Monday, November 21, 2011

यक्ष प्रश्न

ये अक्सर सुनते हैं हम कि समाज में, विकृतिता जोरों से बढ़ रही है
पर यक्ष प्रश्न यह है कि हमारी पीढ़ी,नयी पीढ़ी को कितना गढ़ रही  है
हम अपने ही सुरक्षा कवच में,आज इस कदर क्यों  सिमटे हुए हैं ?
नयी तकनीक के  चकाचौध की,रंगीन चादर में क्यों  लिपटे हुए हैं?
दूसरों की दुःख,वेदना,व्यथा, अब कहाँ  दिखती है कहो   हमें भला ?
किसी से मिलने से पहले सोचते हैं,कैसे हटाओ सर से ये बुरी  बला ?
एक बेहतर समाज की आशा भला ,इस माहौल में कैसे करें हम?
काली रोशनी के पीछे का घना अन्धेरा,दूर कैसे हो ये विचित्र तम ?
स्वयं का सुरक्षा कवच भी सोचो ,हमें आखिर  कब तक बचा पायेगा ?
नयी पीढ़ी के सुनहरे भविष्य का ,कहो  इतिहास कैसे रचा जायेगा?
मत सिमटो स्वयं  में ,सुगंध अपनी जग की बगिया में बिखरने दो
गुणों से भरपूर ये पैमाना,समाज हित में जी भर कर छलकने दो
जानती हूँ  विचलित समाज में ,हो सकते हैं हम उपहास के पात्र
 कदम पीछे करने को हमारे,क्या यही होगा बोलो  कारण एकमात्र
लाखों के हुजूम में एक ही तो,रविन्द्र ,गाँधी आदि जैसे होते हैं
जागृत करने सुप्त समाज को,भला अपनी नींद ये कब सोते हैं?
क्या होता रूप समाज का,अगर ये भी हो जाते  स्वयं तक सीमित
बनो अग्रदूत ले प्रेरणा  इनसे,है तुममे भी संभावना अपरिमित
जहाँ खड़े हो उठाओ वहीँ से ,नव निर्माण का प्रथम सशक्त कदम
सुकार्य करने का है यही समय,न मिलेगा हर बार हमें मनुष्य जनम


Monday, November 14, 2011

atmasantushti

कल मेरे एक जानपहचान वाले ने कहा "तुम ब्लॉग लिखती हो पर कमेंट्स तो 0 ही हैं इसका तात्पर्य है कोई तुम्हारे ब्लॉग नहीं पढ़ता तुम्हे निराशा नहीं होती "मैंने  एक ही ज़बाब दिया"कितने लोगों की रचनाओं को पहचान लिखने के तुरंत बाद ही मिल गयी? रविन्द्रनाथ जी ने गीतांजलि जब लिखी तो क्या यह सोचा था कि उन्हें नोबल अवार्ड मिले या क्या उन्होंने उसके बाद कोई रचना नहीं लिखी ,अपनी लेखनी को दफ़न कर दिया अगर गांधीजी भी ऐसा ही सोचते कि मेरे अहिंसा की नीति को शांति का नोब्ल अवार्ड मिल जाये इसलिए मैं  ये अपनाऊं तो क्या विश्व को इतना  महान अहिंसा का पुजारी मिल सकता था क्या?उन्हें तो आज तक नोब्ले अवार्ड नहीं मिला कितने लोगों को मर्न्नोपरांत ही दुनिया जानती है और  उन्हें अवार्ड मिलता है जब वे ऐसी  दुनिया में जा चुके होते हैं जहाँ पारितोषिक.सराहना इत्यादि का कोई अर्थ नहीं पर जीवन भर उन्होंने आत्मसंतुष्टि के लिए अच्छा काम किया वही उनकी पहचान बनी .
कहने का अर्थ है कि हमें हमेशा अच्छा से अच्छा कार्य करते रहना चाहिए बिना किसी स्वार्थ भाव  से समाज ,परिवार ,देश विश्व के लिए अगर हम कुछ कर सकते हैं तो वो तभी संभव है जब हम पहले अपनी आत्मसंतुष्टि के लिए काम करें .
कर सकोगे आस-पास के ,वातावरण को तुम सदाबहार
 सजा सकते हो अवश्य  इस, समाज को लगाकर  चाँद चार
बस करो ना तुम कभी अपने, बहुमूल्य समय को बेकार
.आत्मसंतुष्टि जिसमे हो उसे कर ,बनाओ ये जीवन साकार

Friday, November 11, 2011

hidden spark: my little bird

hidden spark: my little bird: अपने बच्चों को किसी भी कारण से अपने से दूर करना माँ के लिए बहुत मुश्किल होता है न चाहते हुए भी नैन बरस पड़ते हैं मुझे भी अपनी प्यारी बिटिय...

my little bird

अपने बच्चों को किसी भी कारण से अपने  से दूर करना माँ के लिए बहुत मुश्किल होता है न चाहते हुए भी नैन बरस पड़ते हैं मुझे  भी अपनी प्यारी बिटिया हर पल याद आती है दिल कहता  है भाग कर चली जाऊ  उसे मिल आऊं
एक नहीं,दो नहीं पूरी पांच ,कहानियों से भी न तुझे होता था संतोष
कैसे सोती होगी मेरी रानी  बिटिया,सोचती रह जाती मैं मन मसोस
 आत्मविश्वास भरा वो  भोला चेहरा ,पूरी तैयारी से स्कूल को जाना
थकी हारी  पर फिर भी ताजगी लिए चेहरे पर, वापिस तेरा घर को आना
 बुलबुल सी चहकती मेरे आगे पीछे  ,भोजन की तू करती थी फरमाइश
हर जार,हर डिब्बों में बंद भोजन की, मैं नहीं थकती थी कराती नुमाइश
फिर अपनी पसंद का भोजन चुन ,प्यार से चिड़िया सी चुगते रहना
क्यों  भेजा तुझे मैंने इतनी दूर,अभी आता भी तो न थातुझे उड़ना
दिन तो कट जाता  बिटिया मेरी,रात को तो तू बहुत याद आती
आँखों से  आंसू बरसते रहते,नींद मुझसे कोसों दूर है भागती
प्रभु के सहारे ही हर बार तुझे ,जी कठोर कर मैं छोड़ हूँ आती
तेरे बिना काश पहचाने  राहों में, जीवन अपना मैं मोड़ आती
सब कुछ सह लुंगी सोच  ऐसा,जब मैं वापस घर को हूँ आती
हर कोने में छुपी तेरी यादें, सामने आकर मायूस,है  कर देती
इन आँखों के हर मोती चुन माला, बिटिया  एक दिन बनाएगी
सफल हो कर अपने जीवन में , मेरे अधरों पर  मुस्कान लाएगी
घोंसले में बैठी माँ चिडिया, जिन अण्डों को बड़े प्यार से सेती है
उड़ान सिखाने को वो  घोंसलों से , अपने परिंदों को धकेल देती है
 इसी सच्चाई के साथ जिंदगी नित्य,नए मोड़,नयी राह लेती है
बेटियां कितनी सहजता  स्वयं को,नयेपन से सदा  जोड़ लेती हैं



Thursday, November 10, 2011

एकाकीपन में स्वयं की तलाश

रविन्र्रनाथ टैगोरे की एक पंक्ति है "यदि तोमार डाके सुने केऊ न आशे तोबाई एकला चलो रे " यह सच है अकेलेपन के डर से घबराना या हताश होना अपनी  संचित शक्ति से मुंह  मोड़ना है .एकाकीपन में भी गज़ब की शक्ति होती है इतिहास गवाह है की अधिकतर नयी खोज अकेलेपन की गोद में ही संभव हुई .किसी ने खूब कहा है
अकेला चला था अकेला चलूँगा,सफ़र के सहारों न दो साथ मेरा ,
सहज मिल सके वो नहीं लक्ष्य मेरा,बहुत दूर है मेरी निशा का सवेरा
अगर थक गए हो तो तुम लौट जाओ, गगन  के सितारों न दो साथ मेरा
अकेलेपन की इस स्थिति  से मायूस होकर हिम्मत हार जाने वालों के लिए ये छोटी सी कविता है    
अकेलेपन  के घोर सन्नाटे में खुद को पा लेने का उल्लास है
सच है शांति  और एकाकीपन में ही,गिनी  जाती हरेक सांस है
जमीं  के भीतर पड़ा वो एक बीज,भले रवि के रश्मि से वंचित है
पर एक विशाल तरु की संभावना, उसने रखी  स्वयं में संचित है
इस एकाकीपन को बनाएं हम,कैसे उपयोगी और सरस क्षण
वश में सब हमारे ही तो है, भर लें सुविचारों से जब हम ये मन
मन का दीप आलोकित कर ,एकाकीपन की आज तम हर लें
हर पल सकारात्मकता से भर,आओ मुट्ठी में यह जग कर लें
औरों का अनुपस्थित  होना,सम्पूर्णता से अपनी उपस्थिति है
पुरे ब्रह्माण्ड का रीतापन भर दे,एकाकीपन में ऐसी  वो शक्ति है
स्वयं के एकाकीपन में ही हम ,जग का दामन भर सकते हैं
सबको प्रेरित जो कर जाये,ऐसी कृति का सृजन  कर सकते है
खोजें,सोचें,आओ रूबरू हों,आज अपने खोये हुए व्यक्तित्व से  
दफ़न पड़े शौक  जगा कर अब ,भर दें जग अपने अस्तित्व से
साहित्य की वो सर्वोत्तम रचना ,अकेलेपन में ही लिखी गयी थी
चित्रकार की अद्भुत, अनुपम कृति भी एकांत में ही रची गयी थी






Monday, November 7, 2011

bacchon ki jababdehi

दैनिक जागरण ५ नवम्बर के मुख्या पृष्ठ पर पढ़ा "बी.आई.टी.मेसरा  के architecture विभाग के अंतिम वर्ष के स्टुडेंट  ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली अपने suisidal  नोट में कारण तनाव को बताया suicide  से पहले उसने वेकिपेडिया में इसके विभिन्न तरीकों की खोज की थी "
दूसरी घटना उत्तर २४ परगना जिले की सिटी कॉलेज की बी.ए.द्वितीय वर्ष की स्टुडेंट ने परीक्षा में fail होने पर जान  दे दी.
मैं यह पढ़कर बार-बार ये सोचने को विवश हो जाती हूँ की क्या खराब अंक मिलना ,दोस्तों का साथ छूटना ,प्यार में धोखा  खाना,ये सब जिंदगी से भी बढ़कर महत्वपूर्ण है ?कहा गया है "बड़े भाग मानुस तन पावा"ये जीवन अनमोल है इसे एक झटके में यूँ ख़त्म नहीं किया जा सकता. 
आवश्यकता है बच्चों को समझाने की  "समाज,परिवार ,देश के लिए वे बहुत महत्वपूर्ण हैं उनके  जीवन की उपयोगिता सिर्फ अंक लाने  में ही नहीं बल्कि उनका हँसना,बोलना, खेलना, समाज में तन मन से एक स्वस्थ नागरिक की तरह रहना अपने आप में उनकी उपलब्धि है जरुरत है माता-पिता बच्चे को संस्कारों के आभूषण से अलंकृत करें ताकि वे बड़ी से बड़ी मुसीबतों का सामना हँसते हुए कर सकें यह कार्य वे स्वयं को सुसंस्कृत रख कर ही कर  सकते हैं .
एक दिन में एक बार अपने बच्चे से अवश्य कहिये "तुम मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हो,हम हर परेशानी में तुम्हारे साथ हैं ,हम मिलकर समाधान खोज निकालेंगे" ये वाक्य आपके बच्चे को हमेशा मनोबल देंगे 
social  नेट्वोर्किंग कभी गलत नहीं है वास्तव में कोई अविष्कार गलत नहीं है ,अविवेकपूर्ण उपयोग ही उसे गलत बानाता है .अगर  इसके जरिये अच्छे विचार बांटे जाये तो ये बहुत अच्छा साधन साबित हो सकता है 
मैं एक चिर परिचित पंक्ति उन सारे बच्चों के लिए बोलना चाहती हूँ जो इस तरह के अविवेकपूर्ण कदम लेते हैं 
गर कोई उम्मीद न हो तो भी नाउम्मीद न होना 
जीने के हजारों तरीके हैं दुनिया में,फ़िर क्यों रोना
ये मानव  जीवन इश्वर का दिया अनमोल तोहफा है 
रोकर, हताश हो, इसे न गुजारो कल किसने देखा है ?

soch gahri karo aur apne sakaratmak faisle lo

पेट्रोल के दाम बढ़ गए हैं लोगों में आक्रोश है पर इसके लिए कहीं हम भी कुछ प्रतिशत जिम्मेदार नहीं क्या?
१  हम में से कितने लोग कार-पूलिंग पर यकीन करते हैं? 
२  पैदल चल कर तय कर सकने योग्य दुरी को भी हम क्यों कार से ही करना पसंद करते हैं?
३   अगर घर में चार सदस्य हैं तो सब के लिए अलग गाड़ियाँ  क्यों ?
४   हम में से कितने लोग अपने कार्य स्थल पर पैदल जाना पसंद करते हैं अगर यह नजदीक हो ?
पेट्रोल के सीमित भंडार को सोच समझ कर प्रयोग करना क्या हमारी भी जिम्मेदारी नहीं है? शिक्षित समाज का कर्त्तव्य समस्या के समाधान खोजना होना ज्यादा उचित है बजाये इसके की हम व्यर्थ की बयानबाजी में समय बर्बाद करें आओ सोचें कि हमारा उत्तरदायित्व क्या है ?एक जागरूक नागरिक होने का यही समय है कि सरकार  की  मदद करें अगर हमने अपने स्तर में भी पेट्रोल बचाने की  कशिश की  तो भारत की इतनी बड़ी आबादी इस दिशा में कितना सहयोग देने में सक्षम हो जाएगी



Friday, November 4, 2011

gujarish

आज मैं पश्चिम  बंगाल के छोटे से स्थान  में हूँ . यहाँ के शांत वातावरण ने मेरी लेखन क्षमता के बीज को एक उर्वर भूमि प्रदान की है.वैसे भी बंगाल की आबो-हवा साहित्यकारों , कवियों,चित्रकारों के सुंदर कृतियों से सुवासित है.शायद इस भूमि का ही वरदान है कि बचपन से लिखने की चाहत को आज जैसे पर लग गए हों .कलम जब चल पड़ती है तो जीवन  के हर आयाम, हर पहलू को अपने शब्दों में समेट लेना चाहती है .इसलिए मैंने अपने सारे विचारों को इस ब्लॉग के जरिये आपके समक्ष लाना शुरू किया है.
किसी भी तरह की रचना तब तक अधूरी है जब तक उसकी  आलोचना या सराहना न हो. सराहना पाने से जहाँ बल मिलता  है वहीँ आलोचना  से प्रेरणा मिलती  है.इस धुप छाँव से कृति सजीव,सफल और सार्थक बनती है 
आप सबसे गुजारिश है कि आप में से जो भी मेरी रचना  पढ़े इसे सराहनाओं की दवा या आलोचनाओं के नश्तर से मेरी लेखन क्षमता का विकास  करने में सहयोग दे.मेरा मानना है कि जब इन्सान का जन्म ही दवा और नश्तर  के बीच होता है तो फिर इससे गुरेज क्यों?
जब-जब मेरी भावनाओं की बर्फ पिघलती है ये शब्द बन दुनिया के सामने आने को बेताब रहती है .इश्वर,समाज,प्रकृति,पर्यावरण,नैतिक और पारिवारिक मूल्य,देशभक्ति के सतरंगी किरणों को समेटे यह ब्लॉग इन्द्र धनुषी आभास दिलाने में कितना सफल होगा ये तो मैं नहीं जानती पर हाँ ये जरुर जानती हुईं कि मेरे हर ब्लॉग की लावण्यता उसके भावों में ही छुपी है .अपनी भावनाओं को आप तक पहुँचाने कि इस कोशिश में अगर कहीं भूल हो जाये तो उस भूल के लिए क्षमाप्रथिनी हूँ .
अपनी रचनाओं कि सुमन वाटिका से हर दिन एक सुमन आप सभी पाठकों के लिए .आशा है आप सब को कुछ  सुमन अवश्य पसंद आयेगें .
 



anubhav

कल चेतन भगत के लाइव चाट के द्वारा पता चला की उनकी पहली बुक को प्रकाशक ने नकार दिया था.पर आज वे युवा पाठकों के सबसे चहेते लेखक हैं.दैनिक jagरन के सप्तरंग ३ नवम्बर २०११ के पृष्ठ में मैंने पढ़ा की जब १९३१ में फिल्मों ने बोलना शुरू किया टी फिल्म आलामारा में पृथ्वीराज कपूर की आवाज को लोगों ने दोषमुक्त बताया .बाद में वे लोग ही उनकी आवाज के कायल हो गए.कहीं पर येभी पढ़ा था कि अमिताभ बच्चन की आवाज को एक रेडियो आयोजक ने नकार दिया था पर आज दुनिया जानती है कि बच्चन जी की आवाज में एक जादू,एक कशिश है.
इन सारीबातो  से सीख मिलती है कि अगर किन्ही कारणों से आपकी कृति या अच्छे कार्य भी नकार दिए जायें तो वह आपकी असफलता नहीं बल्कि भावी सफलता की शुरुआत हो सकती है,बशर्ते आप उस अस्वीकृति को जिंदगी की सबसे बड़ी असफलता न मान बैठें.

अपने आँगन से जितना बड़ा आकाश दिखाई देता  है क्या वही उसकी सीमा है? नहीं,आकाश  असीमित है पर इसका ज्ञान तो तब होगा जब हम घर से बाहर आएगें और उस विस्तार से रूबरू होंगे.

Thursday, November 3, 2011

accha lagata hai

काले बादल,बरखा की बूंदें,निहारते रहना अच्छा लगता है.
अकेलेपन में उब जाना भी, कभी-कभी अच्छा लगता है.
तपती धरा को शीतल करने,मौसम चक्र चला करताहै
एक शहर को छोड़ दूजे शहर, जाना सही फैसला लगता है 
हर इन्सान की है वही कहानी,वह काम में ही उलझा रहता है
नयी jagah ,नए लोग,नयापन,कुछ पल ही भला लगता  है
चलते -चलते जो थक जाऊं ,यादों के साये ही भला लगता है
तन्हाई जब साथ हो मेरे,कविता लिखना अच्छा  लगता है
विचारों के पट खोल शब्द,रूबरू कागज के हुआ करता है
जीवन के छुए अनछुए पन्ने, पढ़ना कितना भला लगता है
जीवन संगीत का सुर जब.रोम-रोम में बसने लगता है
हर साज,हर आवाज़,फिर, सब कुछ यहाँ अपना लगता है
कविता के हर शब्द को,फिर अंतर्मन ही सुना करता है
भीगे पलकों को सबसे छुप , पोंछ लेना भला लगता है
हर्ष-विषाद की तिजोरी में,हर्ष का संचय ही भला लगता है
ख़ुशी भरे पलों के सहारे,सपने देखना बहुत अच्छा लगता है






BAL VIKAS

बच्चों को महान व्यक्तियों के उदहारण देकर उनके आदर्शों पर चलने की शिक्षा देना सर्वथा उचित है पर उनके जैसा ही बनकर दिखाने की शिक्षा से मैं सहमत नहीं हूँ .अगरभगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद  को हुबहू महात्मा गाँधी जैसा ही बनने की शिक्षा दी जाती तो हम इन जैसे कई  और  महान  व्यक्ति कभी नहीं पा सकते थे. 
मेरा मानना है कि हर बच्चे में कुछ अद्भुत प्रतिभा होती है जो उसे बहुत अच्छा बनने में कारगर साबित हो सकती है.जरुरत है बच्चों को उनके सम्पूर्ण विकास का अवसर दिया जाये, महान व्यक्तियों का उदाहरण  सिर्फ उनके आदर्शों तक ही सीमित रखा  जाये शेष हर बच्चे को उसकी स्वयं की क्षमता पहचानने का मौका दिया जाये जिससे हमारे समाज को बेहतर से बेहतर नेतृत्व हासिल हो सके.हर जगह,हर युग में कई प्रतिभाशाली महान लोग निखर कर उभरें .