face बुक पर लोग इन करते ही एक पोस्ट दिखाई दिया
अति सर्वत्र वर्जयेत. तीन
अमूल्य शब्द पुरातन,चिरकालिक पर वर्त्तमान परिदृश्य में पूर्णतः
अस्वीकार्य.....आप सब मेरे इस कथन से असहमत हैं तो एक पल के लिए टी.वी on
करिए और सुनिए लोग बोल रहे हैं ,कितना,क्या,कहाँ,किससे और क्यों स्वयं
उन्हें ही नहीं पता है.नेतागण कुछ भी बयान दे रहे हैं.....राज ठाकरे जी
बिहार राज्य के बाशिंदों को
(infiltrators in mumbai )कह कर महाराष्ट्र से भगाने की धमकी देते हैं.
माँ,माटी,मानुष(
3M) के आधार को सर्वस्व मानने वाली ममता जी UPA सरकार को
money,muscles, mafia (
3M) के आधार पर चलने की टिप्पणी करती हैं.
हालांकि इसी दल को इनका समर्थन भी मिला हुआ था.गुजरात
परिवर्तन पार्टी के मुखिया केशुभाई पटेल जी नरेन्द्र मोदी जी को निर्मल
बाबा की उपाधि देते हैं और कहते हैं कि उनके चारों तरफ 420 हैं और वे खुद
840 हैं,उन्हें झूठ बोलने और जनता को मूर्ख बनाने की आदत पड़ गयी है.मूर्ख
बनाने की प्रतियोगिता हो तो मोदी चैम्पियन होंगे." दिग्विजय जी ने मोदी
जी के लिए बयान दे दिया,"there are no similarities between swami
vivekanand and modee and it would have been better had his yatra been
calles hitler yatra " मोदी जी ने सोनिया जी के द्वारा अपव्यय के कुछ
साक्ष्य जुटा कर प्रचार करना शुरू कर दिया अर्थात हर जगह अति---------
बयानबाजी की अति ,सुविचारों की,कुविचारों की,अभाव की,प्रचुरता
की,भ्रष्टाचार की,अपराध की,समाज का अति पतन और
मेरे इस ब्लॉग में भी अति की अतिव्यन्जना.
माननीय प्रधानमंत्रीजी पहले इतने खामोश रहे कि उनकी खामोशी उन्हें हज़ार
ज़वाब से भली लगी और फिर जब मुख खोला तो इतना कहा (पैसे पेड़ पर नहीं
उगते)कि यह अति वर्त्तमान सरकार के अस्तित्व पर ही भारी पड़ने लगा.वे भूल
गए ............
अति का भला न बोलना,अति की भली ना चुप
अति का भला न बरसना,अति की भली न धूप
अपने कार्यकाल के मुहाने से कुछ ही कदम पीछे खड़ी सरकार ने आर्थिक
सुधारों के नाम पर जो अति वृष्टि की है उसने मुझे बचपन की पढी एक लघु कथा
याद दिला दी, जिसमें कौवे के मुख से रोटी गिराने के लिए चालाक लोमड़ी हर
दांव-पेंच खेलती है और अंत में उसकी तारीफ़ कर कहती है '"तुम गाना बहुत
अच्छा गाते हो."कौवा अति उत्साही होकर गाने के लिए मुख खोलता है और रोटी
नीचे गिर जाती है,लोमड़ी का मकसद पूरा हो गया.हाँ,देश की राजनीतिक घटना
क्रम में थोडा विपरीत हुआ .
देश की आम जनता,विपक्ष,विदेशी अखबारों ने
मनमोहन जी को ऐसे-ऐसे विशेषणों से नवाज़ना शुरू किया कि वे अपनी छवि के
प्रति अति प्रतिरक्षात्मक हो गए .हालांकि वे इस बात से पूर्णतः वाकिफ
हैं कि इन सुधारों के तात्कालिक प्रभाव नहीं दिखेंगे पर यह लालसा भी है कि
2014 की शुरुआत में इन्ही सुधारों के कुछ शुरुआती धुंधले रंग जनता को
दिखाई देने लग जाएंगे वह और सकारात्मक प्रभाव के लिए आशान्वित हो जाएगी और
पिछली सारी पीड़ा को भूल कर पुनः इसी दल को सत्ता में लाने के लिए कमर कस
लेगी .अगर ऐसा हुआ तो तीसरे मोर्चे की संभावना एक मृगमरीचिका ही साबित
होगी.
यहाँ मैं आपको अपने सफ़ेद अण्डों को ढो कर ले जाते कतारबद्ध
काले-काले चींटों का दृश्य याद दिला दूँ.अगर एक भी चींटा गुड के किसी अन्य
धेले की तरफ मुड गया तो पीछे के सारे चींटे उसी का अनुसरण कर मध्य से ही
कतार तोड़ देते हैं.इसलिए बहुत संभव है कि आज न नुकुर करने वाले बहुत से दल
पुनः कांग्रेस के साथ गठबंधन की राजनीति करेंगे.इस समीकरण पर आम जनता सिर्फ
गुनगुना कर रह जाएगी "ना-ना करते प्यार तुम्ही से ...."
अन्ना जी का कहना है,"राजनीति में गन्दगी है."केजरीवाल के साथ रहे
योगेन्द्र यादव जी कहते हैं "राजनीति आज का युगधर्म है,इससे पृथक नहीं रहा
जा सकता ",आम जनता का कहना है राजनीति एक नशा है,सत्ता का मद व्यक्ति को
विवेकहीन कर देता है .
इसके(राजनीति)
लिए विरोधाभासी गुणों का होना भी शायद ज़रूरी है जैसे एक ईमानदार चोर,एक truthful liar इस तरह की बातों को दूर करने के लिए मैं अपने ही ब्लॉग 'अजी नाम-वाम में क्या रखा है' की पंक्तियाँ दोहरा रही हूँ.
जब राजतंत्र ही नहीं तो राजनीति शब्द का प्रयोग क्यों ? जो शब्द राज करने की दुर्भावना से ग्रसित है.शाषण व्यवस्था जनतंत्र,प्रजातंत्र,लोकतंत्र है तो जननीति,लोकनीति,प्रजानीति कहिये जो जन सेवा का सदभाव ले आये.
प्रजातंत्र की परिभाषा में भी कुछ परिवर्तन होने चाहिए.जिसके
अनुसार"प्रजातंत्र आधारभूत नैतिक मूल्यों की नींव पर खड़ा जनता के
लिए,जनता के द्वारा,जनता का मजबूत शाषण है."एक नेता
सर्वप्रथम जनसेवक है.उसे न केवल people based बल्कि people +value based
प्रजातंत्र को अपनाना होगा.तभी वह ऐसे निर्णय ले सकेगा जो समग्र के हित
में हों. .
एक मूल्य परक राष्ट्र की कल्पना को मूर्त रूप देने के लिए प्रत्येक
व्यक्ति को परिवर्तित नहीं अपितु रूपांतरित होने की आवश्यकता है.परिवर्तन
तो अस्थाई है जबकि रूपांतरण स्थाई है.जैसा स्वामी मित्रानंद कहते हैं,
"If
Indians transform to become physically fit,emotionally
strong,intellectually refined,culturally rooted,actively patriotic and
spiritually uplifted with the vision of oneness,India will be
revitalised.
अगर किसी भी राजनीतिक
दल ने people+value based democracy को
ध्यान में रखकर अपने कार्य काल को पूरा किया है तो उन्हें सरकारी खर्च पर
विज्ञापन द्वारा प्रचार की ज़रूरत ही कहाँ है?क्या कस्तूरी के महक को साबित
करने के लिए मृग कसम खाता है ?अरे उसे तो स्वयं भी इस गुण का पता नहीं होता
पर सारा वन उस खुशबू से सुवासित हो जाता है.अच्छे नेतृत्व,अच्छे
कार्य,अच्छे कार्य मूल्य स्वयं साबित होते हैं .उन्हें प्रचार करने की
ज़रूरत नहीं पड़ती.पर दुर्भाग्यवश हमारे नेता स्व हित,स्व हक में इस कदर स्वकेंद्रित हो गए कि भारत निर्माण और जनतंत्र का असली अर्थ ही ओझल होता जा रहा है.आम जनता की तो इतनी ही फ़रियाद है
आर्थिक नीति बना लो,विदेश यात्रा भी कर लो
भले छीन लो सफ़र ऐ.सी के वसूल के सेवा कर
मगर झोली में डालो,दो जून के रोटी की सुविधा
हमारे लिए बेहतर शिक्षा और नौकरी के अवसर.
स्वयं को हर हालात पर पाक-साफ़ बताने वाले ,श्वेत झकाझक खादी पहने और भ्रष्टाचार की कालिख का आरोप ढोते अपने रहनुमाओं को देख कर क्या हम
बार-बार श्वेत अंडे ढोते हुए काले चींटों को याद करें ?जब इन चींटों से
इनके अण्डों को हटाने की कोशिश करो तो ये बेहद आक्रामक हो उठते हैं. विपक्षी दल सत्तासीन दल के कार्यों पर नजर रखे उचित है ,लोकतंत्र का तकाज़ा भी है कि वह सरकार को तानाशाह बनने से रोके.पर क्या
पिछले
9 वर्षों से विपक्ष की भूमिका निभा रही भाजपा का साथ ही यह कर्त्तव्य
नहीं कि ऐसे हालात से उबरने के लिए यथोचित रणनीति भी सुझाए ?
.
भाजपा ने अपनी छवि सिर्फ विरोध के लिए विरोध करने वाले राजनीतिक दल की बना ली है .
रियायती
दर पर रसोई गैस की उपलब्धता सीमित करने के फैसले का विरोध करने वाले राज्य
सरकार तथा विपक्षी दलों में से किसी ने भी भारत देश में सौर उर्जा की प्रचूरता को देखते हुए इसे इंधन के विकल्प के रूप में विकसित करने की दूरदर्शिता पर भी क्यों नहीं ध्यान दिया?नहीं,
इस दूरगामी सोच से ज्यादा आसान है विरोधी शोर का ऐलान...और एक बात.....
क्या डीजल पेट्रोल की बढ़ती कीमत के लिए एक अंश भी हम जनता ज़िम्मेदार नहीं
हैं?कम दूरी को भी तय करने के लिए हम पैदल नहीं बल्कि वाहन का प्रयोग पसंद
करते हैं,एक ही परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने अलग-अलग वाहन रखता है,एक ही
कार्यस्थल पर जाने के लिए कार पुलिंग या सार्वजनिक वाहन को वरीयता ना देकर
हम अपने-अपने निजी वाहन का प्रयोग करते हैं.क्या वर्त्तमान में गाड़ियों की
संख्या नित्य बढ़ती नहीं जा रही?जन्म दिवस हो तो किशोर आयु की संतान को
भी गाडी उपहार दे दो....प्रजातंत्र की प्रजा को भी देश की इस दयनीय स्थिति
जिम्मेदारी कुछ अंशों में लेनी होगी.सिर्फ रैली में भीडतंत्र का हिस्सा
बनने से काम नहीं चलेगा.कितने युवाओं को तो यह भी पता नहीं होता की जिस
रैली का वे हिस्सा बने हैं उसका मकसद क्या है?
आरोप-प्रत्यारोप की यह त्वरित प्रवृति एक बेसब्र पीढी को जन्म दे
रही है इस फास्ट प्रतिक्रियात्मक बयानबाजी के मलबे में देश के विकास की
सोच कहीं ज़मींदोज़ हो गई है.व्यक्तिगत तौर पर भावनाओं में आये उतार-चढाव को सार्वजनिक जीवन में संयमित करने में हमारे रहनुमा ही असफल हो रहे हैं तो फिर आम जनता क्या करे ? इसी समस्या से जुड़ा एक अहम् पहलू है भ्रष्टाचार जो मानो एक विशाल समंदर सा हो गया है,
जिसे
तैरना आता है वह बीच मझधार में अठखेलियाँ करे,जिसे गहराई में उतरने से भय
लगता है वह किनारे पर खडा होकर आती-जाती लहरों से ही खेल कर संतुष्टि कर
ले और जिसे तैरना भी नहीं आता,गहराई से भी डर लगता है वह तट पर खडा लहरों
की उतार-चढ़ाव को ही कोसता रहे.और देश की आम जनता इन सभी वर्गों के क्रिया कलाप की साक्षी भर बनी रहे.
किसी भी दल का कोई सशक्त चेहरा नज़र नहीं आता,आम जनता मानो एक मॉल में खड़ी
है जहां एक ही उत्पाद के कई ब्रांड उसे दिग्भ्रमित कर रहे हैं .उसके अपने
पसंदीदा ब्रांड का तो उत्पादन ही बंद हो गया है.मजबूरन उसे इन्ही में से
एक का चयन करना है ताकि बस किसी तरह काम चलता रहे.
आम जनता अपने सभी रहनुमाओं से हुंकार भर पूछती है कि उनके पास इस
भ्रष्टाचार के दाग को देश के लोकतंत्र के परिवेश से साफ़ करने के लिए किस
डिटर्जेंट की रणनीति है ? उसकी प्रमाणिकता क्या है ? वह रणनीति कितनी कारगर
साबित होगी ?
'मेरे कपडे उसके कपडे से अधिक सफ़ेद हैं'या 'उसके कपडे
मेरे कपड़ों से ज्यादा काले हैं' का बेसुरा विज्ञापन बंद करें और अपने
विवेक से देश के समग्र विकास की रूप रेखा जनता के समक्ष प्रस्तुत करें.यह
स्पष्टतः दृष्टिगोचर है कि मुद्दा देश के विकास का नहीं बल्कि कुर्सी पर
काबिज़ होने का ज्यादा है अगर देश की फ़िक्र है तो मध्यावधि चुनाव जैसे
अपव्यय पूर्ण कदम का इतनी बेसब्री से इंतज़ार क्यों है ? इसका अर्थ तो यही
है कि बस सब मौके की प्रतीक्षा में हैं.जिसके भाग्य से छींका गिर जाए.एक
अफ्रीकन कहावत है"Until lions have their historians ,tales of the hunt
will always glorify the hunter. "सुशाषण देने का दावा करने वाले नीतीश
जी बिहार को विशेष राज्य का दर्ज़ा दिलाने की मांग को लेकर अधिकार
यात्रा पर निकलते हैं तो छात्र संगठनों के साथ स्थानीय समस्या से जूझ रहे
लोगों का भी विरोध उन्हें झेलना पड़ता है.फिर सुधार किसके लिए और कहाँ
किये गए ? घटक दल अत्यधिक स्वकेंद्रित न हों . नीतीश जी का कहना है जो
बिहार को विशेष राज्य का दर्ज़ा देगा उसे समर्थन देंगे.नेतागण भूल रहे हैं कि
भारत राज्यों का समूह है जिसका विकास 'अपनी-अपनी ढपली;अपना-अपना राग' के तर्ज़ पर नहीं बल्कि 'मिले सुर मेरा तुम्हारा'के तर्ज़ पर ही संभव है.आम जनता को पहले इस्तेमाल करो फिर विश्वास करो के अनुसार प्रयोगवादी और यथार्थवादी होना पडेगा .उसे
एक मजबूत लोकतंत्र चाहिए.अति की व्यंजना को
लांघता,घिसटता,सिसकता,कराहता,चीखता कमज़ोर धराशाई लोकतंत्र से वह बिफर गई
है.अति की अवधारणा से प्रत्येक नेता बाहर निकले और अखंड भारत के नागरिक
होने का सबूत दे.
2014 के नए समीकरण,तीसरे मोर्चे की मृगमरीचिका सब एक भ्रम है. भाजपा
ने Great coal robbery नाम की पुस्तिका को घर-घर बांटने का फैसला कर
जनता को आकाश (2G),पाताल ( coal),जमीन(राष्ट्रमंडल खेल)में हुए लूट की तरफ
ध्यान आकर्षित करने का फैसला किया है.वहीँ पार्टी लाइन से अलग भाजपा के एक वरिष्ठ नेता बी.सी.खंडूरी जी
ने मनमोहनजी को एक अच्छा अर्थशास्त्री बताते हुए कहा,"पी.एम्.अत्यधिक दबाव
में हैं...समस्या का तुरत -फुरत हल निकालने की बजाए हमें भ्रष्ट व्यवस्था
में बदलाव के लिए उसकी जड़ों पर प्रहार करना होगा."और फिर अगले ही दिन अपने
बयान से पलट भी गए.सपा ने सरकार को यह कह कर बचा लिया कि वह इस समय
किसी साम्प्रदायिक दल को सत्ता में आने से रोकना चाहती है पर विपक्षी दलों
द्वारा बुलाए गए बंद में अपना सक्रिय सहयोग भी दिया . डीजल के मूल्य
वृद्धि,रसोई गैस के सब्सिडी वाले सिलिंडर सीमित करने और रीटेल में भारत
बंद का आयोजन कर भाजपा ने सरकार को नकारा भी बताया और फिर यह भी कह दिया कि फिलहाल उसकी दिलचस्पी सरकार गिराने में नहीं है.वे यह नहीं बता पा रहे हैं कि अगर सब कुछ गलत है तो इसे सही करने की रणनीति क्या होनी चाहिए.यानि अगर केंद्र सरकार नीतिगत मामलों में परिपक्व नहीं है तो भाजपा भी इस दृष्टिकोण से कमज़ोर ही साबित हो रही है क्योंकि समस्या की diagnosis करने के बाद remedy उसके पास है नहीं.अन्ना जी के
दिग्भ्रमित आन्दोलन और केजरीवाल से नीतिगत अलगाव ने संशय की स्थिति ला
दी है. इधर ममता दी की रैली के प्रभाव ने एक नया रंग दिखाना शुरू कर दिया
है .यानी प्रत्येक जगह विरोधाभास ...एक छद्म राजनीति..... जब तक केंद्र में
थे अपने राज्य के लिए लड़ते रहे अब जब बाहर आ गए तो देश की अखण्डता याद आ
रही,पहले खूब क्रोध और तल्ख़ अंदाज़ दिखाए,अब पूछ रहे हैं केंद्र सरकार इतना
गुस्सा क्यों करती है. (अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है) ? अर्थात
वही मुहावरा हवा का रुख क्या होगा कहना मुश्किल.....ऊँट किस करवट बैठेगा ?? unpredictable ....
बस ,कुछ नए similes ( as unpredictable as politicians ,as uncertain as politics )अंग्रेज़ी व्याकरण में
जोर-शोर से गति लेने को तैयार है.ऐसे अनिश्चित परिस्थितियों में नेता
गण वाकयुद्ध करते हैं; फिर उपयुक्त समय आने पर एक ही टेबल पर जोड़ तोड़ की
राजनीति खेलते हैं.आरोप-प्रत्यारोप का अंतहीन बेसुरा राग अलापना छोड़ कर
गठजोड़ के मधुर तान सुनाते हैं और आम जनता हर बार स्वयं को ठगा सा महसूस
करती है .नया चुनाव,नई सरकार और आम जनता बस वहीँ की वहीँ खड़ी रह जाती
है.सरकार और सुधार का अवनी-अम्बर मिलन बस क्षितिज सा ही रह जाता है .
प्रमुख समस्या यह है कि जब कोई दल स्पष्ट बहुमत से जीत हासिल करता नहीं
दिखता तब क्षेत्रीय दल उभर कर सामने आते हैं,गठबंधन की राजनीति तैयार होती
है,मोल-भाव के खेल जमते हैं और भ्रष्टाचार के विषैले बीज पनपते हैं.ज़रूरत
है राजनीतिक दलों को सशक्त होकर ,मजबूत असरकारी विकास योजनाओं के साथ
पाक-साफ़ छवि ले कर उभरने की, जो आम जनता पर विश्वास कायम रख सके या फिर
गठबंधन की राजनीति के नियम स्पष्ट हों,दलों के साझा निर्णय पहले से ही
स्पष्ट हों.किसी भी मुद्दे पर अचानक समर्थन वापिस लेने जैसे कदम उठाने की
नौबत ही क्यों आये.?एक और मुख्य समस्या यह है कि शिक्षित वर्ग वोटाधिकार का
प्रयोग नहीं करता. गरीब अशिक्षित जनता मामूली तोहफों के लालच में अपना
मताधिकार बेच देती है. .2009 के आम चुनाव में 28 करोड़ से ज्यादा
मतदाताओं ने अपने अधिकार का प्रयोग ही नहीं किया था,
ऐसे सुप्त
लोकतंत्र में फिर कैसे शिकवे ???कैसी शिकायत ??? प्रजातंत्र में प्रभुत्व
स्थापित रखने की राजशाही सोच इसी प्रवृति की भयावह उपज है.
इस देश के रहनुमाओं ने क्या-क्या नज़ारे दिखा दिए
मुल्क जिसका हक़दार था और जिन मंज़र की थी ज़रूरत
उन्ही ख्वाबों को तो हकीकत की ज़मीं से महरूम कर गए
अवाम को किस कदर पहले से भी ज्यादा मजबूर कर गए !
मुझे वह सुप्रसिद्ध पंक्ति याद आती है
"सिंहासन खाली करो कि जनता आती है"सभी व्यस्क भारतीय नागरिकों से अपील है
"सजग हों,विवेकपूर्ण हों'और अपने वोटाधिकार का प्रयोग करें,इससे बड़ा जन आन्दोलन, जन क्रान्ति और कोई नहीं है."
राजनीति मेरा पसंदीदा विषय नहीं है पर एक भारतीय नागरिक होने के नाते यह मेरा कर्त्तव्य है
कि देश के हालात को समझ कर अपने वोटाधिकार का विवेकपूर्ण प्रयोग करूँ.
(ब्लॉग में लिखे कोई भी शब्द अगर आप में से किसी को नागवार गुज़रें तो
मुझे अपने द्वारा दी गई प्रतिक्रिया में ज़रूर बताएँ.मैं किसी विशेष दल की
समर्थक नहीं हूँ बस एक सशक्त,विवेकी नेतृत्व वाले दल की तलाश है और उसी
तलाश में इस ब्लॉग के माध्यम से आप सभी को शामिल करना मेरा उद्देश्य है).
2014 के लिए अब भी वक्त है...