Thursday, October 24, 2013

अपनी 'पहचान' का दर्द

२७ जुलाई २०१३
सामने ही पिता का मृत शरीर रखा था..आश्चर्य ..उनसे जुडी किसी भी बात पर कोई उनका नाम ना लेता ...बौडी को स्नान करा दो...मिट्टी पर फूल चढ़ा दो...माटी उठाओ...वगैरह वगैरह.समझ पाना मुश्किल था एक शखशियत जो जीवित अवस्था में एक अदद नाम पहचान से जाना जाता था आज उस शरीर से ऐसा क्या चला गया था जो उसके नाम पहचान को भी अपनी धारा में बहा ले गया.
साथियों !!!!!!!!!!
हम में से प्रत्येक इंसान ता उम्र अपनी पहचान की ज़द्दोज़हद में लगा रहता है जो अंत में एक बौडी...माटी के नाम में तब्दील हो जाता है.मनोवैज्ञानिक अब्राहम मिसालो की थ्योरी 'Hierarchy Of Needs 'के अनुसार रोटी कपड़ा मकान और सेक्स की मूलभूत आवश्यकता की पूर्ति के तुरंत बाद अपनी पहचान की ख्वाहिश जागृत होती है.लोगों के द्वारा स्वीकार किया जाना ,मूल्य दिया जाना हर कोई चाहता है.
अमिताभ बच्चन जैसे महानायक का आज भी कर्मशील रहते हुए समयानुसार अपनी छवि को ढालते हुए अपनी पहचान बरकरार रखना.....पहचान खो जाने के डर से बड़े-बड़े कलाकारों का अवसाद में चला जाना......किसी ट्रैफिक जाम में फंसते ही चिल्ला उठाना,...."तुम मुझे पहचानते नहीं ....जानता नहीं मैं कौन हूँ..."ये सारे वाक्यात पहचान के दर्द को बयान करते हैं.बड़े-बड़े लोग अपनी पहचान की बुलंदियों पर होती ही अखबार की सुर्खियाँ बन जाते हैं ...हालांकि यह सदा सुखद नहीं होता जैसा कि एक मशहूर शायर ने कहा है...
"शोहरत मिली तो नींद भी अपनी ना रही

गुमनाम ज़िंदगी थी तो कितना सूकून था "

इसी क्रम में मुझे भागते-दौड़ते ,चलते फिरते लोगों के लश्कर दिखते हैं जो पारिवारिक सामाजिक दायित्वों के निर्वाह में अलग-अलग चेहरों के पीछे असली चेहरा छुपाये अलग-अलग चेहरों से मिलते हैं इस दरम्यान वे अपना असली चेहरा भी भूल जाते हैं और मज़े की बात तो यह कि अगर अपने असली चेहरे में कभी दुनिया के सामने आ जाएं तो दुनिया पहचानने से ही इनकार कर देती है इस मशहूर शेर की जुबान उधार ले लूँ तो.....ऐसे लोगों से मेरी इल्तजा है....
अपनी पहचान ही खो ना जाए भीड़ में रफ्ता-रफ्ता

इतने चेहरे भी ना बदल थोड़ी सी शोहरत के लिए


Life is a stage, and when the curtain falls upon an act, it is finished and forgotten. The emptiness of such a life is beyond imagination.
Alexander Lowen, describing
the existence of a narcissist

भी-कभी सोचती हूँ मुंशी प्रेमचंद ने धनपत राय के नाम से रचना क्यों ना लिखी...यह भी पहचान का ही दर्द था..उनके करीबी उन्हें कभी ना पढ़ते .....लोग पहचान को बहुत हलके में लेते हैं .कालान्तर में विकसित किये गुणों को पहचान के रूपांतरण के तौर पर कभी नहीं सम्मान देते.एक उदाहरण यह है.
एक साधारण परिवार के बालक ने बहुत संघर्ष कर अपने गुणों को विकसित किया और व्यस्क होने पर उस देश का राजा बन गया.पर प्रजा उसे अब भी अपने आस-पास का वही साधारण बालक समझ उसका यथोचित सम्मान नहीं करती थी.अब वह ढिंढोरा तो पिटवा नहीं सकता था कि मैं राजा बन गया हूँ,मेरा सम्मान करो.उसे एक उपाय सूझा.वह राजा तो था ही,वैभव की कोई कमी ना थी.अतः उसने पैर धोने के स्वर्ण पात्र को गलवा कर एक बेहद लोकप्रिय महापुरुष की मूर्ति बनवाई और चौराहे पर लगवा दी.प्रजा आते-जाते उस मूर्ति को झुक कर नमन करती.कुछ महीनों बाद राज्योत्सव आया.राजा ने चौराहे के पास प्रजा को संबोधित किया और कहा,"मैं इन महापुरुष को नमन करता हूँ."प्रजा ने भी नमन किया.अब राजा ने पूछा,"क्या आप सब जानते हैं कि यह मूर्ति किस चीज़ से बनी है ?"प्रजा ने एक स्वर में कहा,"सोने की."राजा ने कहा,बिलकुल सत्य पर यह पैर धोने वाले स्वर्ण पात्र से बनी है.ऐसे ही मैं भी हूँ ,पहले साधारण बालक था अब मेरे गुणों तथा उत्तम कार्य कुशलता के कारण आप सब के सम्मान का आकांक्षी हूँ."प्रजा समझ गई राजा क्या कहना चाहता था.
रविवार ४ अगस्त २०१३ के प्रकाशित दैनिक जागरण अखबार में पढ़ा था,"रहस्यात्मक उपन्यासकार रोबर्ट गाल्ब्रिथ का पहला उपन्यास 'the  कुक्कूज़ कालिंग'अच्छी समीक्षाओं के बावजूद पाठकों में कोई ख़ास दिलचस्पी पैदा करने में विफल हो गया था .तभी मशहूर लेखिका जे.के रोलिंग ने एक अखबार को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि वे इस उपन्यास की वास्तविक लेखिका हैं.उन्होंने कहा,"छद्म नाम से उपन्यास लिखना आपको सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त करने की कोशिश होती है."पर रोलिंग के नाम का रहस्य खुलने के पूर्व जिस प्रकार उपन्यास की बहुत कम प्रतियां बिकी थी वह यह साबित करती हैं कि कभी-कभी व्यक्ति की पहचान पूर्वाग्रहों से भी ग्रसित हो जाती है.
इंसान हो या भगवान् हर किसी की एक ब्रांड इमेज होती है.भगवान शिव विषपान देव हैं ...तो हनुमान जी उड़ने वाले देव ...मीराबाई एक संत

हैं...तो कबीर तुलसी की सहजता उनकी पहचान है.
कुछ दिन पूर्व आदित्य गुप्ता जी का एक लेख पढ़ रही थी "twits and tweets  "जिसमें उन्होंने वर्त्तमान में फेसबुक ट्विटर पर users (the life and times of me,myself  & I) के द्वारा अपनी अतिरंजित छवि उकेरने पर चर्चा की है.उनका कहना है कि अगर आप की ज़िंदगी इतनी ही मनोरंजक और सुन्दर है तो आप को एक मॉडल या टी.वी .धारावाहिक में टी.आर.पी बढाता हुआ एक कलाकार होना चाहिए.पर पहचान के इस वर्त्तमान ज़द्दोज़हद को मैं ठीक उसी तरह देखती हूँ जो आज से कुछ दशक पूर्व चौपाल,गली नुक्कड़ क्लब,चाय की दूकान काफी हाउस में अपनी रुचि ,अपनी पसंद के लोगों के बीच और अनजाने में किसी अज़नबी से हुई मुलाक़ात के दौरान हुई गपशप के रूप में दिखती थी.वहां भी अपने विषय में बातें होती थीं ,चुनिन्दा विषयों पर विचार-विमर्श होता था.क्या स्वयं को अतिरंजित प्रस्तुतीकरण की चाहत थी ?नहीं .....फिर आज सोशल मीडिया में इसे इस तरह क्यों लिया जाए ?
स्वयं की पहचान उकेरना,स्वयं को प्यार करने जैसा है . इसे naarcissism कहते हैं.यह शब्द ग्रीक देवता नारसिसस से सम्बन्ध रखता है जो

बहुत सुन्दर माने जाते थे और जल भरे तालाब में पड़ती अपनी ही छवि के प्रेम में पड़ गए थे इतनी तन्मयता से अपनी छवि को घूरते रहे कि

एक फूल में तब्दील हो गए जिसका नाम उनके नाम पर रख दिया गया है.
अगर फेसबुक ट्विटर या और सोशल साइट्स के माध्यम से वर्त्तमान पीढी अपनी छवि अपनी पहचान को उजागर कर रही है तो यह इसलिए भी स्वागत योग्य है कि यह विश्व से प्यार करने की प्रथम सीढी है.दूसरों से आप तभी प्यार कर सकते हैं जब पहले खुद से प्यार करें.अपनी पहचान उकेरने के इस क्रम में अच्छी बातों से जुड़ना,अच्छे लोगों की पहचान को अंगीकार करना स्वाध्याय नहीं तो और या है और यह कहाँ गलत है ?अपनी पहचान का सम्मान ही दूसरों के सम्मान की पहल है.बस अपनी और अपने साथ के लोगों की पहचान के दरम्यान अहंकार की कोई चांदी ना हो.

जो चाहते हो कि पैरों तले ज़मीं रहे

तो अपने कद की बलंदी को आसमाँ ना कहो.

हाँ,एक बात अवश्य कहना चाहूंगी कि अपने मौलिकता में प्रत्येक व्यक्ति से मिलना,उनकी संस्कृति,परम्परा,विचार के प्रति उत्सुकता रखना उनकी पहचान को सम्मान देना ही असली निज पहचान है.हिना के रंग की तरह जो रच बस जाए.जब तक हथेली में रहे अपनी उपस्थिति का भान कराये... मिटने के बाद तो उसकी भी पहचान मिट जाती है.ज़िंदगी के जितने भी लम्हात मिले हैं वे विवेकपूर्ण ढंग से पूरी इंसानियत से जीए जाएं तो अपनी पहचान का दर्द कभी ना उभरे.वरना मृत शरीर तो बस माटी है...एक बौडी...जिसका कुछ नाम नहीं.

अंत में एक मशहूर शेर अर्ज़ करती हूँ...



कल तलक जो करते थे फख्र शानो-शौकत पर

शम्मा तक नहीं जलती आज उनकी तुर्बत पर.







हम इंसान की औलाद हैं इंसान ही रहे .बस यही हमारी पहचान है.
कल चले जाएंगे ये जहां छोड़कर प्यार की बस रहेगी निशानी
याद उनको करेगा ये ज़माना सदा लोग जिनका फ़साना कहेंगे.

quote from net thanx

बस..अब और नहीं

कर्तव्यों के पथ पर चलते-चलते..........
छाले पड़े अधिकारों की ख्वाहिश में .
ज़मीन पर निगाहें टिकी रही बरसों
फुर्सत नहीं कि आसमां भी तलाश लूँ !
वेदना दुःख पीड़ा की चीत्कार में
दहेज़,भ्रूण ह्त्या जैसे अत्याचार में
खो ही तो रहा था मेरा अस्तित्व
नहीं.......बस और नहीं ....
अब तलाशुंगी अपना वजूद,
माजुँगी अपनी अन्तर्निहित शक्तियों को
बताउंगी ज़मीं से लेकर आसमां को
कि.....
क्या होता है स्त्री के मौन में छुपा रहस्य
क्या होता है स्त्री शक्ति का सही अर्थ .

अकेली हैं हीर;अकेले हैं रांझे

जीवन का प्रत्येक दिन इस खूबसूरती से जियो मानो वह अंतिम दिन हो और जीने के लिए अगला दिन और नहीं मिलेगा .
सूर्य अपनी दहक तपन का
कभी नहीं है शोक मनाता
गुलाब चुपके-चुपके से ही
है अपना पतझड़ मनाता ............
एहसास नहीं देती निशा
कभी अपनी विकलता की
अनुभूति कौन है कर पाता
सावन के भी विहवलता की ............
किसने पूछा लता बेल से
सहारों में सुख क्या पाती है ?
नदी से तृप्त होकर भी ना पूछा
अपने लिए रख क्या पाती है ?............
दूर जाती सड़क से कब पूछा
पड़े पाँव में कितने छाले हैं....
गोधुली से ना पूछा किसी ने
क्यों लब पर जड़े ताले हैं .................
अस्ताचल होता हुआ सूर्य
क्या निशा में शोक मनाता है?
दौड़ती-भागती सड़क पर कौन
ऐसे गहरे ज़ख्म कर जाता है ?
सबको खुशियाँ देने वाला
गुलाब ही क्यों झर जाता है?

सोचती सावन की आँखों में
कौन इतना नीर भर जाता है.........
उम्र भर हंसाता सारे जग को जो
जीवन के उलझे-सुलझे क्षण में
क्यों मायूस इतना है कर जाता
डूबते सूर्य सा जीवन गगन में .................
अपने-अपने जीवन पथ के
सुख-दुःख कब हुए साझे हैं ?
होती अकेली हीर जितनी ,
उतने ही तो अकेले रांझे हैं .
...........