नाम हमें पहचान देता है .नाम कानों को प्रिय लगने वाला अक्षरों का समूह ही सिर्फ नहीं होता बल्कि इसमें अर्थ होता है जो हमें परिभाषित भी करता है.कहा भी जाता है...words have meaning;names have power.उस प्रश्न का ज़वाब तो मैं संक्षिप्त ही दे पाई थी पर आज 15 वर्षों के बाद मन इस विषय पर ब्लॉग लिखने को कर बैठा.आप में से कुछ लोग नाम के महत्व को मानते होंगे.कर्ण ने महाभारत के युद्ध में जिस आदमी को सारथी चुना वही उसकी हार का कारण बना ...उसका नाम था 'शल्य'जिसका अर्थ होता है,संदेह,शंका,संशय.कर्ण का अर्थ होता है कान .सब शंकाएं कान से ही प्रवेश करती हैं.अपने नाम से प्रभावित शल्य शंका और संदेह से ग्रसित हो कर्ण से कहता,"आप की जीत मुश्किल सी लगती है" और युद्ध का परिणाम सामने था.कभी-कभी नाम का प्रभाव नहीं भी पड़ता है पर अधिकांशतः नाम व्यक्तित्व पर प्रभाव डालता है.
नाम के महत्व पर कुछ प्रसिद्ध कथन लिख रही हूँ....
romeo and juliet में shakespere का कथन है .....
"what's in a name ?that which we call a rose
by any other name would smell as sweet ."
जापानी कहावत है..."tigers die & leave their skins;people die & leave their names."
W.H.Auden..."Proper names are poetry in the raw..like all poetry they are untranslatable."
David S. Slawan.."names are an important key to what a society values.Anthropologists recognize naming as 'one of the chief methods for imposing order on perception."
खैर ,नाम के प्रभाव पर ब्लॉग फिर कभी लिखूंगी अभी उस प्रश्न के उत्तर के विस्तार में ब्लॉग को सीमित करना चाहती हूँ.
यमुना का पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व .....
यमुना का शाब्दिक अर्थ 'जुड़वां'है क्योंकि यह गंगा के साथ मिल जाती है.सनातन संस्कृति में 'यमुना'को देवी(यमी) का दर्ज़ा दिया गया है . इसका उद्गम उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी जिले में बंदरपूछ पहाड़ के दक्षिण पश्चिम ढाल से ६३८७ मीटर की ऊंचाई पर स्थित यमुनोत्री से है.यमुनोत्री धाम का कपाट खुलने के साथ ही चार धाम (यमुनोत्री,गंगोत्री,केदारनाथ,बद्रीनाथ)की यात्रा शुरू हो जाती है. यमुना को धर्मग्रंथों में भक्ति का उद्गम माना गया है जबकि गंगा को ज्ञान की अधिस्थात्री माना गया .भक्ति से ही व्यक्ति ज्ञान की तरफ प्रवृति होता है.अतः धर्मग्रंथ पहले यमुनोत्री के दर्शन की सलाह देते हैं (शायद हमारे राष्ट्र गान 'जन गण मन 'में यमुना का नाम पहले लेने के पीछे भी यही वजह हो)पुराणों के अनुसार यमुना सूर्यदेव तथा सरनयु की पुत्री है .यम और शनिदेव इसके भाई हैं.यमुना(यमी)ने यम को राखी बांधी और अभिभूत यम ने घोषणा कि जो भी किसी स्त्री को बहन मान राखी बन्धवायेगा उसे दीर्घायु होने का वरदान मिलेगा.इसलिए कहते भी हैं कि यमुना में डुबकी लेने से मौत का भय चला जाता है
उत्तराखंड में यमुनोत्री से निकलकर प्रयाग तक प्रवाहित यमुना ब्रजमंडल की आत्मा है.वैषणव इसे श्रीकृष्ण की पटरानी मानते हैं. वासंतिक नवरात्रि की षष्ठी को ब्रजरानी यमुना का जन्म दिवस मनाया जाता है.वैष्णव जन यमुना को इस दिन चुनरी चढ़ाते हैं जो नदी के एक पार से दूसरे पार तक सैकड़ों साड़ियों को जोड़ कर बनाई जाती है.भगवान श्रीकृष्ण से यमुना का अटूट रिश्ता है.इसका तट श्रीकृष्ण की लीलाओं का साक्षी है.कृष्णा को नन्द के आँगन तक पहुँचाने का माध्यम यमुना ही बनी,उनके पग छूने को व्याकुल यमुना ने अपना मक़सद पूरा होते ही वासुदेव जी को रास्ता दे दिया...गोपाल की बंसी धुन बन यमुना में समा गई..और वह नवरस की साक्षात प्रतिबिम्ब बन गई..कंस को मारकर आये कृष्णा ने यमुना के आँचल में ही शान्ति पाई थी. यमुना पर हलधर का भी मन मोह गया था पर कृष्ण के रंग में रंगी कालिंदी को हलधर का गौर वर्ण नहीं भाया.भगवान् श्रीकृष्ण के सभी स्वरूपों और श्रीविग्रहों को स्नानाभिषेक कराने और उनका नैवैद्य बनाने के लिए अधिकांशतः यमुना जल का प्रयोग किया जाता है.पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक महाप्रभु श्रीबल्लभाचार्य ने यमुनाष्टक स्त्रोत द्वारा इनकी महिमा का गुणगान किया है.कालिंद पर्वत से बहाने के कारण इसे कालिंदी भी पुकारा जाता है.महाभारत युग में पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ यमुना के तट पर ही बसा जो आज आधुनिक दिल्ली है.सेल्युकस यूनानी सेनापति ने इसे लोमानेस नाम दिया था..megasthnese ने अपनी पुस्तक 'इंडिका'में यमुना क्षेत्र को लैंड ऑफ़ सूरसेन का नाम दिया .
प्रेम की नदी यमुना सबकी चहेती है .....उसने सागर में स्वतन्त्रता से मिलने का मोह ना करते हुए गंगा में विसर्जित होना पसंद किया ताकि भक्ति और ज्ञान के अद्भुत संगम की नगरी के रूप में प्रयाग को कृतार्थ कर सके.
यमुना द्वापर युग में जहां प्रेम और श्रृंगार के संयोग पक्ष की साक्षी बनी वहीं मध्यकालीन युग में भी वियोग पक्ष की साक्षी स्वरुप प्रेम की अमर
गाथा बन कल-कल बह रही है.आगरा में यमुना के तट पर बना ताजमहल शहंशाह शाहजहां के आँखों का आंसू बन यमुना के नूर को बढ़ा रहा





है..
उत्तराखंड,हरियाणा,उत्तर प्रदेश,हिमाचल प्रदेश,दिली राज्य से गुजरती यमुना टोंस,बेतवा,चम्बल,केन जैसी नदियों को स्वयं में मिलाती करीब १३७६ किलोमीटर की यात्रा तय करती है.बागपत,दिली,नोयडा,मथुरा,आगरा,फ़िरोज़ाबाद,एटवाह,कालपी,हमीरपुर,इलाहाबाद यमुना के तट पर बसे शहर हैं.आधुनिक यमुना प्रदूषण के विषैलेपन से विषाक्त हो रही है....यमुनोत्री से वज़ीराबाद तक यह अमूमन साफ़ रहती है..पर वज़ीराबाद तथा ओखला बैराज के बीच १५ नालों से आया औद्योगिक निष्काषन इसे प्रदूषित कर देता है.एक सर्वेक्षण में biochemical oxygen demand values (BOD) 14-28 mg/l पाये जाने और high coliform content के कारण इसे sewage drain कहा गया. शुद्धिकरण के नाम पर अनेक अभियान चलाये जा रहे हैं पर आधुनिकीकरण के कालिया नाग ने उसे विषाक्त कर दिया है.यमुना की जलधारा हर युग में स्यामल रही ...बस वजहें बदलती रही...द्वापर युग में यह श्याम रंग में रंगी तो आधुनिक युग में प्रदूषण के रंग में स्यामल हो गई.
मैं यमुना हूँ.......जानती हूँ अपना हुनर
कैसे पतली धार से बहते -बहते
धारा में तब्दील हुआ जाता है
कठोर चट्टानों पर बहते हुए
कैसे पदचिन्ह छोड़ा जाता है
दुर्गम राहों से गुजरने पर भी
कैसे वज़ूद बचाया जाता है
वन पर्वत बियाबान को भी
कैसे आबाद किया जाता है
मैं यमुना हूँ...जानती हूँ अपनी प्रवृत्ति
सुनहरे धान,रूपहली सरसों संग
संगीत अपनी ही सुन बहती हूँ
सागर मेरा अंतिम सत्य नहीं
गंगा के ज्ञान संग मिलती हूँ
धारा को तृप्त करने को मैं बन
बादल नभ पर फिर उभरती हूँ
अपना वज़ूद और अपना सत्य
कि बूँद-बूँद से ही मैं बनती हूँ
मैं यमुना हूँ.....जानती हूँ अपना मक़सद
हर मोड़ और हर डगर पर
बाधाओं से सृजन करना है
उर्वर मृदा में परिवर्तित करने
मुझे चंचला बन बहना है
अंजुरी,पात्र सब के मान हेतु
बस उन सा ही ढलना है
बेसुध बहते हुए भी मुझे
दोनों पार के प्रति सजग रहना है
मैं यमुना हूँ...जानती हूँ स्वाध्याय
समक्ष मेरे हर चट्टान है खोलती
सफ़र का नित नूतन अध्याय
कहती है ना हो डबरा ना पोखर
ना झील और ना ही तालाब
पत्थर-पत्थर चूर्ण बना सकती हो
बंजर धरती को महका सकती हो
फिर वही राधा कान्हा की वेणु संग
मधुर प्रेम संगीत बना सकती हो
मैं यमुना हूँ...जानती हूँ अपनी मर्यादा
शैशवास्था की शोख चंचलता से
युवास्था में सर्पिल हो जाउंगी
उन्मुक्त वेग में भी धीर गम्भीर
बन मंज़िल को पाउंगी
कितना भी खाली होती जाऊं
फिर-फिर मैं भरती जाउंगी
सागर तक की यात्रा में उपकृत
कूल कगारों को कर जाउंगी.
मैं यमुना हूँ...बस इतनी इल्तज़ा मेरी
मेरे सतत प्रवाह को ना रोकना
उन्मुक्त वेग से मुझे बहने देना
बाँध बना जो एकत्र करोगे तो
मैं पोखर बनकर सड़ जाउंगी
भूल प्राकृतिकता स्व गति की
अपनी ही बाधा से मर जाउंगी
प्रदूषित करोगे तो वेणु की धुन
ताज की सफेदी भी भूल जाउंगी
मैं यमुना हूँ.....वादा करती हूँ
सागर से बादल बन बार-बार
नीली धारा से हरियाली बनाउंगी
प्रेम की नदी थी मैं ,प्रीत की नदी हूँ
और प्रीत की नदी ही कहलाऊंगी
मिटाओ सारे प्रदूषण तल औ सतह से
देखना; प्रीत की नदी मैं मुस्काउंगी
मुरली की धुन ताज की खामोशी बन
साहित्य संगीत कला में रच बस जाउंगी.
the river makes music even as it lives with rocks (obstacles)that hinders its path.the river bypasses

them,caresses them continuously and in the meantime also makes music as it gurgles away towards its

destination.
-sheel vardhan singh

Thursday, December 19, 2013

फैलती हैं लपटें विषैली श्वास से

मानव जाति के विकास क्रम का गहनता से निरीक्षण करने पर एक बात स्पष्ट हो जाती है कि समुदाय का उदय वर्ग,धर्मं,जातिसमूह,भाषाई,सांस्कृतिक जमायतों राष्ट्रों प्रांतों जैसे कई सामाजिक,राजनीतिक ,सांस्कृतिक धार्मिक बोध का एक प्रतिबिम्ब ही होता है.इसमें तब तक कोई बुराई नहीं जब तक कि प्रतिबिम्ब को दर्शाने वाला आईना धूमिल ना हो,अगर सामाजिक,राजनितिक,सांस्कृतिक धार्मिक बोध का आईना साफ़ और चमकदार है तो समाज समुदाय की संकीर्णता और  साम्प्रदायिकता के धूल से धूसरित और वीभस्त कभी ना होने पाएंगे.
साम्प्रदायिकता को सबसे ज्यादा संवेदनशील धर्मं के आधार पर किया जाता है...जब कि धर्मं के आधारभूत सिद्धांतों का साम्प्रदायिकता से कोई वास्ता ही नहीं होता..पर जब सामाजिक और राजनितिक आधार धर्मं के आड़ में अपने निहित स्वार्थ और प्रभाव को बचाने कि कोशिश में लग जाते हैं तब हिंसा कि आग भड़क उठती है.यह मान बैठना कि विभिन्न धर्म के अनुयायियों या समुदायों के सांसारिक हित (सामाजिक,सांस्कृतिक,आर्थिक,राजनितिक)अन्य किसी भी धर्मं के अनुयायियों के सांसारिक हित से भिन्न हैं...तथा परस्पर एक दूसरे के विरोधी हैं...यही भाव धर्मं की संरचना और प्रभाव की व्यापकता से विमुख और धर्मं आधारित सम्प्रदाय की संकीर्णता के प्रति झुकाव में बदल जाता है.लोग यह भूल जाते हैं कि अलग-अलग धर्म एक ही वृक्ष की अलग-अलग शाखाएं हैं..जो एक ही जड़ से पोषित होती हैं और वह है इंसानियत..मानवता की जड़ जो कई महीन शाखाओं जैसे दया,करुणा,प्रेम,सेवा,सदभाव इत्यादि में बंटी ....जमीन के भीतर गहराई से समाई ...पूरे वृक्ष को पोषित करती है.इंसानियत की ये जड़ें जितनी गहराई में समाएगी उतना ही वृक्ष की शाखाओं को भी विस्तार मिल पायेगा...पर अमूमन ऐसा नहीं हो पाता जड़ें गहरी हो कर वृक्ष को थाम लेती हैं पर घृणा,द्वेष,वैमनस्य के टकराव की आंधी शाखाओं को आपस में ही टकरा देती हैं ...और दुःख इस बात का कि कमजोर शाखाएं ही मजबूत शाखाओं से टकराने का दुस्साहस कर बैठती हैं ....और टूट जाती हैं.कुछ लोगों की विद्वेष पूर्ण भावना ,मतभेदों का इस्तेमाल उन सामाजिक आकांक्षाओं संघर्षों इत्यादि को विकृत रूप में उजागर करने के लिए कर लिया जाता है जिसका धर्म के वास्तविक स्वरुप से दूर=दूर तक कोई नाता नहीं होता.जैसा कि सी.जी.शाह कहते हैं,"साम्प्रदायिक प्रचार के प्रभाव में आकर लोग अपने शोषण ,अत्याचार और पीड़ा के वास्तविक स्त्रोत को पहचानने में असमर्थ हो जाते हैं और उनमें एक छद्म साम्प्रदायिक कारण की कल्पना कर लेते हैं."
एक कविता की दो पंक्तियाँ याद आती हैं...
विश्व मानव के ह्रदय में मूल हो सकता नहीं द्रोहाग्नि का

चाहता लड़ना नहीं समुदाय है,फैलती लपटें विषैले व्यक्तियों के श्वास से .
आधुनिक भारत में साम्प्रदायिकता के विकास के लिए ब्रिटिश शाशन की'फूट डालो शाशन करो'की नीति ख़ास तौर पर जिम्मेदार है.उन्होंने हिन्दू,मुसलमान ,सिखों को लगातार ऐसे अलग-अलग समुदायों का दर्ज़ा दिया जिसकी सामाजिक,राजनीतिक पहचान में कुछ भी साझा नहीं था स्कूल कॉलेज में भारतीय इतिहास बुनियादी रूप से साम्प्रदायिक दृष्टि से पढ़ाया जा रहा था . हालांकि यह भी सही है कि देश में मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के कारण ही उन्हें भी सफलता मिल पाई.अगर हम ऐसी किसी भी आंधी ,को रोकना चाहते हैं तो चीज़ों को सही देखने और समझने वालों की एक जमात तैयार करनी होगी जो ना हिन्दू हों ,ना मुसलमान ना सिख, ईसाई ,पारसी...वे सभी मनुष्यों के लिए हों...ऐसे मनुष्य जो साम्प्रदायिकता के संक्रमण से रूग्ण हैं उन्हें ये ज़मात.. राहत और शान्ति दे सके . कोई ऐसा धर्मं जो प्राचीन इतिहास के सम्राट अशोक महान के' धम्म' की ,मध्यकालीन इतिहास के शहंशाह अकबर के 'दीन-ए-इलाही' की और आधुनिक काल के सही अर्थों में 'धर्मनिरपेक्षता 'का जीती जागती मिसाल बने..सही शांत  चित्त के लिए हवा,भूमि और व्यवस्था दे सके .
धर्मं बेहद व्यापक शब्द है जिसमें सम्प्रदाय की आंधी की कोई गुंजाईश ही नहीं हो सकती.धर्म एक आध्यात्मिक रूपांतरण है ...अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला जागरण है.राधाकृष्णन जी के अनुसार ,"जिन सिद्धांतों के अनुसार हम अपना दैनिक जीवन व्यतीत करते हैं तथा जिनके द्वारा हमारे सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना होती है वे सब धर्म है,धर्म जीवन का सत्य है और हमारे प्रकृति को निर्धारित करने वाली शक्ति है......धर्मों में विशाल रूप से अनेकता मालूम होती है.इसका कारण यह है कि  हम अपने धर्मों के आधारभूत सत्य को नहीं जानते हैं.सभी धर्मों में एक समान तत्त्व,एक समान आधार है जिस पर वह अपना विश्वास तथा क्रिया कलाप आधारित करता है परन्तु वह इमारत जो इस आधार पर बनाई जाती है,प्रत्येक व्यक्ति के साथ भिन्न हो जाती है......धर्म का यह कर्त्तव्य है कि वह हमारे जीवन के प्रति सहज निष्ठा तथा मानवीय प्रकृति की एकता के प्रति विश्वास उत्पन्न कर दे."Jorge के अनुसार

"Basically religion is concerned with two fundamental ideas or experiences-first ,man's relationship to GOD ,& second his relationship to the universe about him including his fellowman. "
पंडित नेहरू के अनुसार,"हिंदुस्तान में धर्म एक व्यापक शब्द है जिसकी( धर्मं) की व्युत्पति 'धृ' धातु से हुई है जिसका अर्थ है धारण करना...एक साथ पकड़ना यह किसी वस्तु की भीतरी आकृति,उसके आतंरिक जीवन के विधान के अर्थ में आता है.इसके अंदर नैतिक विधान,सदाचार,व्यक्ति की सारी जिम्मेदारियां तथा कर्त्तव्य आ जाते हैं."
धर्म के दो रूप होते हैं..एक निष्ठाओं की वह पद्धति जिसके अनुसार व्यक्तिगत जीवन संचालित होता है .दूसरा धर्म पर आधारित सामाजिक पहचान.
धर्मं में प्रयुक्त सभी क्रिया कलाप एक विशेष मक़सद से हैं जो हमें रूपांतरित करते हैं...प्रार्थना प्रकृति के साथ एक होने की कृतज्ञ भावना है,कीर्तन असीम शक्ति के प्रति अपने आनंद और अहोभाग्य को निवेदित करना है...एक उत्सव है भक्ति भाव से भरे हृदय का,मंत्र मन को संयम और एकाग्रता की तरफ ले जाने वाला साधन है,यह उस सार्वभौमिक धर्मं के लिए आवश्यक है जो मानवता में यकीन ,चित्त की शुद्धिकरण और शांत जीवन की आकांक्षा रखते हैं.
उग्रवादी साम्प्रदायिकता का जन्म घृणा,भय तथा अतार्किकता की राजनीति की उपज होता है..इसे रोकने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि व्यक्तिगत ,सामाजिक,राष्ट्रीय व्यवहारों में धर्म के सार तत्त्व को ग्रहण किया जाए .मनु स्मृति के अनुसार....
धृतिः क्षमा दमोसतेय शौचमिन्द्रय निग्रहः
धी विद्या सत्यम क्रोधो दशक धर्म लक्षणम

धैर्य,क्षमा,शान्ति,लोभ न करना,शुद्धता,इन्द्रिय निग्रह,बुद्धि ,विद्या, सत्य तथा अक्रोध धर्म के १० लक्षण हैं.धर्म को किसी भी शर्त में संकीर्ण स्वार्थों के रूप में स्थान ना दिया जाए.प्रत्येक शरीर में निर्बाध बहने वाला लाल रक्त मनुष्यता का हो किसी हिन्दू के भगवा,किसी मुसलमान के हरे या अन्य किसी भी धर्म की संकीर्ण पहचान का द्योतक ना हो .
सच कहा है एक शायर ने ...
इबादत है दुखियों की इमदाद करना
जो नाशाद हों उनका दिल शाद करना
खुदा की नमाज़ और इबादत यही है



जो बर्बाद हों उन्हें आबाद करना.
लेखक hoffing के अनुसार "the essence of religion is faith in the conservation of VALUES.

"फूल तोड़ना मना है"

बगीचे में सुन्दर फूल खिले थे..बाहर कठोर से काले बोर्ड परश्वेत रंग से उभरी लिखावट थी "फूल तोड़ना मना है"अलग-अलग व्यक्तित्व ,अलग-अलग मानसिकता ,परिवेश के लोग बगीचे में घूम रहे थे.किसी ने (आत्मानुशासित)कहा,"फूल सुन्दर हैं ;पौधे पर सम्पूर्णता से खिले हैं खिले ही रहने दूँ तो अपने सौंदर्य और सुगंध से कुदरत को कृतज्ञ कर देंगे....किसी ने (स्वकेंद्रित,स्वात सुखाय)कहा,"ओह!ऐसे सुन्दर ,और तोड़ कर कोट पर सजा लिया.किसी ने(कुत्सित मानसिकता)ने फूल को बेदर्दी से तोड़ लिया..किसी ने (वीभस्त मानसिकता)फूल सिर्फ तोड़ा ही नहीं बल्कि उसकी पंखुड़ियों को भी अलग-अलग कर जमीन पर फेंक दिया और उसके ही अन्य साथियों ने अज़ीब सी घिनौनी हँसी के साथ जमीन पर पडी पंखुड़ियों को अपने परों तले कुचलना शुरू कर दिया....काले बोर्ड पर अब भी लिखावट वैसे ही चमक रही थी"फूल तोड़ना मना है"
समाज में स्त्रियों के प्रति पुरुषों की सोच के बस यही हालात हैं .कुछ कोमल ,विवेकी,संवेदनशील ह्रदय क़ानून (फूल तोड़ना मना है)मान जाते हैं और कुछ....!!!!
ऐसी घटनाओं का वर्गीकरण किशोर-व्यस्क,शिक्षित-अशिक्षित,शहरी-ग्रामीण जैसे असंख्य असीमित दायरों से हटकर बहुत ही सीमित छोटा पर बेहद विशाल बिंदु पर टिका है और वह है...व्यक्तिगत सोच,विचार,व्यवहार और मानसिकता."
महिलाओं के प्रति पुरुषों के द्वारा बलात्कार,यौनाचार,शोषण कहीं पर फटे कपडे,सिले जूतों में कुपोषित,शोषित किशोर का किसी महंगी कार में कुत्ते के साथ बैठे हम उम्र अन्य किशोर/किशोरी को देखने से उपजा आक्रोश है......तो कहीं अतिपोषित संभ्रांत व्यक्ति के भावनात्मक खालीपन से उपजी अकिंचनता की कुंठा......कहीं पर यह स्त्री के मन में बसे लोभ लालच के दहकते अंगार पर स्वेच्छा से चलने के दुस्साहस का भयंकर परिणाम है.......तो कहीं पर पारिवारिक आपसी रिश्तों के अवमूल्यन का छुपा हुआ घिनौना सच है.
आज के मशीनी युग में मानव रूपी मशीन ही सर्वथा खाली और बेकार है..सृजन के अवसर ही ख़त्म होते जा रहे हैं..पहले एक कुम्हार घड़े बनाता था तो सृजन के आनंद से भर उठता था..कुंठा के लिए जगह ही नहीं थी...एक मोची अपने बनाये जूते किसी और के पैरों में देखकर सर्जक होने के गरिमा बोध से उत्साही हो उठता था ......मानव की शक्ति और ऊर्जा तो आज भी वही है पर उसके निष्काशन के लिए जगह कहाँ है?फिर खाली मन मस्तिष्क कामातुर होने में ज़रा भी हिचक नहीं दिखता .....फिर चाहे वह गरीब की कुटिया के बाहर खुले आसमान के नीचे टूटी खाट पर लेटा कोई किशोर /व्यस्क/बुजुर्ग हो या फिर किसी पॉश कॉलोनी के ए.सी कमरे में मुलायम गद्दे पर मखमली कम्बल ओढ़ा कर औंधा पड़ा कोई किशोर/व्यस्क/बुजुर्ग हो.
पारिवारिक ताना बाना जिस तरह से आज बदला है वह स्वयं में एक चुनौती है...तीन पीढ़ियों के साथ एक ही छत के नीचे रहते हुए अनुभव और मूल्य सीखता -सीखाता परिवार आज तीन सदस्यों के पारिवारिक संरचना में तब्दील हो गया है जो किसी त्रिभुज के तीन बिंदुओं की तरह सीधे तौर पर सिर्फ दो ही मिलने की प्रवृत्ति रखते हैं.. (माँ/संतान या फिर पिता/संतान)अगर तीनों मिलने की जुगाड़ भी करते हैं तो त्रिभुज के कोण के विभाजक रेखा के केंद्र पर मिलने की तरह ..अति व्यस्तता उन्हें सम्पूर्णता से कभी मिलने ही नहीं देती है.सम्बन्धों का ऐसा विभाजन और विखंडन कभी नहीं रहा और फिर तीनों ही बाहर कहीं खुशी तलाशने लगते हैं जो कभी भी सही दिशा में नहीं जाता.
आधुनिक संचार साधनों की सहज सर्वसुलभता 'एक तो करेला उस पर नीम चढ़ा ' की कहावत चरितार्थ करता है...अंगुली के एक स्पर्श पर शील से अश्लील सामग्री उपलब्ध है...शील तो समाज में परिवार,शिक्षक सभी सीखा रहे हैं ..आवरण तो अश्लील पर है तो बस आवरण हटाने की उत्कंठा...और फिर उसे प्रायोगिक करने की लालसा कुछ असंयमी पुरुषों का शगल बन जाता है.
विज्ञापन सिनेमा धारावाहिकों में स्त्रियों को सजावटी तथा लुभावनी रूप में ही प्रस्तुत और प्रदर्शित किया जा रहा है...यह ठीक है कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता है पर यह महिलाओं के सम्मान का लाजतंत्र भी हो...सिनेमा से समाज तक माँ,बहन,बेटी के नाम पर भद्दी गालियां और कुछ मुहावरे लाज की हर सीमा लांघ जाते हैं.जिस समय निर्भया के लिए न्याय की गुहार का प्रदर्शन हो रहा था उसी वक्त पुलिस को चूड़ियाँ दिखाई जा रही थी...क्या चूड़ियाँ पहनने वाले हाथ ही गाड़ियां नहीं चला रहे....देश के विकास में योगदान देते सैकड़ों उत्पाद नहीं बना रहे...इसी लिए रायपुर की २२ वर्षीया सौम्या गर्ग ने "चूड़ियाँ पहन र घर बैठने"जैसे आम जुमले को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में चुनौती दी है ऐसे मुहावरे स्त्री को कमतर और कमज़ोर साबित करते हैं. स्त्री की दक्षा,प्रतिभा का प्रस्तुतीकरण करते समाचार विज्ञापन सिनेमा धारावाहिक 'समुद्र में एक बूँद' और 'ऊंट के मुंह में जीरा ' की तरह साबित हो रहे हैं.परिवार,समाज में यह सब देखता पुरुष स्त्री को सहज उपलब्ध मान बैठते हैं.विज्ञापनों तथा अन्य संचार साधनों की यह प्रवृत्ति भी रूकनी चाहिए.इस दिशा में स्वयं स्त्रियां भी कदम बढ़ा सकती हैं...."सजना है मुझे सजना के लिए "वे किसी भी शर्त में स्वयं को लुभावने उत्पाद के रूप में प्रस्तुत करने की इज़ाज़त किसी को ना दें.
स्त्रियां घर से बाहर..
निकलते वक्त ही

सज-धज जाती हैं

क्यों नहीं सजती वे ही स्त्रियां

घर पर

अपने पति के लिए ?
यह प्रश्न मेरे लिए
बहुत मायने रखता है.
रचाती हूँ मेहंदी
सजाती हूँ बिंदी
भरती हूँ मांग
लगाती हूँ महावर
और तुम्हारे प्यार का सिंदूरी रंग
रंग जाता है मेरे कपोलों को
मेरी कजरारी आँखों की सुंदरता को
ज़ज्ब कर लेती हैं
तुम्हारी आँखें
फिर नहीं समाती उन आँखों में
किसी और रमणी की सुंदरता.
नहीं मिल पाती
सुंदरता की कोई उपमा
बाहर तुम्हे
सोचती हूँ ............
हर स्त्री क्यों नहीं करती ऐसा.....
सजे-धजे





















सिर्फ अपने
और अपने पति के लिए .

घरों पर स्त्रियां बचपन से ही भेदभाव में पलती हैं..जो अधिकतर घर की बड़ी -बुजुर्ग महिला सदस्य ही करती हैं.पुरुष अनजाने ही यह सब देखते सुनते हैं और स्वयं को स्त्रियों से श्रेष्ठ समझने लगते हैं .जब घर से बाहर किसी श्रेष्ठतर महिला से उनका सामना होता है तो उनके अहम् की भुरभुरी दीवार ढहने लगती है और उसे बचाने के लिए अपने पौरूष का वे गलत इस्तेमाल कर जाते हैं.
महिला यौन उत्पीड़न के पीछे ऐसे कारणों की लम्बी फेहरिस्त है...बात चाहे १६ दिसम्बर की हो या बाद की कमोबेश उपरोक्त कारण ही इसके लिए जिम्मेदार हैं...पुलिस सजग हो ..क़ानून कठोर से कठोरतर हो जाए ऐसा होना चाहिए पर सर्वप्रथम उपरोक्त मानसिकता में सुधार ज़रूरी है.सृजनशीलता का विकास,पारिवारिक ताने-बाने की मज़बूती,मूल्यों और नैतिकता का विकास,संयम आध्यात्मिकता,संचार साधनों का सकारात्मक योगदान,स्त्रियों /पुरुषों का स्वानुशाशण सभी बात मायने रखते हैं....तस्वीर तभी बदलेगी.हाल ही में शक्तिपुंज ट्रेन से घर लौट रही थी...सवार होते ही बोगी के अंदर लड़ाई चल रही थी ...मालूम हुआ किसी लडके ने सोती हुई अनजान लड़की को छूने की कोशिश की थी...बोगी के सारे यात्री एकजुट हो गए थे और कुछ ही देर में लड़का पुलिस के गिरफ्त में था ...ऐसी बात नहीं कि जागरूकता नहीं आई है ...
ज़रुरत है स्त्री-पुरुष दोनों को ही मर्यादा की सीमा समझने की...यह समझने की कि उनकी ज़िंदगी पूर्णतः स्वतंत्र ,स्वकेंद्रित,स्वात सुखाय नहीं
है...उस ज़िंदगी की कुछ आर्थिक,नैतिक,पारिवारिक,सामाजिक,राष्ट्रीय और वैश्विक सीमाएं है जिसे लांघने का दुस्साहस उन्हें नहीं करना है .





कठोर क़ानून भी बन कर पारित हो गया..शिक्षा प्रणाली भी बदल रही है..लडके लड़कियां एक साथ गणित ,भौतिक विज्ञान,जीवविज्ञानपढ़ रहे हैं उन्हें यौन शिक्षा भी क्यों ना दी जाए...सही गलत स्पर्श क्या है...समय पूर्व यौन सम्बन्ध बनाने के शारीरिक दुष्परिणाम क्या हैं...समाज विशेष में ऐसे सम्बन्धों के लिए क्या-क्या प्रतिमान निर्धारित हैं..वगैरह वगैरह.सबसे मुख्य बात कि स्त्री-पुरुष विद्यालय,कार्यालय,परिवार में एक दूसरे के लिए खतरा नहीं बल्कि पूरक बन कर रहे.. ..दाएं और बाएं पैरों की तरह ...जिस प्रकार शरीर की सही गति के लिए दोनों पैरों का संतुलन और पूरकता अनिवार्य है ..दायां पैर आहत हो तो बायां पैर उसका पूरक बन गति को कायम रखता है....और बायां पैर जब भी मुश्किल महसूस करे दायां पैर उसका पूरक बन गति की अवरूद्धता से शरीर को उबार लेता है.वैसे ही समाज की गति के लिए स्त्री-पुरुष के आपसी रिश्तों का संतुलन और एक की अशक्तता में दूसरे के सहयोग की ज़रुरत है."मैं तुम्हारा ख्याल रखता हूँ;तुम मेरा ख्याल रखती हो."
यही वर्त्तमान संक्रमणकालीन युग का तकाज़ा है.



जब एक पुरुष
पहचानने लगता है स्त्री को
उसके रूप,सौंदर्य की लावण्यता से नहीं
बल्कि...
उसकी दक्षा,मेधा,प्रतिभा
बुद्धि,बोध की विलक्षणता
और उसके आत्मविश्वास से

देता है हौसला यह कहकर ....
छू लेना ऊंचे आकाश को
यह पहचान....यह हौसला
स्त्री के हर रूप
माँ,बहन,बेटी,पत्नी के
कन्धों पर
दो मज़बूत पंख बन उभर आता है
पहुँच जाती हैं वे शिखर पर
जहां से ...आकाश
बेहद करीब लगने लगता है
और सच कहूं !!!!!!!!!!
तब
उस पुरुष के व्यक्तित्व की ऊंचाई
हो जाती है .....स्त्री के लिए

आकाश से भी ऊंची .





एक नए विश्वास ; एक नई किरण के साथ............................

यमुना पाठक

Friday, December 6, 2013

लाइफ,लव,लाफ्टर (एक कप कॉफ़ी;एक कप चाय)

Important during the wave of live in relationship.
MOMENTS OF TOGETHERNESS
moments of togetherness is vital to avoid the presence of VO (पति,पत्नी और वो)in marital life .
A cup of tea & a cup of coffee do play a contributory role for success of marital life....it gives space for  interesting conversation with each other ...essential for a happy family life.undoubtedly the topics of conversation may be with polar extremes ...coffee (about house chores)...tea (about office job)...but they merge with a deep intimacy of two hearts...so deep ....that they start dancing in the same harmony...although the cups are two ...topics are distant as two poles...but the harmony is one...the music is one..dance is one ....because  the two cups give gift of togetherness...a sweet break from 24*7 life.
In short the two cups nourish the marital relationship...all the joys & celebrations that happen to MARITAL LIFE  come from the exixtence of two cups (in evening/morning) .Couple should dive deeper into the  presence of  each other with each sip of tea/coffee.
Even sitting silence with cup of tea/coffee..enables to bring the couple  closer to each other..their  joy, blissfulness... silence...echo in the deep silence of loving nature...creating a complete TRANQUILITY.....& God blesses a solitary couple with an utter glory,beauty & immense love.
हर शाम...
ऑफिस से आने के बाद.....
तुम कहते हो
चलो बैठते हैं
गर्म चाय के दो प्यालों के साथ
तुम्हारे मनुहार पर
लाती हूँ दो प्याले .
एक गर्म कॉफ़ी का कप अपने लिए
एक गर्म चाय का कप तुम्हारे लिए
यह भेदभाव क्यों ?
तुम पूछते हो.
हंसती मैं कहती हूँ
भेदभाव प्यालों से नहीं
प्यालों में समाये द्रव से भी नहीं
भेदभाव तो पलता है दिलों में
प्याले और उनका द्रव
हो आपस में
कितने भी भिन्न...
मोहलत देते हैं हम दोनों को
साथ बैठने की
कितना अच्छा है कि ....
हम बैठे हैं साथ
और सम्बन्धों के लिए
यही है बात ख़ास
तुम ठहाके लगा कर ...
इतना हंसते हो कि
तुम्हारी आँखें सजल हो जाती हैं
और कर देते हो एकाकार
दोनों प्यालों की तरलता को
कितना सुखद...लगता है
मेरे (कॉफ़ी)तेरे(चाय) प्यालों का
अपनी-अपनी संकीर्णता
अपने-अपने अहम् छोड़
यूँ एकाकार हो जाना
कितना अनमोल
होता है
वैवाहिक सम्बन्धों के
मूल्यों का...
मैं...तुम..से परे
हम में तब्दील हो जाना.
YAMUNA PATHAK

लिव इन रिलेशन

आधुनिकीकरण के नाम पर दो चार कदम क्या बढ़ गए

क़ानून की किताब में कैद हो कर रह गई है ये ज़िंदगी.

न्यायमूर्ति के. एस. राधाकृष्णन तथा पिनाकी चंद्रा घोष की अध्यक्षता की पीठ का आठ दिशानिर्देशन के साथ का कहना है लिव-इन संबंध न कोई अपराध हैं, न पाप और संसद को ऐसे संबंधों को वैवाहिक संबंधों की प्रकृति में लाने के लिए कानून बनाने चाहिए यह घरेलू हिंसा एक्ट के तहत स्त्री सुरक्षा को मद्देनज़र रख कर कहा गया कथन है.....यह कथन अविवाहित स्त्री-पुरुष के आपसी लिव इन सम्बन्ध तक तो शायद मान्य हो जाए पर इसके दुरूपयोग की सम्भावना भी बराबर बनी रहेगी जैसा कि खंडवा केस में,ओम्कारेश्वर स्थित बिजली विभाग से रिटायर व्यक्ति की पत्नी ने आरोप लगाया कि उसका पति अपना ज्यादातर वक्त लिव इन पार्टनर के साथ गुजारता है .इस पर जज श्री गंगाचरण दुबे जी के अनुसार दिया फैसला कि पत्नी,लिव इन पार्टनर समेत पति एक ही छत के नीचे रहे ...विवाहित पुरुष १५ दिन पत्नी के साथ और १५ दिन लिव इन पार्टनर के साथ रहे .....इसके अलावा व्यक्ति की चल और अचल दोनों सम्पत्तियों में पत्नी और लिव इन पार्टनर का बराबर का हिस्सा भी होगा ...यह सुनकर प्रत्येक विवाहिता जो विवाह संस्था और इससे जुड़े मूल्यों पर भरोसा करती है उसकी नाराज़गी और विक्षोभ लाज़िमी है. जुवेनाइल पर क़ानून बन जाने से बाल अपराध को बढ़ावा देने वाले व्यस्कों के और भी मज़बूत बन जाने की सम्भावना की तरह ही विवाह जैसी पवित्र संस्था पर ऐसा क़ानून बन जाने से भारतीय संस्कृति की आधुनिक विवाह संस्था के निहित मूल्यों के क्षरण की आशंका ....भी बन जाती है .यह वाकई बहुत ही विचारणीय विषय है....
सही है....
घर को आग लग रही घर के ही चिराग से
एक पति अपनी विवाहिता और लिव इन पार्टनर के साथ रहे ....पुराने 'रखैल' शब्द का आधुनिक रूपांतरण लिव इन रिलेशन है.....फिर ठीक इसका विपरीत भी सही माना जाएगा कि एक पत्नी अपने विवाहित और लिव इन पार्टनर के साथ रहे ...यह लव त्रिकोण को कानूनी जामा पहनाने की रस्म अदायगी हो जायेगी .....ये कैसी उदारता ?? एक विवाहिता के लिए पति का होना क्या मायने रखता है वह क़ानूनविद क्यों नहीं समझ पाते ?? क्या ऐसा कोई क़ानून नहीं जो इससे परे विवाह संस्था के पाकीज़ा मूल्यों को और मज़बूत बनाये ???हालांकि सुप्रीम कोर्ट की माने तो अगर कोई औरत जान-बूझ कर किसी विवाहित पुरुष के साथ रहे तो उसे इस तरह का कोई अधिकार ना देने की बात पर क़ानून लाने की कोशिश भी जारी है..फिर भी कुछ प्रश्न बेहद उलझे से होंगे....
1) एक पुरुष या स्त्री कितने लिव इन पार्टनर रख सकते है...एक..दो..तीन ..या फिर...और क्या इन सब को वैवाहिक दर्ज़ा दिया जाएगा ??अगर हां ,तो क्या यह आर्थिक,सामाजिक,नैतिक अवमूल्यन की शुरुआत नहीं होगी ??अगर नहीं तो फिर सम्बन्ध को लिव इन के बजाय विवाह सूत्र में ही क्यों ना रखा जाए .
२)लिव इन सम्बन्ध से जन्में बच्चों को चाहे जितनी आर्थिक सुरक्षा दे दी जाए ...क्या वे परम्परागत भारतीय परिवेश में सामाजिक और

पारिवारिक सुरक्षा पा सकेंगे ??क्या ऐसे हालात में उनके विकास पर कोई प्रभाव नहीं पडेगा ??
3)लिव इन पार्टनर यह भी दलील देते हैं कि वे इस तरह के सम्बन्धों में रहकर अपने भावी वैवाहिक ज़िंदगी की परीक्षात्मक जांच -परख ( trial and error )कर रहे होते हैं....अब जब इन्हे वैवाहिक सम्बन्ध का दर्ज़ा मिल जाएगा तो ऐसे trial and error उन्मुक्त और असंयम यौन संतुष्टि की प्रयोगशाला साबित ना होंगे ?हाँ यह ज़रूर है कि बगैर कोर्ट खर्च के तलाक विधि ज़रूर लागू हो जायेगी...अर्थात अब हमारा मन भर गया और हम दूसरी डाल पर अपना बसेरा बनाएंगे ....ज़िंदगी बस रैन बसेरा ही बन कर नहीं रह जायेगी??
४)राधाकृषणन जी की तरफ से यह फैसला भी तब लिया गया जब एक लिव इन दम्पति के बीच झगड़े हुए और सम्बन्ध ख़त्म होने के बाद महिला ने अपने लिए रख रखाव के खर्च की मांग रख दी .
क्या भविष्य में यह सम्भावना नहीं बनेगी कि किसी स्त्री द्वारा कोई भी धनाढ्य पुरुष लिव इन के नाम पर शोषित हो जाए....कुछ दिन,महीने,वर्ष के सम्बन्ध बना कर छुटकारा भी पा लेने की कोशिश और अर्थ लाभ की भी गलत कोशिश .....क्या यह एक व्यापार ना बन जाएगा ? आज कई क़ानून का इस प्रकार भी दुष्प्रयोग हो रहा हैं जिनमें दहेज़ सम्बंधित क़ानून,यौन उत्पीड़न क़ानून ,दलित उत्पीड़न क़ानून आदि आते हैं.
५)क्या यह आशंका नहीं कि सम्पति पर एकाधिकार की कोशिश में विवाहिता या लिव इन पार्ट्नर के तरफ से एक दूसरे पक्ष के लिए प्राणघातक योजनाएं अंज़ाम लेने लगें ??
६)एक समाज जहां आज भी विवाह पूर्व ,विवाहेत्तर या समलिंगी सम्बन्धों को मान्यता ही प्राप्त नहीं है या बहुल वर्ग की स्वीकृति ही नहीं है वहाँ ऐसे लिव इन रिलेशन पर क़ानून बना कर उसे सफलता पूर्वक लागू कर पाना किस प्रकार आसान होगा ...जहां आज भी कई न्याय लंबित पड़े हैं ...क्या ऐसे अमान्य सम्बन्धों की पेचीदगी अनावश्यक रूप से न्याय प्रक्रिया पर सवालिया निशाँ नहीं लगाएगी ?
ऐसे कई प्रश्न हैं जिन पर गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है
कुछ दिन पूर्व ही विधवा माँ से मिल कर आई और यह कविता लिखी काश !!!!प्रत्येक विवाहित पुरुष अपनी पत्नी की नज़र में अपनी मौजूदगी के अर्थ को और स्वयं पर पत्नी के एकाधिकार को समझ कर उस भाव का सम्मान कर सके तो ना ऐसे सम्बन्ध बने और ना ही उन पर ऐसे क़ानून बने .
लोग कहते हैं..
दुनिया गोल है
माँ की दुनिया भी
नीली तो नहीं ...पर हाँ'
गोल ही थी
और उसका गोलाकार होना
समाया था उनके माथे की गोल लाल बिंदी में.
सुर्ख लाल बिंदी
समेटे ऊर्जा सूर्य सी
मानो सिमटी जाती थी सारी दुनिया
उस गोलाकार छोटी सी बिंदी में

अब दुनिया...
माँ के लिए कुछ भी नहीं
क्योंकि नहीं सज पाती बिंदी
पिता के जाने के बाद
अब नहीं रहा माँ के लिए
दुनिया के होने का मायना
सूने माथे से गुम हुई बिंदी ने
ख़त्म कर दिया आदि अंत
एक बड़ी सी दुनिया का

डूब गई बड़ी सी दुनिया


पनीली आँखों के सूनेपन में

कोई गोताखोर कितना भी हुनरमंद हो
नहीं ढूंढ सकता...
वह छोटी सी बड़ी दुनिया
जानते हो क्यों ???
क्योंकि पनीली आँखें
साक्षात्कार करा देती हैं
दुःख की अथाह गहराई से
हिम्मत ही नहीं पड़ती
उस दुःख के सागर में डूबने की
अब मैं.....
और भी गहराई से
समझ पाती हूँ महत्व
उन सभी व्रत उपवास प्रार्थनाओं का
जो करती थी माँ अपनी दुनिया की हिफाज़त के लिए
मैं जानती हूँ ....
हमारी भी बड़ी सी दुनिया समाई है
माथे पर सजती छोटी सी लाल बिंदी में
बड़ी सी दुनिया का आदि अन्त
बस एक बिंदु पर .

लिव इन रिलेशनशिप की परिभाषा के अनुसार “an arrangement of living under which the couples which are unmarried live together to conduct a long-going relationship similarly as in marriage.”पर भारतीय परिवेश में जिस लिव इन सम्बन्ध की बात इस क़ानून द्वारा की जा रही है वह अत्यंत ही विरोधाभासी और वैवाहिक मूल्यों के खिलाफ होने के कारण अस्वीकार्य है.
यह लिव इन रिलेशन अगर अपराध और पाप दोनों नहीं तो व्याभिचार अवश्य है क्योंकि इसमें सिर्फ एक पक्ष पति या पत्नी की इच्छा होती है और यह इनमें से किसी एक को निश्चित ही पसंद नहीं होता ...(चाहे वह पति के द्वारा लिव इन पार्टनर हो या पत्नी के द्वारा) .किसी पत्नी के लिए यह बहुत ही पीड़ादायक हो जाता है क्योंकि अधिकांशतः वे आश्रित होती हैं.यह दो व्यक्तियों की निजता का संकीर्ण दायरा नहीं बल्कि दो परिवारों उनके सम्बन्धियों तक का विस्तृत दायरा होता है...और हमारी भारतीय संस्कृति me and my family का संकीर्ण फलसफा नहीं है.एक दाम्पत्य के टूटने की गूंज दो परिवारों के कान भेद देती है....इसके बिखरे कांच कई की आत्मा घायल कर देते हैं जिसमें मुख्यतः माता- पिता होते हैं.लिव इन रिलेशन में पति पत्नी की आपसी सहमति हो ही नहीं सकती क्योंकि पत्नी अपने पति के प्यार को किसी के साथ बाँट नहीं सकती.
और कैसा बदलता आर्थिक ,सामाजिक परिवेश !!!!!!!!!!इसे इस प्रकार के क़ानून का चोला पहना कर हम ही तो बदल रहे हैं ...आर्थिक संतुलन के लिहाज़ से दो को साथ रखना बेहतर है या तीन यह तो अर्थशास्त्र का अ ना जानने वाला भी बखूबी समझ सकता है.आर्थिक तकाज़ा ' हम दो,हमारे दो' का है...नैतिक तकाज़ा 'प्रेम गली अति सांकरी जामें दो ना समाय' का और सामाजिक तकाज़ा 'एक म्यान में दो तलवारें कभी नहीं रह सकतीं का है.यह सिर्फ दैहिक आकर्षण का मामला है...लिव इन रिलेशन और उससे जुड़े क़ानून की कभी ना ज़रुरत थी और ना रहेगी...पहले ऐसे सम्बन्धों को हवा दो फिर उनके संरक्षण के क़ानून बनाओ ऐसा मकड़ जाल ही क्यों बनाना !!!
“It’s better to have a live-in relationship rather then having a divorced life!”
यह विश्व के अन्य किसी भी देश के लिए हो सकता है पर भारत देश में कभी स्वीकार्य नहीं हो सकता.और हाँ, जो देश ऐसे सम्बन्धों को मान्यता देते हैं उनके यहाँ भारत वर्ष के सस्कारों जैसी मूल्यों की जड़ें गहराई से समाई नहीं होगी .
ये सही कहा गया है “Happiness in marriage is not so much FINDING the right person as BEING the right person.”
आज गाँव से कई युवक शिक्षा ,रोजगार आदि के लिए शहर की तरफ पलायन कर जाते हैं...आर्थिक रूप से कमजोर मज़दूर वर्ग अपनी पत्नी को शहर नहीं ले जा पाते ...ऐसे में कब उनकी रिक्तता लिव इन पार्टनर से भरने लगती है उन्हें आभास नहीं हो पाता पर ऐसे में परेशानी तीनों को उठानी पड़ती है.कई स्त्री-पुरुष आदतन जीवन मूल्यों के अभाव में असंयमी बन ऐसे सम्बन्ध बना कर रहने लगते हैं...परन्तु वज़ह कोई भी हो ..... लिव इन रिलेशन में लिव इन पार्टनर को पत्नी की तरह अधिकार या आर्थिक अंश देने वाले क़ानून के बन जाने से नैतिकता का जो अल्पांश भय भी समाज में बचा है वह आर्थिक सुरक्षा के संरक्षण के तले दम तोड़ देगा...पारिवारिक तनाव बढ़ जाएंगे ..सामाजिक विघटन को रोकना मुश्किल होता जाएगा और इस विषय पर सिर्फ क़ानून की भूल-भुलैया या विरोधाभासी प्रावधान उभर कर एक के बाद एक सामने आते रहेंगे.
मेरी प्रत्येक दम्पति से गुज़ारिश है कि इतिहास से सबक ले और ऐसे किसी भी लिव इन रिलेशन को खारिज़ करे , .....रुक्मिणी का दर्द किसी की लेखनी का हिस्सा भले ना बना हो पर आज की विवाहिता अपने पति के जीवन में किसी अन्य की उपस्थिति की कल्पना मात्र से सिहर जाती है.उसे अपने पति पर इस कदर भरोसा होता है....
हम दो मस्त पंछी ..
विचरें स्वच्छ नीलाकाश में

जब भी पड़ें कमजोर मेरी पाँखें
तुम्हारे मज़बूत डैने दें मुझे सहारा
कितनी आश्वस्त हो जाउंगी मैं...
और फिर
कितना आसान
कितना सरल
हो जाएगा
समेटना हम दोनों को










अपने हिस्से का आसमान.

"दुनिया बर्थडे केक की तरह है"

"All the world is birthday cake,so take a piece but not too much."

"दुनिया बर्थडे केक की तरह है,अपना हिस्सा लें लेकिन बड़ा हिस्सा छोड़ दें."

-Gorge Harison
मेरे प्रिय ब्लॉगर साथियों,
आप सब को मेरा बहुत ही प्यार भरा नमस्कार
जॉर्ज हैरिसन की ये ख़ूबसूरत पंक्ति मैं आज अपने बर्थडे पर आपको उपहार के रूप में दे रही हूँ.आप को कुछ प्यारी कविताएँ भी उपहार दूंगी...आप अवश्य आश्चर्य कर रहे होंगे जन्म दिवस पर उपहार लेने की परम्परा है पर यमुना तो देने की बात कर रही है.दोस्तों ,वह इसलिए कि ईश्वर ने हमें पृथ्वी पर इसीलिये भेजा है कि हम बस अपना हिस्सा लें और उस हिस्से का सर्वोत्तम उपयोग कर ईश्वर प्रदत्त उपहार को सार्थक कर दें.
सर्वप्रथम आपको 'happy birthday to you  गीत के विषय में कुछ जानकारी दे दूँ.
1998 की गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स के अनुसार," happy b'day to you'जन्म दिन पर गाया जाने वाला सबसे प्रचलित गीत है.यह गीत अब तक 18 भाषाओं में अनुदित हो चुका है.इस गीत के धुन का आधार 'good mornig to all 'गीत है.जिसे 1893  में रचा और संगीतबद्ध किया था अमेरिकी बहनों -पेटी हिल और मिल्ड्रेड हिल ने.ये दोनों बहनें नर्सरी स्कूल की शिक्षिका थीं.पहली पंक्ति शिक्षिका गाती थी बच्चे दूसरी पंक्ति गुनगुनाते थे -जिसके अंत में बच्चे 'टीचर'शब्द का सम्बोधन करते थे.
इसी गीत के आधार पर हिल बहनों ने हैप्पी b'day  गीत लिखा यह H.Kolman  द्वारा सम्पादित गीतों की पुस्तक में मार्च ,1924 में प्रकाशित हुआ था.उन्ही दिनों रेडियो और फिल्मों के आ जाने से यह गीत बहुत जल्द लोकप्रिय और प्रचारित हो गाया यह पूरा गीत इस प्रकार है.....
happy b'day to u
happy b'day to u (उसका नाम जिसका जन्मदिन है)
may God bless you ,may God bless you God bless you (उसका नाम जिसका जन्मदिन है)
from all friends and new
may goodluck go with you
and happiness too.....

जब यह गीत विश्व भर के रेडियो और टेलीविजन पर बजने लगा तो तीसरी बहन जेसिका हिल ने कॉपीराइट का मुकदमा दायर कर दिया ताकि इस गीत के प्रयोग पर रचयिता बहनों को रॉयल्टी मिलने लगे .इसके लिए शिकागो स्थित संगीत कंपनी klaton F. Sami कंपनी ने जेसिका हिल की ओर से इस गीत का संगीतबद्ध रिकॉर्ड प्रकाशित किया और 1935  में इस गीत का कॉपीराइट दर्ज़ कराया.
(यह जानकारी मुझे मेरे प्रिय अखबार 'दैनिक जागरण'के द्वारा 12 नवम्बर 2010को मिली थी जिसे मैंने डायरी में नोट कर लिया था.)
दोस्तों ,मैं प्रत्येक विशेष दिवस को मनाये जाने की पूरी पक्षधर हूँ ऐसा मैंने कई ब्लॉग में कहा है.यूँ तो हम प्रत्येक दिन को पूरे मनोयोग से जीते हैं पर जन्म दिवस वह दिन होता है जब हमारे साथ हमारे प्रिय जन भी उस विशेष दिन को हमारी खुशी से जुड़ कर जीते हैं जो हमें अपने होने का अर्थ समझा देता है कि हम सिर्फ स्वयं के लिए ही नहीं औरों के लिए भी महत्त्वपूर्ण हैं.मेरे जन्म दिवस पर मेरी आदरणीया माताजी और दिवंगत पिताजी को चौथी लड़की संतान के रूप में पाकर खुशी हुई होगी ये पूरे दावे के साथ मैं नहीं कह सकती पर इतना अवश्य है कि उन्होंने मुझे उस परम्परावादी पारिवारिक परिवेश में भी सम्पूर्णता से बढ़ने का पूरा अवसर दिया..शिक्षा में कोई कमी ना की ...सच कहूं तो सीमित साधनों से सर्वोत्तम संस्कार और मूल्य देने में कोई कसर ना छोड़ी मैं इसके लिए ईश्वर के और उनके प्रति नतमस्तक रहती हूँ.हाँ,दो शख्श जो मेरे जन्म दिवस पर बहुत खुश होते हैं वे हैं मेरे पतिदेव और मेरी प्यारी बिटिया ...जो मुझे अपने ज़िंदगी में बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं.
आज मैं तीन कविताएँ आप को उपहार स्वरुप दे रही हूँ ....
1)
सबसे बड़ी खुशी
घर लौट कर तुम्हारा
रोज़ यह पूछना
क्या किया सारा दिन ?????????????
प्रेरित करता है मुझे
करूँ कुछ ऐसा जो ...हो...
तुम्हारी खुशी से जुड़ा
दे तुम्हे संतुष्टि
और फिर ........
जुट जाती हूँ मैं
स्वयं को ही तराशने में
क्योंकि........
एक नहीं ,
अनगिनत बार कहा है तुमने
यमुना !!!!!
तुम ही मेरी सबसे बड़ी खुशी हो.
है रोशन ........
तुम्हारी खुशी के नूर से
मेरा घर-संसार .

2)
तुमसे शुरू...तुमसे ख़त्म
बिन मांगे ही
दिया तुमने.........
आसमाँ का पूर्ण चाँद
बसंत का भरपूर उन्माद
वर्षा की तृप्त फुहार
शीतल सहृदय बयार
ज़मीँ की हर बहार
मेरे जीवन में दाखिल हो कर
बता दिया तुमने
ज़िंदगी तुमसे शुरू होकर
तुम्ही पर ख़त्म हो जाती है.....
3)
छोटी सी चिड़िया
हम दो मस्त पंछी
विचरते स्वच्छ खुले नीलाकाश में.
जब भी पड़ती हैं
कमजोर
मेरी पाँखें
तुम्हारे मज़बूत डैने
देते हैं पनाह
मैं छोटी सी चिड़िया
कितनी आश्वस्त हो जाती हूँ
और फिर...............

कितना सहज
.......
कितना आसान
हो जाता है
समेटना अपने हिस्से का आकाश.
happy b'day to me ; happy b'day to u  all

Wednesday, November 27, 2013

7 अंकों वाला love

प्रिय पाठकों
पूरे विश्व को एड्स जैसी बीमारी से सचेत और सजग करने के हेतु एक दिसंबर 'विश्व एड्स दिवस' के रूप में मनाया जाता है.पिछली बार इस दिवस पर मैंने 'प्रेम की दैहिक भाषा 'ब्लॉग लिखा था.यूँ तो इस रोग की कई वज़हें हैं पर विवाह व्यवस्था और उसकी शुचिता से भी इसकी रोकथाम कुछ हद तक अवश्य सम्भव है.सात फेरे;सात वचनों वाली भारतीय विवाह संस्था की शक्ति,मर्यादा,पवित्रता पूरे विश्व पटल पर एक मिसाल है यह दो व्यक्तियों,दो वंशों ,दो परिवारों के मिलन के साथ ही अत्यन्त उत्कृष्टता से आध्यात्मिक शक्तियों का भी मिलन है.इसी भाव पर आधारित कुछ प्यार मनुहार की लघु कविताएँ लिख रही हूँ.
1)
बड़ी/छोटी गोल दुनिया
दायरा तुम्हारा है अत्यंत बड़ा
समाते हैं उसमें दुनिया जहां के लोग
परिवार से सम्बंधित
कार्यालय से सम्बंधित
तुम सब की चिंता में मग्न
ज़ेहन में तुम्हारी ...
कई कामों की रूप-रेखा.
पर.........
मेरी दुनिया का दायरा
बहुत सिमटा हुआ है
वह है...
मेरे माथे की छोटी सी गोल बिंदी में
तुम्हारे लिए रचती  गोल रोटी में

अच्छा लगता है जीना मुझे
अपनी इन छोटी-छोटी
गोल दुनिया में
जो समेट लेती है
तुम्हारी वो बड़ी सी दुनिया.
2)
सुवासित लम्हे
एक रात जब भर लिया था
मैंने
अपनी हथेलियों को
रातरानी के फूलों से
और....
महक उठी थी दरो-दीवार
तुमने पूछा....
भाते नहीं क्यों तुम्हे कभी
सुन्दर,महकते लाल गुलाब??
भा जाते हैं बस...
रजनीगंधा,मधुमालती
हरसिंगार,रातरानी और पारिजात.
मैंने धीरे से कहा
क्योंकि.......
ये सभी खिलते हैं बहुतायत से
ठीक तुम्हारे प्यार की तरह
आधिक्य में,
खुशबुओं से लबरेज़
मेरे छोटे-छोटे लम्हों को
सुवासित कर जाते हैं.
3)
पूर्ण विराम
तुम साथ हो मेरे....
ख्वाहिश नहीं मुझे अब कोई
तुम्हे छूना,तुम्हे निहारना
सम्पूर्णता से तुम्हे पाना
अपनी खुशी,अपने आंसू को
'मैं' से 'हम' में
तब्दील होते देखना
मेरी हर ख्वाहिश में
लगा देता है पूर्ण विराम.
4)
सेलिब्रेशन
नहीं करती नज़रअंदाज़...
तुम्हारी किसी बात को मैं
तुम्हारी छोटी से छोटी खुशी
हैं मेरी ज़िंदगी के हार के
छोटे-छोटे फूल की मानिंद
जब-जब पिरोती हूँ
उन छोटे-छोटे फूलों को
हाथ चलते हैं
पर मन....
उस हर खुशनुमा पल को
करता है सेलिब्रेट
बन जाता है जब पूरा हार
जीवन स्वयं हो जाता है
'एक सेलिब्रेशन'.
5)
लॉन्ग ड्राइव
एक पल जो ...
बेइंतहां भाता है मुझे
लॉन्ग ड्राइव पर जाना तुम्हारे साथ
तुम्हारे पसंदीदा गानों पर
तुम्हारा मंद-मंद मुस्काना
उन्हें कपकम्पाते लबों पर सजाना
मैं तुम्हे निहारते सोचती हूँ
कैसा चुम्बकीय आकर्षण है
तुम्हारे व्यक्तित्व में
तुम्हारी निगाहें पल भर को
हट जाती हैं सड़क से
क्या सोच रही हो ????????
पूछ बैठती हैं
मेरा चोर मन कहता है
देखो...देखो....
छूटे जा रहे हैं नदी-नाले शहर -गाँव
इमारतें जंगल और उद्यान
तुम हंस कर कहते हो
छूट जाने दो
बाज़ार गालियां दरो दीवार
बस हमारा साथ ना छूटे
ना आये कभी
इस लॉन्ग ड्राइव का गंतव्य
इसकी मंज़िल दूर और दूर होती जाए
वो सामने दिखते ...
क्षितिज की तरह .

6)
छोटी-छोटी खुशी
कहते हो यह अक्सर तुम
दिल से कभी लगाया ना करो
दुनिया जहां की...
छोटी-छोटी बातों को
रहो खुश हमेशा
हंसती-खिलखिलाती
हर उठती-गिरती लहरों में
क्योंकि.....
मेरी ज़िंदगी
चलायमान,गतिशील है
दुनिया जहां की
छोटी-छोटी बातों से नहीं
बल्कि..........
तुम्हारी छोटी-छोटी
खुशियों से.
7)
नुमाइश
ठन्डे मौसम में देर रात
कंप्यूटर स्क्रीन पर....
उभर रही थी तकरीरें
हमारे प्रेम की इबारतें
धीरे-धीरे..........
तुम जागे आधे नींद से
पूछा...
नहीं आओगी सोने ??????????
टाइप कर रही हूँ
पहुंचा रही हूँ
हमारे प्यार को
जग के कोने-कोने में
मुस्काते हुए कहा था मैंने...
उनींदी आँखों से अस्फुट से शब्दों में
कहा तुमने...
प्यार को प्यार तक ही रहने दो
नुमाईश में यह
तोड़ देता है दम

थम गई की बोर्ड पर
कपकम्पा कर उंगलियां
फड़फड़ा कर बंद हो गई
लाल डायरी.
कितना सच कहा तुमने !!!!!!!!!!!!!
तुम्हारा सारा प्यार...
कैद कर लिया अंतस में मैंने
कभी जगजाहिर ना करने के लिए .

Sunday, November 17, 2013

डैंड्रफ वाला तोता

दोस्तों ,मुझे टी.वी पर लोगों की ज़रूरतों,अभिरुचियों,चाहतों को प्रतिबिंबित करते...उत्पाद के प्रति लुभाते... आकर्षित करते ...विज्ञापन सदा ही आकर्षित करते है..उत्पादों के प्रति आकर्षण हो ...कोई ज़रूरी नहीं पर अधिकाँश विज्ञापनों के भाव से प्रभावित होती हूँ .आजकल चुनावी महापर्व या यूँ कहें चुनावी महासमर के मौसम में सबसे ज्यादा आकर्षित कर रहा है 'डैंड्रफ वाले तोते' का विज्ञापन ..."जिसमें छत से पपड़ी गिरने की सत्यता को एक तोता बताता है जबकि मीडिया उस तोते को 'डैंड्रफ वाले तोते' के रूप में खबर बनाने की जल्दी में होता है".सम्बंधित उत्पाद में तो मुझे कोई रुचि नहीं ...हाँ,मीडिया पर किये व्यंग से सरोकार रखती हूँ और जब उन्नाव जिले के डाँड़ियाखेड़ा गाँव में साधू शोभन सरकार के स्वप्न के फलस्वरूप खुदाई का कार्य और उसकी कवरेज लेते मीडिया की भूमिका देखा तो इस विज्ञापन का व्यंग और भी मुखर लगा.सच कहूं ,अगर जमीन भी विज्ञापन वाले तोते की तरह बोल सकती तो चीख कर कहती,"प्रजातंत्र के चौथे स्तम्भ,तुम अपनी असली भूमिका क्यों भूल रहे हो ?बंद करो 'साधू,स्वप्न और सोने 'सरीखे अंधविश्वास की कवरेज."ऐसा ही कुछ वर्ष पूर्व हुआ था जब गणेश जी द्वारा दूध पीने की खबर बगैर सोचे ,समझे, मनन किये पूरे देश में फ़ैल गई थी तब भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने ही फूर्ति दिखाई थी.स्वामी विवेकानंद जी के शब्दों में ,"मैं आप सब को अन्धविश्वास,मूर्ख देखने की बजाय चाहूँगा कि आप सब घोर नास्तिक बन जाएं क्योंकि नास्तिकता जीवन तो है जिससे हम कुछ बन सकते हैं पर यदि अन्धविश्वास में फंस गए तो बुद्धि चौपट हो जाती है,सोचने की शक्ति क्षीण हो जाती है जीवन का ह्रास हो जाता है. पर जमीन नहीं चीखी.. अपने कुछ अन्य स्तम्भ के साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सक्रिय रहा.
यह अन्धविश्वास के साथ पलायनवादिता ही तो है कि एक स्वप्न के सच को तलाशा जाए ...जबकि कई सच रोज जाहिर होते हैं और मौत बन कर दफ़न हो जाते हैं ..
.सच को गहराई में दफ़न कर देना और स्वप्न को गहराइयों से निकालने की कोशिश करना ...जाने कैसा विरोधाभास है जिसे मीडिया कारण सहित पूरी निष्पक्षता से दिखाने के बजाय किसी खेल की कमेंट्री के सदृश जुबान देकर ,अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह कर चुप्पी साध लेता है..प्रिंट मीडिया के लिए तो फिर भी प्रेस कौंसिल ऑफ़ इण्डिया जैसी नियामक संस्था है पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर कोई नियंत्रण नहीं है.दो चार दिन पूर्व एक चैनल ने डेल्ही से २३८ किलो मीटर दूर भानगढ़ के किले के रहस्य पर ध्यान लगाया हालांकि बार-बार कहा गया हम वैज्ञानिकता पर विश्वास करते हैं अन्धविश्वास को बढ़ावा नहीं देना चाहते पर साथ ही दीवारों पर बनी आकृति,टीम के साथ जो आदरणीया महिला थीं किले के अंदर उनकी तबीयत खराब होने की बात को वे ना बताएँ ऐसा भी नहीं हुआ. उनके अनुसार ,"चाँद पर पहुँचने के युग में चांदनी रात में भूतों की मीटिंग ' को पास के गोलकवास गाँव में किसी ने नहीं देखा था ; हाँ ,सुना ज़रूर था."फिर ज़रुरत क्या है ऐसी खबरों की ,जब गाँव के निवासी ही उस किले से जुडी डरावनी बातों को सच में देखे जाने से इंकार कर रहे हों .देश विदेश से जुडी तमाम खबरें हैं उन्हें दर्शकों तक पहुंचाना ज्यादा ज़रूरी है.बजाय अंधविश्वास से जुडी खबरों को दिखाने के .मेरी समझ से ऐसी जगह जहां अँधेरा हो,चमगादड़ उड़ रहे हों ,किसी की भी तबीयत बिगड़ सकती है.
अब ऐसा क्या किया जाए कि मीडिया स्वतंत्र भी हो और प्रजातंत्र के चौथे स्तम्भ की महत्त्वपूर्ण भूमिका को भी निभा सके .इसके लिए इस चौथे स्तम्भ को स्वयं चार बातों पर ध्यान केंद्रित करना होगा...खबरों के प्रकृति की सत्यता और निष्पक्षता,स्वयं की सजगता,अभिव्यक्ति की स्पष्टता,तथा भाषा प्रयोग में शिष्टता .
दूसरी अहम् बात 24 *7 की खबर प्रणाली बंद करनी होगी.समाचार चैनल के नाम पर वाद-विवाद,आरोप-प्रत्यारोप,मनोरंजन,बाबाओं ,ज्योतषियों के कार्यक्रम पर रोक लगानी होगी.किसी भी खबर की कवरेज निकालने और बार-बार प्रसारित करने के इस पॉपुलैरिटी सिन्ड्रोम से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को बचना चाहिए.
मुझे याद है जब आठवीं कक्षा में पढ़ती थी तब पापा हर दिन समाचार पत्र पढने को कहते क्योंकि खबर पढने के साथ शब्दों का भण्डार उनकी वर्तनी की शुद्धता खुद ब खुद हम सीख सकते थे,साथ ही वे हमें रेडियो पर प्रसारित खबरें सुनने को भी प्रेरित करते थे. कहते ,शब्दों के उच्चारण में सुधार होगा और वाक् शैली परिष्कृत होगी.फिर दूरदर्शन प्रचलन में आया तो उनका कहना था अब तुम समाचार सुन कर ज्ञान वृद्धि के साथ उच्चारण ,भाव,शब्द समझने के साथ बोलने की तहज़ीब भी
सीख सकोगी.सच था हम समाचार उदघोषक/उदघोषिकाओं से शालीन,शिष्ट भाषा, विचार-विमर्श के दौरान बातचीत की तहज़ीब सीख पाते थे आज भी कुछ चैनल बेहद अच्छे हैं लोक सभा,राज्य सभा टी.वी ,डी.डी भारती में प्रसारित बहस,विचार विमर्श बहुत ही आकर्षक होते हैं.पर अन्य कुछ चैनल में बेबाकी के नाम पर जो वाक् युद्ध चलता है वह चौथे स्तम्भ की मज़बूती पर प्रश्न चिन्ह छोड़ता है.
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चूँकि बच्चों- बड़ों, स्त्री -पुरुष ,गाँव शहर तक अपनी सहज पहुँच रखता है अतः उसे अत्यंत संजीदा ,सजग ,तार्किक और निष्पक्ष हो कर खबरों को पहुँचाना होगा.किसी भी मुद्दे पर विचार-विमर्श,बेबाक बहस के नाम पर ऐसा कुछ भी ना दिखाएँ जिसकी प्रति मिनट के कवरेज से दर्शक को कुछ भी
हासिल होने वाला नहीं है.समाचार ना तो क्रिकेट मैच होते हैं ना ही किसी फ़िल्म की कहानी जिसे देखने और दिखाने के लिए हर शॉट...हर कोण के साथ बार बार प्रसारित किया जाए.अगर हिंसा की खबर है तो उसे बार-बार दिखाने से अन्य संवेदनशील स्थानों पर भी हिंसा हो सकती है ..अतः ऐसे समाचार हर कोण से दिखाने की कोई ज़रुरत नहीं .पहले इतने चैनल नहीं थे तो प्रतियोगिता,टी.आर .पी .,आय ( revenue )की कोई आपाधापी भी नहीं थी,बिहारी के दोहे की तरह (सतसैया के दोहे ज्यों नायक के तीर,देखन को छोटे लगे,घाव करे गम्भीर)समाचार सारगर्भित,विषय केंद्रित,संक्षिप्त और प्रभावकारी होते थे.बिना शब्दों के आडम्बर और अतिश्योक्ति के जटिल से जटिल विषय प्रस्तुत होते थे .जब १९७१ में भारत-पाक युद्ध चल रहा था,लोगों से धैर्य रखने के साथ ,रात में घरों की बिजली बंद रखने की हिदायत दी गई थी...पूरी प्रमाणिकता के साथ खबरें जनता तक पहुँचती थी पर आज की तरह...सावधान,खबरदार...कोई है....जैसे शब्दों से आपके आस-पास के डर भय संशय,अशांति को और भी भयावह नहीं बनाया जाता था.सबसे पहले खबर मैंने दिखाया...मैं सबसे तेज....मेरी खबरें सर्वाधिक प्रमाणिक...ये कैसी प्रतियोगिता है ?मुझे जमशेदपुर की ओर जाने वाली ट्रेन में एक चाय वाला याद आता है ,वह कहता था,"खराब से खराब चाय पीयो"और सारे ग्राहक उसे बुला कर चाय खरीदते.कोई नेता...कोई चैनल तो यह कर के देखे ...मैं खराब से खराब नेता हूँ...मैं घटिया से घटिया चैनल हूँ...देखो लोग स्वयं खींचे आयेंगे ऐसे नेता ऐसे चैनल की तरफ.
एक दर्शक होने के नाते मैं अपेक्षा करती हूँ कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने खबरों के दौरान यह ध्यान रखे कि स्टूडियो में आये मेहमान के शब्दों को आरोप-प्रत्यारोप ,गरम बहसबाजी में परिवर्तित होने के पहले ही कैमरा बंद कर दे.खबरें इस तरह प्रसारित करे कि जनता में स्थानीय,राष्ट्रीय,अंतराष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में जीने का उत्साह आये.उस खबर की प्रमाणिकता ठोस रहे. खबरों द्वारा नेताओं की जन्म कुंडली नहीं ;देश के लिए उनके द्वारा किये गए कार्यों और नीतियों की कुंडली जनता के समक्ष रखी जाए...तभी देश का चौथा स्तम्भ जिम्मेदार माना जा सकेगा .
तुम हुंकार की वर्णमाला गढ़ो
पर कोई अक्षर छूट ना जाए...
तुम अवाम की आवाज़ बनो
पर आवाज़ वो घुट ना जाए...
तुम हर पटकथा के कथाकार बनो
पर कोई किरदार खो ना जाए...
तुम सत्य की मूरत बनो
जो जितनी सुन्दर सामने से हो
सुन्दर
उतनी ही हो
पृष्ठ से भी
(प्रायः मूरत सिर्फ सामने से सुन्दर होती है)

तुम्हारी सत्यता,निष्पक्षता में
ना हो सके संशय की कोई गुंजाईश




तुम पर हमें है दम्भ




क्योंकि ....तुम हो
प्रजातंत्र के चौथे स्तम्भ.

'पेन ड्राइव' में बंद ज़िंदगी

कल....
बेचैन..बेसब्र..
भरपूर तलाशा ज़िंदगी को.

ठहाकों में अपनों के...
मुस्कराहटों में बच्चों के.

सोचा......
देख लूँ आईना ही
शायद मिल जाए ज़िंदगी.

अपनी आँखें भी कहाँ देख पाती हैं
अपने ही चेहरे को !!!
सहारा लेना पड़ता है
किसी निर्जीव दर्पण का
या फिर......................

किसी बेहद करीबी की
बोलती आँखों का
जिसमें दिख सके
छवि अपनी पाक-साफ़
नहीं मिला ...ऐसा कोई करीबी .
आईने में दिखती..
अपनी तस्वीर में भी
पा सकी ना मैं ज़िंदगी.
पाती भी कैसे ?????
मिट गई थी वो
सजीवता के पन्नों से
प्राण भरे ....सभी एहसासों से
वक्त ही कहाँ है आज ??
सांस लेने का इस सजीवता को .

..........
थकी,क्लांत,मायूस नज़रें
टिक गई मेज़ पर
थिरक गई लब पर
एक फीकी मुर्दनी हंसी
बच्चों के ...
पसंदीदा चॉकलेट के मानिंद
पड़ा था एक पेन ड्राइव
और........................
उसकी प्राणहीन सूक्ष्मता में
बंद पडी थी ज़िंदगी.

दोस्तों,ज़िंदगी के बड़े-बड़े एहसास आज सिमटते जा रहे हैं...जीवन यांत्रिक हो गया है...यांत्रिकता का यह प्रसार हर विस्तार को अपने में समेट कर बेहद सूक्ष्म रूप देता जा रहा है.गीत,संगीत,मनोरंजन ,ज्ञान,अपनों से जुडी यादों से लबरेज तस्वीरें ,अपने अनुभव सभी एक छोटे से पेन ड्राइव में बंद होते जा रहे हैं...यह तकनीक की चरम कुशलता है ...दीर्घ को लघु करने की निपुणता है ...इसका स्वागत किया जाना चाहिए बस यह ध्यान रखना है ...ज़िंदगी की सजीवता,आत्मीयता सूक्ष्म और निर्जीव ना होने पाये .

Sunday, November 10, 2013

मैं आज भी उतना ही मासूम हूँ! (14 nov children's day)

बच्चे वक्त से पूर्व बड़े हो रहे हैं...उनकी मासूमियत कहीं खो रही है...वे बड़ों की बात नहीं सुनते....पीढ़ियों का अंतराल बढ़ रहा है....ऐसी कई शिकायतें लगभग हर समारोह,आयोजन ,पब्लिक फोरम में लोगों के बीच विचार विमर्श का मुद्दा बन रही हैं.अगर ये शिकायतें अल्पांश में भी सही हैं तो इसके लिए दोषी कौन है ?????????
शिक्षाविद श्रीमान नारायण जी ने यही प्रश्न उठाया था.
"After all who are these students/children  ?Are they not our brothers & sisters or sons & daughters ?? If there is something wrong with them,surely there is very wrong with us also.In other words condemnation of the student/children is in a sense condemnation of ourselves.We cannot shirk our responsibility in this regard.The fault lies partly with the system of education,partly with the teachers of educational institutions,partly with the existing social conditions & partly also with the conditions obtaining in our homes.  "

संस्कार और मूल्यों के कोई 'crash course  ' नहीं होते;ये परिवार,समाज और देश की आबो-हवा में घुले होते हैं जिन्हे बच्चे ऑक्सीजन की तरह हर पल ग्रहण करते रहते हैं.हवा जितनी शुद्ध होगी ...उतनी ही सशक्त नई पीढ़ी का जन्म होगा...बुजुर्ग  पीढ़ी के जिम्मेदार लोग तो सदियों से मूल्यों के संवाहक बने हैं .गलती दूसरी पीढ़ी या व्यस्कों से हो रही है जो कभी नौकरी का दबाव ,कभी समयाभाव कभी गृहस्थ जीवन की आपाधापी का हवाला देकर सबसे पहले जिस जिम्मेदारी की उपेक्षा कर रहे हैं -वह है पारिवारिक मूल्य और उससे जुड़ा बचपन.

दो महीने पूर्व अपनी बिटिया को हॉस्टल छोड़ कर लौट रही थी.सामने की बर्थ पर एक युवा दंपत्ति और उनका आठ वर्ष का पुत्र बैठा था.मैं अपने पतिदेव के साथ बिटिया के बचपन ,उससे सम्बंधित कई यादों को बांटने में मशगूल हो गई जैसा कि मैं हमेशा करती थी.अचानक सामने ध्यान गया तो मायूस हो गई.युवा दंपत्ति में पति किसी कांफ्रेंस की चर्चा के लिए मोबाईल में व्यस्त थे ;पत्नी लैप टॉप पर किसी मूवी में और बीच में बैठा बच्चा कभी मोबाईल की तरफ तो कभी लैप टॉप की तरफ देखता ;;ज़रुरत और समझ के अनुसार ढिशुम-ढिशुम की आवाज़ निकालता...हेल्लो हेल्लो करता और फिर खिड़की के कांच से बाहर देखने की कोशिश करता .सफ़र में संवाद तो चल रहा था पर एकतरफा और पूर्णतः यांत्रिक.मैं सोच रही थी ये दंपत्ति अपने बचपन के दिनों की बातें,बच्चे के एहसासों की बातें कर सफ़र को कितना जीवंत और यादगार बना सकते हैं...मन नहीं माना और आज्ञा लेकर उनसे रूबरू हुई और आपस में संवाद और जुड़ने का महत्व समझाया .थोड़ी देर में ही वह छोटा सा परिवार बेहद जीवंत हो उठा ....ए.सी के उस बंद डब्बे में भी बचपन खुल कर सांसें लेने लगा...माता-पिता के बचपन के पंख उस बच्चे में गज़ब का उड़ान भरने लगे....मुझे तसल्ली हुई....अपनी बिटिया से दूर होने का कष्ट भूल गई.
आज बचपन समाज के हर क्षेत्र से गायब हो रहा है...विज्ञापन,सिनेमा,धारावाहिक गाने,नाटक,बचपन को समय पूर्व परिपक्व साबित करने की कवायद में जुट गए हैं.कुछ इस मशहूर शेर के अंदाज़ में.....
"जुगनुओं को  दिन के उजाले में परखने की जिद करें....

बच्चे इस दौर के किस कदर चालाक हो गए हैं"

अब गाने अगर 'छोटा बच्चा जान कर हमको ना समझना रे' होंगे ....विज्ञापन के पापा ईश्वर की प्रार्थना से मच्छर भगाने की बात करें और बच्चा कहे हाँ, ईश्वर ने प्रार्थना टेबल के नीचे से सुन ली'....बच्चों के लिए बने धारावाहिक शिन चान का किरदार बड़ी-बड़ी बात करे तो आप ही बताइये बचपन स्वयं को कैसे बचा पायेगा ?कहाँ गए वो 'दादी माँ दादी माँ मान जाओ 'सरीखे पारिवारिक मूल्यों पर आधारित गाने....अमूल की मासूम बच्ची जैसी छवि और विज्ञापनों में क्यों नहीं दीखती....मोगली जैसे किरदार क्यों गायब हो रहे हैं....गिल्ली डंडा,कबड्डी,पोशमपाई जैसे खेलों ने क्यों दम तोड़ दिया ..और बंद कमरों के बंद बक्से में बेहद हिंसक रूप में पुनर्जन्म कैसे ले लिया है......इनमें से प्रत्येक प्रश्न का ज़वाब सिर्फ और सिर्फ दूसरी पीढ़ी के पास है.
ईश्वर ने बच्चों को सिर्फ वंश वृद्धि या मानव जाति की शाश्वता बरकरार रखने के लिए धरती पर नहीं भेजा है ...बच्चे ही हैं जो हमें दबाव और तनाव के क्षण में भी निश्चलता,निष्कपटता,के साथ बेशर्त प्यार और सत्यता का पाठ पढ़ाते हैं.जो व्यक्ति बचपन के जितना करीब रहता है 'वह उतना ही सहज,संतुलित,मासूम और बेफिक्र होता है.

एक मशहूर शायर का शेर याद आता है
मालूम ना था इतने फूल होंगे ऐ ज़िंदगी तेरी बाहों में

हमने तो अपना बचपन गुज़ारा था काँटों भरी राहों में "

पर इस फूल और काँटों की भी समझ बड़े होने पर आती है... हम तुलनात्मक,समीक्षात्मक होने लगते हैं ..बचपन की उन यादों को मौजूदा समय से तुलना कर बैठते हैं और तब एहसास होता है कि बचपन में कितने फूल और कितने कांटे थे ...निश्छल,निर्भय ,निश्चिन्त बचपन को तो इनका एहसास भी नहीं होता.
जैसा कि सुभद्रा जी की पंक्तियाँ कहती हैं .....
"ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी
बनी हुई थी आह, झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी

चिंता रहित खेलना खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद



कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद "

एक पुस्तक में कहीं पढ़ा था
"You may give them your love but not your thought;for they have their own thoughts.
you may house their bodies but not their souls;for their souls dwell in the house of tomorrow,


which you cannot visit ,not even in your dreams "
पर मेरा मानना है कि बच्चों से पूरी संज़ीदगी से संवाद कायम रखने ,उन्हें वक्त देने से ,वे अपने स्वप्न की दुनिया में बड़ों को सहर्ष ले जाते हैं.
इस दीपावली मेरी बिटिया घर नहीं आ पाई,उसने मुझे कुछ मोमबत्तियां पार्सल किये जो mentally challenged  बच्चों ने बनाये थे साथ में एक चिट्ठी जिसमें लिखा,"माँ,मैं इन बच्चों के लिए कुछ करना चाहती हूँ."मुझे दो बातों से तसल्ली हुई...प्रथम ,समाज के प्रति उपजी उसकी संवेदनशीलता और दूसरा, अपने एकाकीपन को अवसाद ना बनाकर प्रेरणा बनाने की उसकी कुशलता .
सच है पीढ़ियों का अंतराल,मासूमियत को असमय परिपक्वता की दहलीज़ पार कराने की कवायद हम जैसे दूसरी पीढ़ी की भयंकर भूल है ...तीसरी पीढ़ी को कभी दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि प्रथम और तीसरी पीढ़ी को जोड़ने वाली सेतु दूसरी पीढ़ी है एक घर में एक कुत्ता पाला गया,घर पर १० वर्षीया बच्ची ने उसका नाम नेट पर खोज कर रखा 'aron 'बच्ची की दादी ने उस पालतू कुत्ते को अपनी समझ से पुकारना शुरू किया 'अहिरावण' (पौराणिक नाम) दोनों ही अपनी-अपनी जगह सही थे अब ज़रुरत थी दोनों कड़ियों को जोड़ने की अतः बच्ची के पिता ने सेतु का काम किया बच्ची और दादी दोनों ही उस पालतू को दोनों नाम से बुला लेती हैं.अगर दूसरी पीढ़ी सजग और संवेदनशील है तो फिर पीढ़ी अंतराल की बात ही कहाँ रह जाती है ?उद्योग जगत में भी y-gen x-gen,baby boomers के बीच पीढ़ी अंतराल की बात होती है पर एक दूसरे को समझना आज आधुनिक तकनीक के माध्यम से कितना आसान हो गया है ...face book,ब्लॉग साइट्स ,सोशल नेट वर्किंग साइट्स जैसे साधनों से ५०-५५ वर्ष का व्यक्ति 20-25 के युवा से जुड़ रहा है बच्चों से जुड़ रहा है मूल्यों के संवाह के लिए इससे सशक्त माध्यम कहाँ मिल पायेगा .बस इन सभी साधनों की सही इस्तेमाल की ज़रुरत है.
ज़रुरत है अपने अनुशाषण ,अपने मूल्यों की तरफ बच्चों को जबरजस्ती खींचने की कोशिश के बजाय स्वयं ही मूल्य बन जाने की ताकि इन मूल्यों , संस्कारों तहज़ीब को बच्चे आबो-हवा और फ़िज़ाओं से प्राकृतिक रूप में ग्रहण कर लें .....बच्चों से जुड़ने,उनकी दुनिया में विचरण करने के लिए सर्वप्रथम उन्हें समझना ज़रूरी है.बच्चे आज भी उतने ही मासूम हैं जितने हम जैसी दूसरी और दादा जी नाना जी जैसी तीसरी पीढ़ी के ज़माने में हुआ करते थे....गलती बड़ों से हो रही है ....उन्होंने अपनी आँखों के चश्में से बच्चों को देखना और परखना शुरू कर दिया है ....हर बच्चा कहता है.....
कैसे पहचाना मैंने बोलो अपने पराये की सीमा
किससे सीखा मैंने इस झूठ फरेब का करिश्मा
जब-जब चाहा मैंने तुमको पाया सिर्फ खिलौना
तुम्हारे शानो शौकत ने किया इस कदर मुझे बौना
मैं आज भी उतना ही मासूम हूँ ,उतना ही निश्छल
छीनता जा रहा क्यों मेरा बचपन हर क्षण पल-पल ??

"God sends children for another purpose than merely to keep up the race ...it is to enlarge our hearts and to make us unselfish and full of kindly sympathies and affections to give our soul higher aims.....my soul is grateful to the lord as He has gladdened the earth with little children."(J.L.Nehru)

Tuesday, October 29, 2013

राहों पर दुःख लाख देखे,पर मैं रो न सका

दोस्तों,आपको बता दूँ कि हर बच्चे की तरह मुझे भी बचपन से ही घूमने-फिरने का बहुत शौक रहा है .हाँ,अन्य बच्चों से मैं एक बात पर अंतर रखती थी. मुझे रेल यात्रा से अधिक सड़क यात्रा  और प्रत्येक बच्चों के खिड़की के नज़दीक बैठने की शगल से अलग मुझे चालक के पास वाली सीट भाती थी.इसकी एक खास वज़ह यह थी कि दौड़ते-भागते दृश्यों से भी ज्यादा मुझे वाहनों के पीछे लिखे सन्देश आकर्षित करते थे.आजकल ये सन्देश इक्का-दुक्का वाहनों में ही नज़र आते हैं. शायद यह सुरक्षा के दृष्टिकोण को रखकर लिया गया निर्णय हो क्योंकि पीछे के वाहन का चालक उस सन्देश को पढ़ने के मोह में पथ से विचलित हो कर दुर्घटना ना कर बैठे.पर मुझे लगता है कि कम से कम उस सन्देश को पढ़ने के लोभवश ही वाहन चालक अपने आगे की गाडी को overtake नहीं करता और दुर्घटनाएं कम होती.खैर.........
बचपन की रोचक आदतें हमारी शेष ज़िंदगी में भी ज्यों की त्यों शामिल हो जाती हैं.वाहन के पीछे लिखे सन्देश के इस विलुप्त होते प्रचलन के बीच ही दो महीने पूर्व मुझे एक यात्रा के दौरान ट्रक के पीछे लिखा एक बहुत ही संजीदा सन्देश पढ़ने को मिला...
राहों पर दुःख लाख देखे,पर मैं रो न सका
ज़िंदगी मोड़ पर गुज़री,और मैं सो न सका

चूँकि पिछले दो वर्षों से उस राह पर महीने में एक बार जाना हो जाता था इसलिए मुझे यह अंदाज़ा लगाना आसान था कि ठीक आधे घंटे बाद एक चाय की दूकान पर यह ट्रक अवश्य रुकेगी.मेरा अंदाज़ा बिलकुल सही था. हम उस दूकान पर रुके, मेरी बेसब्र निगाहों ने चैन की सांस ली जब पुनः वही सन्देश दिखाई दिया.मैंने अपने पतिदेव से उस ट्रक के चालक से औपचारिक बात करने की आज्ञा ली.अमूमन मेरी ऐसी किसी भी खोज और भावनाओं से वे पूर्णतः वाकिफ होते हैं और इसका मान भी रखते हैं.उन्होंने सहमति में सर हिलाया और चाय की चुस्कियां लेने में व्यस्त हो गए.मैंने उन बुजुर्ग चालक (सरदारजी) की आँखों में कार्य के प्रति गौरव और संतुष्टि की तेज चमक देखी.मैंने उनका अभिवादन कर कहा,"भैया,आपके वाहन के पीछे लिखे सन्देश ने मुझे बेहद प्रभावित किया है,क्या ये शब्द आपके हैं?"उन्होंने कहा,"शब्द की भावनाएं और गाडी दोनों मेरी हैं,मैं पिछले कई दिनों से घर से बाहर हूँ."फिर बेहद संजीदे लहजे में बात की,"मैडम हम ट्रक चालक भी किसी सभ्य की तरह रोटी कमाने के लिए घर से निकलते हैं,हमें भी अपने बच्चों और परिवार की बेहद फ़िक्र रहती है पर मुझे अत्यंत दुःख होता है जब छोटी गाड़ियों,दो पहिया वाहनों और कभी-कभी पैदल चलने वालों की असावधानी और सड़क नियमों की अवहेलना का खामियाजा हम बड़े वाहनों के चालकों को भुगतना पड़ता है.नियमबद्ध होने के बावजूद किसी भी दुर्घटना होने के बाद हमारे साथ मार-पीट की जाती है,हमारे वाहन जला दिए जाते है.और हमें एक घृणित टैग और लेबल दे दिया जाता है"पियक्कड़".(मुझे यह सुन कर बेहद दुःख हुआ क्योंकि समाज के प्रति संवेदनशील होने की वज़ह से मैं कहीं भी और किसी भी व्यक्ति,समाज,कम्युनिटी को किसी विशेष तरह के नकारात्मक लेबेल या टैग देने की प्रवृति की सख्त विरोधी हूँ) मैं तो शराब भी नहीं पीता,राह में कई बार घायल को देख कर रो भी नहीं पाता. हाँ,अन्य वाहनों से दुर्घटनाग्रस्त ,सड़क पर पड़े घायलों को अगर देख पाता हूँ तो हॉस्पिटल पहुँचाने में मदद ज़रूर करता हूँ .ऐसे कई चालक मेरे साथ हैं जो मेरी बहुत मदद करते हैं.कुछ महीनों बाद मैं ट्रक चलाना छोड़कर स्थाई तौर पर गाँव में बस जाउंगा और मेरा भतीजा यह काम करेगा.उनकी बातों में आत्मगौरव के साथ घर परिवार से दूर रहने की पीड़ा,सड़क पर समय काल के ग्रास बनने वालों के परिजनों की वेदना की प्रतिध्वनि सुनी जा सकती थी.उनके अंतिम शब्द ने जीवन को एक  सीख दे दी. "मैडम,सच कहूँ,हमारी ज़िंदगी मोड़ और सड़क पर ही व्यतीत हो जाती है."पतिदेव की चाय खत्म हो चुकी थी और वे तनिक जल्दी में थे अतः मुझे अनिच्छा से बातचीत को विराम देना पडा.मैंने उन्हें धन्यवाद देते हुए कहा,"भैया,मैंने स्वयं आप की कही बातों को पिछले कई यात्राओं में एहसास किया है."
शेष मार्ग तय करते वक्त दिल को छू लेने वाली उन दो पंक्तियों के सन्देश के हर लब्ज़ सरदार जी के कहे लब्जों के साथ मिश्रित होकर असरदार औषधि बन, मस्तिष्क की कई स्मृतियों को चलचित्र की भांति प्रस्तुत करने लगे......अलसुबह साईकिल पर कोयले की बड़ी-बड़ी बोरियों को ले जाते लोग जो कोयले के बोझ से कई बार असंतुलित हो जाते थे, तेज गति से बाइक चलाते युवा,सड़क यातायात को बाधित करते रेस लगाते मनचले,overtake करते माचिस की डिब्बी जैसी छोटी-छोटी गाड़ियां जो बारिश के बाद अचानक निकले पतंगों सी लहरा कर भागती थी, क्षमता से भी ज्यादा सवारियों को बिठाये वाहन(संलग्न चित्र में देखा जा सकता है) ....ऐसी कई स्मृतियों के बीच यात्राओं के दौरान 95%  स्थितियों में हमारी गाडी को आगे बढ़ने का इशारा देते नियम बद्ध ट्रक चालक मुझे तीव्रता से याद आये.

Monday, October 28, 2013

'स्त्री'-एक शून्य ??

मैंने पूछा...
स्त्री का अस्तित्व क्या है ????
एक शून्य ........(0)
कही दूर से प्रतिध्वनि गूंजी...
चलो मैंने मान लिया..
परन्तु अब मेरी भी सुनो .....
स्त्री..है
बेशक एक शून्य
जिसे उचित स्थान दिया जाए तो
इजाफा करती है..
पुरुष के व्यक्तित्व में
परिवार के अस्तित्व में
समाज के कृतित्व में
बशर्ते...
उसे महत्त्वपूर्ण मान रखा जाए
पुरुष के दाईं तरफ..
शास्त्रों ने उसे पुरुष का वाम पक्ष माना..
और कर दिया महत्वहीन.
भारत वर्ष ने दिया..
संपूर्ण विश्व को शून्य का ज्ञान
शून्य के ज्ञान के साथ है ज़रूरी
शून्य के स्थान का महत्व
शून्य बढाता है दस गुना......(10)

इकाई के महत्व को
बस उसे स्थान मिले सदा
इकाई के दाएँ तरफ....
हाथ तो दोनों ज़रूरी हैं,
पर प्रायः दाहिना हाथ ही





बाएं से ज्यादा महत्व रखता है.

'कॉफ़ी का एक कप'

हर सुबह..
पति के दफ्तर जाने के बाद...
बच्चों को स्कूल भेजने के बाद...
सूक्ष्म निरीक्षण करती है
फैले हुए घर का
बिखरी हुई चीज़ों का
समेटती है.... बिखरे काम
सहेजती,जमाती है,चीज़ों को

यथास्थान...

इस बिखराव को समेटने के दौरान
होती है गज़ब सी ज़द्दोज़हद...
ख़्वाबों को हकीकत में तब्दील करने की
फिर भी......
सहज,शांत,संतुलित रहती है,
तन्हा स्त्री  .............
साथ देने उसका कोई है ,
तो बस......वह ....है...



कॉफ़ी का एक कप

फिर वही सुबह... निपट तन्हाई..और उस तन्हाई पर अधिकारपूर्वक आधिपत्य जमाता 'कॉफ़ी का एक कप '..बीती सांझ की

उपलब्धियों के हर्ष...रात के छूटे कुछ सितारों के दर्द

....और दूर तक फ़ैली ओस में भीगी भोर की ढेर सारी उम्मीदों को साझा करने को आतुर ....वह एक कप.

किसी के साथ कोई बातचीत नहीं...फिर इतनी आवाजें कहाँ से ???ओह! मन के बैठक में कई लोग..कई घटनाएं...कुछ बीती

रात के सपनों से चुराई ..तो कुछ यादों की संदूकची से


निकलीं...तो कुछ हकीकत में आँखों के सामने घटती..सब की आवाजें तन्हाई को भी तन्हा कहाँ रहने देती हैं...बेचारा कॉफ़ी का

एक कप तो बेवज़ह तन्हाई पर आधिपत्य जमाने का

कसूवार बन जाता है. बल्कि इसका हर घूँट तो तन्हाई को कम करता है...अंतर्मन की कोख में पलती उम्मीद और हसरत की



जुड़वां भ्रूणों को बेहद तन्मयता से पोषित करता है...


ख़्वाबों को सच में तब्दील कर लेने का जोश भरता है...छोटी-छोटी उलझनों के मकड़ जाल से निकल जाने की युक्तियाँ सुझाता



है......कहता है......"रात के छूटे सितारों के दर्द भरे




पड़ाव जीवन का अंत नहीं होते...उन सितारों के बीच का चाँद ही तुम्हारी सुप्त क्षमता है...जो तुम्हे उन्नति के सोपान में राह


दिखाता है..."

कॉफ़ी के कुछ अंतिम घूँट शेष रहते ही कई अनकही बातें...कई घुटी ज़ज्बातें ...नेट के ज़रिये उन तक पहुँचने के लिए बेताब

होने लगती हैं ...जिन्हें मैं जानती नहीं...पहचानती


नहीं...मैं कॉफ़ी के अंतिम घूँट से पूछती हूँ...

"क्या तन्हाई को दूर करने के लिए इतने सारे अज़नबियों के सामने दिल की गिरह

खोल देना जायज़ है..."

खाली हो चुका तन्हा कप


मुस्करा कर कहता है...... "क्या मालूम दुनिया का हर शख्श तुम्हारी तरह ही तन्हा हो !!!!! कॉफ़ी के एक कप के साथ."

मेरे प्रिय ब्लॉगर साथियों,अकेलेपन की शक्तियां एक तप की तरह होती हैं ...जो समाज हितोन्मुख होते ही व्यक्ति को




सुख,संतुष्टि,आत्मविश्वास की ऊर्जा से भर देती हैं ...ठीक





कॉफ़ी के एक कप की तरह...

तप तो अकेले भागीरथी ने किया था...पर जब उस तप के फलस्वरूप जब गंगा धरती पर उतर गईं तो पूरी पृथ्वी तृप्त हो



गई....यही तो है अकेलेपन से उपजा और बहुजन





हिताय...बहुजन सुखाय की सुन्दर भावना से किया गया  कर्त्तव्य.

Thursday, October 24, 2013

अपनी 'पहचान' का दर्द

२७ जुलाई २०१३
सामने ही पिता का मृत शरीर रखा था..आश्चर्य ..उनसे जुडी किसी भी बात पर कोई उनका नाम ना लेता ...बौडी को स्नान करा दो...मिट्टी पर फूल चढ़ा दो...माटी उठाओ...वगैरह वगैरह.समझ पाना मुश्किल था एक शखशियत जो जीवित अवस्था में एक अदद नाम पहचान से जाना जाता था आज उस शरीर से ऐसा क्या चला गया था जो उसके नाम पहचान को भी अपनी धारा में बहा ले गया.
साथियों !!!!!!!!!!
हम में से प्रत्येक इंसान ता उम्र अपनी पहचान की ज़द्दोज़हद में लगा रहता है जो अंत में एक बौडी...माटी के नाम में तब्दील हो जाता है.मनोवैज्ञानिक अब्राहम मिसालो की थ्योरी 'Hierarchy Of Needs 'के अनुसार रोटी कपड़ा मकान और सेक्स की मूलभूत आवश्यकता की पूर्ति के तुरंत बाद अपनी पहचान की ख्वाहिश जागृत होती है.लोगों के द्वारा स्वीकार किया जाना ,मूल्य दिया जाना हर कोई चाहता है.
अमिताभ बच्चन जैसे महानायक का आज भी कर्मशील रहते हुए समयानुसार अपनी छवि को ढालते हुए अपनी पहचान बरकरार रखना.....पहचान खो जाने के डर से बड़े-बड़े कलाकारों का अवसाद में चला जाना......किसी ट्रैफिक जाम में फंसते ही चिल्ला उठाना,...."तुम मुझे पहचानते नहीं ....जानता नहीं मैं कौन हूँ..."ये सारे वाक्यात पहचान के दर्द को बयान करते हैं.बड़े-बड़े लोग अपनी पहचान की बुलंदियों पर होती ही अखबार की सुर्खियाँ बन जाते हैं ...हालांकि यह सदा सुखद नहीं होता जैसा कि एक मशहूर शायर ने कहा है...
"शोहरत मिली तो नींद भी अपनी ना रही

गुमनाम ज़िंदगी थी तो कितना सूकून था "

इसी क्रम में मुझे भागते-दौड़ते ,चलते फिरते लोगों के लश्कर दिखते हैं जो पारिवारिक सामाजिक दायित्वों के निर्वाह में अलग-अलग चेहरों के पीछे असली चेहरा छुपाये अलग-अलग चेहरों से मिलते हैं इस दरम्यान वे अपना असली चेहरा भी भूल जाते हैं और मज़े की बात तो यह कि अगर अपने असली चेहरे में कभी दुनिया के सामने आ जाएं तो दुनिया पहचानने से ही इनकार कर देती है इस मशहूर शेर की जुबान उधार ले लूँ तो.....ऐसे लोगों से मेरी इल्तजा है....
अपनी पहचान ही खो ना जाए भीड़ में रफ्ता-रफ्ता

इतने चेहरे भी ना बदल थोड़ी सी शोहरत के लिए


Life is a stage, and when the curtain falls upon an act, it is finished and forgotten. The emptiness of such a life is beyond imagination.
Alexander Lowen, describing
the existence of a narcissist

भी-कभी सोचती हूँ मुंशी प्रेमचंद ने धनपत राय के नाम से रचना क्यों ना लिखी...यह भी पहचान का ही दर्द था..उनके करीबी उन्हें कभी ना पढ़ते .....लोग पहचान को बहुत हलके में लेते हैं .कालान्तर में विकसित किये गुणों को पहचान के रूपांतरण के तौर पर कभी नहीं सम्मान देते.एक उदाहरण यह है.
एक साधारण परिवार के बालक ने बहुत संघर्ष कर अपने गुणों को विकसित किया और व्यस्क होने पर उस देश का राजा बन गया.पर प्रजा उसे अब भी अपने आस-पास का वही साधारण बालक समझ उसका यथोचित सम्मान नहीं करती थी.अब वह ढिंढोरा तो पिटवा नहीं सकता था कि मैं राजा बन गया हूँ,मेरा सम्मान करो.उसे एक उपाय सूझा.वह राजा तो था ही,वैभव की कोई कमी ना थी.अतः उसने पैर धोने के स्वर्ण पात्र को गलवा कर एक बेहद लोकप्रिय महापुरुष की मूर्ति बनवाई और चौराहे पर लगवा दी.प्रजा आते-जाते उस मूर्ति को झुक कर नमन करती.कुछ महीनों बाद राज्योत्सव आया.राजा ने चौराहे के पास प्रजा को संबोधित किया और कहा,"मैं इन महापुरुष को नमन करता हूँ."प्रजा ने भी नमन किया.अब राजा ने पूछा,"क्या आप सब जानते हैं कि यह मूर्ति किस चीज़ से बनी है ?"प्रजा ने एक स्वर में कहा,"सोने की."राजा ने कहा,बिलकुल सत्य पर यह पैर धोने वाले स्वर्ण पात्र से बनी है.ऐसे ही मैं भी हूँ ,पहले साधारण बालक था अब मेरे गुणों तथा उत्तम कार्य कुशलता के कारण आप सब के सम्मान का आकांक्षी हूँ."प्रजा समझ गई राजा क्या कहना चाहता था.
रविवार ४ अगस्त २०१३ के प्रकाशित दैनिक जागरण अखबार में पढ़ा था,"रहस्यात्मक उपन्यासकार रोबर्ट गाल्ब्रिथ का पहला उपन्यास 'the  कुक्कूज़ कालिंग'अच्छी समीक्षाओं के बावजूद पाठकों में कोई ख़ास दिलचस्पी पैदा करने में विफल हो गया था .तभी मशहूर लेखिका जे.के रोलिंग ने एक अखबार को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि वे इस उपन्यास की वास्तविक लेखिका हैं.उन्होंने कहा,"छद्म नाम से उपन्यास लिखना आपको सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त करने की कोशिश होती है."पर रोलिंग के नाम का रहस्य खुलने के पूर्व जिस प्रकार उपन्यास की बहुत कम प्रतियां बिकी थी वह यह साबित करती हैं कि कभी-कभी व्यक्ति की पहचान पूर्वाग्रहों से भी ग्रसित हो जाती है.
इंसान हो या भगवान् हर किसी की एक ब्रांड इमेज होती है.भगवान शिव विषपान देव हैं ...तो हनुमान जी उड़ने वाले देव ...मीराबाई एक संत

हैं...तो कबीर तुलसी की सहजता उनकी पहचान है.
कुछ दिन पूर्व आदित्य गुप्ता जी का एक लेख पढ़ रही थी "twits and tweets  "जिसमें उन्होंने वर्त्तमान में फेसबुक ट्विटर पर users (the life and times of me,myself  & I) के द्वारा अपनी अतिरंजित छवि उकेरने पर चर्चा की है.उनका कहना है कि अगर आप की ज़िंदगी इतनी ही मनोरंजक और सुन्दर है तो आप को एक मॉडल या टी.वी .धारावाहिक में टी.आर.पी बढाता हुआ एक कलाकार होना चाहिए.पर पहचान के इस वर्त्तमान ज़द्दोज़हद को मैं ठीक उसी तरह देखती हूँ जो आज से कुछ दशक पूर्व चौपाल,गली नुक्कड़ क्लब,चाय की दूकान काफी हाउस में अपनी रुचि ,अपनी पसंद के लोगों के बीच और अनजाने में किसी अज़नबी से हुई मुलाक़ात के दौरान हुई गपशप के रूप में दिखती थी.वहां भी अपने विषय में बातें होती थीं ,चुनिन्दा विषयों पर विचार-विमर्श होता था.क्या स्वयं को अतिरंजित प्रस्तुतीकरण की चाहत थी ?नहीं .....फिर आज सोशल मीडिया में इसे इस तरह क्यों लिया जाए ?
स्वयं की पहचान उकेरना,स्वयं को प्यार करने जैसा है . इसे naarcissism कहते हैं.यह शब्द ग्रीक देवता नारसिसस से सम्बन्ध रखता है जो

बहुत सुन्दर माने जाते थे और जल भरे तालाब में पड़ती अपनी ही छवि के प्रेम में पड़ गए थे इतनी तन्मयता से अपनी छवि को घूरते रहे कि

एक फूल में तब्दील हो गए जिसका नाम उनके नाम पर रख दिया गया है.
अगर फेसबुक ट्विटर या और सोशल साइट्स के माध्यम से वर्त्तमान पीढी अपनी छवि अपनी पहचान को उजागर कर रही है तो यह इसलिए भी स्वागत योग्य है कि यह विश्व से प्यार करने की प्रथम सीढी है.दूसरों से आप तभी प्यार कर सकते हैं जब पहले खुद से प्यार करें.अपनी पहचान उकेरने के इस क्रम में अच्छी बातों से जुड़ना,अच्छे लोगों की पहचान को अंगीकार करना स्वाध्याय नहीं तो और या है और यह कहाँ गलत है ?अपनी पहचान का सम्मान ही दूसरों के सम्मान की पहल है.बस अपनी और अपने साथ के लोगों की पहचान के दरम्यान अहंकार की कोई चांदी ना हो.

जो चाहते हो कि पैरों तले ज़मीं रहे

तो अपने कद की बलंदी को आसमाँ ना कहो.

हाँ,एक बात अवश्य कहना चाहूंगी कि अपने मौलिकता में प्रत्येक व्यक्ति से मिलना,उनकी संस्कृति,परम्परा,विचार के प्रति उत्सुकता रखना उनकी पहचान को सम्मान देना ही असली निज पहचान है.हिना के रंग की तरह जो रच बस जाए.जब तक हथेली में रहे अपनी उपस्थिति का भान कराये... मिटने के बाद तो उसकी भी पहचान मिट जाती है.ज़िंदगी के जितने भी लम्हात मिले हैं वे विवेकपूर्ण ढंग से पूरी इंसानियत से जीए जाएं तो अपनी पहचान का दर्द कभी ना उभरे.वरना मृत शरीर तो बस माटी है...एक बौडी...जिसका कुछ नाम नहीं.

अंत में एक मशहूर शेर अर्ज़ करती हूँ...



कल तलक जो करते थे फख्र शानो-शौकत पर

शम्मा तक नहीं जलती आज उनकी तुर्बत पर.







हम इंसान की औलाद हैं इंसान ही रहे .बस यही हमारी पहचान है.
कल चले जाएंगे ये जहां छोड़कर प्यार की बस रहेगी निशानी
याद उनको करेगा ये ज़माना सदा लोग जिनका फ़साना कहेंगे.

quote from net thanx