Monday, October 28, 2013

'स्त्री'-एक शून्य ??

मैंने पूछा...
स्त्री का अस्तित्व क्या है ????
एक शून्य ........(0)
कही दूर से प्रतिध्वनि गूंजी...
चलो मैंने मान लिया..
परन्तु अब मेरी भी सुनो .....
स्त्री..है
बेशक एक शून्य
जिसे उचित स्थान दिया जाए तो
इजाफा करती है..
पुरुष के व्यक्तित्व में
परिवार के अस्तित्व में
समाज के कृतित्व में
बशर्ते...
उसे महत्त्वपूर्ण मान रखा जाए
पुरुष के दाईं तरफ..
शास्त्रों ने उसे पुरुष का वाम पक्ष माना..
और कर दिया महत्वहीन.
भारत वर्ष ने दिया..
संपूर्ण विश्व को शून्य का ज्ञान
शून्य के ज्ञान के साथ है ज़रूरी
शून्य के स्थान का महत्व
शून्य बढाता है दस गुना......(10)

इकाई के महत्व को
बस उसे स्थान मिले सदा
इकाई के दाएँ तरफ....
हाथ तो दोनों ज़रूरी हैं,
पर प्रायः दाहिना हाथ ही





बाएं से ज्यादा महत्व रखता है.

'कॉफ़ी का एक कप'

हर सुबह..
पति के दफ्तर जाने के बाद...
बच्चों को स्कूल भेजने के बाद...
सूक्ष्म निरीक्षण करती है
फैले हुए घर का
बिखरी हुई चीज़ों का
समेटती है.... बिखरे काम
सहेजती,जमाती है,चीज़ों को

यथास्थान...

इस बिखराव को समेटने के दौरान
होती है गज़ब सी ज़द्दोज़हद...
ख़्वाबों को हकीकत में तब्दील करने की
फिर भी......
सहज,शांत,संतुलित रहती है,
तन्हा स्त्री  .............
साथ देने उसका कोई है ,
तो बस......वह ....है...



कॉफ़ी का एक कप

फिर वही सुबह... निपट तन्हाई..और उस तन्हाई पर अधिकारपूर्वक आधिपत्य जमाता 'कॉफ़ी का एक कप '..बीती सांझ की

उपलब्धियों के हर्ष...रात के छूटे कुछ सितारों के दर्द

....और दूर तक फ़ैली ओस में भीगी भोर की ढेर सारी उम्मीदों को साझा करने को आतुर ....वह एक कप.

किसी के साथ कोई बातचीत नहीं...फिर इतनी आवाजें कहाँ से ???ओह! मन के बैठक में कई लोग..कई घटनाएं...कुछ बीती

रात के सपनों से चुराई ..तो कुछ यादों की संदूकची से


निकलीं...तो कुछ हकीकत में आँखों के सामने घटती..सब की आवाजें तन्हाई को भी तन्हा कहाँ रहने देती हैं...बेचारा कॉफ़ी का

एक कप तो बेवज़ह तन्हाई पर आधिपत्य जमाने का

कसूवार बन जाता है. बल्कि इसका हर घूँट तो तन्हाई को कम करता है...अंतर्मन की कोख में पलती उम्मीद और हसरत की



जुड़वां भ्रूणों को बेहद तन्मयता से पोषित करता है...


ख़्वाबों को सच में तब्दील कर लेने का जोश भरता है...छोटी-छोटी उलझनों के मकड़ जाल से निकल जाने की युक्तियाँ सुझाता



है......कहता है......"रात के छूटे सितारों के दर्द भरे




पड़ाव जीवन का अंत नहीं होते...उन सितारों के बीच का चाँद ही तुम्हारी सुप्त क्षमता है...जो तुम्हे उन्नति के सोपान में राह


दिखाता है..."

कॉफ़ी के कुछ अंतिम घूँट शेष रहते ही कई अनकही बातें...कई घुटी ज़ज्बातें ...नेट के ज़रिये उन तक पहुँचने के लिए बेताब

होने लगती हैं ...जिन्हें मैं जानती नहीं...पहचानती


नहीं...मैं कॉफ़ी के अंतिम घूँट से पूछती हूँ...

"क्या तन्हाई को दूर करने के लिए इतने सारे अज़नबियों के सामने दिल की गिरह

खोल देना जायज़ है..."

खाली हो चुका तन्हा कप


मुस्करा कर कहता है...... "क्या मालूम दुनिया का हर शख्श तुम्हारी तरह ही तन्हा हो !!!!! कॉफ़ी के एक कप के साथ."

मेरे प्रिय ब्लॉगर साथियों,अकेलेपन की शक्तियां एक तप की तरह होती हैं ...जो समाज हितोन्मुख होते ही व्यक्ति को




सुख,संतुष्टि,आत्मविश्वास की ऊर्जा से भर देती हैं ...ठीक





कॉफ़ी के एक कप की तरह...

तप तो अकेले भागीरथी ने किया था...पर जब उस तप के फलस्वरूप जब गंगा धरती पर उतर गईं तो पूरी पृथ्वी तृप्त हो



गई....यही तो है अकेलेपन से उपजा और बहुजन





हिताय...बहुजन सुखाय की सुन्दर भावना से किया गया  कर्त्तव्य.