Friday, November 4, 2011

gujarish

आज मैं पश्चिम  बंगाल के छोटे से स्थान  में हूँ . यहाँ के शांत वातावरण ने मेरी लेखन क्षमता के बीज को एक उर्वर भूमि प्रदान की है.वैसे भी बंगाल की आबो-हवा साहित्यकारों , कवियों,चित्रकारों के सुंदर कृतियों से सुवासित है.शायद इस भूमि का ही वरदान है कि बचपन से लिखने की चाहत को आज जैसे पर लग गए हों .कलम जब चल पड़ती है तो जीवन  के हर आयाम, हर पहलू को अपने शब्दों में समेट लेना चाहती है .इसलिए मैंने अपने सारे विचारों को इस ब्लॉग के जरिये आपके समक्ष लाना शुरू किया है.
किसी भी तरह की रचना तब तक अधूरी है जब तक उसकी  आलोचना या सराहना न हो. सराहना पाने से जहाँ बल मिलता  है वहीँ आलोचना  से प्रेरणा मिलती  है.इस धुप छाँव से कृति सजीव,सफल और सार्थक बनती है 
आप सबसे गुजारिश है कि आप में से जो भी मेरी रचना  पढ़े इसे सराहनाओं की दवा या आलोचनाओं के नश्तर से मेरी लेखन क्षमता का विकास  करने में सहयोग दे.मेरा मानना है कि जब इन्सान का जन्म ही दवा और नश्तर  के बीच होता है तो फिर इससे गुरेज क्यों?
जब-जब मेरी भावनाओं की बर्फ पिघलती है ये शब्द बन दुनिया के सामने आने को बेताब रहती है .इश्वर,समाज,प्रकृति,पर्यावरण,नैतिक और पारिवारिक मूल्य,देशभक्ति के सतरंगी किरणों को समेटे यह ब्लॉग इन्द्र धनुषी आभास दिलाने में कितना सफल होगा ये तो मैं नहीं जानती पर हाँ ये जरुर जानती हुईं कि मेरे हर ब्लॉग की लावण्यता उसके भावों में ही छुपी है .अपनी भावनाओं को आप तक पहुँचाने कि इस कोशिश में अगर कहीं भूल हो जाये तो उस भूल के लिए क्षमाप्रथिनी हूँ .
अपनी रचनाओं कि सुमन वाटिका से हर दिन एक सुमन आप सभी पाठकों के लिए .आशा है आप सब को कुछ  सुमन अवश्य पसंद आयेगें .
 



anubhav

कल चेतन भगत के लाइव चाट के द्वारा पता चला की उनकी पहली बुक को प्रकाशक ने नकार दिया था.पर आज वे युवा पाठकों के सबसे चहेते लेखक हैं.दैनिक jagरन के सप्तरंग ३ नवम्बर २०११ के पृष्ठ में मैंने पढ़ा की जब १९३१ में फिल्मों ने बोलना शुरू किया टी फिल्म आलामारा में पृथ्वीराज कपूर की आवाज को लोगों ने दोषमुक्त बताया .बाद में वे लोग ही उनकी आवाज के कायल हो गए.कहीं पर येभी पढ़ा था कि अमिताभ बच्चन की आवाज को एक रेडियो आयोजक ने नकार दिया था पर आज दुनिया जानती है कि बच्चन जी की आवाज में एक जादू,एक कशिश है.
इन सारीबातो  से सीख मिलती है कि अगर किन्ही कारणों से आपकी कृति या अच्छे कार्य भी नकार दिए जायें तो वह आपकी असफलता नहीं बल्कि भावी सफलता की शुरुआत हो सकती है,बशर्ते आप उस अस्वीकृति को जिंदगी की सबसे बड़ी असफलता न मान बैठें.

अपने आँगन से जितना बड़ा आकाश दिखाई देता  है क्या वही उसकी सीमा है? नहीं,आकाश  असीमित है पर इसका ज्ञान तो तब होगा जब हम घर से बाहर आएगें और उस विस्तार से रूबरू होंगे.