Friday, December 6, 2013

लाइफ,लव,लाफ्टर (एक कप कॉफ़ी;एक कप चाय)

Important during the wave of live in relationship.
MOMENTS OF TOGETHERNESS
moments of togetherness is vital to avoid the presence of VO (पति,पत्नी और वो)in marital life .
A cup of tea & a cup of coffee do play a contributory role for success of marital life....it gives space for  interesting conversation with each other ...essential for a happy family life.undoubtedly the topics of conversation may be with polar extremes ...coffee (about house chores)...tea (about office job)...but they merge with a deep intimacy of two hearts...so deep ....that they start dancing in the same harmony...although the cups are two ...topics are distant as two poles...but the harmony is one...the music is one..dance is one ....because  the two cups give gift of togetherness...a sweet break from 24*7 life.
In short the two cups nourish the marital relationship...all the joys & celebrations that happen to MARITAL LIFE  come from the exixtence of two cups (in evening/morning) .Couple should dive deeper into the  presence of  each other with each sip of tea/coffee.
Even sitting silence with cup of tea/coffee..enables to bring the couple  closer to each other..their  joy, blissfulness... silence...echo in the deep silence of loving nature...creating a complete TRANQUILITY.....& God blesses a solitary couple with an utter glory,beauty & immense love.
हर शाम...
ऑफिस से आने के बाद.....
तुम कहते हो
चलो बैठते हैं
गर्म चाय के दो प्यालों के साथ
तुम्हारे मनुहार पर
लाती हूँ दो प्याले .
एक गर्म कॉफ़ी का कप अपने लिए
एक गर्म चाय का कप तुम्हारे लिए
यह भेदभाव क्यों ?
तुम पूछते हो.
हंसती मैं कहती हूँ
भेदभाव प्यालों से नहीं
प्यालों में समाये द्रव से भी नहीं
भेदभाव तो पलता है दिलों में
प्याले और उनका द्रव
हो आपस में
कितने भी भिन्न...
मोहलत देते हैं हम दोनों को
साथ बैठने की
कितना अच्छा है कि ....
हम बैठे हैं साथ
और सम्बन्धों के लिए
यही है बात ख़ास
तुम ठहाके लगा कर ...
इतना हंसते हो कि
तुम्हारी आँखें सजल हो जाती हैं
और कर देते हो एकाकार
दोनों प्यालों की तरलता को
कितना सुखद...लगता है
मेरे (कॉफ़ी)तेरे(चाय) प्यालों का
अपनी-अपनी संकीर्णता
अपने-अपने अहम् छोड़
यूँ एकाकार हो जाना
कितना अनमोल
होता है
वैवाहिक सम्बन्धों के
मूल्यों का...
मैं...तुम..से परे
हम में तब्दील हो जाना.
YAMUNA PATHAK

लिव इन रिलेशन

आधुनिकीकरण के नाम पर दो चार कदम क्या बढ़ गए

क़ानून की किताब में कैद हो कर रह गई है ये ज़िंदगी.

न्यायमूर्ति के. एस. राधाकृष्णन तथा पिनाकी चंद्रा घोष की अध्यक्षता की पीठ का आठ दिशानिर्देशन के साथ का कहना है लिव-इन संबंध न कोई अपराध हैं, न पाप और संसद को ऐसे संबंधों को वैवाहिक संबंधों की प्रकृति में लाने के लिए कानून बनाने चाहिए यह घरेलू हिंसा एक्ट के तहत स्त्री सुरक्षा को मद्देनज़र रख कर कहा गया कथन है.....यह कथन अविवाहित स्त्री-पुरुष के आपसी लिव इन सम्बन्ध तक तो शायद मान्य हो जाए पर इसके दुरूपयोग की सम्भावना भी बराबर बनी रहेगी जैसा कि खंडवा केस में,ओम्कारेश्वर स्थित बिजली विभाग से रिटायर व्यक्ति की पत्नी ने आरोप लगाया कि उसका पति अपना ज्यादातर वक्त लिव इन पार्टनर के साथ गुजारता है .इस पर जज श्री गंगाचरण दुबे जी के अनुसार दिया फैसला कि पत्नी,लिव इन पार्टनर समेत पति एक ही छत के नीचे रहे ...विवाहित पुरुष १५ दिन पत्नी के साथ और १५ दिन लिव इन पार्टनर के साथ रहे .....इसके अलावा व्यक्ति की चल और अचल दोनों सम्पत्तियों में पत्नी और लिव इन पार्टनर का बराबर का हिस्सा भी होगा ...यह सुनकर प्रत्येक विवाहिता जो विवाह संस्था और इससे जुड़े मूल्यों पर भरोसा करती है उसकी नाराज़गी और विक्षोभ लाज़िमी है. जुवेनाइल पर क़ानून बन जाने से बाल अपराध को बढ़ावा देने वाले व्यस्कों के और भी मज़बूत बन जाने की सम्भावना की तरह ही विवाह जैसी पवित्र संस्था पर ऐसा क़ानून बन जाने से भारतीय संस्कृति की आधुनिक विवाह संस्था के निहित मूल्यों के क्षरण की आशंका ....भी बन जाती है .यह वाकई बहुत ही विचारणीय विषय है....
सही है....
घर को आग लग रही घर के ही चिराग से
एक पति अपनी विवाहिता और लिव इन पार्टनर के साथ रहे ....पुराने 'रखैल' शब्द का आधुनिक रूपांतरण लिव इन रिलेशन है.....फिर ठीक इसका विपरीत भी सही माना जाएगा कि एक पत्नी अपने विवाहित और लिव इन पार्टनर के साथ रहे ...यह लव त्रिकोण को कानूनी जामा पहनाने की रस्म अदायगी हो जायेगी .....ये कैसी उदारता ?? एक विवाहिता के लिए पति का होना क्या मायने रखता है वह क़ानूनविद क्यों नहीं समझ पाते ?? क्या ऐसा कोई क़ानून नहीं जो इससे परे विवाह संस्था के पाकीज़ा मूल्यों को और मज़बूत बनाये ???हालांकि सुप्रीम कोर्ट की माने तो अगर कोई औरत जान-बूझ कर किसी विवाहित पुरुष के साथ रहे तो उसे इस तरह का कोई अधिकार ना देने की बात पर क़ानून लाने की कोशिश भी जारी है..फिर भी कुछ प्रश्न बेहद उलझे से होंगे....
1) एक पुरुष या स्त्री कितने लिव इन पार्टनर रख सकते है...एक..दो..तीन ..या फिर...और क्या इन सब को वैवाहिक दर्ज़ा दिया जाएगा ??अगर हां ,तो क्या यह आर्थिक,सामाजिक,नैतिक अवमूल्यन की शुरुआत नहीं होगी ??अगर नहीं तो फिर सम्बन्ध को लिव इन के बजाय विवाह सूत्र में ही क्यों ना रखा जाए .
२)लिव इन सम्बन्ध से जन्में बच्चों को चाहे जितनी आर्थिक सुरक्षा दे दी जाए ...क्या वे परम्परागत भारतीय परिवेश में सामाजिक और

पारिवारिक सुरक्षा पा सकेंगे ??क्या ऐसे हालात में उनके विकास पर कोई प्रभाव नहीं पडेगा ??
3)लिव इन पार्टनर यह भी दलील देते हैं कि वे इस तरह के सम्बन्धों में रहकर अपने भावी वैवाहिक ज़िंदगी की परीक्षात्मक जांच -परख ( trial and error )कर रहे होते हैं....अब जब इन्हे वैवाहिक सम्बन्ध का दर्ज़ा मिल जाएगा तो ऐसे trial and error उन्मुक्त और असंयम यौन संतुष्टि की प्रयोगशाला साबित ना होंगे ?हाँ यह ज़रूर है कि बगैर कोर्ट खर्च के तलाक विधि ज़रूर लागू हो जायेगी...अर्थात अब हमारा मन भर गया और हम दूसरी डाल पर अपना बसेरा बनाएंगे ....ज़िंदगी बस रैन बसेरा ही बन कर नहीं रह जायेगी??
४)राधाकृषणन जी की तरफ से यह फैसला भी तब लिया गया जब एक लिव इन दम्पति के बीच झगड़े हुए और सम्बन्ध ख़त्म होने के बाद महिला ने अपने लिए रख रखाव के खर्च की मांग रख दी .
क्या भविष्य में यह सम्भावना नहीं बनेगी कि किसी स्त्री द्वारा कोई भी धनाढ्य पुरुष लिव इन के नाम पर शोषित हो जाए....कुछ दिन,महीने,वर्ष के सम्बन्ध बना कर छुटकारा भी पा लेने की कोशिश और अर्थ लाभ की भी गलत कोशिश .....क्या यह एक व्यापार ना बन जाएगा ? आज कई क़ानून का इस प्रकार भी दुष्प्रयोग हो रहा हैं जिनमें दहेज़ सम्बंधित क़ानून,यौन उत्पीड़न क़ानून ,दलित उत्पीड़न क़ानून आदि आते हैं.
५)क्या यह आशंका नहीं कि सम्पति पर एकाधिकार की कोशिश में विवाहिता या लिव इन पार्ट्नर के तरफ से एक दूसरे पक्ष के लिए प्राणघातक योजनाएं अंज़ाम लेने लगें ??
६)एक समाज जहां आज भी विवाह पूर्व ,विवाहेत्तर या समलिंगी सम्बन्धों को मान्यता ही प्राप्त नहीं है या बहुल वर्ग की स्वीकृति ही नहीं है वहाँ ऐसे लिव इन रिलेशन पर क़ानून बना कर उसे सफलता पूर्वक लागू कर पाना किस प्रकार आसान होगा ...जहां आज भी कई न्याय लंबित पड़े हैं ...क्या ऐसे अमान्य सम्बन्धों की पेचीदगी अनावश्यक रूप से न्याय प्रक्रिया पर सवालिया निशाँ नहीं लगाएगी ?
ऐसे कई प्रश्न हैं जिन पर गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है
कुछ दिन पूर्व ही विधवा माँ से मिल कर आई और यह कविता लिखी काश !!!!प्रत्येक विवाहित पुरुष अपनी पत्नी की नज़र में अपनी मौजूदगी के अर्थ को और स्वयं पर पत्नी के एकाधिकार को समझ कर उस भाव का सम्मान कर सके तो ना ऐसे सम्बन्ध बने और ना ही उन पर ऐसे क़ानून बने .
लोग कहते हैं..
दुनिया गोल है
माँ की दुनिया भी
नीली तो नहीं ...पर हाँ'
गोल ही थी
और उसका गोलाकार होना
समाया था उनके माथे की गोल लाल बिंदी में.
सुर्ख लाल बिंदी
समेटे ऊर्जा सूर्य सी
मानो सिमटी जाती थी सारी दुनिया
उस गोलाकार छोटी सी बिंदी में

अब दुनिया...
माँ के लिए कुछ भी नहीं
क्योंकि नहीं सज पाती बिंदी
पिता के जाने के बाद
अब नहीं रहा माँ के लिए
दुनिया के होने का मायना
सूने माथे से गुम हुई बिंदी ने
ख़त्म कर दिया आदि अंत
एक बड़ी सी दुनिया का

डूब गई बड़ी सी दुनिया


पनीली आँखों के सूनेपन में

कोई गोताखोर कितना भी हुनरमंद हो
नहीं ढूंढ सकता...
वह छोटी सी बड़ी दुनिया
जानते हो क्यों ???
क्योंकि पनीली आँखें
साक्षात्कार करा देती हैं
दुःख की अथाह गहराई से
हिम्मत ही नहीं पड़ती
उस दुःख के सागर में डूबने की
अब मैं.....
और भी गहराई से
समझ पाती हूँ महत्व
उन सभी व्रत उपवास प्रार्थनाओं का
जो करती थी माँ अपनी दुनिया की हिफाज़त के लिए
मैं जानती हूँ ....
हमारी भी बड़ी सी दुनिया समाई है
माथे पर सजती छोटी सी लाल बिंदी में
बड़ी सी दुनिया का आदि अन्त
बस एक बिंदु पर .

लिव इन रिलेशनशिप की परिभाषा के अनुसार “an arrangement of living under which the couples which are unmarried live together to conduct a long-going relationship similarly as in marriage.”पर भारतीय परिवेश में जिस लिव इन सम्बन्ध की बात इस क़ानून द्वारा की जा रही है वह अत्यंत ही विरोधाभासी और वैवाहिक मूल्यों के खिलाफ होने के कारण अस्वीकार्य है.
यह लिव इन रिलेशन अगर अपराध और पाप दोनों नहीं तो व्याभिचार अवश्य है क्योंकि इसमें सिर्फ एक पक्ष पति या पत्नी की इच्छा होती है और यह इनमें से किसी एक को निश्चित ही पसंद नहीं होता ...(चाहे वह पति के द्वारा लिव इन पार्टनर हो या पत्नी के द्वारा) .किसी पत्नी के लिए यह बहुत ही पीड़ादायक हो जाता है क्योंकि अधिकांशतः वे आश्रित होती हैं.यह दो व्यक्तियों की निजता का संकीर्ण दायरा नहीं बल्कि दो परिवारों उनके सम्बन्धियों तक का विस्तृत दायरा होता है...और हमारी भारतीय संस्कृति me and my family का संकीर्ण फलसफा नहीं है.एक दाम्पत्य के टूटने की गूंज दो परिवारों के कान भेद देती है....इसके बिखरे कांच कई की आत्मा घायल कर देते हैं जिसमें मुख्यतः माता- पिता होते हैं.लिव इन रिलेशन में पति पत्नी की आपसी सहमति हो ही नहीं सकती क्योंकि पत्नी अपने पति के प्यार को किसी के साथ बाँट नहीं सकती.
और कैसा बदलता आर्थिक ,सामाजिक परिवेश !!!!!!!!!!इसे इस प्रकार के क़ानून का चोला पहना कर हम ही तो बदल रहे हैं ...आर्थिक संतुलन के लिहाज़ से दो को साथ रखना बेहतर है या तीन यह तो अर्थशास्त्र का अ ना जानने वाला भी बखूबी समझ सकता है.आर्थिक तकाज़ा ' हम दो,हमारे दो' का है...नैतिक तकाज़ा 'प्रेम गली अति सांकरी जामें दो ना समाय' का और सामाजिक तकाज़ा 'एक म्यान में दो तलवारें कभी नहीं रह सकतीं का है.यह सिर्फ दैहिक आकर्षण का मामला है...लिव इन रिलेशन और उससे जुड़े क़ानून की कभी ना ज़रुरत थी और ना रहेगी...पहले ऐसे सम्बन्धों को हवा दो फिर उनके संरक्षण के क़ानून बनाओ ऐसा मकड़ जाल ही क्यों बनाना !!!
“It’s better to have a live-in relationship rather then having a divorced life!”
यह विश्व के अन्य किसी भी देश के लिए हो सकता है पर भारत देश में कभी स्वीकार्य नहीं हो सकता.और हाँ, जो देश ऐसे सम्बन्धों को मान्यता देते हैं उनके यहाँ भारत वर्ष के सस्कारों जैसी मूल्यों की जड़ें गहराई से समाई नहीं होगी .
ये सही कहा गया है “Happiness in marriage is not so much FINDING the right person as BEING the right person.”
आज गाँव से कई युवक शिक्षा ,रोजगार आदि के लिए शहर की तरफ पलायन कर जाते हैं...आर्थिक रूप से कमजोर मज़दूर वर्ग अपनी पत्नी को शहर नहीं ले जा पाते ...ऐसे में कब उनकी रिक्तता लिव इन पार्टनर से भरने लगती है उन्हें आभास नहीं हो पाता पर ऐसे में परेशानी तीनों को उठानी पड़ती है.कई स्त्री-पुरुष आदतन जीवन मूल्यों के अभाव में असंयमी बन ऐसे सम्बन्ध बना कर रहने लगते हैं...परन्तु वज़ह कोई भी हो ..... लिव इन रिलेशन में लिव इन पार्टनर को पत्नी की तरह अधिकार या आर्थिक अंश देने वाले क़ानून के बन जाने से नैतिकता का जो अल्पांश भय भी समाज में बचा है वह आर्थिक सुरक्षा के संरक्षण के तले दम तोड़ देगा...पारिवारिक तनाव बढ़ जाएंगे ..सामाजिक विघटन को रोकना मुश्किल होता जाएगा और इस विषय पर सिर्फ क़ानून की भूल-भुलैया या विरोधाभासी प्रावधान उभर कर एक के बाद एक सामने आते रहेंगे.
मेरी प्रत्येक दम्पति से गुज़ारिश है कि इतिहास से सबक ले और ऐसे किसी भी लिव इन रिलेशन को खारिज़ करे , .....रुक्मिणी का दर्द किसी की लेखनी का हिस्सा भले ना बना हो पर आज की विवाहिता अपने पति के जीवन में किसी अन्य की उपस्थिति की कल्पना मात्र से सिहर जाती है.उसे अपने पति पर इस कदर भरोसा होता है....
हम दो मस्त पंछी ..
विचरें स्वच्छ नीलाकाश में

जब भी पड़ें कमजोर मेरी पाँखें
तुम्हारे मज़बूत डैने दें मुझे सहारा
कितनी आश्वस्त हो जाउंगी मैं...
और फिर
कितना आसान
कितना सरल
हो जाएगा
समेटना हम दोनों को










अपने हिस्से का आसमान.

"दुनिया बर्थडे केक की तरह है"

"All the world is birthday cake,so take a piece but not too much."

"दुनिया बर्थडे केक की तरह है,अपना हिस्सा लें लेकिन बड़ा हिस्सा छोड़ दें."

-Gorge Harison
मेरे प्रिय ब्लॉगर साथियों,
आप सब को मेरा बहुत ही प्यार भरा नमस्कार
जॉर्ज हैरिसन की ये ख़ूबसूरत पंक्ति मैं आज अपने बर्थडे पर आपको उपहार के रूप में दे रही हूँ.आप को कुछ प्यारी कविताएँ भी उपहार दूंगी...आप अवश्य आश्चर्य कर रहे होंगे जन्म दिवस पर उपहार लेने की परम्परा है पर यमुना तो देने की बात कर रही है.दोस्तों ,वह इसलिए कि ईश्वर ने हमें पृथ्वी पर इसीलिये भेजा है कि हम बस अपना हिस्सा लें और उस हिस्से का सर्वोत्तम उपयोग कर ईश्वर प्रदत्त उपहार को सार्थक कर दें.
सर्वप्रथम आपको 'happy birthday to you  गीत के विषय में कुछ जानकारी दे दूँ.
1998 की गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स के अनुसार," happy b'day to you'जन्म दिन पर गाया जाने वाला सबसे प्रचलित गीत है.यह गीत अब तक 18 भाषाओं में अनुदित हो चुका है.इस गीत के धुन का आधार 'good mornig to all 'गीत है.जिसे 1893  में रचा और संगीतबद्ध किया था अमेरिकी बहनों -पेटी हिल और मिल्ड्रेड हिल ने.ये दोनों बहनें नर्सरी स्कूल की शिक्षिका थीं.पहली पंक्ति शिक्षिका गाती थी बच्चे दूसरी पंक्ति गुनगुनाते थे -जिसके अंत में बच्चे 'टीचर'शब्द का सम्बोधन करते थे.
इसी गीत के आधार पर हिल बहनों ने हैप्पी b'day  गीत लिखा यह H.Kolman  द्वारा सम्पादित गीतों की पुस्तक में मार्च ,1924 में प्रकाशित हुआ था.उन्ही दिनों रेडियो और फिल्मों के आ जाने से यह गीत बहुत जल्द लोकप्रिय और प्रचारित हो गाया यह पूरा गीत इस प्रकार है.....
happy b'day to u
happy b'day to u (उसका नाम जिसका जन्मदिन है)
may God bless you ,may God bless you God bless you (उसका नाम जिसका जन्मदिन है)
from all friends and new
may goodluck go with you
and happiness too.....

जब यह गीत विश्व भर के रेडियो और टेलीविजन पर बजने लगा तो तीसरी बहन जेसिका हिल ने कॉपीराइट का मुकदमा दायर कर दिया ताकि इस गीत के प्रयोग पर रचयिता बहनों को रॉयल्टी मिलने लगे .इसके लिए शिकागो स्थित संगीत कंपनी klaton F. Sami कंपनी ने जेसिका हिल की ओर से इस गीत का संगीतबद्ध रिकॉर्ड प्रकाशित किया और 1935  में इस गीत का कॉपीराइट दर्ज़ कराया.
(यह जानकारी मुझे मेरे प्रिय अखबार 'दैनिक जागरण'के द्वारा 12 नवम्बर 2010को मिली थी जिसे मैंने डायरी में नोट कर लिया था.)
दोस्तों ,मैं प्रत्येक विशेष दिवस को मनाये जाने की पूरी पक्षधर हूँ ऐसा मैंने कई ब्लॉग में कहा है.यूँ तो हम प्रत्येक दिन को पूरे मनोयोग से जीते हैं पर जन्म दिवस वह दिन होता है जब हमारे साथ हमारे प्रिय जन भी उस विशेष दिन को हमारी खुशी से जुड़ कर जीते हैं जो हमें अपने होने का अर्थ समझा देता है कि हम सिर्फ स्वयं के लिए ही नहीं औरों के लिए भी महत्त्वपूर्ण हैं.मेरे जन्म दिवस पर मेरी आदरणीया माताजी और दिवंगत पिताजी को चौथी लड़की संतान के रूप में पाकर खुशी हुई होगी ये पूरे दावे के साथ मैं नहीं कह सकती पर इतना अवश्य है कि उन्होंने मुझे उस परम्परावादी पारिवारिक परिवेश में भी सम्पूर्णता से बढ़ने का पूरा अवसर दिया..शिक्षा में कोई कमी ना की ...सच कहूं तो सीमित साधनों से सर्वोत्तम संस्कार और मूल्य देने में कोई कसर ना छोड़ी मैं इसके लिए ईश्वर के और उनके प्रति नतमस्तक रहती हूँ.हाँ,दो शख्श जो मेरे जन्म दिवस पर बहुत खुश होते हैं वे हैं मेरे पतिदेव और मेरी प्यारी बिटिया ...जो मुझे अपने ज़िंदगी में बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं.
आज मैं तीन कविताएँ आप को उपहार स्वरुप दे रही हूँ ....
1)
सबसे बड़ी खुशी
घर लौट कर तुम्हारा
रोज़ यह पूछना
क्या किया सारा दिन ?????????????
प्रेरित करता है मुझे
करूँ कुछ ऐसा जो ...हो...
तुम्हारी खुशी से जुड़ा
दे तुम्हे संतुष्टि
और फिर ........
जुट जाती हूँ मैं
स्वयं को ही तराशने में
क्योंकि........
एक नहीं ,
अनगिनत बार कहा है तुमने
यमुना !!!!!
तुम ही मेरी सबसे बड़ी खुशी हो.
है रोशन ........
तुम्हारी खुशी के नूर से
मेरा घर-संसार .

2)
तुमसे शुरू...तुमसे ख़त्म
बिन मांगे ही
दिया तुमने.........
आसमाँ का पूर्ण चाँद
बसंत का भरपूर उन्माद
वर्षा की तृप्त फुहार
शीतल सहृदय बयार
ज़मीँ की हर बहार
मेरे जीवन में दाखिल हो कर
बता दिया तुमने
ज़िंदगी तुमसे शुरू होकर
तुम्ही पर ख़त्म हो जाती है.....
3)
छोटी सी चिड़िया
हम दो मस्त पंछी
विचरते स्वच्छ खुले नीलाकाश में.
जब भी पड़ती हैं
कमजोर
मेरी पाँखें
तुम्हारे मज़बूत डैने
देते हैं पनाह
मैं छोटी सी चिड़िया
कितनी आश्वस्त हो जाती हूँ
और फिर...............

कितना सहज
.......
कितना आसान
हो जाता है
समेटना अपने हिस्से का आकाश.
happy b'day to me ; happy b'day to u  all