Tuesday, December 31, 2013

like...comment...share ;happy...new...year

एक शायर की जुबां में...
साल बदला नज़ारे वही हैं,बदनसीबी के मारे वही हैं
सिर्फ बदले हैं अपने कैलेण्डर,चाँद सूरज सितारे वही हैं.
एक महिला को एक जादुई लैंप मिला,उसे हाथ लगाते ही सामने एक जिन्न प्रकट हुआ..और .तीन इच्छाएं पूछी.महिला ने कहा,"मैं चाहती हूँ कि मेरा पति सिर्फ मुझे ही देखे...मैं उनकी ज़िंदगी में अपने तरह की इकलौती अमानत रहूँ...सवेरे उठते ही जिस पर उनकी पहली नज़र पड़े वह मैं ही होऊं.जिन्न ने उस महिला को स्मार्ट फोन बना दिया.
सच है आज आप कहीं भी हों पूजास्थल,समारोह,मैय्यत हर जगह आप का स्मार्ट फोन और उस पर फेस बुक ,व्हॉट्स ऐप जैसी सुविधाएं प्रत्येक इंसान की संगिनी हुई जा रही हैं. फेस बुक पर तीन क्लीक लाइक,कमेंट,शेयर.....ध्यान से देखा जाए तो ज़िंदगी में इन तीनों का अत्यंत महत्व है.अगर ये तीनों ही ज़िंदगी से नदारद हो जाए तो पहले से ही उदास चेहरों में बहुत सारी शिकायतें लिए भटकने वाले लोग पूरी धरती को उदास कर दें.एक पुजारी भाव-भंगिमा पर उपदेश दे रहे थे.उन्होंने कहा,"जब आप स्वर्ग की बात करते हैं तो आप के चेहरे पर चमक होती है ;जब आप करूणा की बात करते हैं तो आँखें सजल दीखती हैं;जब आप दान की बात करते हैं तो देने की संतुष्टि आपको आभा मय बना देती है.एक भक्त ने पूछा,"जब नरक की बात करते हैं तो क्या होता है?"पुजारी ने कहा,"वह आपका रोज का सामान्य चेहरा है."सच है दोस्तों ,रोज़मर्रा की ज़िंदगी में जब हम दूसरों की छोटी छोटी अच्छी बातों को पसंद(like) करना...उन पर अपनी स्वस्थ प्रतिक्रिया (comment)देना और उसे अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाने लगते हैं तो ज़िंदगी बहुत खूबसूरत हो जाती है
बस यही संकल्प लिया है मैंने .....दूसरों की अच्छी बातों को पसंद कर उस पर स्वस्थ प्रतिक्रिया दूंगी और उसे जन मानस की भलाई के लिए
शेयर कर दूंगी.
(trio of like,comment,share)
इसके लिए मैं कई उदाहरण से अपनी योजनाएं तैयार करूंगी.
१) कहीं पर पढ़ी एक बहुत प्यारी सी घटना याद आ रही है ...
एक सामाजिक विज्ञान की शिक्षिका ने एक दिन कक्षा में विद्यार्थियों को अपने friends के नाम लिखने के साथ उसकी जो बात उन्हें अच्छी लगती है उसे कागज़ पर लिखने को कहा.सप्ताहांत में उस शिक्षिका ने सभी विद्यार्थियों के नाम पर अलग-अलग लिस्ट बनाई और उन पर दूसरे बच्चों द्वारा उनके बारे में कही बातों को लिख कर मौलिक कागज़ सम्बंधित दोस्तों को दे दिया.बच्चे आपस में यह जानकार बहुत खुश हुए कि उनके कुछ सहपाठी जिन्हे वे करीब नहीं समझते थे वे उन्हें चाहते हैं.यह समूह ज़िंदगी के कई वर्षों के बहाव में आगे बढ़ गया.वर्षों बाद उनमें से एक छात्र युद्ध में शहीद हो गया इत्तफाकन उसकी यह टीचर उसके अंतिम यात्रा में पहुँची ...एक सैनिक ने परिचय पूछा और बताया,"संजय आपकी बहुत बातें करता था ."तभी संजय के पिता ने अपनी ज़ेब से एक पर्स निकाल कर उसमें से पीले पड़े एक कागज़ दिखा कर कहा,"यह कागज़ अंतिम समय संजय के पास था.यह सुन्दर काम करने का आप को बहुत-बहुत शुक्रिया " वहाँ संजय के कुछ सहपाठी भी थे उनमें से एक ने कहा,"उस दिन दिया हुआ कागज़ मेरी डेस्क पर आज भी रखा है."एक महिला ने कहा,"मेरे पति ने ऐसा कागज़ अपने शादी की अल्बम में लगा रखा है."एक ने आंसू पोछते हुए कहा,"मुझे लगता है कि हम सब के पास अपनी-अपनी लिस्ट सुरक्षित है."
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(संकलित )
यह दोस्तों की बात को लाइक करना था .... बात बहुत छोटी थी पर कितनी गहरी थी.
मैं ऐसे ही छोटी-छोटी बातों से लोगों को करीब और मधुर रिश्तों के लिए तैयार करूंगी.
२) एक और दृष्टांत देती हूँ.
एक बार एक वृद्ध व्यक्ति 19th शताब्दी के प्रसिद्ध कवि और कलाकार दांते गैब्रियल रोसिटी के पास कुछ स्केच और कलाकृतियां दिखाने गया,रोसिटी ने उन्हें ध्यान से देखा और उदार भाव से कहा कि इन तस्वीरों में योग्यता नज़र नहीं आती .अब दुखी वृद्ध व्यक्ति ने कुछ ऐसी कलाकृति दिखाई जो एक विद्यार्थी ने बनाई थी.रोसिटी उन स्केच को देखा कर झूम गया और कहा ,"इन्हे बनाने वाले विद्यार्थी में बहुत प्रतिभा है.एक कलाकार के रूप में उसे प्रोत्साहन और सहायता की ज़रुरत है अगर वह इसी में करियर बनाये तो उसका भविष्य सुरक्षित है... क्या वह विद्यार्थी तुम्हारा पुत्र है ?"उस वृद्ध ने दुखी हो कर कहा,"यह मेरी ही कलाकृतियां हैं...आज से ४० वर्ष पूर्व की हैं.काश यह पसंदगी (लाइक) और तारीफ़ मैंने पहले सुनी होती ,दरअसल किसी की तारीफ़ और पसंद के अभाव में हतोत्साहित होकर मैंने सालों पहले यह काम छोड़ दिया था पहले की दिखाई कलाकृति की अयोग्यता उसी का परिणाम है."
मैं अपने घर-परिवार समाज में सभी को अच्छे कार्य करने पर यथोचित प्रोत्साहन दूंगी.
३) एक अन्य उदाहरण 19th सदी की शुरुआत में लन्डन का एक युवक लेखक बनाना चाहता था पर वह सिर्फ चार साल स्कूल गया था ;पिता क़र्ज़ ना चुकाने के कारण जेल में थे और वह चूहों से भरे एक वेयरहाउस में बोतल पर लेबल लगाने का काम करता था.फिर भी कहानी पर कहानी लिखता गया,एक दिन उसकी एक कहानी स्वीकार कर ली गई..हालांकि बदले में पैसा ना मिला पर सम्पादक ने उसकी तारीफ़ की ....सम्मान दिया .वह इतना रोमांचित हुआ कि सडकों पर बौराया घूमता रहा..इस पसंद ( like )और तारीफ़ ने उसकी ज़िंदगी बदल दी अगर यह ना हुआ होता तो वह ज़िंदगी भर बोतल में लेबल लगाने का काम करता उस युवक का नाम था-चार्ल्स डिकेंस.मनोवैज्ञानिक जेस लायर एक जगह लिखते हैं,"प्रसंशा मनुष्य के ह्रदय के लिए सूर्य के सुखद प्रकाश की तरह है.इसके बिना हमारे व्यक्तित्व का पुष्प नहीं खिल सकता."
सच है "जिस इंसान के काम को जितना ज्यादा पसंद किया जाता है वह उतना ही परिपूर्ण इंसान बन जाता है."
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(-नार्मन विंस्टन पील)
मैं अपने साथी ब्लोग्गेर्स के विचारों को यथोचित सम्मान दूंगी.
४) अब दूसरी बात कमेंट की आती है..यह भी जीवन में ज़रूरी है.अपने सहयोगियों या विरोधियों की प्रतिक्रिया का निष्पक्षता से विश्लेषण किया जाए तो हमें बहुत सी हितकारी बातें हाथ लग सकती हैं.झेन फ़कीर ने प्रतिक्रिया का बखूबी प्रयोग किया है-जब कोई शिष्य उनसे दीक्षित होता तो गुरु कहते _जाओ,हमें पा लिया,अब कुछ दिन हमारे विरोधी के पास रहो,हमारा दूसरा पक्ष वहाँ नज़र आयेगा,लेकिन जाना निष्पक्ष होकर.इस बात की पूरी सम्भावना रहेगी कि विरोधी कुछ मामलों में सही रहेंगे.हमारा और विरोधी का पक्ष मिलकर एक तीसरा पक्ष बन जाए जो और भी श्रेष्ठ हो सकता है." तो यह है कमेंट का प्रभाव.एक बात और अगर प्रतिक्रिया स्वरुप कुछ सच भी कहना हो तो सुनने में प्रीतिकर हो यह ध्यान रखना ज़रूरी है.एक शिक्षिका की कहानी याद आती है जो एक छात्र के परिवार की तस्वीर के विषय में प्रतिक्रिया सुन रही थी उनकी सहकर्मी ने कहा कि इस तस्वीर वाले बच्चे के बालों का रंग परिवार के अन्य सदस्यों से अलग है और उस बच्चे को बुलाकर पूछा क्या तुम्हे गोद लिया गया है.? उस बच्चे को इस बात का अर्थ नहीं पता था.पहली शिक्षिका ने समझ लिया बच्चे पर प्रश्न के रूप में यह प्रतिक्रिया गहरा असर डालेगी अतः बीच में बोलते हुए कहा,"क्या तुम माँ के पेट में पालने की बजाय उनके दिल से पैदा हुए हो.?बच्चे ने कहा ,"हाँ"और उसकी आखें खुशी से छलछला गईं..
(-
(संकलित )
मैं अपने प्रति किसी की प्रतिक्रिया का आकलन कर तदानुसार अपने स्वभाव में सुधार करूंगी.....साथ ही दूसरों के प्रति राय बनाने में शब्दानुशासन पर ध्यान दूंगी.
५) अब बात करती हूँ शेयर करने की.कुछ लोग अपने मन की बात या अच्छी बात को लोगों तक पहुंचाने को बेमानी मानते हैं.अगर कोई उनसे अपने कष्ट भी शेयर करे तो अतिव्यस्तता का बहाना कर देते हैं यह भूल जाते हैं कि लोग उन्हें महत्वपूर्ण मान कर अपनी बात कहना चाह रहे हैं.रोटरी क्लब के लंच में शहर के दो डॉक्टर एक बुजुर्ग जो कई वर्ष पूर्व रिटायर हो गए थे और दूसरा शहर का सबसे लोकप्रिय युवा डॉक्टर था.बेहद व्यस्त दीखता युवा डॉक्टर देर से आया और कहा,"काश मेरा फोन बजाना बंद हो जाए.बुजुर्ग ने सुना और कहा,"आज से २० वर्ष पहले मैं भी यही सोचता था ,पर तुम ईश्वर को धन्यवाद दो कि तुम्हारा फोन बज रहा है...इस बात पर खुश हो कि लोग तुम्हे चाहते हैं उन्हें तुम्हारी ज़रुरत है.फिर वह बुजुर्ग डॉक्टर निराश हो कर बोले,"अब मेरे पास कोई फोन कॉल नहीं आते,किसी को मेरी ज़रुरत नहीं मैं गुजरा वक्त हो गया हूँ."
-(-नार्मन विंस्टन पील)
मैं अपने दोस्तों,परिवार के सदस्यों को आवश्यकता पड़ने पर मदद के लिए तैयार रहूंगी... उनके फोन कॉल्स की उपेक्षा नहीं करूंगी.
दोस्तों,ये सच है.... जीवन अत्यंत छोटा है....साल के बदलते कैलेण्डर की तरह .मैं स्वयं के साथ सभी को जीवन का हर लम्हा जीने के ज़ज्बे से
भर देने का संकल्प लेती हूँ ."
.....किसी शायर की पंक्तियों में........
रोशनी की ज़ीनत थी घर में जिस कैलेण्डर से
एक साल ही रहकर वो भी उतर गया......
प्राचीन काल में श्रुति या सुनकर ही विद्या आगे एक से दूसरे तक पहुँचती थी फिर आज संकोच क्यों ???
हाँ, एक संवेदनशील नागरिक होने के नाते मेरा कर्त्तव्य बनता है कि किसी भी प्रकार के नकारात्मक और समाज के लिए अहितकारी विचार
को रिजेक्ट कर उसका प्रसार रोकने की जिम्मेदारी भी समझ सकूँ.
लाइक,कमेंट,शेयर की ऐसी शुद्ध ,निर्बाध त्रिवेणी बहाऊँ कि......
अबकी बरस नारी चीत्कार नहीं गूंजे खुशियों भरी चूड़ी की खनक
नारी अस्मिता ना हो तार-तार,रहे बची लाज भरी सिंदूरी चमक
दुःख ना हो इतना दर्दीला कि किसी भी बात पर जाए नयन छलक
लोभ,लिप्सा वासना की चाह नहीं हो ससम्मान जीवन जीने की ललक
पौरूष ऐसा दिव्य हो जाए कि ना छुपे,छुपाये उससे कोई भीगी पलक
करूंगी सारे अधूरे वादे पूरे कि फिर ना रह जाए कहीं कोई दिली कसक
हर स्थान बनाऊं इतना सुवासित कि हो गुलाब की हर पंखुरी सी महक
हर शख्श को करूँ आनंदित कि जैसे चमन में परिंदों के खुशी की चहक
खुशियां बिखेरूँ कण-कण में कि धरा में ही मिल जाए स्वर्ग की झलक
२०१४ अबकी बरस ऐसी तब्दीलियां ला कि दशकों तक गूंजे तुम्हारी धमक .

you don't need to be perfect...you don't need infinite wisdom...you don't need endless
patience or humility...you don't have to be a saint...you only have to want to live a life that's
full & true ...to rise up ,to greet your own unique destiny.
-paulo coelho

उषा की पहली किरण के दस्तक से तो खुल जाते हैं हर दरवाज़े
ये दुआ है कि हमें ज़िंदगी शिद्दत से जीना सीखा दे ये नया साल
दुआ यह भी कि सबके जीवन में ढेरों खुशियां लाये ये नया साल
" ईश्वर हम सब  को जीवन का हर लम्हा जीने के ज़ज्बे से भर दें ."

Friday, December 27, 2013

प्रीत की नदी-'यमुना'

शुरुआत Jess.c.scott की एक सुन्दर सी पंक्ति से करती हूँ.....
"when someone loves you ,the way they say your name is different.you know that your name is safe in

their mouths."
इस ब्लॉग को लिखने की प्रेरणा मुझे अपने एक साक्षात्कार में पूछे गए एक मनोरंजक प्रश्न से मिली.प्रश्न था,"आपका नाम यमुना है ,क्या आप इस नाम की पौराणिक महत्ता जानती हैं..क्या नाम के व्यक्तित्व पर पड़ने वाले प्रभाव से आप इत्तिफाक रखती हैं."
प्रश्न सुनते ही dale carnegie का कथन मानस पटल पर उभर आया


"names are the sweetest & most important sound in any language."
दोस्तों,अपना नाम सबको बहुत प्रिय होता है क्योंकि यही नाम हमें पहचान देता है .नाम कानों को प्रिय लगने वाला अक्षरों का समूह ही सिर्फ नहीं होता बल्कि इसमें अर्थ होता है जो हमें परिभाषित भी करता है.कहा भी जाता है...words have meaning;names have power.उस प्रश्न का ज़वाब तो मैं संक्षिप्त ही दे पाई थी पर आज 15 वर्षों के बाद मन इस विषय पर ब्लॉग लिखने को कर बैठा.आप में से कुछ लोग नाम के महत्व को मानते होंगे.कर्ण ने महाभारत के युद्ध में जिस आदमी को सारथी चुना वही उसकी हार का कारण बना ...उसका नाम था 'शल्य'जिसका अर्थ होता है,संदेह,शंका,संशय.कर्ण का अर्थ होता है कान .सब शंकाएं कान से ही प्रवेश करती हैं.अपने नाम से प्रभावित शल्य शंका और संदेह से ग्रसित हो कर्ण से कहता,"आप की जीत मुश्किल सी लगती है" और युद्ध का परिणाम सामने था.कभी-कभी नाम का प्रभाव नहीं भी पड़ता है पर अधिकांशतः नाम व्यक्तित्व पर प्रभाव डालता है.
नाम के महत्व पर कुछ प्रसिद्ध कथन लिख रही हूँ....
romeo and juliet में shakespere का कथन है .....
"what's in a name ?that which we call a rose
by any other name would smell as sweet ."
जापानी कहावत है..."tigers die & leave their skins;people die & leave their names."
W.H.Auden..."Proper names are poetry in the raw..like all poetry they are untranslatable."
David S. Slawan.."names are an important key to what a society values.Anthropologists recognize naming as 'one of the chief methods for imposing order on perception."
खैर ,नाम के प्रभाव पर ब्लॉग फिर कभी लिखूंगी अभी उस प्रश्न के उत्तर के विस्तार में ब्लॉग को सीमित करना चाहती हूँ.
यमुना का पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व .....
यमुना का शाब्दिक अर्थ 'जुड़वां'है क्योंकि यह गंगा के साथ मिल जाती है.सनातन संस्कृति में 'यमुना'को देवी(यमी) का दर्ज़ा दिया गया है . इसका उद्गम उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी जिले में बंदरपूछ पहाड़ के दक्षिण पश्चिम ढाल से ६३८७ मीटर की ऊंचाई पर स्थित यमुनोत्री से है.यमुनोत्री धाम का कपाट खुलने के साथ ही चार धाम (यमुनोत्री,गंगोत्री,केदारनाथ,बद्रीनाथ)की यात्रा शुरू हो जाती है. यमुना को धर्मग्रंथों में भक्ति का उद्गम माना गया है जबकि गंगा को ज्ञान की अधिस्थात्री माना गया .भक्ति से ही व्यक्ति ज्ञान की तरफ प्रवृति होता है.अतः धर्मग्रंथ पहले यमुनोत्री के दर्शन की सलाह देते हैं (शायद हमारे राष्ट्र गान 'जन गण मन 'में यमुना का नाम पहले लेने के पीछे भी यही वजह हो)पुराणों के अनुसार यमुना सूर्यदेव तथा सरनयु की पुत्री है .यम और शनिदेव इसके भाई हैं.यमुना(यमी)ने यम को राखी बांधी और अभिभूत यम ने घोषणा कि जो भी किसी स्त्री को बहन मान राखी बन्धवायेगा उसे दीर्घायु होने का वरदान मिलेगा.इसलिए कहते भी हैं कि यमुना में डुबकी लेने से मौत का भय चला जाता है
उत्तराखंड में यमुनोत्री से निकलकर प्रयाग तक प्रवाहित यमुना ब्रजमंडल की आत्मा है.वैषणव इसे श्रीकृष्ण की पटरानी मानते हैं. वासंतिक नवरात्रि की षष्ठी को ब्रजरानी यमुना का जन्म दिवस मनाया जाता है.वैष्णव जन यमुना को इस दिन चुनरी चढ़ाते हैं जो नदी के एक पार से दूसरे पार तक सैकड़ों साड़ियों को जोड़ कर बनाई जाती है.भगवान श्रीकृष्ण से यमुना का अटूट रिश्ता है.इसका तट श्रीकृष्ण की लीलाओं का साक्षी है.कृष्णा को नन्द के आँगन तक पहुँचाने का माध्यम यमुना ही बनी,उनके पग छूने को व्याकुल यमुना ने अपना मक़सद पूरा होते ही वासुदेव जी को रास्ता दे दिया...गोपाल की बंसी धुन बन यमुना में समा गई..और वह नवरस की साक्षात प्रतिबिम्ब बन गई..कंस को मारकर आये कृष्णा ने यमुना के आँचल में ही शान्ति पाई थी. यमुना पर हलधर का भी मन मोह गया था पर कृष्ण के रंग में रंगी कालिंदी को हलधर का गौर वर्ण नहीं भाया.भगवान् श्रीकृष्ण के सभी स्वरूपों और श्रीविग्रहों को स्नानाभिषेक कराने और उनका नैवैद्य बनाने के लिए अधिकांशतः यमुना जल का प्रयोग किया जाता है.पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक महाप्रभु श्रीबल्लभाचार्य ने यमुनाष्टक स्त्रोत द्वारा इनकी महिमा का गुणगान किया है.कालिंद पर्वत से बहाने के कारण इसे कालिंदी भी पुकारा जाता है.महाभारत युग में पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ यमुना के तट पर ही बसा जो आज आधुनिक दिल्ली है.सेल्युकस यूनानी सेनापति ने इसे लोमानेस नाम दिया था..megasthnese ने अपनी पुस्तक 'इंडिका'में यमुना क्षेत्र को लैंड ऑफ़ सूरसेन का नाम दिया .
प्रेम की नदी यमुना सबकी चहेती है .....उसने सागर में स्वतन्त्रता से मिलने का मोह ना करते हुए गंगा में विसर्जित होना पसंद किया ताकि भक्ति और ज्ञान के अद्भुत संगम की नगरी के रूप में प्रयाग को कृतार्थ कर सके.
यमुना द्वापर युग में जहां प्रेम और श्रृंगार के संयोग पक्ष की साक्षी बनी वहीं मध्यकालीन युग में भी वियोग पक्ष की साक्षी स्वरुप प्रेम की अमर
गाथा बन कल-कल बह रही है.आगरा में यमुना के तट पर बना ताजमहल शहंशाह शाहजहां के आँखों का आंसू बन यमुना के नूर को बढ़ा रहा





है..
उत्तराखंड,हरियाणा,उत्तर प्रदेश,हिमाचल प्रदेश,दिली राज्य से गुजरती यमुना टोंस,बेतवा,चम्बल,केन जैसी नदियों को स्वयं में मिलाती करीब १३७६ किलोमीटर की यात्रा तय करती है.बागपत,दिली,नोयडा,मथुरा,आगरा,फ़िरोज़ाबाद,एटवाह,कालपी,हमीरपुर,इलाहाबाद यमुना के तट पर बसे शहर हैं.आधुनिक यमुना प्रदूषण के विषैलेपन से विषाक्त हो रही है....यमुनोत्री से वज़ीराबाद तक यह अमूमन साफ़ रहती है..पर वज़ीराबाद तथा ओखला बैराज के बीच १५ नालों से आया औद्योगिक निष्काषन इसे प्रदूषित कर देता है.एक सर्वेक्षण में biochemical oxygen demand values (BOD) 14-28 mg/l पाये जाने और high coliform content के कारण इसे sewage drain कहा गया. शुद्धिकरण के नाम पर अनेक अभियान चलाये जा रहे हैं पर आधुनिकीकरण के कालिया नाग ने उसे विषाक्त कर दिया है.यमुना की जलधारा हर युग में स्यामल रही ...बस वजहें बदलती रही...द्वापर युग में यह श्याम रंग में रंगी तो आधुनिक युग में प्रदूषण के रंग में स्यामल हो गई.
मैं यमुना हूँ.......जानती हूँ अपना हुनर
कैसे पतली धार से बहते -बहते
धारा में तब्दील हुआ जाता है
कठोर चट्टानों पर बहते हुए
कैसे पदचिन्ह छोड़ा जाता है
दुर्गम राहों से गुजरने पर भी
कैसे वज़ूद बचाया जाता है
वन पर्वत बियाबान को भी
कैसे आबाद किया जाता है
मैं यमुना हूँ...जानती हूँ अपनी प्रवृत्ति
सुनहरे धान,रूपहली सरसों संग
संगीत अपनी ही सुन बहती हूँ
सागर मेरा अंतिम सत्य नहीं
गंगा के ज्ञान संग मिलती हूँ
धारा को तृप्त करने को मैं बन
बादल नभ पर फिर उभरती हूँ
अपना वज़ूद और अपना सत्य
कि बूँद-बूँद से ही मैं बनती हूँ
मैं यमुना हूँ.....जानती हूँ अपना मक़सद
हर मोड़ और हर डगर पर
बाधाओं से सृजन करना है
उर्वर मृदा में परिवर्तित करने
मुझे चंचला बन बहना है
अंजुरी,पात्र सब के मान हेतु
बस उन सा ही ढलना है
बेसुध बहते हुए भी मुझे
दोनों पार के प्रति सजग रहना है
मैं यमुना हूँ...जानती हूँ स्वाध्याय
समक्ष मेरे हर चट्टान है खोलती
सफ़र का नित नूतन अध्याय
कहती है ना हो डबरा ना पोखर
ना झील और ना ही तालाब
पत्थर-पत्थर चूर्ण बना सकती हो
बंजर धरती को महका सकती हो
फिर वही राधा कान्हा की वेणु संग
मधुर प्रेम संगीत बना सकती हो
मैं यमुना हूँ...जानती हूँ अपनी मर्यादा
शैशवास्था की शोख चंचलता से
युवास्था में सर्पिल हो जाउंगी
उन्मुक्त वेग में भी धीर गम्भीर
बन मंज़िल को पाउंगी
कितना भी खाली होती जाऊं
फिर-फिर मैं भरती जाउंगी
सागर तक की यात्रा में उपकृत
कूल कगारों को कर जाउंगी.
मैं यमुना हूँ...बस इतनी इल्तज़ा मेरी
मेरे सतत प्रवाह को ना रोकना
उन्मुक्त वेग से मुझे बहने देना
बाँध बना जो एकत्र करोगे तो
मैं पोखर बनकर सड़ जाउंगी
भूल प्राकृतिकता स्व गति की
अपनी ही बाधा से मर जाउंगी
प्रदूषित करोगे तो वेणु की धुन
ताज की सफेदी भी भूल जाउंगी
मैं यमुना हूँ.....वादा करती हूँ
सागर से बादल बन बार-बार
नीली धारा से हरियाली बनाउंगी
प्रेम की नदी थी मैं ,प्रीत की नदी हूँ
और प्रीत की नदी ही कहलाऊंगी
मिटाओ सारे प्रदूषण तल औ सतह से
देखना; प्रीत की नदी मैं मुस्काउंगी
मुरली की धुन ताज की खामोशी बन
साहित्य संगीत कला में रच बस जाउंगी.
the river makes music even as it lives with rocks (obstacles)that hinders its path.the river bypasses

them,caresses them continuously and in the meantime also makes music as it gurgles away towards its

destination.
-sheel vardhan singh

Thursday, December 19, 2013

फैलती हैं लपटें विषैली श्वास से

मानव जाति के विकास क्रम का गहनता से निरीक्षण करने पर एक बात स्पष्ट हो जाती है कि समुदाय का उदय वर्ग,धर्मं,जातिसमूह,भाषाई,सांस्कृतिक जमायतों राष्ट्रों प्रांतों जैसे कई सामाजिक,राजनीतिक ,सांस्कृतिक धार्मिक बोध का एक प्रतिबिम्ब ही होता है.इसमें तब तक कोई बुराई नहीं जब तक कि प्रतिबिम्ब को दर्शाने वाला आईना धूमिल ना हो,अगर सामाजिक,राजनितिक,सांस्कृतिक धार्मिक बोध का आईना साफ़ और चमकदार है तो समाज समुदाय की संकीर्णता और  साम्प्रदायिकता के धूल से धूसरित और वीभस्त कभी ना होने पाएंगे.
साम्प्रदायिकता को सबसे ज्यादा संवेदनशील धर्मं के आधार पर किया जाता है...जब कि धर्मं के आधारभूत सिद्धांतों का साम्प्रदायिकता से कोई वास्ता ही नहीं होता..पर जब सामाजिक और राजनितिक आधार धर्मं के आड़ में अपने निहित स्वार्थ और प्रभाव को बचाने कि कोशिश में लग जाते हैं तब हिंसा कि आग भड़क उठती है.यह मान बैठना कि विभिन्न धर्म के अनुयायियों या समुदायों के सांसारिक हित (सामाजिक,सांस्कृतिक,आर्थिक,राजनितिक)अन्य किसी भी धर्मं के अनुयायियों के सांसारिक हित से भिन्न हैं...तथा परस्पर एक दूसरे के विरोधी हैं...यही भाव धर्मं की संरचना और प्रभाव की व्यापकता से विमुख और धर्मं आधारित सम्प्रदाय की संकीर्णता के प्रति झुकाव में बदल जाता है.लोग यह भूल जाते हैं कि अलग-अलग धर्म एक ही वृक्ष की अलग-अलग शाखाएं हैं..जो एक ही जड़ से पोषित होती हैं और वह है इंसानियत..मानवता की जड़ जो कई महीन शाखाओं जैसे दया,करुणा,प्रेम,सेवा,सदभाव इत्यादि में बंटी ....जमीन के भीतर गहराई से समाई ...पूरे वृक्ष को पोषित करती है.इंसानियत की ये जड़ें जितनी गहराई में समाएगी उतना ही वृक्ष की शाखाओं को भी विस्तार मिल पायेगा...पर अमूमन ऐसा नहीं हो पाता जड़ें गहरी हो कर वृक्ष को थाम लेती हैं पर घृणा,द्वेष,वैमनस्य के टकराव की आंधी शाखाओं को आपस में ही टकरा देती हैं ...और दुःख इस बात का कि कमजोर शाखाएं ही मजबूत शाखाओं से टकराने का दुस्साहस कर बैठती हैं ....और टूट जाती हैं.कुछ लोगों की विद्वेष पूर्ण भावना ,मतभेदों का इस्तेमाल उन सामाजिक आकांक्षाओं संघर्षों इत्यादि को विकृत रूप में उजागर करने के लिए कर लिया जाता है जिसका धर्म के वास्तविक स्वरुप से दूर=दूर तक कोई नाता नहीं होता.जैसा कि सी.जी.शाह कहते हैं,"साम्प्रदायिक प्रचार के प्रभाव में आकर लोग अपने शोषण ,अत्याचार और पीड़ा के वास्तविक स्त्रोत को पहचानने में असमर्थ हो जाते हैं और उनमें एक छद्म साम्प्रदायिक कारण की कल्पना कर लेते हैं."
एक कविता की दो पंक्तियाँ याद आती हैं...
विश्व मानव के ह्रदय में मूल हो सकता नहीं द्रोहाग्नि का

चाहता लड़ना नहीं समुदाय है,फैलती लपटें विषैले व्यक्तियों के श्वास से .
आधुनिक भारत में साम्प्रदायिकता के विकास के लिए ब्रिटिश शाशन की'फूट डालो शाशन करो'की नीति ख़ास तौर पर जिम्मेदार है.उन्होंने हिन्दू,मुसलमान ,सिखों को लगातार ऐसे अलग-अलग समुदायों का दर्ज़ा दिया जिसकी सामाजिक,राजनीतिक पहचान में कुछ भी साझा नहीं था स्कूल कॉलेज में भारतीय इतिहास बुनियादी रूप से साम्प्रदायिक दृष्टि से पढ़ाया जा रहा था . हालांकि यह भी सही है कि देश में मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के कारण ही उन्हें भी सफलता मिल पाई.अगर हम ऐसी किसी भी आंधी ,को रोकना चाहते हैं तो चीज़ों को सही देखने और समझने वालों की एक जमात तैयार करनी होगी जो ना हिन्दू हों ,ना मुसलमान ना सिख, ईसाई ,पारसी...वे सभी मनुष्यों के लिए हों...ऐसे मनुष्य जो साम्प्रदायिकता के संक्रमण से रूग्ण हैं उन्हें ये ज़मात.. राहत और शान्ति दे सके . कोई ऐसा धर्मं जो प्राचीन इतिहास के सम्राट अशोक महान के' धम्म' की ,मध्यकालीन इतिहास के शहंशाह अकबर के 'दीन-ए-इलाही' की और आधुनिक काल के सही अर्थों में 'धर्मनिरपेक्षता 'का जीती जागती मिसाल बने..सही शांत  चित्त के लिए हवा,भूमि और व्यवस्था दे सके .
धर्मं बेहद व्यापक शब्द है जिसमें सम्प्रदाय की आंधी की कोई गुंजाईश ही नहीं हो सकती.धर्म एक आध्यात्मिक रूपांतरण है ...अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला जागरण है.राधाकृष्णन जी के अनुसार ,"जिन सिद्धांतों के अनुसार हम अपना दैनिक जीवन व्यतीत करते हैं तथा जिनके द्वारा हमारे सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना होती है वे सब धर्म है,धर्म जीवन का सत्य है और हमारे प्रकृति को निर्धारित करने वाली शक्ति है......धर्मों में विशाल रूप से अनेकता मालूम होती है.इसका कारण यह है कि  हम अपने धर्मों के आधारभूत सत्य को नहीं जानते हैं.सभी धर्मों में एक समान तत्त्व,एक समान आधार है जिस पर वह अपना विश्वास तथा क्रिया कलाप आधारित करता है परन्तु वह इमारत जो इस आधार पर बनाई जाती है,प्रत्येक व्यक्ति के साथ भिन्न हो जाती है......धर्म का यह कर्त्तव्य है कि वह हमारे जीवन के प्रति सहज निष्ठा तथा मानवीय प्रकृति की एकता के प्रति विश्वास उत्पन्न कर दे."Jorge के अनुसार

"Basically religion is concerned with two fundamental ideas or experiences-first ,man's relationship to GOD ,& second his relationship to the universe about him including his fellowman. "
पंडित नेहरू के अनुसार,"हिंदुस्तान में धर्म एक व्यापक शब्द है जिसकी( धर्मं) की व्युत्पति 'धृ' धातु से हुई है जिसका अर्थ है धारण करना...एक साथ पकड़ना यह किसी वस्तु की भीतरी आकृति,उसके आतंरिक जीवन के विधान के अर्थ में आता है.इसके अंदर नैतिक विधान,सदाचार,व्यक्ति की सारी जिम्मेदारियां तथा कर्त्तव्य आ जाते हैं."
धर्म के दो रूप होते हैं..एक निष्ठाओं की वह पद्धति जिसके अनुसार व्यक्तिगत जीवन संचालित होता है .दूसरा धर्म पर आधारित सामाजिक पहचान.
धर्मं में प्रयुक्त सभी क्रिया कलाप एक विशेष मक़सद से हैं जो हमें रूपांतरित करते हैं...प्रार्थना प्रकृति के साथ एक होने की कृतज्ञ भावना है,कीर्तन असीम शक्ति के प्रति अपने आनंद और अहोभाग्य को निवेदित करना है...एक उत्सव है भक्ति भाव से भरे हृदय का,मंत्र मन को संयम और एकाग्रता की तरफ ले जाने वाला साधन है,यह उस सार्वभौमिक धर्मं के लिए आवश्यक है जो मानवता में यकीन ,चित्त की शुद्धिकरण और शांत जीवन की आकांक्षा रखते हैं.
उग्रवादी साम्प्रदायिकता का जन्म घृणा,भय तथा अतार्किकता की राजनीति की उपज होता है..इसे रोकने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि व्यक्तिगत ,सामाजिक,राष्ट्रीय व्यवहारों में धर्म के सार तत्त्व को ग्रहण किया जाए .मनु स्मृति के अनुसार....
धृतिः क्षमा दमोसतेय शौचमिन्द्रय निग्रहः
धी विद्या सत्यम क्रोधो दशक धर्म लक्षणम

धैर्य,क्षमा,शान्ति,लोभ न करना,शुद्धता,इन्द्रिय निग्रह,बुद्धि ,विद्या, सत्य तथा अक्रोध धर्म के १० लक्षण हैं.धर्म को किसी भी शर्त में संकीर्ण स्वार्थों के रूप में स्थान ना दिया जाए.प्रत्येक शरीर में निर्बाध बहने वाला लाल रक्त मनुष्यता का हो किसी हिन्दू के भगवा,किसी मुसलमान के हरे या अन्य किसी भी धर्म की संकीर्ण पहचान का द्योतक ना हो .
सच कहा है एक शायर ने ...
इबादत है दुखियों की इमदाद करना
जो नाशाद हों उनका दिल शाद करना
खुदा की नमाज़ और इबादत यही है



जो बर्बाद हों उन्हें आबाद करना.
लेखक hoffing के अनुसार "the essence of religion is faith in the conservation of VALUES.

"फूल तोड़ना मना है"

बगीचे में सुन्दर फूल खिले थे..बाहर कठोर से काले बोर्ड परश्वेत रंग से उभरी लिखावट थी "फूल तोड़ना मना है"अलग-अलग व्यक्तित्व ,अलग-अलग मानसिकता ,परिवेश के लोग बगीचे में घूम रहे थे.किसी ने (आत्मानुशासित)कहा,"फूल सुन्दर हैं ;पौधे पर सम्पूर्णता से खिले हैं खिले ही रहने दूँ तो अपने सौंदर्य और सुगंध से कुदरत को कृतज्ञ कर देंगे....किसी ने (स्वकेंद्रित,स्वात सुखाय)कहा,"ओह!ऐसे सुन्दर ,और तोड़ कर कोट पर सजा लिया.किसी ने(कुत्सित मानसिकता)ने फूल को बेदर्दी से तोड़ लिया..किसी ने (वीभस्त मानसिकता)फूल सिर्फ तोड़ा ही नहीं बल्कि उसकी पंखुड़ियों को भी अलग-अलग कर जमीन पर फेंक दिया और उसके ही अन्य साथियों ने अज़ीब सी घिनौनी हँसी के साथ जमीन पर पडी पंखुड़ियों को अपने परों तले कुचलना शुरू कर दिया....काले बोर्ड पर अब भी लिखावट वैसे ही चमक रही थी"फूल तोड़ना मना है"
समाज में स्त्रियों के प्रति पुरुषों की सोच के बस यही हालात हैं .कुछ कोमल ,विवेकी,संवेदनशील ह्रदय क़ानून (फूल तोड़ना मना है)मान जाते हैं और कुछ....!!!!
ऐसी घटनाओं का वर्गीकरण किशोर-व्यस्क,शिक्षित-अशिक्षित,शहरी-ग्रामीण जैसे असंख्य असीमित दायरों से हटकर बहुत ही सीमित छोटा पर बेहद विशाल बिंदु पर टिका है और वह है...व्यक्तिगत सोच,विचार,व्यवहार और मानसिकता."
महिलाओं के प्रति पुरुषों के द्वारा बलात्कार,यौनाचार,शोषण कहीं पर फटे कपडे,सिले जूतों में कुपोषित,शोषित किशोर का किसी महंगी कार में कुत्ते के साथ बैठे हम उम्र अन्य किशोर/किशोरी को देखने से उपजा आक्रोश है......तो कहीं अतिपोषित संभ्रांत व्यक्ति के भावनात्मक खालीपन से उपजी अकिंचनता की कुंठा......कहीं पर यह स्त्री के मन में बसे लोभ लालच के दहकते अंगार पर स्वेच्छा से चलने के दुस्साहस का भयंकर परिणाम है.......तो कहीं पर पारिवारिक आपसी रिश्तों के अवमूल्यन का छुपा हुआ घिनौना सच है.
आज के मशीनी युग में मानव रूपी मशीन ही सर्वथा खाली और बेकार है..सृजन के अवसर ही ख़त्म होते जा रहे हैं..पहले एक कुम्हार घड़े बनाता था तो सृजन के आनंद से भर उठता था..कुंठा के लिए जगह ही नहीं थी...एक मोची अपने बनाये जूते किसी और के पैरों में देखकर सर्जक होने के गरिमा बोध से उत्साही हो उठता था ......मानव की शक्ति और ऊर्जा तो आज भी वही है पर उसके निष्काशन के लिए जगह कहाँ है?फिर खाली मन मस्तिष्क कामातुर होने में ज़रा भी हिचक नहीं दिखता .....फिर चाहे वह गरीब की कुटिया के बाहर खुले आसमान के नीचे टूटी खाट पर लेटा कोई किशोर /व्यस्क/बुजुर्ग हो या फिर किसी पॉश कॉलोनी के ए.सी कमरे में मुलायम गद्दे पर मखमली कम्बल ओढ़ा कर औंधा पड़ा कोई किशोर/व्यस्क/बुजुर्ग हो.
पारिवारिक ताना बाना जिस तरह से आज बदला है वह स्वयं में एक चुनौती है...तीन पीढ़ियों के साथ एक ही छत के नीचे रहते हुए अनुभव और मूल्य सीखता -सीखाता परिवार आज तीन सदस्यों के पारिवारिक संरचना में तब्दील हो गया है जो किसी त्रिभुज के तीन बिंदुओं की तरह सीधे तौर पर सिर्फ दो ही मिलने की प्रवृत्ति रखते हैं.. (माँ/संतान या फिर पिता/संतान)अगर तीनों मिलने की जुगाड़ भी करते हैं तो त्रिभुज के कोण के विभाजक रेखा के केंद्र पर मिलने की तरह ..अति व्यस्तता उन्हें सम्पूर्णता से कभी मिलने ही नहीं देती है.सम्बन्धों का ऐसा विभाजन और विखंडन कभी नहीं रहा और फिर तीनों ही बाहर कहीं खुशी तलाशने लगते हैं जो कभी भी सही दिशा में नहीं जाता.
आधुनिक संचार साधनों की सहज सर्वसुलभता 'एक तो करेला उस पर नीम चढ़ा ' की कहावत चरितार्थ करता है...अंगुली के एक स्पर्श पर शील से अश्लील सामग्री उपलब्ध है...शील तो समाज में परिवार,शिक्षक सभी सीखा रहे हैं ..आवरण तो अश्लील पर है तो बस आवरण हटाने की उत्कंठा...और फिर उसे प्रायोगिक करने की लालसा कुछ असंयमी पुरुषों का शगल बन जाता है.
विज्ञापन सिनेमा धारावाहिकों में स्त्रियों को सजावटी तथा लुभावनी रूप में ही प्रस्तुत और प्रदर्शित किया जा रहा है...यह ठीक है कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता है पर यह महिलाओं के सम्मान का लाजतंत्र भी हो...सिनेमा से समाज तक माँ,बहन,बेटी के नाम पर भद्दी गालियां और कुछ मुहावरे लाज की हर सीमा लांघ जाते हैं.जिस समय निर्भया के लिए न्याय की गुहार का प्रदर्शन हो रहा था उसी वक्त पुलिस को चूड़ियाँ दिखाई जा रही थी...क्या चूड़ियाँ पहनने वाले हाथ ही गाड़ियां नहीं चला रहे....देश के विकास में योगदान देते सैकड़ों उत्पाद नहीं बना रहे...इसी लिए रायपुर की २२ वर्षीया सौम्या गर्ग ने "चूड़ियाँ पहन र घर बैठने"जैसे आम जुमले को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में चुनौती दी है ऐसे मुहावरे स्त्री को कमतर और कमज़ोर साबित करते हैं. स्त्री की दक्षा,प्रतिभा का प्रस्तुतीकरण करते समाचार विज्ञापन सिनेमा धारावाहिक 'समुद्र में एक बूँद' और 'ऊंट के मुंह में जीरा ' की तरह साबित हो रहे हैं.परिवार,समाज में यह सब देखता पुरुष स्त्री को सहज उपलब्ध मान बैठते हैं.विज्ञापनों तथा अन्य संचार साधनों की यह प्रवृत्ति भी रूकनी चाहिए.इस दिशा में स्वयं स्त्रियां भी कदम बढ़ा सकती हैं...."सजना है मुझे सजना के लिए "वे किसी भी शर्त में स्वयं को लुभावने उत्पाद के रूप में प्रस्तुत करने की इज़ाज़त किसी को ना दें.
स्त्रियां घर से बाहर..
निकलते वक्त ही

सज-धज जाती हैं

क्यों नहीं सजती वे ही स्त्रियां

घर पर

अपने पति के लिए ?
यह प्रश्न मेरे लिए
बहुत मायने रखता है.
रचाती हूँ मेहंदी
सजाती हूँ बिंदी
भरती हूँ मांग
लगाती हूँ महावर
और तुम्हारे प्यार का सिंदूरी रंग
रंग जाता है मेरे कपोलों को
मेरी कजरारी आँखों की सुंदरता को
ज़ज्ब कर लेती हैं
तुम्हारी आँखें
फिर नहीं समाती उन आँखों में
किसी और रमणी की सुंदरता.
नहीं मिल पाती
सुंदरता की कोई उपमा
बाहर तुम्हे
सोचती हूँ ............
हर स्त्री क्यों नहीं करती ऐसा.....
सजे-धजे





















सिर्फ अपने
और अपने पति के लिए .

घरों पर स्त्रियां बचपन से ही भेदभाव में पलती हैं..जो अधिकतर घर की बड़ी -बुजुर्ग महिला सदस्य ही करती हैं.पुरुष अनजाने ही यह सब देखते सुनते हैं और स्वयं को स्त्रियों से श्रेष्ठ समझने लगते हैं .जब घर से बाहर किसी श्रेष्ठतर महिला से उनका सामना होता है तो उनके अहम् की भुरभुरी दीवार ढहने लगती है और उसे बचाने के लिए अपने पौरूष का वे गलत इस्तेमाल कर जाते हैं.
महिला यौन उत्पीड़न के पीछे ऐसे कारणों की लम्बी फेहरिस्त है...बात चाहे १६ दिसम्बर की हो या बाद की कमोबेश उपरोक्त कारण ही इसके लिए जिम्मेदार हैं...पुलिस सजग हो ..क़ानून कठोर से कठोरतर हो जाए ऐसा होना चाहिए पर सर्वप्रथम उपरोक्त मानसिकता में सुधार ज़रूरी है.सृजनशीलता का विकास,पारिवारिक ताने-बाने की मज़बूती,मूल्यों और नैतिकता का विकास,संयम आध्यात्मिकता,संचार साधनों का सकारात्मक योगदान,स्त्रियों /पुरुषों का स्वानुशाशण सभी बात मायने रखते हैं....तस्वीर तभी बदलेगी.हाल ही में शक्तिपुंज ट्रेन से घर लौट रही थी...सवार होते ही बोगी के अंदर लड़ाई चल रही थी ...मालूम हुआ किसी लडके ने सोती हुई अनजान लड़की को छूने की कोशिश की थी...बोगी के सारे यात्री एकजुट हो गए थे और कुछ ही देर में लड़का पुलिस के गिरफ्त में था ...ऐसी बात नहीं कि जागरूकता नहीं आई है ...
ज़रुरत है स्त्री-पुरुष दोनों को ही मर्यादा की सीमा समझने की...यह समझने की कि उनकी ज़िंदगी पूर्णतः स्वतंत्र ,स्वकेंद्रित,स्वात सुखाय नहीं
है...उस ज़िंदगी की कुछ आर्थिक,नैतिक,पारिवारिक,सामाजिक,राष्ट्रीय और वैश्विक सीमाएं है जिसे लांघने का दुस्साहस उन्हें नहीं करना है .





कठोर क़ानून भी बन कर पारित हो गया..शिक्षा प्रणाली भी बदल रही है..लडके लड़कियां एक साथ गणित ,भौतिक विज्ञान,जीवविज्ञानपढ़ रहे हैं उन्हें यौन शिक्षा भी क्यों ना दी जाए...सही गलत स्पर्श क्या है...समय पूर्व यौन सम्बन्ध बनाने के शारीरिक दुष्परिणाम क्या हैं...समाज विशेष में ऐसे सम्बन्धों के लिए क्या-क्या प्रतिमान निर्धारित हैं..वगैरह वगैरह.सबसे मुख्य बात कि स्त्री-पुरुष विद्यालय,कार्यालय,परिवार में एक दूसरे के लिए खतरा नहीं बल्कि पूरक बन कर रहे.. ..दाएं और बाएं पैरों की तरह ...जिस प्रकार शरीर की सही गति के लिए दोनों पैरों का संतुलन और पूरकता अनिवार्य है ..दायां पैर आहत हो तो बायां पैर उसका पूरक बन गति को कायम रखता है....और बायां पैर जब भी मुश्किल महसूस करे दायां पैर उसका पूरक बन गति की अवरूद्धता से शरीर को उबार लेता है.वैसे ही समाज की गति के लिए स्त्री-पुरुष के आपसी रिश्तों का संतुलन और एक की अशक्तता में दूसरे के सहयोग की ज़रुरत है."मैं तुम्हारा ख्याल रखता हूँ;तुम मेरा ख्याल रखती हो."
यही वर्त्तमान संक्रमणकालीन युग का तकाज़ा है.



जब एक पुरुष
पहचानने लगता है स्त्री को
उसके रूप,सौंदर्य की लावण्यता से नहीं
बल्कि...
उसकी दक्षा,मेधा,प्रतिभा
बुद्धि,बोध की विलक्षणता
और उसके आत्मविश्वास से

देता है हौसला यह कहकर ....
छू लेना ऊंचे आकाश को
यह पहचान....यह हौसला
स्त्री के हर रूप
माँ,बहन,बेटी,पत्नी के
कन्धों पर
दो मज़बूत पंख बन उभर आता है
पहुँच जाती हैं वे शिखर पर
जहां से ...आकाश
बेहद करीब लगने लगता है
और सच कहूं !!!!!!!!!!
तब
उस पुरुष के व्यक्तित्व की ऊंचाई
हो जाती है .....स्त्री के लिए

आकाश से भी ऊंची .





एक नए विश्वास ; एक नई किरण के साथ............................

यमुना पाठक

Friday, December 6, 2013

लाइफ,लव,लाफ्टर (एक कप कॉफ़ी;एक कप चाय)

Important during the wave of live in relationship.
MOMENTS OF TOGETHERNESS
moments of togetherness is vital to avoid the presence of VO (पति,पत्नी और वो)in marital life .
A cup of tea & a cup of coffee do play a contributory role for success of marital life....it gives space for  interesting conversation with each other ...essential for a happy family life.undoubtedly the topics of conversation may be with polar extremes ...coffee (about house chores)...tea (about office job)...but they merge with a deep intimacy of two hearts...so deep ....that they start dancing in the same harmony...although the cups are two ...topics are distant as two poles...but the harmony is one...the music is one..dance is one ....because  the two cups give gift of togetherness...a sweet break from 24*7 life.
In short the two cups nourish the marital relationship...all the joys & celebrations that happen to MARITAL LIFE  come from the exixtence of two cups (in evening/morning) .Couple should dive deeper into the  presence of  each other with each sip of tea/coffee.
Even sitting silence with cup of tea/coffee..enables to bring the couple  closer to each other..their  joy, blissfulness... silence...echo in the deep silence of loving nature...creating a complete TRANQUILITY.....& God blesses a solitary couple with an utter glory,beauty & immense love.
हर शाम...
ऑफिस से आने के बाद.....
तुम कहते हो
चलो बैठते हैं
गर्म चाय के दो प्यालों के साथ
तुम्हारे मनुहार पर
लाती हूँ दो प्याले .
एक गर्म कॉफ़ी का कप अपने लिए
एक गर्म चाय का कप तुम्हारे लिए
यह भेदभाव क्यों ?
तुम पूछते हो.
हंसती मैं कहती हूँ
भेदभाव प्यालों से नहीं
प्यालों में समाये द्रव से भी नहीं
भेदभाव तो पलता है दिलों में
प्याले और उनका द्रव
हो आपस में
कितने भी भिन्न...
मोहलत देते हैं हम दोनों को
साथ बैठने की
कितना अच्छा है कि ....
हम बैठे हैं साथ
और सम्बन्धों के लिए
यही है बात ख़ास
तुम ठहाके लगा कर ...
इतना हंसते हो कि
तुम्हारी आँखें सजल हो जाती हैं
और कर देते हो एकाकार
दोनों प्यालों की तरलता को
कितना सुखद...लगता है
मेरे (कॉफ़ी)तेरे(चाय) प्यालों का
अपनी-अपनी संकीर्णता
अपने-अपने अहम् छोड़
यूँ एकाकार हो जाना
कितना अनमोल
होता है
वैवाहिक सम्बन्धों के
मूल्यों का...
मैं...तुम..से परे
हम में तब्दील हो जाना.
YAMUNA PATHAK

लिव इन रिलेशन

आधुनिकीकरण के नाम पर दो चार कदम क्या बढ़ गए

क़ानून की किताब में कैद हो कर रह गई है ये ज़िंदगी.

न्यायमूर्ति के. एस. राधाकृष्णन तथा पिनाकी चंद्रा घोष की अध्यक्षता की पीठ का आठ दिशानिर्देशन के साथ का कहना है लिव-इन संबंध न कोई अपराध हैं, न पाप और संसद को ऐसे संबंधों को वैवाहिक संबंधों की प्रकृति में लाने के लिए कानून बनाने चाहिए यह घरेलू हिंसा एक्ट के तहत स्त्री सुरक्षा को मद्देनज़र रख कर कहा गया कथन है.....यह कथन अविवाहित स्त्री-पुरुष के आपसी लिव इन सम्बन्ध तक तो शायद मान्य हो जाए पर इसके दुरूपयोग की सम्भावना भी बराबर बनी रहेगी जैसा कि खंडवा केस में,ओम्कारेश्वर स्थित बिजली विभाग से रिटायर व्यक्ति की पत्नी ने आरोप लगाया कि उसका पति अपना ज्यादातर वक्त लिव इन पार्टनर के साथ गुजारता है .इस पर जज श्री गंगाचरण दुबे जी के अनुसार दिया फैसला कि पत्नी,लिव इन पार्टनर समेत पति एक ही छत के नीचे रहे ...विवाहित पुरुष १५ दिन पत्नी के साथ और १५ दिन लिव इन पार्टनर के साथ रहे .....इसके अलावा व्यक्ति की चल और अचल दोनों सम्पत्तियों में पत्नी और लिव इन पार्टनर का बराबर का हिस्सा भी होगा ...यह सुनकर प्रत्येक विवाहिता जो विवाह संस्था और इससे जुड़े मूल्यों पर भरोसा करती है उसकी नाराज़गी और विक्षोभ लाज़िमी है. जुवेनाइल पर क़ानून बन जाने से बाल अपराध को बढ़ावा देने वाले व्यस्कों के और भी मज़बूत बन जाने की सम्भावना की तरह ही विवाह जैसी पवित्र संस्था पर ऐसा क़ानून बन जाने से भारतीय संस्कृति की आधुनिक विवाह संस्था के निहित मूल्यों के क्षरण की आशंका ....भी बन जाती है .यह वाकई बहुत ही विचारणीय विषय है....
सही है....
घर को आग लग रही घर के ही चिराग से
एक पति अपनी विवाहिता और लिव इन पार्टनर के साथ रहे ....पुराने 'रखैल' शब्द का आधुनिक रूपांतरण लिव इन रिलेशन है.....फिर ठीक इसका विपरीत भी सही माना जाएगा कि एक पत्नी अपने विवाहित और लिव इन पार्टनर के साथ रहे ...यह लव त्रिकोण को कानूनी जामा पहनाने की रस्म अदायगी हो जायेगी .....ये कैसी उदारता ?? एक विवाहिता के लिए पति का होना क्या मायने रखता है वह क़ानूनविद क्यों नहीं समझ पाते ?? क्या ऐसा कोई क़ानून नहीं जो इससे परे विवाह संस्था के पाकीज़ा मूल्यों को और मज़बूत बनाये ???हालांकि सुप्रीम कोर्ट की माने तो अगर कोई औरत जान-बूझ कर किसी विवाहित पुरुष के साथ रहे तो उसे इस तरह का कोई अधिकार ना देने की बात पर क़ानून लाने की कोशिश भी जारी है..फिर भी कुछ प्रश्न बेहद उलझे से होंगे....
1) एक पुरुष या स्त्री कितने लिव इन पार्टनर रख सकते है...एक..दो..तीन ..या फिर...और क्या इन सब को वैवाहिक दर्ज़ा दिया जाएगा ??अगर हां ,तो क्या यह आर्थिक,सामाजिक,नैतिक अवमूल्यन की शुरुआत नहीं होगी ??अगर नहीं तो फिर सम्बन्ध को लिव इन के बजाय विवाह सूत्र में ही क्यों ना रखा जाए .
२)लिव इन सम्बन्ध से जन्में बच्चों को चाहे जितनी आर्थिक सुरक्षा दे दी जाए ...क्या वे परम्परागत भारतीय परिवेश में सामाजिक और

पारिवारिक सुरक्षा पा सकेंगे ??क्या ऐसे हालात में उनके विकास पर कोई प्रभाव नहीं पडेगा ??
3)लिव इन पार्टनर यह भी दलील देते हैं कि वे इस तरह के सम्बन्धों में रहकर अपने भावी वैवाहिक ज़िंदगी की परीक्षात्मक जांच -परख ( trial and error )कर रहे होते हैं....अब जब इन्हे वैवाहिक सम्बन्ध का दर्ज़ा मिल जाएगा तो ऐसे trial and error उन्मुक्त और असंयम यौन संतुष्टि की प्रयोगशाला साबित ना होंगे ?हाँ यह ज़रूर है कि बगैर कोर्ट खर्च के तलाक विधि ज़रूर लागू हो जायेगी...अर्थात अब हमारा मन भर गया और हम दूसरी डाल पर अपना बसेरा बनाएंगे ....ज़िंदगी बस रैन बसेरा ही बन कर नहीं रह जायेगी??
४)राधाकृषणन जी की तरफ से यह फैसला भी तब लिया गया जब एक लिव इन दम्पति के बीच झगड़े हुए और सम्बन्ध ख़त्म होने के बाद महिला ने अपने लिए रख रखाव के खर्च की मांग रख दी .
क्या भविष्य में यह सम्भावना नहीं बनेगी कि किसी स्त्री द्वारा कोई भी धनाढ्य पुरुष लिव इन के नाम पर शोषित हो जाए....कुछ दिन,महीने,वर्ष के सम्बन्ध बना कर छुटकारा भी पा लेने की कोशिश और अर्थ लाभ की भी गलत कोशिश .....क्या यह एक व्यापार ना बन जाएगा ? आज कई क़ानून का इस प्रकार भी दुष्प्रयोग हो रहा हैं जिनमें दहेज़ सम्बंधित क़ानून,यौन उत्पीड़न क़ानून ,दलित उत्पीड़न क़ानून आदि आते हैं.
५)क्या यह आशंका नहीं कि सम्पति पर एकाधिकार की कोशिश में विवाहिता या लिव इन पार्ट्नर के तरफ से एक दूसरे पक्ष के लिए प्राणघातक योजनाएं अंज़ाम लेने लगें ??
६)एक समाज जहां आज भी विवाह पूर्व ,विवाहेत्तर या समलिंगी सम्बन्धों को मान्यता ही प्राप्त नहीं है या बहुल वर्ग की स्वीकृति ही नहीं है वहाँ ऐसे लिव इन रिलेशन पर क़ानून बना कर उसे सफलता पूर्वक लागू कर पाना किस प्रकार आसान होगा ...जहां आज भी कई न्याय लंबित पड़े हैं ...क्या ऐसे अमान्य सम्बन्धों की पेचीदगी अनावश्यक रूप से न्याय प्रक्रिया पर सवालिया निशाँ नहीं लगाएगी ?
ऐसे कई प्रश्न हैं जिन पर गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है
कुछ दिन पूर्व ही विधवा माँ से मिल कर आई और यह कविता लिखी काश !!!!प्रत्येक विवाहित पुरुष अपनी पत्नी की नज़र में अपनी मौजूदगी के अर्थ को और स्वयं पर पत्नी के एकाधिकार को समझ कर उस भाव का सम्मान कर सके तो ना ऐसे सम्बन्ध बने और ना ही उन पर ऐसे क़ानून बने .
लोग कहते हैं..
दुनिया गोल है
माँ की दुनिया भी
नीली तो नहीं ...पर हाँ'
गोल ही थी
और उसका गोलाकार होना
समाया था उनके माथे की गोल लाल बिंदी में.
सुर्ख लाल बिंदी
समेटे ऊर्जा सूर्य सी
मानो सिमटी जाती थी सारी दुनिया
उस गोलाकार छोटी सी बिंदी में

अब दुनिया...
माँ के लिए कुछ भी नहीं
क्योंकि नहीं सज पाती बिंदी
पिता के जाने के बाद
अब नहीं रहा माँ के लिए
दुनिया के होने का मायना
सूने माथे से गुम हुई बिंदी ने
ख़त्म कर दिया आदि अंत
एक बड़ी सी दुनिया का

डूब गई बड़ी सी दुनिया


पनीली आँखों के सूनेपन में

कोई गोताखोर कितना भी हुनरमंद हो
नहीं ढूंढ सकता...
वह छोटी सी बड़ी दुनिया
जानते हो क्यों ???
क्योंकि पनीली आँखें
साक्षात्कार करा देती हैं
दुःख की अथाह गहराई से
हिम्मत ही नहीं पड़ती
उस दुःख के सागर में डूबने की
अब मैं.....
और भी गहराई से
समझ पाती हूँ महत्व
उन सभी व्रत उपवास प्रार्थनाओं का
जो करती थी माँ अपनी दुनिया की हिफाज़त के लिए
मैं जानती हूँ ....
हमारी भी बड़ी सी दुनिया समाई है
माथे पर सजती छोटी सी लाल बिंदी में
बड़ी सी दुनिया का आदि अन्त
बस एक बिंदु पर .

लिव इन रिलेशनशिप की परिभाषा के अनुसार “an arrangement of living under which the couples which are unmarried live together to conduct a long-going relationship similarly as in marriage.”पर भारतीय परिवेश में जिस लिव इन सम्बन्ध की बात इस क़ानून द्वारा की जा रही है वह अत्यंत ही विरोधाभासी और वैवाहिक मूल्यों के खिलाफ होने के कारण अस्वीकार्य है.
यह लिव इन रिलेशन अगर अपराध और पाप दोनों नहीं तो व्याभिचार अवश्य है क्योंकि इसमें सिर्फ एक पक्ष पति या पत्नी की इच्छा होती है और यह इनमें से किसी एक को निश्चित ही पसंद नहीं होता ...(चाहे वह पति के द्वारा लिव इन पार्टनर हो या पत्नी के द्वारा) .किसी पत्नी के लिए यह बहुत ही पीड़ादायक हो जाता है क्योंकि अधिकांशतः वे आश्रित होती हैं.यह दो व्यक्तियों की निजता का संकीर्ण दायरा नहीं बल्कि दो परिवारों उनके सम्बन्धियों तक का विस्तृत दायरा होता है...और हमारी भारतीय संस्कृति me and my family का संकीर्ण फलसफा नहीं है.एक दाम्पत्य के टूटने की गूंज दो परिवारों के कान भेद देती है....इसके बिखरे कांच कई की आत्मा घायल कर देते हैं जिसमें मुख्यतः माता- पिता होते हैं.लिव इन रिलेशन में पति पत्नी की आपसी सहमति हो ही नहीं सकती क्योंकि पत्नी अपने पति के प्यार को किसी के साथ बाँट नहीं सकती.
और कैसा बदलता आर्थिक ,सामाजिक परिवेश !!!!!!!!!!इसे इस प्रकार के क़ानून का चोला पहना कर हम ही तो बदल रहे हैं ...आर्थिक संतुलन के लिहाज़ से दो को साथ रखना बेहतर है या तीन यह तो अर्थशास्त्र का अ ना जानने वाला भी बखूबी समझ सकता है.आर्थिक तकाज़ा ' हम दो,हमारे दो' का है...नैतिक तकाज़ा 'प्रेम गली अति सांकरी जामें दो ना समाय' का और सामाजिक तकाज़ा 'एक म्यान में दो तलवारें कभी नहीं रह सकतीं का है.यह सिर्फ दैहिक आकर्षण का मामला है...लिव इन रिलेशन और उससे जुड़े क़ानून की कभी ना ज़रुरत थी और ना रहेगी...पहले ऐसे सम्बन्धों को हवा दो फिर उनके संरक्षण के क़ानून बनाओ ऐसा मकड़ जाल ही क्यों बनाना !!!
“It’s better to have a live-in relationship rather then having a divorced life!”
यह विश्व के अन्य किसी भी देश के लिए हो सकता है पर भारत देश में कभी स्वीकार्य नहीं हो सकता.और हाँ, जो देश ऐसे सम्बन्धों को मान्यता देते हैं उनके यहाँ भारत वर्ष के सस्कारों जैसी मूल्यों की जड़ें गहराई से समाई नहीं होगी .
ये सही कहा गया है “Happiness in marriage is not so much FINDING the right person as BEING the right person.”
आज गाँव से कई युवक शिक्षा ,रोजगार आदि के लिए शहर की तरफ पलायन कर जाते हैं...आर्थिक रूप से कमजोर मज़दूर वर्ग अपनी पत्नी को शहर नहीं ले जा पाते ...ऐसे में कब उनकी रिक्तता लिव इन पार्टनर से भरने लगती है उन्हें आभास नहीं हो पाता पर ऐसे में परेशानी तीनों को उठानी पड़ती है.कई स्त्री-पुरुष आदतन जीवन मूल्यों के अभाव में असंयमी बन ऐसे सम्बन्ध बना कर रहने लगते हैं...परन्तु वज़ह कोई भी हो ..... लिव इन रिलेशन में लिव इन पार्टनर को पत्नी की तरह अधिकार या आर्थिक अंश देने वाले क़ानून के बन जाने से नैतिकता का जो अल्पांश भय भी समाज में बचा है वह आर्थिक सुरक्षा के संरक्षण के तले दम तोड़ देगा...पारिवारिक तनाव बढ़ जाएंगे ..सामाजिक विघटन को रोकना मुश्किल होता जाएगा और इस विषय पर सिर्फ क़ानून की भूल-भुलैया या विरोधाभासी प्रावधान उभर कर एक के बाद एक सामने आते रहेंगे.
मेरी प्रत्येक दम्पति से गुज़ारिश है कि इतिहास से सबक ले और ऐसे किसी भी लिव इन रिलेशन को खारिज़ करे , .....रुक्मिणी का दर्द किसी की लेखनी का हिस्सा भले ना बना हो पर आज की विवाहिता अपने पति के जीवन में किसी अन्य की उपस्थिति की कल्पना मात्र से सिहर जाती है.उसे अपने पति पर इस कदर भरोसा होता है....
हम दो मस्त पंछी ..
विचरें स्वच्छ नीलाकाश में

जब भी पड़ें कमजोर मेरी पाँखें
तुम्हारे मज़बूत डैने दें मुझे सहारा
कितनी आश्वस्त हो जाउंगी मैं...
और फिर
कितना आसान
कितना सरल
हो जाएगा
समेटना हम दोनों को










अपने हिस्से का आसमान.

"दुनिया बर्थडे केक की तरह है"

"All the world is birthday cake,so take a piece but not too much."

"दुनिया बर्थडे केक की तरह है,अपना हिस्सा लें लेकिन बड़ा हिस्सा छोड़ दें."

-Gorge Harison
मेरे प्रिय ब्लॉगर साथियों,
आप सब को मेरा बहुत ही प्यार भरा नमस्कार
जॉर्ज हैरिसन की ये ख़ूबसूरत पंक्ति मैं आज अपने बर्थडे पर आपको उपहार के रूप में दे रही हूँ.आप को कुछ प्यारी कविताएँ भी उपहार दूंगी...आप अवश्य आश्चर्य कर रहे होंगे जन्म दिवस पर उपहार लेने की परम्परा है पर यमुना तो देने की बात कर रही है.दोस्तों ,वह इसलिए कि ईश्वर ने हमें पृथ्वी पर इसीलिये भेजा है कि हम बस अपना हिस्सा लें और उस हिस्से का सर्वोत्तम उपयोग कर ईश्वर प्रदत्त उपहार को सार्थक कर दें.
सर्वप्रथम आपको 'happy birthday to you  गीत के विषय में कुछ जानकारी दे दूँ.
1998 की गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स के अनुसार," happy b'day to you'जन्म दिन पर गाया जाने वाला सबसे प्रचलित गीत है.यह गीत अब तक 18 भाषाओं में अनुदित हो चुका है.इस गीत के धुन का आधार 'good mornig to all 'गीत है.जिसे 1893  में रचा और संगीतबद्ध किया था अमेरिकी बहनों -पेटी हिल और मिल्ड्रेड हिल ने.ये दोनों बहनें नर्सरी स्कूल की शिक्षिका थीं.पहली पंक्ति शिक्षिका गाती थी बच्चे दूसरी पंक्ति गुनगुनाते थे -जिसके अंत में बच्चे 'टीचर'शब्द का सम्बोधन करते थे.
इसी गीत के आधार पर हिल बहनों ने हैप्पी b'day  गीत लिखा यह H.Kolman  द्वारा सम्पादित गीतों की पुस्तक में मार्च ,1924 में प्रकाशित हुआ था.उन्ही दिनों रेडियो और फिल्मों के आ जाने से यह गीत बहुत जल्द लोकप्रिय और प्रचारित हो गाया यह पूरा गीत इस प्रकार है.....
happy b'day to u
happy b'day to u (उसका नाम जिसका जन्मदिन है)
may God bless you ,may God bless you God bless you (उसका नाम जिसका जन्मदिन है)
from all friends and new
may goodluck go with you
and happiness too.....

जब यह गीत विश्व भर के रेडियो और टेलीविजन पर बजने लगा तो तीसरी बहन जेसिका हिल ने कॉपीराइट का मुकदमा दायर कर दिया ताकि इस गीत के प्रयोग पर रचयिता बहनों को रॉयल्टी मिलने लगे .इसके लिए शिकागो स्थित संगीत कंपनी klaton F. Sami कंपनी ने जेसिका हिल की ओर से इस गीत का संगीतबद्ध रिकॉर्ड प्रकाशित किया और 1935  में इस गीत का कॉपीराइट दर्ज़ कराया.
(यह जानकारी मुझे मेरे प्रिय अखबार 'दैनिक जागरण'के द्वारा 12 नवम्बर 2010को मिली थी जिसे मैंने डायरी में नोट कर लिया था.)
दोस्तों ,मैं प्रत्येक विशेष दिवस को मनाये जाने की पूरी पक्षधर हूँ ऐसा मैंने कई ब्लॉग में कहा है.यूँ तो हम प्रत्येक दिन को पूरे मनोयोग से जीते हैं पर जन्म दिवस वह दिन होता है जब हमारे साथ हमारे प्रिय जन भी उस विशेष दिन को हमारी खुशी से जुड़ कर जीते हैं जो हमें अपने होने का अर्थ समझा देता है कि हम सिर्फ स्वयं के लिए ही नहीं औरों के लिए भी महत्त्वपूर्ण हैं.मेरे जन्म दिवस पर मेरी आदरणीया माताजी और दिवंगत पिताजी को चौथी लड़की संतान के रूप में पाकर खुशी हुई होगी ये पूरे दावे के साथ मैं नहीं कह सकती पर इतना अवश्य है कि उन्होंने मुझे उस परम्परावादी पारिवारिक परिवेश में भी सम्पूर्णता से बढ़ने का पूरा अवसर दिया..शिक्षा में कोई कमी ना की ...सच कहूं तो सीमित साधनों से सर्वोत्तम संस्कार और मूल्य देने में कोई कसर ना छोड़ी मैं इसके लिए ईश्वर के और उनके प्रति नतमस्तक रहती हूँ.हाँ,दो शख्श जो मेरे जन्म दिवस पर बहुत खुश होते हैं वे हैं मेरे पतिदेव और मेरी प्यारी बिटिया ...जो मुझे अपने ज़िंदगी में बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं.
आज मैं तीन कविताएँ आप को उपहार स्वरुप दे रही हूँ ....
1)
सबसे बड़ी खुशी
घर लौट कर तुम्हारा
रोज़ यह पूछना
क्या किया सारा दिन ?????????????
प्रेरित करता है मुझे
करूँ कुछ ऐसा जो ...हो...
तुम्हारी खुशी से जुड़ा
दे तुम्हे संतुष्टि
और फिर ........
जुट जाती हूँ मैं
स्वयं को ही तराशने में
क्योंकि........
एक नहीं ,
अनगिनत बार कहा है तुमने
यमुना !!!!!
तुम ही मेरी सबसे बड़ी खुशी हो.
है रोशन ........
तुम्हारी खुशी के नूर से
मेरा घर-संसार .

2)
तुमसे शुरू...तुमसे ख़त्म
बिन मांगे ही
दिया तुमने.........
आसमाँ का पूर्ण चाँद
बसंत का भरपूर उन्माद
वर्षा की तृप्त फुहार
शीतल सहृदय बयार
ज़मीँ की हर बहार
मेरे जीवन में दाखिल हो कर
बता दिया तुमने
ज़िंदगी तुमसे शुरू होकर
तुम्ही पर ख़त्म हो जाती है.....
3)
छोटी सी चिड़िया
हम दो मस्त पंछी
विचरते स्वच्छ खुले नीलाकाश में.
जब भी पड़ती हैं
कमजोर
मेरी पाँखें
तुम्हारे मज़बूत डैने
देते हैं पनाह
मैं छोटी सी चिड़िया
कितनी आश्वस्त हो जाती हूँ
और फिर...............

कितना सहज
.......
कितना आसान
हो जाता है
समेटना अपने हिस्से का आकाश.
happy b'day to me ; happy b'day to u  all