Tuesday, December 18, 2012

SILENT CALL

Hello frends!
Today day I am writing 4 the parents having SINGLE CHILD .We parents r very possessive & protective for our child;we pamper them a lot & sometimes we are unaware of the fact that the unique sense of affection is strangling the talent of our child silently.
last night as I had read A short story so dreamt the same about  my daughter(who is away 4rom the home).she was in a queue.all the girls taking a lighted candle in their hands were moving towards an altar.Everyone's candle was lighted up except the one in my daughter's hand.I asked the reason.she said"maa,I light it up everytime but your tears douse the flame;I tried to rekindle it but..! it will not lit until your tears stop flowing."
my eyes opened.....I was shaken...my throat was dry....after few minutes I realised it was mere a dream but I was compelled to give a thought to my daughter's condition ONCE AGAIN.she has her own
ambition,dream,talent..... I have no right to strangle these only for the sake of my desire to see her very close to me
here is one poem SILENT CALL (मूक पुकार) for the parents having experience similar to me.


है सम्पूर्णता से बढ़ने की चाह,मुझे बोनसाई मत बनाओ
न करो इतना प्रयोग मुझपर,विरुद्ध प्रकृति के मत जाओ
......
मेरी जड़ों को क्यूँ नहीं  माटी के गहन तम में समाने देती
सबसे ऊँची शाखा बन
क्यूँ न उजाले में नभ के आने देती
......
माँ  उंचाई नभ की मुझे तुम,आज भरपूर माप लेने दो
सीमित न करो गमले में शाखाओं को विस्तार पाने दो
.....
मैं भी विस्तृत और घना बन शीतल साया देना चाहती हूँ
नन्हे बीज से प्रस्फुटित हो,विशाल काया लेना चाहती हूँ
.....
कुदरत ने भेजा धरा पर मुझको संपूर्ण विस्तार करने को
और अपनी ही प्रकृति संग जग के कण-कण से जुड़ने को
.....
                                      बुद्धिजीवी,प्रयोगधर्मी माँ,करबद्ध समक्ष मैं हूँ आज खडी
                                      पूछ रही  कुदरती नियम के सदैव विपक्ष में क्यों तू अड़ी?


                                      बोनसाई बन सर्वस्व देने की कितनी भी कोशिश करुँगी
                                     माँ,फिर भी बोलो कैसे साया मैं विशाल तरु सा दे सकुंगी


                                     वजूद मेरा ज़रूर रहेगा पर यह स्वाभाविकता हट जायेगी
                                    विस्तार होगा जहाँ संकीर्ण मेरी वास्तविकता मिट जायेगी


बोनसाई बनाकर मुझे बता दो तुम क्या हासिल कर पाओगी
विस्तार मेरा देख पाने को आज नहीं तो कल तरस जाओगी
...............

Monday, November 26, 2012

सिर्फ एक ही बुलबुल काफी है

वह अर्थशास्त्र(economics) की छात्रा थी पर उसे साहित्य में भी गहरी रूचि थी.लक्ष्य तो हिन्दी साहित्य विषय में मास्टर डिग्री लेकर फिर PHD  करना था पर अभिभावक ने राह दिखाते हुए कहा अर्थशास्त्र में स्कोप ही स्कोप है,बस उसे इसी डिग्री को चुनना पडा.अब तो हर कक्षा बस अंतर्द्वंद की नई कहानी होती थी.'जहां ना जाए रवि वहां जाए कवि' की कहावत अपने चरमोत्कर्ष पर प्रभावकारी होती .अर्थशास्त्र की कक्षा में व्याख्यान (lecture) गरीबी की समस्या के कारण ,निदान और सरकारी प्रयास पर होते तो उसे दिनकर जी की 'श्वानों को मिलता दूध वस्त्र भूखे बच्चे अकुलाते हैं ' पंक्तियाँ ज्यादा करीब लगती ,समस्त आंकड़े कहीं पीछे छूट जाते .......उसके लिए मांग और पूर्ति का नियम (law of demand and supply)वस्तु और सेवाओं के उत्पादों से ज्यादा तालुकात इस बात पर रखता कि चाँद पर सितारों से अधिक संख्या में कविताएँ क्यों लिखी गई क्योंकि चाँद की पूर्ति सितारों से कम है अतः चाँद की मांग साहित्य में सितारों से ज्यादा है........व्याख्यान हरित क्रान्ति(green revolution) पर चल रहा होता पर उसके ज़ेहन में बंकिम चन्द्र चटर्जी की 'सुजला सुफला शस्य श्यामला' की स्वर लहरी गूंजती थी....कुल मिलकर बेहद अंतर्द्वंद होता .साहित्य की सारी संवेदनशीलता को स्वयं में समाये दिल और अर्थशास्त्र के आंकड़े याद करता उसका दिमाग ,उन दिनों छात्रा को emotions और intellect के दो नावों पर सवार रखता था .
ऐसे ही एक कक्षा में जनवृधि -कारण और निदान(population growth ) के व्याख्यान पर one child norms of china को निदान के एक बिंदु के रूप में रखा गया.इस बार छात्रा ने बेहद संजीदगी से इसे दिल और दिमाग दोनों पर लिया.अब यहाँ कोई कशमकश नहीं.....अभाव का सामना ना करने के लिए इस दिशा में वह एक छोटा कदम तो भविष्य में उठा ही सकती है.यह थी दिमाग की आवाज़ और दिल ने कहा वन में भी एक शेर का ही महत्व है.नभ में एक आफताब दिन रोशन करता है तो माहताब रात रोशन करता है.बस ठान लिया ;मान लिया >one child norms of china के निदान को.
उस दिन का संजोया हुआ भविष्य कुछ ही वर्षों में वर्त्तमान भी बना .अब छात्रा एक प्यारी सी पुत्री की माँ बन चुकी थी.उसने घर में सभी सदस्यों को अपना फैसला भी सुना दिया.... बस यही पहली और आख़िरी संतान है.एक परम्परावादी परिवार ने उसके इस कदम को स्वीकारना ही नहीं चाहा.हर दिन एक नया प्रश्न-....वंश कैसे आगे बढेगा??? छात्रा के रूप से एक परिपक्व स्त्री के रूप में परिवर्तित वह ज़वाब देती,"भारत के शक्तिशाली वंश गांधी परिवार का वंश आज भी कैसे चल रहा है? तीर की तरह अन्य प्रश्न उसे बेध जाता ,"बुढापे में देखभाल कौन करेगा ? तीर की चोट खा कर भी ना हारने वाली वह कहती,"अगर वृद्धावस्थामें बेटे ही देखभाल के लिए ज़रूरी हैं तो वृद्धाश्रमों की संख्या में उतरोत्तर बढ़ोतरी क्यों हो रही है? हरिद्वार जैसे तीर्थस्थानों में इतनी वृद्धाएं अकेलेपन को जीने को क्यों अभिशप्त हैं?"पर नए दिन की तो शुरुआत ही नए प्रश्न से होती-"बेटे नहीं तो सुख नहीं,एक आँख भी आँख होती है क्या?"उसके ज़वाब बहुत ही सधे होते,"क्या सुख का सम्बन्ध संतानों की संख्या से है ? प्रत्येक इंसान को अपनी ज़िंदगी तो स्वयं ही जीनी होती है .कभी लाखों की भीड़ में इंसान तनहा हो जाता है और कभी अकेलेपन में भी कई के मौजूद होने के एहसास से भरा होता है.और फिर इस बात की क्या गारंटी कि एक से ज्यादा बच्चों को ईश्वर अमर कर देगा?उपहार सिनेमा घर के अग्निकांड में एक ही परिवार के दो बच्चे असमय काल कवलित हुए,गीता और संजय चोपड़ा(बहन-भाई) एक साथ ही इस संसार से विदा लिए."
उसका सोचना सही था अर्थशास्त्र विषय की इंटेलेक्चुअल छात्रा के रूप में भी और साहित्य में अभिरुचि रखने वाली संवेदनशील इंसान के रूप में भी.राजतंत्र हो या प्रजातंत्र विषमताएं,असमानताएं तो बनी ही हुई हैं .धनी-निर्धन के बीच की खाई ना राजतंत्र में पटी ना ही प्रजातंत्र में ख़त्म हुई.वंश वृद्धि,क्रियाकर्म में पुत्र के होने का महत्व जैसी झूठी बेबुनियाद दलीलों ने कन्या भ्रूण ह्त्या,जन वृद्धि ,गरीबी जैसे ना जाने कितनी समस्याओं को जन्म दे दिया है.
पर छात्रा से परिपक्व स्त्री के रूप में तब्दील हो चुकी वह मनुष्य स्वभावानुसार आज भी यदा-कदा अंतर्द्वंद में ही जी रही होती है.
अर्थशास्त्र के एक सैद्धांतिक पाठ को व्यवहार में लाकर उसका मस्तिष्क संतुष्ट है क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने में एक नन्हा कदम उसने ज़रूर उठाया .पर दिल तो आज भी साहित्य की संवेदनशीलता से दो चार होता है जब उसकी प्यारी पुत्री पूछती है,"माँ,आपको तो किसी दोस्त की आवश्यकता नहीं होती रही होगी आपके भाई-बहन ही आपके दोस्त बन जाया करते होंगे.माँ,आपकी अल्बम देखूं तो सही;कितनी यादें समेटी हैं आपने अपने भाई बहनों के साथ ? माँ,मैं अपने कई दोस्तों के बीच भी स्वयं को हमेशा अकेला क्यों पाती हूँ?"
माँ समझाती है...............
आबाद गुलिस्तां करने को सिर्फ एक ही बुलबुल काफी है
गुलशन महकाने को  खुशबूदार
बस एक ही गुल काफी है
घने तम को चीरने में रोशनी की बस एक लकीर काफी है
गीतों की स्वर लहरी बिखेरने ज्यों एक ही गुंजन काफी है.
पुत्री संतुष्ट होती है...माँ के लिए तो वही सब कुछ है---एक बुलबुल ,एक महकता गुल,एक गुंजन.वह माँ के सारे प्यार की एकमात्र हकदार....किसी का हस्तक्षेप नहीं उस प्यार में ....??
और फिर उस स्त्री ने पुत्री को एक गूढ़ मंत्र दिया ---"इंसान अकेला आया है;अकेला जाएगा.सफ़र के साथी की तरह लोग मिलते हैं ,अपनी मंजिल आने पर बिछड़ भी जाते हैं....सबकी मंजिल जुदा-जुदा है......कोई किसी का संगी नहीं.....अपनी ज़िंदगी स्वयं ही जीनी होती है.....उम्र भर कोई साथ नहीं निभा पाता....इसलिए अपनी ज़िंदगी की इबारतें अकेले ही लिखनी है."और कुछ मशहूर पंक्तियों से पुत्री के अकेलेपन को तसल्ली भी दी,विश्वास भी और साहस भी दिया........
अकेला चला था,अकेला चलूँगा
सफ़र के सहारों न दो साथ मेरा
सहज मिल सके वह नहीं लक्ष्य मेरा
बहुत दूर है मेरी निशा का सवेरा
अगर थक गए हो तो तुम लौट जाओ
गगन के सितारों न दो साथ मेरा.

आप सबों से कुछ अहम सवाल
पुत्र और पुत्री में फर्क क्यों ?जन्मा बच्चा सिर्फ संतान क्यों नहीं?सुख की गारंटी सिर्फ पुत्र से क्यों ?क्या एक स्वस्थ,सुन्दर ,सुशील संतान के माता-पिता बनने का गर्व इस बात से ऊपर नहीं कि वह पुत्री है या पुत्र ?
चलो एक कदम हम भी बढाएं;ज्ञान सिर्फ सैद्धांतिक ही क्यों ;जीवन के व्यवहारिक पहलू को भी क्यों ना छू जाए!!!!

Friday, October 12, 2012

श्रधांजलि

एक दोपहर जब एक बड़ी कंपनी के कर्मचारी लंच टाइम से वापस लौटे ,तो उन्हें एक मेल मिला ."उसमें लिखा था कि कल उनका एक साथी गुज़र गया जो उनकी तरक्की में बाधक था .श्रधांजलि सभा मीटिंग हॉल में रखी गई है."
पहले तो लोगों को जानकार दुःख हुआ उनका साथी नहीं रहा फिर वो उत्सुकता से सोचने लगे आखिर कौन था वह जो हम सब की तरक्की में बाधा बन रहा था.चलो अब वह नहीं रहा.जैसा कि अक्सर होता है लोग किसी के गुज़र जाने के बाद उसकी बुराइयां भी भूल जाते हैं ,इसलिए सब उसके जाने का अफ़सोस करने लगे.
हॉल में दरी बिछी थी और दीवार से पहले पर्दा लगा था.वहां एक सूचना लगी ,"गुज़रने वाले की तस्वीर परदे के पीछे दीवार पर लगी है.एक-एक कर आप जाएं उसे श्रधान्जली दें और फिर निश्चिंत होकर तरक्की की राह पर कदम बाधाएं क्योंकि अब तरक्की का वह बाधक नहीं रहा.सभी कर्मचारी तो बिलकुल हैरान थे.
वे एक-एक कर परदे के पीछे जाते और जब वे दीवार पर लगी तस्वीर देखते तो अवाक् रह जाते.उनके मुंह से बोल ही न निकलते .
दरअसल दीवार की जगह पर एक दर्पण(mirror )लगा था,जिसके नीचे लिखा था:"दुनिया में केवल एक ही व्यक्ति है जो आपकी तरक्की को रोक सकता है,आपको सीमाओं में बाँध सकता है और वह आप खुद हैं."
हॉल के बाहर बॉस कर्मचारियों का स्वागत कर कह रहा था,"अपने नकारात्मक पहलू (negative aspect) को श्रधांजलि दे चुके मेरे नए साथियों आपका स्वागत है."

Thursday, October 11, 2012

Oh ! this sloppy crawl ......

एक पर्ची ,उस पर अंग्रेज़ी के अक्षरों में लिखे कुछ शब्द जिसे पढ़ पाना सागर मंथन के सदृश,पढ़ कर समझने में सफल तो अमृत पा  लिया और दुर्भाग्यवश न पढ़ पाए तो ये शब्द विष बन जाएंगे .....

हाँ ,यही तो होती है "Tragedy of doctor's prescription "

आज कंप्यूटर के तेजी से बढ़ते प्रचलन से अगले कुछ दशकों में कागज़-कलम संग्रहालय में रखी जाने वाले वस्तुओं की सूची में नाम दर्ज कराने की कतार में खड़े होने को तैयार हैं.तकनीक क्षेत्र में तीव्रता से बदलते परिवेश में विद्यालयों में प्रयुक्त शिक्षा के ये अहम् साधन कब ऐतिहासिक पृष्ठों की शोभा बन जाएं ,कुछ कहा नहीं जा सकता.
प्रिय पाठकों
,आप सभी को हिन्दी की क्लास में सुलेख और इंग्लिश की क्लास में handwriting के होम वर्क याद होंगे ,जो ना चाहते हुए भी हमें प्रतिदिन एक-एक पेज लिखने ही होते थे.नौकरी प्राप्त करने के लिए भेजे जाने वाले दरखास्त (application )  भी कभी-कभी स्वयं की handwriting में ही भेजने की शर्त होती थी.इसका उद्देश्य उम्मीदवार के व्यक्तित्व की पहचान करना होता था और लिखावट विशेषज्ञ (handwriting analyst ) इस बात को बखूबी अंजाम भी देते थे.मुझे याद है मेरे छोटे भाई की लिखावट सुन्दर न होने की वज़ह से वे मुझसे ही application लिखवाते थे.पर एक बार उनसे यही कहा गया,"यह लिखावट आपकी नहीं है"उन्होंने यह बात स्वीकार की पर जानकारी के लिए पूछा "आप इतने विश्वास पूर्वक यह बात कैसे कह रहे हैं?"तब उन analyst  ने कहा'" आप जिस जॉब के लिए आये हैं उस क्षेत्र में कलात्मक लिखावट के प्रति रुझान बहुत कम देखने को मिलता है.ऐसी लिखावट के व्यक्ति शिक्षा,कला या साहित्य से जुड़े लोग ही हो सकते हैं."
शिक्षण व्यवसाय से जुड़े लोगों के लिए लिखावट की स्पष्टता एक अपेक्षणीय शर्त होती है.एक और महत्वपूर्ण व्यवसाय जो इस शर्त की अनिवार्यता से जुडा होना चाहिए वह स्वास्थ्य के साथ-साथ जीवन-मृत्यु से सम्बंधित चिकित्सा का क्षेत् है.पर आम तौर पर देखा जाता है कि स्कूली शिक्षा में प्रतिदिन सुलेख का गृह कार्य करने वाले विद्यार्थियों में से वे कुछ लोग जो आगे उच्च शिक्षा के बाद डॉक्टर बनते हैं वे जाने कितनी जल्दबाजी में होते हैं कि prescription में ऐसी  handwriting लिखते हैं मानो कोई चींटी स्याही भरी दवात से बाहर आकर कागज़ पर रेंग गई हो (sloppy crawls)और tragedy यह कि इस लिखावट को डॉक्टर भले ही समझ रहा हो पर जिसके लिए लिखा जा रहा है उसे या फिर कैमिस्ट को समझ में आ जाए इसकी कोई निश्चितता (certainity)नहीं होती है.शायद इसलिए एक लोक प्रचलित उपमा भी लोग देते हैं "his/her  handwriting is as illegible as doctor's prescription."विशेष रूप से गाँव ,कस्बों और छोटे शहरों के कुछ chemist drug prescription नहीं पढ़ पाते.
इसका कारण क्या है-असावधानी,जल्दबाजी या असंवेदनशीलता ? जाहिर सी बात इतने आदर्श पेशे से जुड़े  लोग वाकई अपने मरीज के प्रति पूर्णतः संवेदनशील होते हैं.उन्हें स्वस्थ देखने और उनकी स्वास्थ्य संबंधी परेशानी को सुन कर मृदु स्वभाव और मधुर वाणी का भी परिचय देते हैं और उनके(मरीज) लिए कल्याणकारी (शिवम्)भी साबित होते हैं.जो मरीज को पूर्ण सत्यता से अपनी स्वास्थ्य संबंधी बात कहने का विश्वास देता है. जब
सत्यम,शिवम् तक बात आ जाती है तो उसे सुन्दरम भी बनाने की कोशिश करना अत्यावश्यक है.पर्ची(prescription )में सुन्दर,स्पष्ट अक्षरों में लिखे दवा के नाम मरीज को अप्रत्यक्षतः सन्देश देंगे कि उसका डॉक्टर जल्दी में नहीं है और उसका धैर्यपूर्वक पूरा ध्यान रख रहा है .बस यही तो है एक चिकित्सक की सत्यम से शिवम् और फिर सुन्दरम तक की संछिप्त पर बेहद आवश्यक यात्रा जो उसके इस पेशे को बहुत ही महान बनाती है.तभी तो मरीज अपने डॉक्टर को भगवान मानता है.

मेरे एक पहचान की महिला के साथ एक वाक्या हुआ.उनके चेहरे पर rashes हो गए थे.उन्होंने अपने फॅमिली डॉक्टर से consult किया .दवा दूकान से उन्हें  वही दवा नहीं दी गई जो डॉक्टर ने लिखी थी या यूँ कहिये उन्हें गलत दवा मिल गई पर कुछ महिलाओं में इतना धैर्य कहाँ होता है कि कवर पर लिखे नाम से दवा का मिलान भी कर लें और वह भी चेहरे का मामला हो तो फिर तो बस और भी जल्दबाजी हो जाती है.....अक्सर ऐसा होता है कि एक तो लापरवाही और दूसरे डॉक्टर के handwriting की वज़ह से लोग दवा के कवर पर लिखे नाम को पर्ची परprescription लिखे उस नाम से मिलाने की ज़हमत नहीं उठाते .
खैर ,वह दवा रात सोने के पहले लगानी थी.अतः वे दवा लगा कर सो गई.मध्य रात्रि में चेहरे पर जलन से वे अर्ध निद्रा में ही उठीं और चेहरे से दवा धोया पर सवेरे वे rashes और भी फ़ैल गए थे और कुछ दिनों बाद उनके चेहरे की गोरी रंगत स्याह हो गई.वे कुछ ना कर सकीं. शिकायत भी क्या करती ?? फॅमिली डॉक्टर होने का लाभ उन साक्षर शिक्षित डॉक्टर को मिला.पर आज जब भी मैं उन दीदी से मिलती हूँ तो यही ख्याल आता है "काश!वे डॉक्टर निरक्षर शिक्षित डॉक्टर होतीं !दीदी भी सावधान होती तो उनके चेहरे की वह चमकती रंगत यूँ परिवर्तित हो कर विकृत न होती.
'दैनिक जागरण' अखबार १२ सितम्बर २०१२ को जब मैंने यह समाचार पढ़ा कि महाराष्ट्र राज्य के senior doctors  ने लिखावट सुधारने की मुहिम चलाई है तो बहुत प्रसन्नता हुई.मेडस्केप इंडिया नाम से ट्रस्ट बनाया गया है ताकि कैपिटल letters में स्पष्ट लिखावट के प्रति जागरूकता फैलाई जाए और इसके ज़रिये दवा संबंधी गड़बड़ियों और मेडिकल practitioner को (illegible scribbles)कानूनी झंझट से बचाया जा सके.महाराष्ट्र सरकार में स्वास्थ्य मंत्री सुरेश शेट्टी जी ने कहा,"महाराष्ट्र मेडिकल कौंसिल अगर जन हित में कोई अभियान चलाती है तो सरकार उसे पूरा समर्थन देगी."
मेडस्केप इंडिया doctors के लिए इस दिशा में (HANDWRITING LEGIBILITY) कार्यशालाएं आयोजित करने जा रहा है.जिसके अंतर्गत 'drug prescription  लिखते वक्त doctors capital letters  के साथ correct spellings  पर भी ध्यान रखें. अगर small letters  प्रयुक्त किये जाएं तो उनका झुकाव(slant ) लगभग 15-20  डिग्री से अधिक न हो.इसमें भी विशेष रूप से O,E और T की स्पष्टता(clearity ) पर ज्यादा ध्यान दिया जाये.doctors  अपने contact  number  पर्ची में अवश्य दें ताकि किसी भी असहुलियत में उनसे संपर्क किया जा सके.'
Maharashtra Medical Council,Dental Council,Neurologists Association ,Gynaecologists Association ,Homoepathy Council,Ayurvedic Council,Federation Obsteric And Gynaecological Society Of India(FOGSI) जैसी 24 संस्थाओं से यह आग्रह किया गया है कि वे इस दिशा में पहल करें.एक सर्वेक्षण के अनुसार USA में इस असावधानी की वज़ह से करीब 7000 मौत प्रत्येक वर्ष होती है. भारत देश में ऐसे आंकड़े उपलब्ध ही नहीं हो पाते .कारण स्पष्ट है कुछ तो इस ब्लॉग में लिखी घटना सरीखी स्थितियां होती हैं और कुछ देश के लम्बी कानूनी कार्यवाही का भय.स्पष्ट सबूत (दवा की पर्ची ,chemist की रसीद ,दवा के पैकेट इत्यादि) होते हुए भी लोग शिकायत दर्ज नहीं कराते.
Medscape India  की ग्रुप प्रेसिडेंट डॉक्टर सुनीता दुबे का कहना है "Due to lack of clarity in doctor's written prescriptions,the number of deaths caused in India and internationally are on a shocking rise..........an incorrect drug is administered to the patient which a lot of time proves fatal or nearly fatal."
इस छोटे पर अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू पर जितना जल्दी कार्यान्वन हो उतना ही अच्छा है.फिर लिखावट की असावधानी के फलस्वरूप होने वाली असामयिक मौत या दुर्घटना भी नहीं होगी,ना ही दीदी के साथ हुई लापरवाही की वज़ह से कोई मेरी तरह पूर्वाग्रही हो कर यह सोचेगा,काश!वे doctor निरक्षर शिक्षित पेशेवर होती .. साथ ही लोक प्रचलित उपमा (as  illegible as doctor's prescripion )भी लोगों की जुबां पर कभी नहीं होगा.
विश्व स्तर पर सभी doctors से हमारी अपील है कि वे इस दिशा में अवश्य सोचें और कितनी भी जल्दी हो पर prescription पर दवा का नाम स्पष्ट handwriting में ही लिखें.आपकी यह सावधानी और संवेदनशीलता कई लोगों को सही दिशा दे कर मुसीबत से बचा सकेगी.
धन्यवाद.
(ब्लॉग में लिखित कथन"काश!वे निरक्षर शिक्षित पेशेवर होती " सिर्फ एक विशेष डॉक्टर के लिए उठे उदगार हैं जिनका सम्बन्ध इस ब्लॉग की व्यक्तिगत घटना से है.कृपया इसे अन्यथा न लिया जाए.मैं इस पेशे से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति की अमूल्य सेवा का सदा सम्मान करती हूँ.)

(चित्र और जानकारी नेट से साभार)

Sunday, October 7, 2012

सफ़ेद अंडे ढोते 'काले चींटे'

face बुक पर लोग इन करते ही एक पोस्ट दिखाई दिया अति सर्वत्र वर्जयेत. तीन अमूल्य शब्द पुरातन,चिरकालिक पर वर्त्तमान परिदृश्य में पूर्णतः अस्वीकार्य.....आप सब मेरे इस कथन से असहमत हैं तो एक पल के लिए टी.वी on करिए और सुनिए लोग बोल रहे हैं ,कितना,क्या,कहाँ,किससे और क्यों स्वयं उन्हें ही नहीं पता है.नेतागण कुछ भी बयान दे रहे हैं.....राज ठाकरे जी बिहार राज्य के बाशिंदों को (infiltrators in mumbai )कह कर महाराष्ट्र से भगाने की धमकी देते हैं.माँ,माटी,मानुष(3M) के आधार को सर्वस्व मानने वाली ममता जी UPA सरकार को money,muscles, mafia (3M) के आधार पर चलने की टिप्पणी करती हैं.हालांकि इसी दल को इनका समर्थन भी मिला हुआ था.गुजरात परिवर्तन पार्टी के मुखिया केशुभाई पटेल जी नरेन्द्र मोदी जी को निर्मल बाबा की उपाधि देते हैं और कहते हैं कि उनके चारों तरफ 420  हैं और वे खुद 840  हैं,उन्हें झूठ बोलने और जनता को मूर्ख बनाने की आदत पड़ गयी है.मूर्ख बनाने की प्रतियोगिता हो तो मोदी चैम्पियन होंगे." दिग्विजय जी ने मोदी जी के लिए बयान दे दिया,"there are no similarities between swami vivekanand and modee and it would have been better had his yatra been calles hitler yatra " मोदी जी ने सोनिया जी के द्वारा अपव्यय के कुछ साक्ष्य जुटा कर प्रचार करना शुरू कर दिया अर्थात हर जगह अति--------- बयानबाजी की अति ,सुविचारों की,कुविचारों की,अभाव की,प्रचुरता की,भ्रष्टाचार की,अपराध की,समाज का अति पतन और मेरे इस ब्लॉग में भी अति की अतिव्यन्जना.
माननीय प्रधानमंत्रीजी पहले इतने खामोश रहे कि उनकी खामोशी उन्हें  हज़ार ज़वाब से  भली लगी और फिर जब मुख खोला  तो इतना कहा (पैसे पेड़ पर नहीं उगते)कि यह अति वर्त्तमान सरकार के अस्तित्व पर ही भारी पड़ने लगा.वे भूल गए ............
अति का भला न बोलना,अति की भली ना चुप
अति का भला न बरसना,अति की भली न धूप

अपने कार्यकाल के मुहाने से कुछ ही कदम पीछे खड़ी सरकार ने आर्थिक सुधारों के नाम पर जो अति वृष्टि की है उसने मुझे बचपन की पढी एक लघु कथा याद दिला दी, जिसमें कौवे के मुख से रोटी गिराने के लिए चालाक लोमड़ी हर दांव-पेंच खेलती है और अंत में उसकी तारीफ़ कर कहती है '"तुम गाना बहुत अच्छा गाते हो."कौवा अति उत्साही होकर गाने के लिए मुख खोलता है और रोटी नीचे गिर जाती है,लोमड़ी का मकसद पूरा हो गया.हाँ,देश की राजनीतिक घटना क्रम में थोडा विपरीत हुआ .देश की आम जनता,विपक्ष,विदेशी अखबारों ने मनमोहन जी को ऐसे-ऐसे विशेषणों से नवाज़ना शुरू किया कि वे अपनी छवि के प्रति अति प्रतिरक्षात्मक हो गए .हालांकि वे इस बात से पूर्णतः वाकिफ हैं कि इन सुधारों के तात्कालिक प्रभाव नहीं दिखेंगे पर यह लालसा भी है कि 2014  की शुरुआत में इन्ही सुधारों के कुछ शुरुआती धुंधले रंग जनता को दिखाई देने लग जाएंगे वह और सकारात्मक प्रभाव के लिए आशान्वित हो जाएगी और पिछली सारी पीड़ा को भूल कर पुनः इसी दल को सत्ता में लाने के लिए कमर कस लेगी .अगर ऐसा हुआ तो तीसरे मोर्चे की संभावना एक मृगमरीचिका ही साबित होगी.यहाँ मैं आपको अपने सफ़ेद अण्डों को ढो कर ले जाते कतारबद्ध काले-काले चींटों का दृश्य याद दिला दूँ.अगर एक भी चींटा गुड के किसी अन्य धेले की तरफ मुड गया तो पीछे के सारे चींटे उसी का अनुसरण कर मध्य से ही कतार तोड़ देते हैं.इसलिए बहुत संभव है कि आज न नुकुर करने वाले बहुत से दल पुनः कांग्रेस के साथ गठबंधन की राजनीति करेंगे.इस समीकरण पर आम जनता सिर्फ गुनगुना कर रह जाएगी  "ना-ना करते प्यार तुम्ही से ...."
अन्ना जी का कहना है,"राजनीति में गन्दगी है."केजरीवाल के साथ रहे योगेन्द्र यादव जी कहते हैं "राजनीति आज का युगधर्म है,इससे पृथक नहीं रहा जा सकता ",आम जनता का कहना है राजनीति एक नशा है,सत्ता का मद व्यक्ति को विवेकहीन कर देता है .इसके(राजनीति) लिए विरोधाभासी गुणों का होना भी शायद ज़रूरी है जैसे एक ईमानदार चोर,एक truthful liar इस तरह की बातों को दूर करने के लिए मैं अपने ही ब्लॉग 'अजी नाम-वाम में क्या रखा है' की पंक्तियाँ दोहरा रही हूँ.
जब राजतंत्र ही नहीं तो राजनीति शब्द का प्रयोग क्यों ? जो
शब्द राज करने की दुर्भावना से ग्रसित है.शाषण व्यवस्था जनतंत्र,प्रजातंत्र,लोकतंत्र है तो जननीति,लोकनीति,प्रजानीति कहिये जो जन सेवा का सदभाव ले आये.
प्रजातंत्र की परिभाषा में भी कुछ परिवर्तन होने चाहिए.जिसके अनुसार"प्रजातंत्र आधारभूत नैतिक मूल्यों की नींव पर खड़ा जनता के लिए,जनता के द्वारा,जनता का मजबूत
शाषण है."एक नेता सर्वप्रथम जनसेवक है.उसे न केवल people based  बल्कि people +value  based  प्रजातंत्र को अपनाना होगा.तभी वह ऐसे निर्णय ले सकेगा जो समग्र के हित में हों. .
एक मूल्य परक राष्ट्र की कल्पना को मूर्त रूप देने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को परिवर्तित नहीं अपितु रूपांतरित होने की आवश्यकता है.परिवर्तन तो अस्थाई है जबकि रूपांतरण स्थाई है.जैसा स्वामी मित्रानंद कहते हैं,"If Indians transform to become physically fit,emotionally strong,intellectually refined,culturally rooted,actively patriotic and spiritually uplifted with the vision of oneness,India will be revitalised.
अगर किसी भी राजनीतिक दल ने people+value based democracy को ध्यान में रखकर अपने कार्य काल को पूरा किया है तो उन्हें सरकारी खर्च पर विज्ञापन द्वारा प्रचार की ज़रूरत ही कहाँ है?क्या कस्तूरी के महक को साबित करने के लिए मृग कसम खाता है ?अरे उसे तो स्वयं भी इस गुण का पता नहीं होता पर सारा वन उस खुशबू से सुवासित हो जाता है.अच्छे नेतृत्व,अच्छे कार्य,अच्छे कार्य मूल्य स्वयं साबित होते हैं .उन्हें प्रचार करने की ज़रूरत नहीं पड़ती.पर दुर्भाग्यवश हमारे नेता स्व हित,स्व हक में इस कदर स्वकेंद्रित हो गए कि भारत निर्माण और जनतंत्र का असली अर्थ ही ओझल होता जा रहा है.आम जनता की  तो इतनी ही फ़रियाद है
आर्थिक नीति बना लो,विदेश यात्रा भी कर लो
भले छीन लो सफ़र ऐ.सी के वसूल के सेवा कर
मगर झोली में डालो,दो जून के रोटी की सुविधा
हमारे लिए बेहतर शिक्षा और नौकरी के अवसर.

black ants स्वयं को हर हालात पर पाक-साफ़ बताने वाले ,श्वेत झकाझक खादी पहने और भ्रष्टाचार की कालिख का आरोप ढोते अपने रहनुमाओं को देख कर क्या हम बार-बार  श्वेत अंडे ढोते हुए काले चींटों को याद करें ?जब इन चींटों से इनके अण्डों को हटाने की कोशिश करो तो ये बेहद आक्रामक हो उठते हैं. विपक्षी दल सत्तासीन दल के कार्यों पर नजर रखे उचित है ,लोकतंत्र का तकाज़ा भी है कि वह सरकार को तानाशाह बनने से रोके.पर क्या पिछले 9 वर्षों से विपक्ष की भूमिका निभा रही भाजपा का साथ ही यह कर्त्तव्य नहीं कि ऐसे हालात से उबरने के लिए यथोचित रणनीति भी सुझाए ?
.भाजपा ने अपनी छवि सिर्फ विरोध के लिए विरोध करने वाले राजनीतिक दल की बना ली है .रियायती दर पर रसोई गैस की उपलब्धता सीमित करने के फैसले का विरोध करने वाले राज्य सरकार तथा विपक्षी दलों में से किसी ने भी भारत देश में सौर उर्जा की प्रचूरता को देखते हुए इसे इंधन के विकल्प के रूप में विकसित करने की दूरदर्शिता पर भी क्यों नहीं ध्यान दिया?नहीं, इस दूरगामी सोच से ज्यादा आसान है विरोधी शोर का ऐलान...और एक बात..... क्या डीजल पेट्रोल की बढ़ती कीमत के लिए एक अंश भी हम जनता ज़िम्मेदार नहीं हैं?कम दूरी को भी तय करने के लिए हम पैदल नहीं बल्कि वाहन का प्रयोग पसंद करते हैं,एक ही परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने अलग-अलग वाहन रखता है,एक ही कार्यस्थल पर जाने के लिए कार पुलिंग या सार्वजनिक वाहन को वरीयता ना देकर हम अपने-अपने निजी वाहन का प्रयोग करते हैं.क्या वर्त्तमान में गाड़ियों की संख्या नित्य बढ़ती नहीं जा रही?जन्म दिवस हो तो किशोर आयु की संतान को भी गाडी उपहार दे दो....प्रजातंत्र की प्रजा को भी देश की इस दयनीय स्थिति जिम्मेदारी कुछ अंशों में लेनी होगी.सिर्फ रैली में भीडतंत्र का हिस्सा बनने से काम नहीं चलेगा.कितने युवाओं को तो यह भी पता नहीं होता की जिस रैली का वे हिस्सा बने हैं उसका मकसद क्या है?

आरोप-प्रत्यारोप की यह त्वरित प्रवृति   एक बेसब्र पीढी को जन्म दे रही है इस फास्ट प्रतिक्रियात्मक बयानबाजी के मलबे में देश के विकास की सोच कहीं ज़मींदोज़ हो गई है.व्यक्तिगत तौर पर भावनाओं में आये उतार-चढाव को सार्वजनिक जीवन में संयमित करने में हमारे रहनुमा ही असफल हो रहे हैं तो फिर आम जनता क्या करे ? इसी समस्या से जुड़ा एक अहम् पहलू है भ्रष्टाचार जो मानो एक विशाल समंदर सा हो गया है,जिसे तैरना आता है वह बीच मझधार में अठखेलियाँ करे,जिसे गहराई में उतरने से भय लगता है वह किनारे पर खडा होकर आती-जाती लहरों से ही खेल कर संतुष्टि कर ले और जिसे तैरना भी नहीं आता,गहराई से भी डर लगता है वह तट पर खडा लहरों की उतार-चढ़ाव को ही कोसता रहे.और देश की आम जनता इन सभी वर्गों के क्रिया कलाप की साक्षी भर बनी रहे.
किसी भी दल का कोई सशक्त चेहरा नज़र नहीं आता,आम जनता मानो एक मॉल में खड़ी है जहां एक ही उत्पाद के कई ब्रांड उसे दिग्भ्रमित कर रहे हैं .उसके अपने पसंदीदा ब्रांड का तो उत्पादन ही बंद हो गया है.मजबूरन उसे इन्ही में से एक का चयन करना है ताकि बस किसी तरह काम चलता रहे.
आम जनता अपने सभी रहनुमाओं से हुंकार भर पूछती है कि उनके पास इस भ्रष्टाचार के दाग को देश के लोकतंत्र के परिवेश से साफ़ करने के लिए किस डिटर्जेंट की रणनीति है ? उसकी प्रमाणिकता क्या है ? वह रणनीति कितनी कारगर साबित होगी ? 'मेरे कपडे उसके कपडे से अधिक सफ़ेद हैं'या 'उसके कपडे मेरे कपड़ों से ज्यादा काले हैं' का बेसुरा विज्ञापन बंद करें और अपने विवेक से देश के समग्र विकास की रूप रेखा जनता के समक्ष प्रस्तुत करें.यह स्पष्टतः दृष्टिगोचर है कि मुद्दा देश के विकास का नहीं बल्कि कुर्सी पर काबिज़ होने का ज्यादा है अगर देश की फ़िक्र है तो मध्यावधि चुनाव जैसे अपव्यय पूर्ण कदम का इतनी बेसब्री से इंतज़ार क्यों है ? इसका अर्थ तो यही है कि बस सब मौके की प्रतीक्षा में हैं.जिसके भाग्य से छींका गिर जाए.एक अफ्रीकन कहावत है"Until lions have their historians ,tales of the hunt will always glorify the hunter. "सुशाषण देने का दावा करने वाले नीतीश जी बिहार को विशेष राज्य का दर्ज़ा दिलाने की मांग को लेकर अधिकार यात्रा पर निकलते हैं तो छात्र संगठनों के साथ स्थानीय समस्या से जूझ रहे लोगों का भी विरोध उन्हें झेलना पड़ता है.फिर सुधार किसके लिए और कहाँ किये गए ? घटक दल अत्यधिक स्वकेंद्रित न हों . नीतीश जी का कहना है जो बिहार को विशेष राज्य का दर्ज़ा देगा उसे समर्थन देंगे.नेतागण भूल रहे हैं कि भारत राज्यों का समूह है जिसका विकास 'अपनी-अपनी ढपली;अपना-अपना राग' के तर्ज़ पर नहीं बल्कि 'मिले सुर मेरा तुम्हारा'के तर्ज़ पर ही संभव है.आम जनता को पहले इस्तेमाल करो फिर विश्वास करो के अनुसार प्रयोगवादी और यथार्थवादी होना पडेगा .उसे एक मजबूत लोकतंत्र चाहिए.अति की व्यंजना को लांघता,घिसटता,सिसकता,कराहता,चीखता कमज़ोर धराशाई लोकतंत्र से वह बिफर गई है.अति की अवधारणा से प्रत्येक नेता बाहर निकले और अखंड भारत के नागरिक होने का सबूत दे.

2014  के नए समीकरण,तीसरे मोर्चे की मृगमरीचिका सब एक भ्रम हैभाजपा ने Great coal robbery  नाम की पुस्तिका को घर-घर बांटने का फैसला कर जनता को आकाश (2G),पाताल ( coal),जमीन(राष्ट्रमंडल खेल)में हुए लूट की तरफ ध्यान आकर्षित करने का फैसला किया है.वहीँ पार्टी लाइन से  अलग भाजपा के एक वरिष्ठ नेता बी.सी.खंडूरी जी ने मनमोहनजी को एक अच्छा अर्थशास्त्री बताते हुए कहा,"पी.एम्.अत्यधिक दबाव में हैं...समस्या का तुरत -फुरत हल निकालने की बजाए हमें भ्रष्ट व्यवस्था में बदलाव के लिए उसकी जड़ों पर प्रहार करना होगा."और फिर अगले ही दिन अपने बयान से पलट भी गए.सपा ने सरकार को यह कह कर बचा लिया कि वह इस समय किसी साम्प्रदायिक दल को सत्ता में आने से रोकना चाहती है पर विपक्षी दलों द्वारा बुलाए गए बंद में अपना सक्रिय सहयोग भी दिया . डीजल के मूल्य वृद्धि,रसोई गैस के सब्सिडी वाले सिलिंडर सीमित करने और रीटेल में भारत बंद का आयोजन कर भाजपा ने सरकार को नकारा भी बताया और फिर यह भी कह दिया कि फिलहाल उसकी दिलचस्पी सरकार गिराने में नहीं है.वे यह नहीं बता पा रहे हैं कि अगर सब कुछ गलत है तो इसे सही करने की रणनीति क्या होनी चाहिए.यानि अगर केंद्र सरकार नीतिगत मामलों में परिपक्व नहीं है तो भाजपा भी इस दृष्टिकोण से कमज़ोर ही साबित हो रही है क्योंकि समस्या की diagnosis करने के बाद remedy उसके पास है नहीं.अन्ना जी के दिग्भ्रमित आन्दोलन और केजरीवाल से नीतिगत अलगाव ने संशय की स्थिति ला दी है. इधर ममता दी की रैली के प्रभाव ने एक नया रंग दिखाना शुरू कर दिया है .यानी प्रत्येक जगह विरोधाभास ...एक छद्म राजनीति..... जब तक केंद्र में थे अपने राज्य के लिए लड़ते रहे अब जब बाहर आ गए तो देश की अखण्डता याद आ रही,पहले खूब क्रोध और तल्ख़ अंदाज़ दिखाए,अब पूछ रहे हैं केंद्र सरकार इतना गुस्सा क्यों करती है. (अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है) ? अर्थात वही मुहावरा हवा का रुख क्या होगा कहना मुश्किल.....ऊँट किस करवट बैठेगा ?? unpredictable ....
बस ,कुछ नए similes ( as unpredictable as politicians ,as uncertain as politics )अंग्रेज़ी व्याकरण में
जोर-शोर से गति लेने को तैयार है.ऐसे अनिश्चित परिस्थितियों में नेता गण वाकयुद्ध करते हैं; फिर उपयुक्त समय आने पर एक ही टेबल पर जोड़ तोड़ की राजनीति खेलते हैं.आरोप-प्रत्यारोप का अंतहीन बेसुरा राग अलापना छोड़ कर गठजोड़ के मधुर तान सुनाते हैं और आम जनता हर बार स्वयं को ठगा सा महसूस करती है .नया चुनाव,नई सरकार और आम जनता बस वहीँ की वहीँ खड़ी रह जाती है.सरकार और सुधार का अवनी-अम्बर मिलन बस क्षितिज सा ही रह जाता है .
प्रमुख समस्या यह है कि जब कोई दल स्पष्ट बहुमत से जीत हासिल करता नहीं दिखता तब क्षेत्रीय दल उभर कर सामने आते हैं,गठबंधन की राजनीति तैयार होती है,मोल-भाव के खेल जमते हैं और भ्रष्टाचार के विषैले बीज पनपते हैं.ज़रूरत है राजनीतिक दलों को सशक्त होकर ,मजबूत असरकारी विकास योजनाओं के साथ पाक-साफ़ छवि ले कर उभरने की, जो आम जनता पर विश्वास कायम रख सके या फिर गठबंधन की राजनीति के नियम स्पष्ट हों,दलों के साझा निर्णय पहले से ही स्पष्ट हों.किसी भी मुद्दे पर अचानक समर्थन वापिस लेने जैसे कदम उठाने की नौबत ही क्यों आये.?एक और मुख्य समस्या यह है कि शिक्षित वर्ग वोटाधिकार का प्रयोग नहीं करता. गरीब अशिक्षित जनता मामूली तोहफों के लालच में अपना मताधिकार बेच देती है. .2009  के आम चुनाव में 28  करोड़ से ज्यादा मतदाताओं ने अपने अधिकार का प्रयोग ही नहीं किया था,ऐसे सुप्त लोकतंत्र में फिर कैसे शिकवे ???कैसी शिकायत ??? प्रजातंत्र में प्रभुत्व स्थापित रखने की राजशाही सोच इसी प्रवृति की भयावह उपज है.
इस देश के रहनुमाओं ने क्या-क्या नज़ारे दिखा दिए
मुल्क जिसका हक़दार था और जिन मंज़र की थी ज़रूरत
उन्ही ख्वाबों को तो हकीकत की ज़मीं से महरूम कर गए
अवाम को किस कदर पहले से भी ज्यादा मजबूर कर गए !
मुझे वह सुप्रसिद्ध पंक्ति याद आती है"सिंहासन खाली करो कि जनता आती है"सभी व्यस्क भारतीय नागरिकों से अपील है "सजग हों,विवेकपूर्ण हों'और अपने वोटाधिकार का प्रयोग करें,इससे बड़ा जन आन्दोलन, जन क्रान्ति और कोई नहीं है."
राजनीति मेरा पसंदीदा विषय नहीं है पर एक भारतीय नागरिक होने के नाते यह मेरा कर्त्तव्य है कि देश के हालात को समझ कर अपने वोटाधिकार का विवेकपूर्ण प्रयोग करूँ.
(ब्लॉग में लिखे कोई भी शब्द अगर आप में से किसी को नागवार गुज़रें तो मुझे अपने द्वारा दी गई प्रतिक्रिया में ज़रूर बताएँ.मैं किसी विशेष दल की समर्थक नहीं हूँ बस एक सशक्त,विवेकी नेतृत्व वाले दल की तलाश है और उसी तलाश में इस ब्लॉग के माध्यम से आप सभी को शामिल करना मेरा उद्देश्य है).2014 के लिए अब भी वक्त है...

Saturday, October 6, 2012

अमराइयाँ गाँव की

इस ब्लॉग को लिखने के पीछे दो उद्देश्य हैं ;प्रथम सभी पाठकों/लेखकों को उनके बचपन के दोस्तों की याद दिलाना और यह भी ध्यान रखना कि हम बड़े ऐसी कोई रंजिश आपस में ना रखें जिसका प्रभाव हमारे बच्चों के मस्तिष्क पर फ्रेम में जडी किसी तस्वीर सा स्थिर हो कर रह जाए.दुसरा यह सन्देश देना कि अपने बच्चों को उनके दोस्तों के साथ जी भर कर खेलने दें. सुखद साथ की ये स्मृतियाँ आगे की राह में उनके चरित्र के अल्पांश का निर्माण भी कर जाती हैं .बस इतना ध्यान ज़रूर रखें कि आपके बच्चे, अपने दोस्त या बाल सखा के संग एक स्वस्थ वातावरण में खेलें .
दरअसल ,इस बार जब मेरी बिटिया हॉस्टल से घर आयी तो बातों ही बातों में उसने सहसा तीर की मानिंद एक प्रश्न छोड़ दिया ,"माँ, मैं तो फ़ोन पर अपनी सहेलियों से इतनी सारी बातें करती हूँ क्या आपको अपने बचपन की किसी सहेली की याद नहीं आती?"अब यह बाल गोपाल का यशोदा मैया से पूछे प्रश्न "मैया मेरी कबहूँ बढ़ेगी चोटी"जैसा बाल सुलभ प्रश्न तो था नहीं जिसमें एक प्रश्न के उत्तर के बाद उस उत्तर से ही प्रश्नों का निर्माण होने की अंतहीन क्रिया चलती रहती,यह तो बालपन और किशोरावस्था के संधिकाल का मासूमियत भरा अल्हड सा प्रश्न था जहाँ उत्तर की प्रतीक्षा का भी धैर्य नहीं होता.मैंने ज़वाब दिया,"याद आती है"उसने छोटे से शब्द 'हूँ' से काम चलाया और अपनी पढ़ाई में लग गयी.
पर उसके प्रश्न ने मुझे वो फाइल खोलने को विवश कर दिया जिसमें मैंने अपनी छठी,सातवीं.......कक्षाओं के परिणाम,समाचार पत्र में छपी कुछ रचनाओं की कटिंग और तमाम ऐसी चीज़ें सम्हाल कर रखी थीं जिनसे खाली वक्त में रु-ब-रु होना मुझे कभी-कभी बेहद सुकून देता है. .व्यग्रता से खोजने के बावजूद मैं वो हासिल ना कर पायी जो चाहिए था. बिटिया के जाने के बाद उसके प्रश्न से जुडी खोज की अधूरी कोशिश पुनः आरम्भ हुई और कहते हैं न "जिन ढूंढे तिन पाइयाँ"मुझे वह सम्पति मिल गयी जो हर किसी के बचपन की अनमोल धरोहर होती है चाहे वह द्वापर युगीन कृष्ण-सुदामा हों या फिर आधुनिक काल की मेरी बेटी.
मुझे मेरी प्यारी सी सहेली अनुपमा सिंह की तस्वीर और उसका लिखा हुआ अंतिम ख़त जिसके पन्ने बिलकुल पीले पड़ चुके थे वे मिल गए.अब यह अनुपमा कौन थी यह भी बताती हूँ,नाम के अनुरूप वास्तव में अनुपम,उस उम्र की लड़कियों से बिलकुल परे,चंचलता,चपलता से उसका दूर-दूर तक कोई वास्ता ना था,गहरी बड़ी-बड़ी आँखों में अजीब सी उदासी झलकती थी.मैं हर गर्मी की छुट्टियो में अपने गाँव जाती थी;पिताजी का यह मानना था कि शहर में पली-बढी लड़कियां अगर गाँव के वातावरण से भी परिचित रहे तो उनके लिए अच्छा ही होगा तब ये तो कल्पनातीत ही था कि गाँव भी शहर की तरह कुछ हद तक ही सही पर आधुनिक सुविधाओं से अवश्य ही सुसज्जित हो जायेंगे.अनुपमा सागर में पढ़ती थी;मेरी तरह वह भी गर्मियों में ही वहां आती थी,मैं आम के बगीचे में खेल रही थी वह मुझे वहीँ मिली.जाने, उसमें क्या आकर्षण था कि मेरा बालमन उससे दोस्ती को इच्छुक हो गया.उसने भी शायद कुछ ऐसा ही एहसास किया था तभी तो उस दिन के उपरान्त हम घंटों बाते करते,पेड़ों पर चढ़ते और खेलते रहते.
एक दिन वह मुझे अपने घर ले गयी,जब मैंने उसकी माँ को वैधव्य हाल में देखा तो पूछा"अनु,तुमने कभी बताया नहीं "उसकी झील सी बड़ी आँखों में मानो सैलाब उमड़ आया,कहने लगी,"मुझे मेरे जन्म का बेहद अफ़सोस है,इधर मैंने दुनिया में आँखें खोली;उधर पापा ने सदा के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं ,माँ का यह रूप अनायास ही मेरे जन्म से जुड़ गया है"उसकी गहरी झील सी आँखों में पानी के स्रोत का रहस्य अब मेरे लिए रहस्य नहीं रह गया था.हाँ, एक बात और हुई उस दिन के बाद से मैं अपने पिता से गहरे जुड़ाव में बंध गयी जो आज भी कायम है.
मैं वापस शहर आ गयी पर कच्ची अमिया से पके आम तक की सारी खुशबू मानो अनु की यादों से जुड़ गयी अगले वर्ष गाँव जाना ना हो सका,दो वर्ष बाद जब गयी अनु फिर दिखी पर मुझसे कटी सी रही,मैंने ही जिद कर उसे आम के बगीचे में बुलाया और कहा,"अनु,मैं इस बार कम दिनों के लिए आयी हूँ ,कल चली जाउंगी,मुझे बस स्टॉप छोड़ने आ जाना"उसने तो मानो अधर ही सी रखे थे,बस हाँ में सर हिलाया और चली गयी.
अगले दिन इंतज़ार में मेरी आँखें पथरा सी गयी पर वह नहीं आयी उसके भाई ने मुझे यह अंतिम पत्र पकड़ा दिया.
उसके बाद मेरा गाँव जाना कुछ वर्ष के अंतराल में होने लगा पर वह मुझे नहीं मिलती, दादाजी ने बताया ब्राह्मण और ठाकुर के किन्ही दो परिवारों में भीषण विवाद हुआ नतीज़तन पुरे गाँव में इन दो वर्णों ने बोल-चाल बंद कर दी है .मैंने पूछा था इसमें हम कहाँ दोषी हैं?दबंग दादाजी की आँखों में क्रोध स्पष्ट दिख रहा था .मैंने भी उनका मान रखते हुए शांत रहना बेहतर समझा .पर बड़ों के इस रवैये को आज तक मेरा दिल माफ़ नहीं कर सका है .अनु मेरी पहली और आखिरी बाल सखी साबित हुई.जब बी.एड. कर रही थी तो अंतिम बार गाँव जाना हुआ पता चला अनु का विवाह हो गया है.
दोस्तों ;उसकी खामोशी,उदासी ,असमय ओढी परिपक्वता ने मुझे उन्ही दिनों से ही कुछ -कुछ संवेदनशील बना
दिया था मैंने यह कविता "अमराइयाँ गाँव की"उसीकी याद में लिखा है ;उसकी तस्वीर,उसके अंतिम ख़त भी इस ब्लॉग के साथ हैं .मैं इस वर्ष अपनी बिटिया, जिसने अपने एक अल्हड से प्रश्न से, मेरे ज़ेहन में पडी धूमिल यादों को ताज़ा कर दिया ;उसके साथ गाँव अवश्य जाउंगी बस ईश्वर से यही दुआ मांगती हूँ कि अनु की खबर ही मुझे मिल जाए........................ताकि .मेरी खोज को विराम मिल सके.
ओ सखी ,कहाँ भूली हूँ मैं,
घनी अमराइयाँ गाँव की.
वो मस्ती,वो अमिया खाना
और राहत ठन्डे छाँव की


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परिपक्वता में मासूमियत
खासियत तेरे स्वभाव की
कभी बेफिक्री में न हंसना
संकेत करते थे अभाव की


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पहली बारिश का सोंधापन
और खेल कागज़ के नाव की
अब भी दिल में बसी वैसे ही
मीठी यादें तेरे उस गाँव की


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रुनझुन बजती मधुर वह धुन
जो करती नुपुर तेरे पाँव की
पर शोर बहुत है इस दिल में
तेरे उस खामोश से ठांव की


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संभाल रखी हैं निशानियाँ
मैंने एक-एक तेरे चाव की
तेरी यादों के थे कितने ज़ख्म
किसे परवाह थी इस घाव की


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चार दशकों की ये ज़िन्दगी
अब है उन लम्हों के दांव की
तू नहीं है पर तेरी यादें ही अब
हैं अनमोल रत्न के भाव की .


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यकीन नहीं है तो छूकर देखो

समाज के किसी भी घटना क्रम से जब राजनीति जुड़ जाती है तो वह घटना अत्यधिक पेचीदा और रहस्यमयी हो जाती है.इसे राजनीति का मायावी प्रभाव कहा जाए या हमारी सोच और समझ का दायरा यह निर्णय करना कठिन है.इस बार भी यही हुआ अनुराधा बाली और गीतिका शर्मा दोनों ही राजनीति रसूख रखने वाले शख्स से जुडी थी .एक ने वैवाहिक सम्बन्ध बनाया तो दूसरी का जुड़ाव जीविकोपार्जन की वज़ह से रहा .अनुराधा बाली जिस तरह से रूप सौंदर्य की लावण्यता की वज़ह से चन्द्रमोहन की अर्धांगिनी बनी उस घटनाक्रम को देखने के बाद कई महत्वपूर्ण बात सामने आती है...........
प्रथम --यह कि बुद्धिमत्ता से तालुकात रखने वाली कुछ महिलाएं अपनी ज़िंदगी से जुडी बेहद महत्वपूर्ण व्यक्तिगत फैसले लेने पर उस बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता को भावावेग में भुला बैठती हैं.
दूसरी बात कि समाज(स्त्री-पुरुष) की एक विचित्र मानसिकता यह है कि राजनीतिक रसूख रखने वाले किसी भी व्यक्ति से अपना सम्बन्ध बताने पर लोग गौरवान्वित होते हैं .कुछ तो इस सम्बन्ध के भरोसे को अलादीन का चिराग समझ हर काम को चुटकी में पूरा हो जाने का दावा करते हैं.
तीसरी बात कुछ महिलाएं अपने शौहर के ऊँचे रुतबे और ओहदे पर होने से इसे status सिम्बल मान कर अपने नात-रिश्तेदार,पड़ोसियों से एक सुरक्षात्मक दूरी बना लेती हैं जो उनके लिए सदैव घातक साबित होता है. इस अकेलेपन का अवसाद और अलगाव उनकी ज़िंदगी को बेमकसद बना देता है जिसकी परिणति समाज के समक्ष इस भयावह रूप में दृष्टिगोचर होता है.
दूसरी घटना में गीतिका शर्मा की भी उम्र(२३ वर्ष) कोई बहुत परिपक्व अवस्था की नहीं थी. इस अवस्था में बच्चे अक्सर पहला गलत काम करते हैं वह कि अपनी बातों को घर के बेहद करीबी रिश्तों से साझा नहीं करते हैं.वे गैरों को तो अपना मान लेते हैं पर अपनों से दूरी बना लेते हैं.दूसरी गलती यह कि जल्द से जल्द सफलता की सीढ़ियों को चढ़ने के क्रम में जिन दुर्गम और अवांछित राहों से गुज़रने का समझौता कर लेते हैं वे उसकी मंजिल के शिखर से बेखबर रहते हैं.उन्हें यह बात समझ नहीं आ पाती कि साहस उचित है पर दुस्स्साहस कदाचित नहीं.
ऐसे किसी भी सम्बन्ध बनाने के पूर्व स्त्रीयों को अपनी बाह्य सुन्दरता के साथ अपनी असीम शक्ति,साहस,बुद्धिमत्ता जैसी आतंरिक शक्तियों पर भी भरपूर भरोसा करना चाहिए .पुरुष में शक्ति है पर स्त्री के असीम शक्ति पुंज से वह हार भी जाता है.मुझे नारायण दत्त तिवारी की पत्नी और बेटे पर फक्र है कि उन्होंने अपना हक कानून के द्वारा साबित करवाया इसमें उन्हें ना तो किसी महिला संगठन की मदद मिली ना ही और किसी अपेक्षित की पर उन्होंने अपनी कानूनी जीत हासिल की.यह उचित भी इसलिए था क्योंकि बच्चे को नाजायज़ मानने वाला समाज माता पिता को नाजायज़ क्यों नहीं मानता जिनकी क्षणिक भावावेग की वासना और लिप्सा एक बच्चे को समाज की नज़र में नए अस्वीकार्य विशेषण से नवाज़ देती है भला उस बच्ची/बच्चे का क्या कसूर है.
इतिहास गवाह है कि हर युग में स्त्री त्याग ,समर्पण,शक्ति,बुद्धिमता की साक्षात प्रतिमूर्ति रही है पर पुरुष प्रधान समाज ने हमेशा उसे जांचने-परखने और उनकी कर्तव्यनिष्ठा को भुलाने की हिमाकत की है.दूसरी ओर स्वयं स्त्रियों ने ही अपने त्याग ,अपनी वेदना ,अपने समर्पण से स्वस्तित्व की अलग परिभाषा रच दी है .इतिहास के पन्नों पर ऐसे कितने पुरुषों से सम्बंधित इबारतें लिखी हैं जिनकी पत्नियों के त्याग ने ही उन्हें जग को प्रकाशित करने में मदद की पर उन स्त्रियों की लिखित-अलिखित गाथा से वे पन्ने भीगे हैं.अगर आप को यकीन नहीं है तो वे पन्ने छूकर देखो जो उनकी छुपी अश्रुधाराओं से अब तक गीले हैं चाहे वे उर्मिला हों यशोधरा या.............
आज इन्ही भीगे पन्नों की  इबारतों से आपको रु-ब-रु करवाने जा रही हूँ................
1
गांधारी क्यों बांधी तुमने आँखों पर पट्टी
इस तरह तुम आज आदर्श तो ना बन सकी
पति की उस नियति और अशक्त अवस्था में
उनकी नेत्र ज्योति क्यों
तुम ना बन सकी ?
2 ...............
अपने चक्षु खुले रख कर अपने बच्चों का
सही मार्गनिर्देशन क्या नहीं कर सकती थी
सौ पुत्रों की माता थी तुम, एक बार सोचो
सुन्दर
सौ इतिहास ना रच सकती थी?
3 ...............
पति की कमजोरी संग कमज़ोर पड़ जाना
यह पति के प्रति सही सहयोग नहीं होता

अपनी शक्ति और संपूर्ण समर्थता से तेरा
ध्रितराष्ट्र से जुड़ना सोचो,कितना सही होता.

4 ..................
द्रौपदी!विचारों, तुमने भी तो की है गलती
क्यों खुद को वहां दांव पर लगने ही दिया
पुरुषों की भरी सभा में थे मौजूद पति भी
फिर क्यों अबला बन चीर हरने ही दिया
5 .................
यूँ चुपचाप अपमान का घूंट पी जाना
नारी का धर्मं तो कभी बनता नहीं है

ऐसे पुरुषों के साथ क्यों रहना ही बोलो
जिनमें अपनेपन का मर्म होता नहीं है

6 .....................
सीता,तुम तो अपना सर्वस्व छोड़ कर
पति का साथ देने ही तो वन गयी थी
उस स्वर्ण लंका के चमक से अछूती
राम की याद में ही तो जोगन भई थी

7 ..................
फिर राम ने कैसे ना दिया साथ तेरा
उन विवश,विषाद अश्रु भरे क्षणों में
सामजिक संशय के मर्यादा बोध से
छवि तुम्हारी बिखेर दी रज कणों में
8 ...................
यशोधरा! तुम्हारे त्याग को ही देखो
इतिहास के किस ग्रन्थ ने याद रखा है
आज जिन महात्मा बुद्ध की गाथा से
प्राचीन इतिहास सुवासित महक उठा है
9 ...................
मोक्ष प्राप्ति ही करनी थी तो क्यों
बांधा तुम्हारे संग सूत्र विवाह का
चुपचाप धीरे से सघन रात्रि में ही
संग छोड़ा तुम्हारा और राहुल का

10 .....................
देख लो तुम्हे तो उर्मिला के सदृश ही
इतिहास ने पूर्णतः है विस्मृत किया
पूछा उसने भी नहीं अपने स्वामी से
क्यों मुझे जीते-जी यूँ है मृत किया
??
11 .....................
अपने प्रति जिम्मेदारियों का एहसास
उर्मिला भी लक्षमण को ना दिला सकी
पति से चौदह वर्ष जुदाई की कल्पना
उसे भी कैसे और क्यों ना रुला सकी

12 .................
सच कहूँ भरे हैं हमारे ऐतिहासिक ग्रन्थ
ऐसी कितनी ही मार्मिक गाथाओं से
यकीन नहीं है तो छूकर देखो पन्ने जो
अब तक भीगे हैं उन छुपी अश्रुधाराओं से
****************

(किसी भी धर्मं या सम्प्रदाय को आहत करना इस blog का उद्देश्य नहीं है. मैं ब्लॉग में उल्लिखित सभी पात्रों की महानता के प्रति पूर्ण आदर और श्रधा रखती हूँ.सिर्फ भाव प्रबलता की अभिव्यक्ति के लिए उन सम्मानित पात्रों का उल्लेख किया गया है.अगर किसी भी आदरणीय पाठक को कोई भी आपत्ति हो तो मैं वह अंश बिना किसी वाद-विवाद या बहस के हटा लेने का वचन देती हूँ,साथ ही क्षमाप्रार्थिनी भी रहूंगी)
धन्यवाद

हमदम,तेरे साथ चलूँ तो....

आज हरितालिका तीज के शुभावसर पर आप सबों के सुखद दाम्पत्य और अखंड सौभाग्यवती रहने की सुखद कामना के साथ यमुना का प्यार भरा नमस्कार.
विवाह संस्था और पारिवारिक मूल्यों पर मेरी गहरी आस्था और अटूट विश्वास है.हरितालिका तीज का यह निर्जला व्रत पत्नी अपने पति की मंगल कामना के लिए रखती हैं.हालांकि देश के कुछ राज्यों बिहार,झारखण्ड,छत्तीसगढ़ ,मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में प्रचलित इस व्रत का महिमा मंडन देश के इन्ही राज्यों के साथ पंजाब,हरियाणा में भी प्रचलित व्रत करवा चौथ की तरह हिन्दी सिनेमा ,धारावाहिक इत्यादि द्वारा ना होने के कारण बहुत कम लोग ही इससे परिचित हैं पर फिर भी  तीज के रूप में उपासना आज भी इन राज्यों की माटी में सोंधी महक के रूप में समाई है.आप के मस्तिष्क में सहज ही एक प्रश्न उठ गया होगा-"पति अपनी पत्नियों के लिए ऐसा कोई व्रत क्यों नहीं रखते ?"यही प्रश्न मुझसे एक नवविवाहिता ने भी पूछा.मेरा मानना है कि पति जो घर से बाहर अपने परिवार के सुख-सुविधाओं के लिए दिन भर भटकता है ,जोखिम उठाता है क्या यह उसके व्रत की एक बानगी नहीं ?व्रत का सीधा अर्थ किसी गहरे संकल्प से भर जाना होता है.फिर वह अच्छे मार्ग पर बढ़ने का,जीवन को सर्वोत्तम ढंग से जीने का या अपने कार्य को निष्ठां पूर्वक करने का हो सकता है.इस नज़रिए से पति प्रत्येक दिन व्रत रखता है क्योंकि वह प्रतिदिन अपने परिवार के सुचारुपूर्ण ढंग से रोजी-रोटी की व्यवस्था का संकल्प करता है.जो काम काजी महिलाएं हैं ;व्रत उपवास उनकी आस्था का प्रश्न है पर वे कामकाजी महिलाएं और गृहणी भी प्रतिदिन एक व्रत से गुज़रती हैं और वह है अपने परिवार के साथ-साथ अपने जीवन को भी सर्वोत्तम बनाने का व्रत(संकल्प).
क्या है मान्यता-
इस व्रतोत्सव के लिए कहा जाता है कि जब भगवान शिव को पाने के लिए माँ पार्वती तपस्या रत हो गई तो पुत्री के कठोर तप को देख राजा हिमालय ने देवर्षि नारद से परामर्श कर बेटी का विवाह भगवान विष्णु से करने का निर्णय लिया.भगवान शिव को अपना वर मान चुकी माँ पार्वती को इस बात की जानकारी होने पर बहुत दुःख हुआ. उन्होंने मन की पीड़ा अपनी सखियों से कही.पिता की नज़रों से पार्वती को बचाने के लिए सखियों ने उन्हें घने जंगल में छुपा दिया जैसे किसी का हरण किया जाता है ठीक उसी तरह सखियों ने माँ पार्वती को छुपाया..हरण होने के कारण ही इस व्रत को हरितालिका कहा जाता है.इस दौरान माँ पार्वती ने वन की एक कन्दरा में शिव की प्रतिमा बना उनका पूजन किया.उस दिन भाद्र पद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीय तिथि थी .पार्वती जी ने निर्जला व्रत करते हुए दिन-रात शिव की आराधना की. उनकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर भगवन शिव प्रकट हुए और उन्होंने पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वर दिया.तभी से यह व्रतोत्सव मनाया जाता है .
मैं वर्त्तमान में पति द्वारा पत्नी को वेतन दिए जाने जैसे बेमानी फैसले के मद्देनज़र जब हरितालिका तीज जैसे पारंपरिक व्रत-त्योहारों का आकलन करती हूँ तो समाज के बदलते परिवेश में विवाह संस्था के विकृत होते स्वरुप पर क्षुब्ध भी होती हूँ.पर यह फैसला समाज के बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा क्यों लिया गया यह भी गौर करने वाली बात है.अनुराग बसु की मूवी 'बर्फी'के कुछ प्रारम्भिक शब्द"आज का प्यार ऐसा,दो मिनट नूडल्स जैसा,फेस बुक पर पैदा हुआ,कार में हुआ ये ज़वां,कोर्ट में जाकर मर गया"आज के प्रेम की विकृत सच्चाई को बताती है.पर कुछ स्थितियों में पति द्वारा पत्नी को वेतन दिए जाने का यह फैसला निहायत ज़रूरी भी है क्योंकि..........
१) कुछ गैरजिम्मेदार पति अपनी कमाई का कुछ हिस्सा शराब,पार्टी या अपने अवैध संबंधों पर खर्च करने से बाज़ नहीं आते ऐसे में दिन भर समर्पण और त्याग की देवी बनी पत्नियों के लिए यह सकारात्मक कदम है .
२) पति की मृत्यु की दुखद घटना के बाद परिवार वाले पुत्र की कमाई और उसके बैंक जमा पूंजी को किसी ना किसी दांव-पेंच से काम क्रिया में लगाने का बहाना बना विधवा को उससे वंचित कर आर्थिक दृष्टि से मजबूर कर देते हैं.यह वक्त उस विधवा के लिए इतना दुखद होता है रुपये-पैसे के विषय में वह अपनी सोच की दिशा निर्धारित नहीं कर पाती,जिसका बेजा लाभ रिश्तेदार उठा लेते हैं.ऐसे बुरे वक्त में तात्कालिक ज़रूरत के लिए कम से कम उसके खाते में जमा पूंजी सहायक हो सकेगी.
३) जो दंपत्ति विवाह व्यवस्था को एक समझौता और घुटन भरा बंधन मान कर दाम्पत्य जीवन की ज़द्दोज़हद में उलझे होते हैं उनके लिए यह फैसला स्वागत के योग्य हो सकता है .

जिन दम्पत्तियों के संबंधों का अटूट भवन आपसी विश्वास की नींव और भरोसे की छत के साथ खडा होता है उन्हें ऐसे किसी भी फैसलों का कभी भी इंतज़ार नहीं रहता क्योंकि उनके आपसी रिश्ते इस सुदृढ़ भवन में बेहद महफूज़ होते हैं.
"हमदम तेरे साथ चलूँ तो......"इस हरितालिका तीज के शुभावसर पर इन्ही मधुर संबंधों की अभिव्यक्ति है.इसे जीवन भर हर वह विवाहिता एहसास करती है जिसे ईश्वर ने जीवन साथी के रूप में एक विवेकी व्यक्ति का उपहार दिया है.
तुम साथ हो तो मुझे सम्पूर्णता का एहसास होता है
जीवन के हर एक मोड़ पर पर्व सा उल्लास होता है.
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तुम्हारा साथ जीवन को सुवासित झोंकों से भरता है
तेरे सिवा दूजा ना कोई ,इस दिल दर्पण में बसता है
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आँखें मैं बंद करूँ जब भी, वही तेज़ कदमों की चाल
शरारती नयन तेरे और दमकते माथे पर बिखरे बाल
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एक थिरकन नख से शिख को,मादक लय दे जाती है
तुम्हारी पद चाप तुम्हारे आने का,दस्तक दे जाती है.
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चहरे पर फ़ैली वही चिर परिचित, मोहक सी मुस्कान
चारों तरफ उड़ती नज़रें, उनसे भी ज्यादा चौकस कान
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सबकी निगाहें तेरे सुदर्शन व्यक्तित्व पर सिमट जाती हैं
बुरी नज़रों से बचाने की इच्छा अमरबेल सी लिपट जाती है
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और फिर जब कभी भी मेरा यह मन उदास हो जाता है
तुम्हारे साथ का स्मरण ही एक सुखद सांझ हो जाता है
.....................
जीवन की उबड़-खाबड़ और पथरीली इन राहों पर
संग बिताए पल-पल की उन भूली-बिसरी यादों पर
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तेरे सानिध्य की यादें ही ,मुझे मलहम सी लगती हैं
भावनाएं मेरी फिर तो अनकहे शब्दों में भी सजती हैं
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क्या कहूँ जीवन की डगर है कठिन मुझे जिस पर
विचारवान हो चलना है बहुत सम्हल-सम्हल कर

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तेरा भरोसा इस डगर को भी आनंद से भर देता है
दामन खुशियों से भरकर,दुःख
मेरे सारे  हर लेता है
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दुनिया सारी संग भी हो ,तेरी जुदाई पर खलती है
इस सूनेपन को भी तेरी सुधियाँ ही आकर भरती हैं
......................
एक सच्चा सा दिल ही तेरा ,सब पर भारी पड़ता है.
सब हो पर तेरे बिन मुझे ,यह जीवन खाली लगता है.
....................
सब के साथ चलती हुई मैं, कुछ दूर ही थक जाती हूँ
हमदम तेरे साथ चलूँ तो, सीढियां भी चढ़ जाती हूँ.
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तेरे बिन मेरी पहचान तो किसी हुजूम में खो जाती है
प्रियतम तेरा साथ है तो यमुना वजूद में हो पाती है.
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तेरा साथ पाकर तो हर जगह मैं ही मैं नज़र आती हूँ
हाथ तेरा पल भर छूटे तो मृगछौने सी सहम जाती हूँ
......................
अनगिनत सितारों के बीच बस एक चन्दा ही काफी है
जैसे एक सूर्य की रश्मियाँ धरा पर उजाला फैलाती हैं

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वैसे इस जीवन की राहों पर, हमसफ़र ही सच्चा साथी है
बिन जिसके तूफानी थपेड़ों से, टूटी जीवन की नैया जाती है.
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रोशन हैं;दो घर तुझसे

 "क्या बेटियाँ पराई होती हैं"
यह शीर्षक जब-जब दिखाई दिया,ज़ेहन में बचपन से अब तक समाई कई गीतों की स्वर लहरियां हिलोरें लेने लगी.जिनमें बेहद ही सुरीले अंदाज़ में बेटियों के पराये होने की बात कही गयी है.
१- बहन पराया धन है कहना,उसको सदा नहीं रहना,बहना याद करे......
२- बाबुल तेरे अंगना की मैं हूँ ऐसी चिड़िया रे,रात भर बसेरा है सुबह उड़ जाना है.....
३- इन अंखियों की तू है मोती.....बेटी सदा ही पराई होती......



४- ये गलियाँ,ये चौबारा ,यहाँ आना ना दोबारा ,अब हम तो भये परदेशी....
ऐसे गीतों की लम्बी फेहरिस्त है.अब जब बचपन से ये परायेपन की घुट्टी ताल मिश्री की तरह पिलाई जाए तो बेटियाँ भी भला क्या करें?वे भी मान बैठती हैं कि उनका कोई अपना घर है ही नहीं.पर मैं समझती हूँ कि बेटियों की परवरिश के दौरान परायेपन का टैग लगाकर अभिभावक बहुत गलत करते हैं. अनजाने में ही वे सम्पूर्णता के साथ अपनेपन का भाव लेकर बेटियों के परिवार से जुड़ने की प्रवाहमयी सरिता पर खुद ही बाँध बना देते है और फिर इस बाँध की दीवारें तोड़ने का साहस वे इस भय से नहीं करती कि कहीं तबाही ना आ जाए .यहाँ तक कि उसकी विदाई के वक्त घिसी- पिटी सी नसीहत दोहराई जाती है'"अब तुम्हारा घर वही है जहां डोली जा रही है अर्थी भी वहीँ से उठनी चाहिए.बेटी, तुम जिनकी अमानत थी हमने तुम्हे उनको सौंप दिया है"
हाँ इस उपरोक्त सन्देश में यह भाव भी छुपा होता है कि जहां हम तुम्हे भेज रहे हैं वह भी तुम्हारा अपना घर है . इस घर की तरह वहां भी तुम्हे बहुत प्यार ,दुलार और एक मजबूत संरक्षण मिलेगा.
पर अमानत को लेने वाले सभ्य और सुसंस्कृत हुए तो बिटिया के भाग्य जग गए और अगर बदकिस्मती से वे लोभी,लालची हुए तो फिर फूल सी बिटिया उस वीराने में कैसे खिली रह पायेगी???????इस बात का अंदाजा ही वे नहीं लगा पाते.<!--
बेटियों को हमेशा यह विश्वास दिलाये रखें कि वे उनके लिए आजीवन महत्वपूर्ण हैं .उनकी ज़िंदगी परिवार समाज के लिए कीमती है.ऐसे में वे विवाह के बाद भी अगर दुर्भाग्य से घरेलु हिंसा या दहेज़ के दानव का शिकार होने लगें तो उनमें उनका मुकाबला करने की हिम्मत रहेगी . वे कभी भी आत्मघाती कदम नहीं उठाएंगी.अपनी किसी भी परेशानी को आपसे वैसे ही बांटने की हिम्मत और अधिकार रखेंगी जैसे वे विवाह के पहले करती थी.
इन छुटियों में जब मैं शिलौंग गयी तो स्थानीय चालक से एक अच्छी बात पता चली कि वहां दहेज़ जैसी कोई प्रथा नहीं है.उत्तर पूर्व भारत में बेटियाँ विदा नहीं होती लडके उनके घर आते हैं.मुझे इस दहेज़ रहित सामाजिक संरचना पर बेहद नाज़ हुआ.
दरअसल यह सोच और मानसिकता सर्वाधिक रूप में उत्तर भारत के कई राज्यों में प्रचलित है.यहाँ बचपन से ही बेटियों की शिक्षा के सम्बन्ध में भी एतराज़ किया जाता है यह कहकर"अरे इन्हें पढ़ा-लिखा कर क्या फ़ायदा पराई हैं अपने घर चली जाएंगी आपको इनसे क्या मिलेगा"वे यह भी मानते हैं की लड़कियों से वंश नहीं चलता.वे तो सदैव परायों के लिए ही पाली जाती हैं.लोग यह भूल जाते हैं कि यही बेटियाँ बहु बन कर वंश वृद्धि में सहायक बनती हैं.और सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह कि उसी राज्य उत्तर प्रदेश में जवाहर लाल नेहरु जी का वंश आज भी फलित पुष्पित हो रहा है जबकि उनकी एकलौती संतान बेटी (इंदिरा प्रियदर्शिनी )ही थी.आज भी सर्वाधिक जाना पहचाना गांधी वंश उन्ही(इंदिरा जी) से ही आगे बढ़ रहा है.वे तो कभी पराई नहीं मानी गयीं.
मैं स्वयं भुक्तभोगी हूँ.जब अपने गाँव जाती तो पापा को घर पर सब कहते,"कलक्टर बनवाना है क्या बेटी को ?बन भी गयी तो आपके किस काम की?? सारा राज भोग तो ससुराल वाले करेंगे"मैं बहुत चकित होती यह सोचती कि क्या समाज हमारी शिक्षा से लाभान्वित हो यह ज़रूरी नहीं?? यह अपना घर; पराया घर क्या है, इसकी परिभाषा तो उन दिनों समझ नहीं पाती,हाँ चुनौती समझ कर और भी जुनून तथा मेहनत से पढ़ती.

मेरी बड़ी दीदी एक सशक्त उदाहरण है उन्होंने और उनके परिवार(ससुराल) वालों ने पापा की कई जिम्मेदारियों को बखूबी अंजाम दिया और आज भी घर की ज़िम्मेदारी में सबसे पहले वही सलाह मशवरा देती हैं.यह पिता और पिता तुल्य ससुर जी के संबंधों का विस्तार था.प्रशंसनीय बात यह कि उनकी शादी  पान पत्ते पर मात्र सवा रुपये रखा कर की गयी थी.वज़ह उनके ससुर जी को दहेज़ शब्द से ही नफरत थी,वे बस एक सुशील बहु की आकाक्षा रखते थे.पर अफ़सोस की बात यह है कि दीदी को अपनी दोनों बेटियों के विवाह में दहेज़ देने पड़े,जबकि छोटी बेटी सरकारी नौकरी करती थी.यह इस समाज का विरोधाभासी कटु और स्याह पक्ष है.हाँ, उन्होंने बेटियों को परायेपन का टैग नहीं आत्मविश्वास का टैग लगा कर विदा किया था कि जब भी कोई मुसीबत आये अपनी अच्छी शिक्षा और संस्कार का सहारा लेना; फिर भी समाधान ना हो तो घर का हर सदस्य तुम्हारे साथ है.बेहिचक चली आना या हमें सूचित करना.
माता-पिता को बेटी को कभी यह सन्देश नहीं देना चाहिए कि वह उनके पास पराई अमानत है.बल्कि हर कदम पर बताना चाहिए ," वे उन्ही का अंश होती हैं और उनके लिए वे आजीवन बेहद महत्वपूर्ण हैं." उन्हें शिक्षित कर स्वावलंबी बनाना माता-पिता की उनके प्रति पहली ज़वाबदेही है.विवाह व्यवस्था समाज में आपसी संबंधों के विस्तार के लिए की गयी है.फिर भला शादी के उपरान्त माता-पिता के घर से बेटियों का नाता क्यों टूटे?जिस बेटी को पाल पोस कर हर सुख-दुःख में भागीदार बनाया वह पराई क्यों और कैसे हो सकती है?इस बात का हमेशा ख्याल रखा जाना चाहिए. कि समाज में मान-सम्मान प्रतिष्ठा से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है बच्चों की खुशी ,सुख और उनकी समाज और परिवार में सुरक्षा.

दरअसल ये रिश्ते इतने जटिल होते नहीं जितने बना दिए जाते हैं वज़ह है अहम् भाव .सबसे प्रथम कड़ी शुरू होती है इस अहम् से कि बहु
बार -बार मायके क्यों जाए,उसकी ज़रूरत पहले ससुराल में है
.अब ज़रा सा गौर किया जाए तो स्पष्ट है ------- क्या उस बहु के ससुराल आने के पूर्व घर नहीं चल रहा था?अगर माता-पिता को ज़रूरत है तो क्या ससुराल वालों की सहयोगपूर्ण जिम्मेदारी नहीं बनती कि उसे (बहु) वहां(मायके) भेजें?यकीन मानिए इससे उस बहु के मन में सम्मान की भावना जागृत होगी और वह दो घरों को जोड़ने के लिए एक मजबूत सेतु का काम करेगी.

हाँ, यहाँ बेटी के माता-पिता को थोड़ी सावधानी रखनी होगी कि प्यार के वशीभूत हो बार-बार उसे अनावश्यक रूप से ना बुलाएं .आखिर बेटी जब पढ़ने के लिए उनसे दूर जाती है तब भी तो वे उसके बगैर रह रहे थे न !तब उन्होंने बेटी को पढ़ाई में विघ्न ना हो ये ख्याल कर अपने से दूर रखा . अब भी वह कुछ जिम्मेदारी निभाने की राह पर ही तो बढ़ रही है.

यहाँ एक बात मैं और देखती हूँ कि कुछ बेटियाँ शादी के उपरान्त स्वयं को ससुराल में इतना व्यस्त कर लेती हैं कि माता-पिता के प्रति कर्त्तव्य को यह कह कर टाल देती हैं ," अब वहां हमारा क्या काम है? भैया-भाभी हैं ,उनकी(माता-पिता) सेवा करने के लिए,मैं अपनी ससुराल के लिए हूँ."ससुराल वालों के प्रति अपने कर्त्तव्य निभाना बहुत अच्छी बात है पर ज़रूरत पड़ने पर भाई-भाभी की मदद करना बेटियों को सदा परिवार के करीब रखने में भी सहायक होता है .साथ ही दो परिवार के स्नेह डोर की मजबूती भी इससे बनी रहेगी.भाई-भाभी भी बेटियों(बहनों) को पैत्रिक सम्पति पर हक के प्रतिद्वंदी के तौर पर कभी ना समझें.
बेटियों से भी मैं यही कहना चाहूंगी कि परम्पराओं ने भी उन्हें कभी पराया नहीं बनाया है;उन्हें ज़रूरत अपने वजूद,अपने अस्तित्व को मजबूती के साथ समाज के समक्ष रखने की है.यकीन करिए जब तक आप पूर्ण विश्वास के साथ स्वयं को दोनों घरों से जुडा मानती रहेंगी सभी को आप प्रिय और अपनी लगेंगी और यही अपनापन सर्वाधिक प्रिय होता है,जिसे अपना मानो वही प्रिय हो जाता है.अपना स्थान बेटियाँ समाज,परिवार,देश में खुद स्थापित कर लेती हैं,यही उनके आत्मविश्वास की दिव्य ज्योति है.


"दो घरों को जोड़ने वाली एक मजबूत सेतु और इज्ज़त है बेटी
अपनेपन से एक नहीं दो आशियाने को करती ज़न्नत है बेटी."

एक बार एक कार्यक्रम के दौरान counsellor ने हम सभी महिलाओं से प्रश्न किया,"अगर एक ही वक्त में आपके ससुराल और मायके दोनों जगह विवाह समारोह का आयोजन रखा गया हो तो आप का निर्णय किस स्थान पर जाने का होगा?"कई ज़वाब थे .मेरा ज़वाब था,"जहां मेरी ज्यादा ज़रूरत होगी मैं वहां जाने का निर्णय लूंगी."कभी-कभी ऐसा होता है कि ससुराल पक्ष में कोई ज़िम्मेदार हेल्पिंग हैण्ड ना हो और मायके में कई सहायक हों,या फिर हालात इसके ठीक विपरीत भी हो सकते हैं ऐसे में महज़ एक दर्शक की भूमिका निभाने से ज्यादा अच्छा है ज़िम्मेदारी निभाना.
अगर दोनों ही जगह हेल्पिंग हैण्ड की कमी नहीं है तो विवाह समारोह में एक जगह जाएं और reception में दूसरी जगह .वह भी ज़रूरत के हिसाब से पति-पत्नी(दोनों पक्ष) सहयोगिता पूर्ण माहौल में निर्णय ले लें.
बस समझदारी से अपनी बिटिया की परवरिश अभिभावक करते रहे तो परायेपन का यह शब्द उनकी बिटिया की ज़िंदगी के शब्दकोष से नदारद होगा.और उनकी बिटिया अपने नुपुर के रुनझुन की मधुर आवाज़ से दोनों घरों में संगीत लहरी बिखेरती रहेगी और गायेगी----

"माँ ने तो हमें जन्म दिया,सासू ने दिया हमें प्यारा पिया
रोशन हो दो घर मुझसे,मैं बन सकूँ ऐसा एक दीप्त दिया"

बेटियाँ पराई नहीं होती हैं ;अपने पराये के दायरे से कोसों दूर बेटियाँ भी तो बस अपना ही अंश होती हैं. जिस भारतीय संस्कृति की परम्पराओं के तहत ये दुहाई दी जाती है कि "बेटियाँ पराई होती हैं"वास्तव में दोष उस संस्कृति की परम्पराओं का नहीं ;दोष उस पर अमल करने वालों की सोच और समझ का है.


ठीक उस तरह जैसे अपने चहरे पर अवांछित तत्त्व की मौजूदगी से बेखबर होकर अपने आईने को दोष देना.
एक मशहूर शेर अर्ज़ करती हूँ
"यकीन मानिए हमारे ही चहरे पर धुल है
इलज़ाम लगाना आईने पर फ़िज़ूल है."

Sunday, September 30, 2012

हाँ, मुझे तलाश है

एक बात जो मुझे हमेशा सालती है वह यह कि इंसान विकास के क्रम में गगनचुम्बी इमारतों, विशाल भवनों को देखता है; ओह! उफ़! आह! कर विस्मित होता है;उनकी संरचना,बनावट की प्रशंसा  के कसीदे काढता है पर इस पुरे अवलोकन में नींव के उस पत्थर(सृजन के मूल ) की अवहेलना कर जाता है जिस पर उस भवन का अस्तित्व आरम्भ हुआ.आज हम सब की  यही मनोवृति है.बड़े होकर अपने माता-पिता को भूल जाना,उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपने गुरुजनों को भूलना,दुसरे शहर या परदेश जाकर अपनी मूल संस्कृति को विस्मृत करना.हर बार,हर जगह उस प्रथम स्त्रोत को भूलना,उसकी अवहेलना करना जो हमारे विकास रूपी भवन के नींव की प्रथम ईंट थी.
समाज बड़े-बड़े नेताओं को,संस्थान महत्वपूर्ण लोगों को सम्मानित करने,प्रतिभाओं की खोज में शहर दर शहर भटकने की कवायद में ऐसे अनेक अनदेखे सितारों को भूल जाता है जो नित्य रोशन हो रहे हैं या यूँ कहिये कि अगर वे सितारे अपनी टिमटिमाहट के साथ नभ में ना दिखें तो नभ सिर्फ काले शामियाने के सिवा कुछ ना दिखे. इसका भान उन्हें नहीं हो पाता.विकास के आरंभिक स्त्रोत,समाज के अग्रदूत,नित्य बिना किसी प्रचार-प्रसार की चाह रख कर समाज हित में सेवा देने वाले, ऐसे लोगों को ही समाज हाशिये पर रख देता है और मुख्य पृष्ठ पर दिखते हैं सिर्फ वे चहरे जो देश की संपत्ति, सत्ता ,शक्ति के बल-बूते सब कुछ बदल देने का बस दावा करते रहते हैं

विकास के आरंभिक बिंदु की अवहेलना हर देश,काल में की जा रही है.वह सुक्ष्म ज़रूर है पर उसकी सूक्ष्मता ने ही विकास की आधारशिला रखी हैआइये हम सब उस सुक्ष्म प्रथम कण ,नींव की प्रथम ईंट के प्रति कृतज्ञ हों उनका भी सम्मान करें उन्हें विस्मृत ना करें.
(सुख के सुखद स्त्रोत के साथ मुझे दुःख के स्त्रोत की भी तलाश है.मैंने यहाँ पांचवे stanza में समस्या के मूल या जड़ को पहचान कर समाधान प्राप्ति की प्रवृति का भी संकेत देने की छोटी सी कोशिश की है .)
*****************
सृजन के हर क्रम में
हाँ ,मुझे तलाश है...

1.........
उस प्रथम ईंट/प्रस्तर की
जिसने भवन की नींव रखी
उस मधुर प्रथम सरगम की
जिससे स्वर लहरी गूंजी
2 ............
उस प्रथम सुसुप्त बीज की
जिसकी जागृति से वृक्ष बना
माटी के उस प्रथम कण की
जिस पर विशाल पर्वत खडा

3 ..............
जल के प्रथम उस नन्हे बूंद की
जिसमें अथाह जलनिधि बसा

जीवन के उस प्रथम स्त्रोत की
है जिसने समस्त ब्रह्माण्ड रचा
4 ....................
ओस के उस प्रथम कण की
जिसने पर्ण दल पवित्र किया
सूर्य की उस प्रथम किरण की
जिससे जग में उजास बिखरा
5 ...................
दर्द के उस पहले एहसास की
जो बन आंसू नयन से छलका
गरल के उस तिक्त घूंट की भी
जिसके आस्वादन ने मृत किया

6..............
चमकते स्वेद बूंद की जो
श्रमिक के माथे से ढलका
प्रेम के प्रथम प्रस्फुटन की
जो भावावेग से मचला
7 ............
विचारों के विशाल सागर में
क्या थी चिंतन की प्रथम कड़ी
विकास के इस उन्नत शिखर पर
भुला मनुज वह प्रथम सीढ़ी

8 ............
पर मैं बेसब्र,व्याकुल हूँ बस
सोचती रहती
यही हर घड़ी
विशाल भवन दिखता सबको
नींव की ईंट क्यों दिखी नहीं ?

9 ...........
कहाँ है सृजन का प्रथम कण
हाँ,मुझे है तलाश उसकी
ताकि आरम्भ कर सकूँ
ऐसी सुन्दर एक नयी कृति
10 ............
नए सृजन,नए निर्माण की
जिसमें दिख सके वह प्रथम कड़ी
विकास की अनंत यात्रा में जो
जग के लिए हुई भूली-बिसरी .
.
************

ज़िंदगी मोड़ पर गुज़री,मैं सो न सका

मेरे प्रिय पाठकों/ब्लोगेर्स
यमुना का सप्रेम नमस्कार
महत्वपूर्ण दिवसों की श्रंखला में मैं अन्तराष्ट्रीय वृद्ध दिवस (1 october)के अवसर पर आप सब से रु-ब-रु हूँ.आज इस ब्लॉग के ज़रिये मैं आपको एक ऐसे बुजुर्ग से परिचित करने जा रही हूँ जो कोई चर्चित शख्शियत नहीं है फिर भी अनजाने में हुई उनसे एक छोटी सी मुलाकात ने मुझे खासा प्रभावित किया.यूँ भी मैं आम लोगों की सहज सोच और जीजिविषा से परिपूर्ण विचारों को जाने-माने शख्शियतों के अलंकृत विचारों से ज्यादा तवज्जो देती हूँ,उनके विचारों को आम ज़िंदगी में शामिल कर उन्हें स्वयं के लिए बेहद ख़ास मानती हूँ.
दोस्तों,आपको बता दूँ कि हर बच्चे की तरह मुझे भी बचपन से ही घूमने-फिरने का बहुत शौक रहा है .हाँ,अन्य बच्चों से मैं एक बात पर अंतर रखती थी. मुझे रेल यात्रा से अधिक सड़क यात्रा  और प्रत्येक बच्चों के खिड़की के नज़दीक बैठने की शगल से अलग मुझे चालक के पास वाली सीट भाती थी.इसकी एक खास वज़ह यह थी कि दौड़ते-भागते दृश्यों से भी ज्यादा मुझे वाहनों के पीछे लिखे सन्देश आकर्षित करते थे.आजकल ये सन्देश इक्का-दुक्का वाहनों में ही नज़र आते हैं. शायद यह सुरक्षा के दृष्टिकोण को रखकर लिया गया निर्णय हो क्योंकि पीछे के वाहन का चालक उस सन्देश को पढ़ने के मोह में पथ से विचलित हो कर दुर्घटना ना कर बैठे.पर मुझे लगता है कि कम से कम उस सन्देश को पढ़ने के लोभवश ही वाहन चालक अपने आगे की गाडी को overtake नहीं करता और दुर्घटनाएं कम होती.खैर.........
बचपन की रोचक आदतें हमारी शेष ज़िंदगी में भी ज्यों की त्यों शामिल हो जाती हैं.वाहन के पीछे लिखे सन्देश के इस विलुप्त होते प्रचलन के बीच ही दो महीने पूर्व मुझे एक यात्रा के दौरान ट्रक के पीछे लिखा एक बहुत ही संजीदा सन्देश पढ़ने को मिला...
राहों पर दुःख लाख देखे,पर मैं रो न सका
ज़िंदगी मोड़ पर गुज़री,और मैं सो न सका

चूँकि पिछले दो वर्षों से उस राह पर महीने में एक बार जाना हो जाता था इसलिए मुझे यह अंदाज़ा लगाना आसान था कि ठीक आधे घंटे बाद एक चाय की दूकान पर यह ट्रक अवश्य रुकेगी.मेरा अंदाज़ा बिलकुल सही था. हम उस दूकान पर रुके, मेरी बेसब्र निगाहों ने चैन की सांस ली जब पुनः वही सन्देश दिखाई दिया.मैंने अपने पतिदेव से उस ट्रक के चालक से औपचारिक बात करने की आज्ञा ली.अमूमन मेरी ऐसी किसी भी खोज और भावनाओं से वे पूर्णतः वाकिफ होते हैं और इसका मान भी रखते हैं.उन्होंने सहमति में सर हिलाया और चाय की चुस्कियां लेने में व्यस्त हो गए.मैंने उन बुजुर्ग चालक (सरदारजी) की आँखों में कार्य के प्रति गौरव और संतुष्टि की तेज चमक देखी.मैंने उनका अभिवादन कर कहा,"भैया,आपके वाहन के पीछे लिखे सन्देश ने मुझे बेहद प्रभावित किया है,क्या ये शब्द आपके हैं?"उन्होंने कहा,"शब्द की भावनाएं और गाडी दोनों मेरी हैं,मैं पिछले कई दिनों से घर से बाहर हूँ."फिर बेहद संजीदे लहजे में बात की,"मैडम हम ट्रक चालक भी किसी सभ्य की तरह रोटी कमाने के लिए घर से निकलते हैं,हमें भी अपने बच्चों और परिवार की बेहद फ़िक्र रहती है पर मुझे अत्यंत दुःख होता है जब छोटी गाड़ियों,दो पहिया वाहनों और कभी-कभी पैदल चलने वालों की असावधानी और सड़क नियमों की अवहेलना का खामियाजा हम बड़े वाहनों के चालकों को भुगतना पड़ता है.नियमबद्ध होने के बावजूद किसी भी दुर्घटना होने के बाद हमारे साथ मार-पीट की जाती है,हमारे वाहन जला दिए जाते है.और हमें एक घृणित टैग और लेबल दे दिया जाता है"पियक्कड़".(मुझे यह सुन कर बेहद दुःख हुआ क्योंकि समाज के प्रति संवेदनशील होने की वज़ह से मैं कहीं भी और किसी भी व्यक्ति,समाज,कम्युनिटी को किसी विशेष तरह के नकारात्मक लेबेल या टैग देने की प्रवृति की सख्त विरोधी हूँ) मैं तो शराब भी नहीं पीता,राह में कई बार घायल को देख कर रो भी नहीं पाता. हाँ,अन्य वाहनों से दुर्घटनाग्रस्त ,सड़क पर पड़े घायलों को अगर देख पाता हूँ तो हॉस्पिटल पहुँचाने में मदद ज़रूर करता हूँ .ऐसे कई चालक मेरे साथ हैं जो मेरी बहुत मदद करते हैं.कुछ महीनों बाद मैं ट्रक चलाना छोड़कर स्थाई तौर पर गाँव में बस जाउंगा और मेरा भतीजा यह काम करेगा.उनकी बातों में आत्मगौरव के साथ घर परिवार से दूर रहने की पीड़ा,सड़क पर समय काल के ग्रास बनने वालों के परिजनों की वेदना की प्रतिध्वनि सुनी जा सकती थी.उनके अंतिम शब्द ने जीवन को एक  सीख दे दी. "मैडम,सच कहूँ,हमारी ज़िंदगी मोड़ और सड़क पर ही व्यतीत हो जाती है."पतिदेव की चाय खत्म हो चुकी थी और वे तनिक जल्दी में थे अतः मुझे अनिच्छा से बातचीत को विराम देना पडा.मैंने उन्हें धन्यवाद देते हुए कहा,"भैया,मैंने स्वयं आप की कही बातों को पिछले कई यात्राओं में एहसास किया है."
SDC14246शेष मार्ग तय करते वक्त दिल को छू लेने वाली उन दो पंक्तियों के सन्देश के हर लब्ज़ सरदार जी के कहे लब्जों के साथ मिश्रित होकर असरदार औषधि बन, मस्तिष्क की कई स्मृतियों को चलचित्र की भांति प्रस्तुत करने लगे......अलसुबह साईकिल पर कोयले की बड़ी-बड़ी बोरियों को ले जाते लोग जो कोयले के बोझ से कई बार असंतुलित हो जाते थे, तेज गति से बाइक चलाते युवा,सड़क यातायात को बाधित करते रेस लगाते मनचले,overtake करते माचिस की डिब्बी जैसी छोटी-छोटी गाड़ियां जो बारिश के बाद अचानक निकले पतंगों सी लहरा कर भागती थी, क्षमता से भी ज्यादा सवारियों को बिठाये वाहन(संलग्न चित्र में देखा जा सकता है) ....ऐसी कई स्मृतियों के बीच यात्राओं के दौरान 95%  स्थितियों में हमारी गाडी को आगे बढ़ने का इशारा देते नियम बद्ध ट्रक चालक मुझे तीव्रता से याद आये. इन स्मृतियों के बीच एक गहन चिंतन ने भी दस्तक दी .चूँकि सफ़र की वे राहें बेहद जानी पहचानी थी इसलिए कुछ नयेपन को पा लेने की आशा पर वह दस्तक भारी पडी.मैं सोच रही थी हम सब की ज़िंदगी का सफ़र भी तो ऐसे कई मोड़ों से गुज़रता है....करियर बनाने का मोड़,नौकरी पाने का,प्रोन्नति का,विवाह सूत्र में बंध गृहस्थी बसाने का मोड़,संतान प्राप्ति का;फिर उन संतानों की शिक्षा और करियर बनाने का मोड़ .हर मोड़ के बाद एक नए की प्रतीक्षा और फिर उसे हासिल करने के बाद भी चैन की नींद नहीं .ज़िंदगी यूँ ही चलती रहती है और हम जीवन की सांध्य बेला में कदम रख लेते हैं
.किसी ने सच ही कहा है-
ये दुनिया अजीब सरायेखानी देखी
हर चीज़ यहाँ की आनी-जानी देखी
जो आकर ना जाए वह बुढापा देखा
जो जाकर न आए वह जवानी देखी

पर एक बात गौरतलब है ; इन मोड़ों पर एक अहम् बात हमसे अनजाने ही छुट जाती है वह है अपने नात-रिश्तेदारों के साथ आत्मीय सम्बन्ध की निरंतरता, जिसकी परिणति जीवन की सांझ बेला में एकाकीपन के रूप में परिलक्षित होती है.आजकल संतान की संख्या एक या दो ही होती है वे भी अपने करियर ,नौकरी चाकरी के चक्रव्यूह में फंसे दूर बस जाते हैं,सहकर्मियों के भीड़ में से कुछ चेहरे ही रिटायर्ड होने के बाद खोज-खबर लेते हैं.इन सभी बातों के मद्देनज़र जीवन की सांध्य बेला के लिए कुछ बातें स्मरणीय हो सकती हैं:-
1) हमेशा सक्रिय रहना . प्रातःकालीन भ्रमण,हलके योगासन,अच्छी पुस्कें पढ़ना,किसी ज़रूरतमंद को यथासंभव मदद करना ,अपने आस-पड़ोस को स्वानुभव से लाभान्वित करना और अपनी उपयोगिता समाज में बनाए रखना आवश्यक है.सर्वाधिक ज़रूरी है ,अपने कार्य को संतुष्टि के साथ निभाना ताकि अच्छे स्वास्थय का लाभ सदैव मिलता रहे;ठीक उन बुजुर्ग चालक,सरदारजी की तरह.
2) अपने करियर की कामयाबी को पारिवारिक रिश्तों की मजबूत डोर पर कभी हावी ना होने देना.समय-समय पर इन संबंधों की जड़ों को
प्यार और स्नेह भरे मुलाकाती जल से सिंचित करते रहना ताकि जीवन की सांध्य बेला के एकाकीपन की तपिश में ये विशाल दरख्त हमें भरपूर साया दे सकें.

3) जो संस्थाएं पालना घर का (creche ) का सञ्चालन करती हैं वे ज़रूरतमंद बुजुर्गों को सलाह-मशवरा तथा दिशानिर्देशन विभाग में रख कर उनके अमूल्य अनुभवों का लाभ उठाने के साथ उन्हें आर्थिक मदद भी कर सकती हैं.
4)वैसे तो आजकल गाँव की चौपाल संस्कृति भी विलुप्तिकरण के कगार में है पर इसी तर्ज़ पर शहरों में चलने वाले बुजुर्ग क्लब की सदस्यता लेकर बुजुर्ग लाभान्वित हो सकते हैं.अपने जैसे कई अन्य लोगों के साथ उन्हें उमंग और उत्साह के संग जीवन जीने की प्रेरणा मिलेगी.
5)एकाकी रहने वाले बुजुर्गों को आस-पास से बहुत अच्छे सम्बन्ध बना कर रखने चाहिए,उनके किसी भी एक सदस्य से रोज़ मुलाकात अवश्य करनी चाहिए .कहीं भी बाहर जाने से पूर्व अच्छे पड़ोसियों को सूचना देनी चाहिए ताकि वे उनके प्रति और घर के प्रति सजग रहे.पड़ोसियों को भी "अकेले हम;अकेले तुम"के आधुनिक फलसफे के कोकून से बाहर निकल कर बुजुर्गों के साथ आत्मीय सम्बन्ध रखते हुए उनकी यथासंभव मदद करनी चाहिए.यह privacy में दखल नहीं बल्कि "मैं हूँ ना"का अटूट भरोसा विकसित करता है.
6) युवाओं तथा बच्चों को अपने घर,परिवार,समाज के बुजुर्गों के अच्छे अनुभव से लाभ लेने के लिए सदा तत्पर रहना चाहिए.जो शिक्षा हमें उनसे मिल सकती है वह कोई इन्टरनेट या सोसिअल नेट वोर्किंग sites नहीं दे सकती क्योंकि वे अनुभव उन्हें ज़िंदगी के सफ़र में न जाने कितने ठोकरों और अनुभवों के बाद मिले होते है.ज़रूरत है उन्हें सम्मान प्यार और महत्व देकर अपने जीवन में शामिल करने की ताकि हम वे गलतियां ना दोहराएं जो उन्होंने की और उनके द्वारा किये गए सारे अच्छे कार्य और भी परिष्कृत और परिमार्जित रूप में सम्पादित कर समाज को लाभ पहुंचाएं.
7) युवावस्था में ही उम्र के अंतिम पड़ाव के लिए आर्थिक सुरक्षा की योजना बना लेनी चाहिए ताकि किसी का मोहताज़ बन कर ना जीना पड़े.
८)सरकारी कर्मचारियों को बुजुर्गों के द्वारा उनकी जमा धनराशि निकालने के दौरान उन्हें यथोचित सहायता करनी चाहिए,सरकारी योजनाओं का लाभ उन बुजुर्गों तक पहुँचाने के क्रियान्वन की जांच परख समयांतराल में होती रहनी चाहिए.
9) आर्थिक दृष्टिकोण से सक्षम युवा और बुजुर्ग विपन्न तथ निर्धन वर्ग के बुजुर्गों की सहायता के लिए संगठन बना कर उन्हें स्वस्थ तथा सम्मानित जीवन देने की दिशा में अमूल्य योगदान दे सकते हैं.
10) युवाओं तथा बच्चों के अभिभावकों को एक महत्वपूर्ण शिक्षा अवश्य ही देनी चाहिए कि वे बिना शर्त (आर्थिक अपेक्षा) के अपने रिश्तों को मजबूत बनाएं.लोगों की मदद सिर्फ इस लिए करें कि ईश्वर की अनुकम्पा से उन्हें इतनी सामर्थ्य मिली है और वे सिर्फ एक माध्यम और निमित्त हैं.
इस प्रकार हम प्रत्येक दिन अपने सुन्दर और विवेकपूर्ण कदमों से अपने घर,परिवार,समाज के सम्मानित बुजुर्गों को यथोचित स्थान देने के साथ स्वयं के जीवन सांध्य को भी सुरक्षित और खुबसूरत बना सकते हैं.
अंत में इस दिवस पर चंद काव्यात्मक पंक्तियाँ.....
ना रहो युवाओं अमर जवानी के भ्रम में
क्यों कुदरत के नियम को झुठला रहे हो ?
किसके कन्धों का कहो तुम लोगे सहारा
जो आज जवानी के जोश में इठला रहे हो.
बुजुर्ग हैं अनुभवों की खान,साए दरख्त के
कथन यही सदियों से हर जुबां कह रही है

क्यूँ पारंपरिक लीक से भटक रहे हो युवाओं
सचेत करती हर बुजुर्ग की सदा पूछ रही है.

निस्तब्धता को भंग करती वो सिसकियाँ

"मृत्यु से कहो,कब,कहां,किसकी कभी रही यारी है
आज जो चली गई मैं तो कल तुम्हारी भी बारी है."

जीवन को जीने की शैली और विवेकशीलता से हमारे स्वास्थय का सीधा सम्बन्ध होता है.फिर भी बीमारी ,दुर्घटना या यूँ कहें मृत्यु का भी सामना हम सब को करना ही पड़ता है.हमारी गतिविधि जीवन को भरपूर जीने और मृत्यु से बचने का जितना भी उपक्रम कर ले पर यह सत्य है कि तर्क शक्ति,ज्ञान-विज्ञान से लबरेज़ मानव मृत्यु के समक्ष आज भी उतना ही लाचार है जितना सभ्यता के प्रथम चरण पर था.एक डॉक्टर के लिए मौत उतनी ही निश्चित है जितनी एक मरीज़ के लिए है.
एक तरफ पुनर्जन्म और सात जन्मों के साथ की अवधारणा है तो दूसरी तरफ ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा के ज़ज्बे ,जिसने हमें दो बेहद विपरीत दिशाओं में ज़िंदगी जीने की राह दिखाई है.पहली धारणा अगले जन्म में दुःख,कष्ट ना भोगने के मोह में जहां हमें सात्विकता की ओर उन्मुख करती है तो दूसरी अवधारणा जब ज़िंदगी इसी एक जन्म में है तो जी भर भोग लिया जाए के बोध के साथ लोभ-लिप्सा.लुट-खसोट,भोगवादिता की ओर ले जाती है.ये वैसा ही है जैसे कुदरत में श्वेत और श्याम के बीच कई रंग बिखरे हैं पर चयन हमारा कि हमारे विवेक की कूची उन रंगों में से किन का चयन कर समाज के कैनवास को सजीवता से भरना चाहती है.
मृत्यु निश्चित है,इसे स्वीकार करना ही होगा.अपनी मृत्यु से ही ज्यादा अपनों के बिछोह का भय बेचैन करता है शायद यह आत्मीयता का मोहपाश होता है.पर इस सत्य में एक ही बात सांत्वना दे सकती है,वह कि हमारे आचार-विचार,व्यवहार ना हमारे लिए और ना ही दूसरों के लिए गलत या पीड़ादायक हों.सबके साथ सुन्दरता से जीवन जीने की शैली उनके मृत्यु के बाद हमें क्षोभ,ग्लानि और पश्चाताप से नहीं भरती बल्कि इस दुःख से परिपूर्ण माहौल में भी एक असीम शांति देती है कि जब तक हम उसके साथ रहे या वह हमारे साथ रहा हमने एक-दूसरे का पूरा ख्याल रखा,हमने बगैर शिकवे शिकायत के अपने जीवन लीला के किरदार बखूबी निभाए,.यही भाव जीवन और मृत्यु को निरपेक्ष भाव से देखने योग्य बनाता है. शेष सभी उपक्रम और गतिविधियाँ बेमानी हैं.इसलिए
मैंने यह कविता चार दिन पूर्व ही लिखी है.उम्र के इस पड़ाव में आकर अपने अनुभव के निचोड़ से मुझे यही कुछ अमृत बूंद मिले हैं जो मरने के बाद भी हम सब को जीवन देते हैं .बस.........आज इतना ही.
DEATHरात्रि की इस पूर्ण निस्तब्धता में
हर वह दिल हाहाकार करता है,
जिसका अपना बेहद ही करीबी
उससे दूर कहीं अन्यत्र बसता है.
.................................
रात्रि की कालिमा बेहद गहरी
उतरती उसके रूह में जाती है,
जिसकी प्यारी अनमोल छवि
क्रूर मृत्यु,अपने संग ले जाती है.
......................................
इस नीरवता को भंग करता
दिल जार-जार बिलखता है,
निगाहें कहीं शून्य को घूरती
अंतर्मन में सैलाब उमड़ता है.
..................................
दिन की आपाधापी में उसकी
छवि कठोर ज़मीं सी होती है,
पर कौन जाने उसके अन्दर
कसक इतनी भी भरी होती है.
...................................
लोरियां,कहानियां,थपकियाँ
सब बेअसर सी हुई जाती हैं,
उन सुरमई आँखों की नींदें
स्याह रजनी में डुबी जाती है.
.............................
जो नयन निर्जल हैं दिन में उनके
दुखों का अंदाज़ा कौन लगाए ?
निशा की निस्तब्धता भंग करते
इस शोर को शांत कौन कराए ?
...............................
ऐसे कई ग़मज़दा निज व्यथा से
मोमबत्ती बन पिघल रहे कोने में,
किसकी आहट पर यूँ चौंक रहे
किसका भान है उनके ना होने में.
................................
सुनो,सदा,राह से भटके,पथिको !
किस खोज में आज त्रस्त हो रहे?
मृत्यु के सत्य से यूँ मुख मोड़ कर
सत्तासीन,शक्ति बीच मस्त हो रहे.
................................
किसके लिए तिजोरियां अपनी
भरने पर तुम सब अमादा हो?
कौन भोगेगा, क्या ले जाओगे
पास तुम्हारे कम या ज्यादा हो.
.......................................
उठो,जागो  कि रात की नीरवता
किसी की सिसकी से भंग हो रही,

दिवस की तेज़ रोशनी भी देखो
रोज़ काली निशा में मंद हो रही.
......................................
मत करो दंभ ,निज शक्ति का तुम
ना सत्ता का यूँ कभी गुमान करो,
डरो आह से ,उन अभावग्रस्तों के
इस सूनेपन का तुम भी भान करो.
......................................
ना करो अति ,मान अमर स्वयं को
सब के नयन इस रजनी में सजल हैं,
निस्तब्धता को चीरती सिसकियाँ
कहती, मृत्यु के पहरे पल-पल हैं.

..........................................

Monday, August 6, 2012

मधुमालती,सच कहूँ;तुम बहुत याद आती हो ."

सावन के इस महीने में यादों से तर मस्तिष्क की ज़मीन पर वह सारी हरियाली सजीव हो उठती है जिनके साए तले मेरे हंसते-खेलते बचपन ने, झंझावातों से भरे किशोरावस्था और फिर चुपके -चुपके संजीदगी भरे युवावस्था की ओर कदम बढाया था.वर्त्तमान फ्लैट culture में रहते हुए उषा से निशा तक का वक्त,शीत से वसंत और फिर ग्रीष्म से वर्षा ऋतू का सफ़र मुझे हर पल पिता के घर की खुली वादियों में ले जाता है जहां की हरियाली में गज़ब सा मन मोहक आकर्षण था जिसने आज भी मुझे अपने मोह पाश में बाँध कर रखा है.
घर के पीछे एक नीलगिरी (euclyptus ) का विशाल वृक्ष था उसकी धरा पर गिरी सूखी पतियों से बड़ी भीनी खुशबू फैलती थी.बड़े होकर ज्ञात हुआ यही वह वृक्ष है जो भूजल के स्तर को कम कर देता है पर जीवन के उस वसंतकाल में तो बस अपने घर के आँगन में आराम कुर्सी में बैठ उस नीलगिरी के पीछे रुई से बादल और उन बादलों के पीछे लुकते-छिपते चाँद को निहारना मुझे बेहद अच्छा लगता था.ऐसा प्रतीत होता था मानो कोई रमणी घूँघट की ओट से निहार कर अपना चाँद सा चेहरा छुपा ले रही हो और लुका-छीपी की यह मनमोहक क्रीडा देखते -देखते मैं कब निद्रा देवी की गोद में समा जाती, एहसास ही नहीं होता था.माँ आकर जगाती और अपने कमरे में सोने को कहती जिसकी खिड़की के पीछे से आती रात रानी की भीनी मदहोश खुशबू पुरे कमरे को अपनी रूमानियत से सराबोर कर जाती थी. आँगन में कुछ समय तक एक इमली का वृक्ष भी रहा पर पड़ोस की दादीजी ने भूत-प्रेत के डर से पापा को उस वृक्ष को कटवाने का आदेश दे दिया था.मैं भूत वगैरह तो मानती नहीं थी और उस अल्हड उम्र में पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों से पूर्णतः गाफिल थी पर वृक्ष कट जाने पर फिर भी बहुत रोई थी,क्योंकि इमली खाने की पुरी चटोरी थी.घर के विशाल बागान में आम,अमरुद,शरीफा(सीताफल)सहजन के साथ कनेर फूल के भी पेड़ थे.एक वृक्ष और था जिसके पीछे मान्यता है कि वह हमेशा दो घरों के बीच ही उगता है और अपने नाम के अनुरूप पड़ोसियों से शत्रुता करवा बैठता है.हाँ, ठीक पहचाना--बेर का पेड़; जिसके विषय में कहते हैं कि यह वृक्ष बैर कराता है .ये बात और है कि उस बेर के पेड़ को साझा करने वाले बंगाली परिवार से हमारे हमेशा ही मधुर सम्बन्ध रहे.मुख्य द्वार (लोहे की मजबूत gate ) की दाईं ओर एक टेसू (ढ़ाक,पलाश)का वृक्ष था जो हमारे घर को दूर से ही अलग पहचान देता था.जिसके फूलों के आकर्षण से होली के त्यौहार में सारे बच्चे कट्टी- मिठ्ठी की भावना छोड़ मेरे घनिष्ठ मित्र बन जाते हम सब दो दिन पहले से ही टेसू के फूल रंग बनाने के लिए एकत्रित करने लगते थे.माँ बागान के अधिकाँश हिस्सों में kitchen गार्डेन विकसित करती जिसमें उगाई मौसमी सब्जियों से भोजन की थाली महक जाती थी.वह सारी हरियाली हमारे पीहर के आशियाने की ही नहीं ;;हमारी ज़िंदगी का भी श्रृंगार थी .हरा रंग आँखों को कितनी ठंडक देता था,हरी सब्जियां और ताजे फल की वज़ह से हमें कभी डॉक्टर के पास जाने की नौबत नहीं आती थी.
SDC13398इन सबके बीच सर्वाधिक लुभावनी थी प्यारी सी एक लता जिसे "मधुमालती" से संबोधित किया जाता है.आज भी अगर कहीं मधुमालती की लता दिख जाती है तो ख्यालों में मायके की वह हरियाली,पेड़ पर लगे झूले ,द्वार पर मधुमालती की तोरण ,रसोई की मौसमी सब्जियों,बागान के पके ताजे फल से रचे बसे सुखद और भीनी यादों के झोंकों के संग इस मरू में मरूद्यान का आभास जगा कर अंतर्मन को महका जाती हैं .मैं अपने फ्लैट की छत पर लगे गमलों और उस में उगाये पौधों को देख अपनी उसी मधुमालती से धीमे से कह जाती हूँ ,"देख,मधु, वृक्ष,पौधे,लता की हरियाली बोनसाई बन कर गमलों और छतों में सिमट आयी है. मधुमालती,सच कहूँ;तुम बहुत याद आती हो ."
प्रातः पलकें खुलते ही जब
खिड़की के बाहर देखा
मधुमालती मुख्य द्वार पर
शामियाने की छतरी ताने
एक मृदुल सुवास लिए अपने
गुलाबी सफ़ेद धारी दार
गुच्छेदार फूलों को हिलाकर
मानो अभिनन्दन कर रही थी..................
धीरे-धीरे सूर्य की किरणें
चहुँ ओर उजास फैलाने लगी
मधुमालती के छाँह तले
घर और आस-पास की औरतें
छोटे-मोटे काम निबटाने लगीं
दुनिया जहां की बातों के साथ
मानो उनकी समस्या का हल
उसकी सुवास के बगैर दुष्कर था ...............
दोपहर होते ही माँ की
आँख बचाकर घरों से निकले
नन्हे बच्चों की किलकारियों से
मानो यह निस्तब्ध बेला भी
गुले-गुलज़ार हो जाती

मधुमालती भी खुश हो कर
अपने दो-चार पुष्प बच्चों की
टोकरियों में उपहार दे जाती................
सांझ होते ही इधर देखती
आसमान में तारे टिमटिमाते
उधर मधुमालती के सितारों से
चमकते फूलों के नीचे
युवकों,बुजुर्गों की दुनिया सिमटती
उनके कहकहे और ठहाके
रात के सन्नाटे में भी
कितना उल्लास भर जाते ............

मधुमालती की मादक खुशबू से
उनकी नींद से बोझिल
पलकें मुंदने सी लगती
रात्रिभर पवन के झोंकों में
समाई उसकी भीनी खुशबू
सारे वातावरण को पवित्र करती................
सोचती हूँ काश!!आँगन में
तुलसी के बिरवे की तरह
द्वार पर मंगल सूचक
मधुमालती का तोरण
घर-घर में सजा होता

हरियाली सुख समृधि का
प्रतीक तो है ही
पर्यावरण के संरक्षण का
खुला एक एलान है
मधुमालती को गृह द्वार पर
खूबसूरती से सजाने वालों
हरियाली  आज भी बचाने वालों
आप सब को यमुना का सलाम है..
The tree is our teacher,imparting to us the lesson of nature that if we seek to progress outwardly we must first strengthen ourselves inwardly;we must begin from the base of our own selves before we can hope to build society a new.  (a quote )

Sunday, August 5, 2012

friendship ka ship titanic ship saa naa ho jaye (on friend ship day)

तुलसीकृत रामचरित मानस की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं
जे न मित्र दुःख होहिं दुखारी,तिन्ही बिलोकत पातक भारी...............
निज दुःख गिरि सम रज करी जाना,मित्रक दुःख रज मेरु समाना ...........
अर्थात जो मित्र के दुःख से दुखी नहीं होता वह पाप करता है. अपने पर्वत के सदृश बड़े दुःख को धुल जैसा छोटा और मित्र के धुल जैसे छोटे दुःख को पर्वत सा बड़ा समझना चाहिए.

आज के इस परिवेश में जहां दोस्ती,बंधुत्व भाव सोसिअल नेट्वोर्किंग sites ,parties वगैरह के माध्यम से सहजता से उपलब्ध हैं या यूँ कहिये; आज दोस्ती की पतंग समाज के खुले आकाश में ऊँची और ऊँची उड़ती जा रही है वहां यह नज़र डालना ज़रूरी है कि क्या इस दोस्ती भाव से जुड़े विश्वास की अटूट डोर भी उतनी ही मजबूत रह पायी है या छल,फरेब का मांझा बन कर एक डोर ही दुसरी को काट जमीन पर गिरने को विवश कर रही है और कभी-कभी तो कुछ बदनसीब पतंगों को ज़मीं भी मयस्सर नहीं होता.वे कटी पतंग किसी पेड़ की डाली पर अधर में लटकी रह जाती है.पता है क्यों?वह इसलिए कि
अब दोस्ती में न वह गर्मी है न वादे निभाने का जुनून
क्या करें दिल मिलाते ही नहीं हाथ मिलाने वाले

ऐसा मैं इस लिए कह रही हूँ क्योंकि नित्य घटती घटनाएं जहां दोस्त ही दोस्त का अपहरण कर फिरौती वसूल करता है,कभी-कभी तो ह्त्या जैसे घृणित वारदातों को भी दोस्त ही अंजाम दे देता है,लड़कियों और लड़कों की दोस्ती एम.एम एस ,बलात्कार जैसे अश्लील हरकतों पर आकर दम तोड़ देती है,दोस्ती के नाम पर कोई द्वापर युगीन कृष्ण बनने का दंभ लिए प्रकट तो ज़रूर होता है पर इस घोर कलयुग में दोस्ती की पवित्र चादर मैली कर साफगोई से निकल जाता है.बड़े-बड़े ओहदे वाले किसी गरीब सुदामा के दोस्त बन कर उसकी सादगी का गलत इस्तेमाल कर लेते हैं ,ये सब तो यही सोचने पर मजबूर करता है कि................
जब भी मिलना हो किसी से,ज़रा दूरी रखना
जान ले लेता है सीने से लगाने वाला

मेरे कॉलेज की एक सहेली थी बला की खुबसूरत पर उसकी एक आदत से मैं परेशान हो जाती थी.वह अपने बहुत सारे दोस्त बनाती और उनसे अपने नोट्स पुरे करवाती,उनके पैसों पर चाय नाश्ता करती और फिर चार पांच महीने बाद कोई और दोस्त बना लेती.समझाने पर बोलती ,"अरे!यार, मुझे उन्हें बेवकूफ बनाने में मज़ा आता है"एक दिन मैंने उसे समझाया,"सुनो,अगर तुम किसी को बेवकूफ बनाने में कामयाब होती हो तो यह सोचकर खुश मत हो कि तुम स्मार्ट हो बल्कि तुम यह सोचो कि वे सब तुम पर कितना विश्वास करते हैं,ये उनके विश्वास की जीत है जिसे तुम अपनी कामयाबी मान रही हो"जाने इस बात ने उस पर क्या असर किया उसने सच्ची दोस्ती निभाने का वादा किया और उस दिन के बाद किसी को बेवकूफ नहीं बनाया.
एक कहावत है'a friend in need is a friend indeed "जो ज़रूरत में काम आये वही वास्तव में दोस्त है"पर आजकल तो दोस्त ज़रूरत के साथ ही आते हैं और अगर किसी वज़ह से उनकी ज़रूरत पुरी ना हो पाए तो दोस्ती में दरार शुरू हो जाती है .दोस्त बनकर हितैषी भाव प्रदर्शित करने वालों का हुजूम कब आपकी बर्बादी का सबब बन जाए आपको पता तक नहीं चल पाता .उस वक्त के लिए तो एक मशहूर शेर ही सटीक लगता है...................
भीड़ में हर एक के हाथों में शगुफ्ता फूल थे
सर मेरा ज़ख़्मी हुआ बताओ किसके पत्थर से ??????????????

दोस्ती की किताब के किस पन्ने पर लिखा है कि अगर दोस्त ज़रूरत पुरी न कर पाए ,एक दूजे के मुताबिक़ उपयोगी न बन पाए या नसीब और पुरुषार्थ के बल पर ऊँचे ओहदे पर पहुँच कर अपनी कुछ सीमाओं की वज़ह से दोस्त को सहयोग न कर पाए तो उसे दुश्मन का खिताब दे दिया जाए.दोस्ती का रसायनशास्त्र chemistry इतनी शीघ्रता से परिवर्तित होना क्या सही है?

ऐसे में यही आशंका रह जाती है कि कहीं इस फ्रेंडशिप का शिप titanic शिप सा  न हो जाए
ऐसा नहीं है कि दोस्ती शब्द हर जगह एक कैंसर की तरह हो गया है.आज भी कई दोस्त पवित्रता के साथ हित भाव बंधुत्व बनाए हुए हैं.मुझे आज भी याद है पापा जब कार्य की व्यस्तता की वज़ह से हमें गाँव नहीं छोड़ पाते थे तो अपने दोस्त रहमान चाचा जिनका घर भी पास के गाँव में था उनके साथ बेफिक्र भेज देते थे.दोस्ती विश्वास की डोर से बंधी होती है चूँकि ये रक्त सम्बन्ध नहीं होते इसलिए विश्वास का यह पर्दा बेहद झीना होता है जो शक की हल्की से कैंची से भी तार-तार हो जाता है अतः एक दुसरे की मजबूरी,स्थिति ,को समझना दोस्ती के लिए अत्यावश्यक है.लड़कियों को इस लिहाज़ से हमेशा सजग रहने की ज़रूरत है कि मित्र बनाने के समय थोड़ा धैर्य से काम लें,लड़के हो या लडकियां स्वयं को बेवज़ह इस्तेमाल न होने दें ,दोस्त की कोई बात नागवार गुजरे तो स्पष्ट कहने का साहस रखें और एक बात अवश्य करिए कि अपने दोस्तों के विषय में घर के बड़ों को अवश्य अवगत करायें. ऐसी बात या ऐसी दोस्ती जो घर के बड़ों से छुप कर की जाए उसके बिगड़ने पर बेबसी के सिवा कुछ हाथ नहीं आता.सीधी सी बात यह है कि.............
चाहे जिससे भी वास्ता रखना
चल सको उतना फासला रखना

दोस्ती की सहज उपलब्धता,नए अंदाज़,नए तरीकों और इन सब की नजाकत को कुछ यूँ समझने की कोशिश करते हैं....................
दोस्ती के मायने कैसे,बदले हैं वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य में
मासूम,हित भाव,दम तोड़े हैं इस नवीन परिदृश्य में
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दोस्त तो मिलते हैं कई सोसिअल नेट वोर्किंग साइटों में
या फिर कभी यूँ ही कहीं भी होती, छोटी बड़ी, पार्टियों में
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भरोसा कभी न तोड़ने की,आपस में दी तसल्ली जाती है
मिलते रहेंगे, कहने की,कवायद भी खूब
निभाई जाती है
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द्वापर युगीन कृष्ण सुदामा,आज भी मिलते हैं जग में
निर्बाध रक्त दोस्ती का,बहता है उनके संपूर्ण रग-रग में
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आज भी इस युग का सुदामा, जाता नहीं श्रीकृष्ण के घर
श्रीकृष्ण ही रहते हैं देखो उसके,घर आने को सदैव तत्पर
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आना कृष्ण का घर सुदामा के ,दे जाता मीडीया को कवरेज
प्रचार तो सुदामा का भी होगा,स्वागत से फिर क्यूँ हो गुरेज़
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किमकर्तव्यविमुढ़ हो करता,हद से ज्यादा स्वागत-सत्कार
सारी असलियत समझता रहता,सुनता अंतर्मन की चीत्कार
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सुदामा को सदैव ही कृष्ण की,पद प्रतिष्ठा का है रहता भान
निभाये कैसे वह दोस्ती,सामने लक्षमण रेखा के हैं निशान
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एक ही बार चने के लिए,छला सुदामा ने कृष्ण को द्वापर युग में
छला जा रहा सुदामा आज,देखो बार-बार इस घोर कलयुग में
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कृष्ण को तो हर दिन इस युग में एक ,नया सुदामा मिल जाएगा
चंद लम्हों की इस पहचान को,क्या बिचारा सुदामा भूल पायेगा?
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ऐसी दोस्ती किस काम की जो,झूठ,फरेब,छल के पंक में सनी रहे
द्वापर युगीन दोस्ती की मिठास,काश! इस कल युग में भी बनी रहे
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(blog में लिखे शेर किसी मशहूर शायर के हैं )

Thursday, August 2, 2012

भीगी श्रावणी पूर्णिमा(d first and final call)

यमुना का प्यार भरा नमस्कार और रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाअगर कोई भाई - बहन आपस में रूठे हुए हों तो मेरी गुजारिश है कि इस शुभ अवसर पर सारी नाराज़गी मिटा लें
यह पर्व आज से महज़ चार-पांच वर्ष पूर्व मेरे लिए बहुत ही खुबसूरत होता था ,मैं बेसब्री से इस श्रावणी पूर्णिमा का इंतज़ार करती थी पर अब यह पर्व अपनी अज़ीज़ प्रिया के दुखों से जुड़ गया है जिसकी वज़ह से इस अवसर पर पूर्ण उल्लास नहीं रह पाता.
अपने हमसफ़र के स्थानान्तरण होने पर नए स्थान के नए विद्यालय से जुड़ने के क्रम में ही प्रिया से मेरी मुलाक़ात हुई थी.प्रथम दिन ही विद्यालय के अध्यापक-अध्यापिकाओं के अच्छे-खासे समूह में वह एक चेहरा था;आत्मविश्वास से लबरेज़,हंसता-मुस्कराता,चंचल सी आँखें,लब मानो सब कुछ इसी क्षण बोल जाएंगे.हाँ, प्रिया में गज़ब सा आकर्षण था.औपचारिक बातचीत के बाद कुछ ही दिनों में हम दोनों में एक अनाम रिश्ते की घनिष्ठता हो गयी.वह मुझसे दस वर्ष छोटी थी पर हम हर बात बेझिझक करते,मुझे नए परिवेश में उसका भरपूर सहयोग मिलता था.मैं अपनी बिटिया के लिए कुछ भी पसंदीदा भोजन बनाती तो प्रिया के लिए भी अलग डिब्बे में अवश्य पैक करती;उसे मेरे हाथों का बना केक बहुत पसंद था .वह एक कुशल शिक्षिका थी,उसके मुख की भाव-भंगिमा,अभिव्यक्ति उसकी कही गयी बातों को बेहद खूबसूरती से सामने वाले को समझा देते थे.शायद इसी लिए वह प्रिया थी, सबकी चहेती.
वह अपनी बातों में अपने भाई टुकटुक का ज़िक्र ज़रूर करती,यूँ कहिये कि उसकी बातें उसी से आरम्भ होती और उसी पर ख़त्म हो जाती थी.एक दिन उसने कहा,"मैम, आज मेरे घर के लिए बहुत खुशी का दिन है मेरा भाई यु.के.जा रहा है."मैं तो उसके हर पल में इस कदर शामिल हो गयी थी कि उसकी खुशी मेरी अपनी खुशी थी और उसका दुःख मेरा निजी दुःख.उसके भाई का जन्मदिवस विजयादशमी को होता था.टुकटुक जब जन्म दिवस के शुभ अवसर पर कोलकाता से घर गया तो वह हर रिश्तेदार से मिला क्योंकि उसे परदेश जाना था.पहली बार उसने मुझसे भी फोन पर बात की "मैम मैं बेहद खुश हूँ,आपका भी आशीर्वाद चाहिए" मुझे भी बहुत खुशी हुई.वह कुछ दिनों बाद वापस चला गया.
दीपावली पर जब मैं अवकाश पर थी ,एक दिन अचानक प्रिया का कॉल आया,उसने कहा,"मैम,मैं भाई से मिलने जा रही हूँ"मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ सोचा ,अभी तो बीस दिन पूर्व ही वे सब मिले थे.मैं व्यग्र हो गयी पर उसने आगे कुछ कहे बिना ही फोन रख दिया .अगले दिन कॉल करने पर उसने बताया "टुकटुक बहुत बीमार है,उसे डेंगू हो गया है.उसके पुरे शरीर पर पट्टियां बांधी गयी हैं."जब यह बात मैंने अपने पतिदेव को बताई तो उन्होंने इतना ही कहा "बात गंभीर है"मैंने प्रिया को झूठी सांत्वना दी कि सब ठीक हो जाएगा जबकि जानती थी, बहुत कुछ क्षण भर में प्रिया की ज़िंदगी को बदल देने वाला था.मैं रात भर ठीक से सो नहीं पायी.रात के ठीक दो बजे उसके किसी रिश्तेदार का कॉल मिला.उन्होंने इतना ही कहा," प्रिया के सेल में जो मुख्य नंबर हैं उनमें सूचित कर बुरी खबरदे रहा हूँ ,टुकटुक इस दुनिया में नहीं रहा."ज़ेहन में बसे प्रिया के मुस्कराते चेहरे को परिवर्तित होने में एक लम्हा भी न लगा,जानती थी वह होनहार भाई अपनी बहन की मुस्कान भी अपने साथ ही ले गया.
प्रिया ने कार्य से इस्तीफा दे दिया अब उसे अपने माता -पिता का सहारा बनना था.विद्यालय में मेरी बगल की सीट खाली रहती,प्रिया नहीं दीखती थी.कुछ दिनों उपरांत मैंने भी विद्यालय छोड़ दिया.घटना के चार महीनों बाद प्रिया को यह सोच कर अपने घर बुलाया ताकि वह सब भूल कर अपना मन हल्का कर सके .उसने रोते हुए एक ही बात कही,"अगर टुकटुक का विवाह हुआ होता तो कम से कम उसकी कोई निशानी तो हमारे पास होती,हम बहुत अकेले हो गए हैं."मैंने उसे समझाया कि ऐसा होने पर उससे जुडा एक और रिश्ता कितना परेशान होता.पर उसके अव्यक्त दुःख को इन बातों से कब तक दूर किया जा सकता था.
प्रिया से अब भी फोन पर बात होती है पर मैंने अपनी चंचल सी उस प्रिया को हमेशा के लिए खो दिया है. अब जो प्रिया बात करती है उससे मेरी ही आवाज़ नहीं मिल पाती .ऐसा लगता है; आवाज़ किसी गहरी खाई से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है.राखी का त्यौहार उसके लिए अब बेमानी हो गया और उससे जुडी मैं, उसके भाई को कभी नहीं भुला पाती जिसे मैं ने कभी देखा ही नहीं था;जानती थी तो बस प्रिया की ज़ुबानी या फिर एक बार फोन पर बात किया था वही मेरे लिए उससे पहली और अंतिम बात रही. (first & final call)
दिल में छुपा यह गहरा बादल
आँखों की राह बरसता जाए
सूर्य न दिखता, घनघोर मेघ है
कहो,आंसू अब कौन सूखा पाए?
...............
यह गहन उदासी धीमे-धीमे
पारदर्शी बूंदों सी उतर रही है
अब तो हर श्रावणी पूर्णिमा
अश्कों से भीगी गुज़र रही है

..........
भाई के मेरे खिलौने छुपाने पर
ओह!मैं कितना शोर मचाती थी
मिठाई, टॉफी, उपहारों में भी
पना हिस्सा वृहद् बनाती थी
............
किसे चिढ़ाऊं,अब झगडूं किससे
ऐसे कई प्रश्न हैं दिल को मथ रहे
कैसे आ पायेगा वह सुदूर देश से
बस यादें ही अब तो साथ रहे
...........
घर के आँगन में व्यतीत पलों की
धुंधली यादें चटकीली हुई आज
वह ही था मित्र-शत्रु बचपन का
राखी थाली पर धरी हुई आज

...................
संग उसके हँसते-खेलते ही तो
मैं सदियाँ भी पल में जीती थी
पल ही यूँ बन जायेंगे सदियाँ
नहीं किसी क्षण में सोची थी
..............
किससे कहूँ वेदना दिल की
मुझको यहाँ किसका साथ है
गम का अन्धेरा इतना गहरा
हाथों को ना दिखता हाथ है

...................
समझाऊं कैसे जननी को कि
अब सहारा मुझे ही मान ले
जिम्मेदारी निभा सकूँ भाई सी
मेरे कटे पंखों में ऐसी जान दे


Thursday, May 3, 2012

"सात फेरे;सात वचन"

"स्त्री स्वतन्त्रता में सबसे बड़ा अवरोध उनके साथ आबद्ध प्रतीक चिन्हों का होना है जो नारी दासता के परिपोषक होने के साथ उन्हें खुले वातावरण में सांस लेने से रोकते हैं "इस विचारधारा के पक्ष या विपक्ष के पूर्व हमें' प्रतीक चिन्हों के महत्व' और 'नारी स्वतन्त्रता' दोनों को ही गहनता से समझना होगा.
प्रतीक चिहन समाज द्वारा बनाई गयी पवित्र व्यवस्था 'विवाह सूत्र'की देन है जो १६ संस्कारों (गर्भाधान,पुंसवन,सीमंतोंनयन,जातकर्म,नामकरण,निष्क्रमण,अन्नप्राशन,चूडाकर्म ,कर्णछेदन,विद्यारम्भ,उपनयन,वेदारम्भ,समावर्तन,विवाह,वानप्रस्थ,अंत्येष्टि )में से एक है.संस्कार का अर्थ ही है परिमार्जन या शुद्धिकरण.प्राचीन समाज ने व्यवस्थित विधि से जीवन प्रत्याशा 100 वर्ष  की मान कर इसे चार आश्रम -ब्रहमचर्य,गृहस्थ,वानप्रस्थ और संन्यास में बाँट दिया था.विवाह गृहस्थ आश्रम से जुड़ा संस्कार है  और सिंदूर,मंगल सूत्र आदि प्रतीक इससे जोड़े गए हैं '.मंगल' अर्थात शुभ और 'सूत्र' यानि धागा या बंधन.इस तरह दो अलग-अलग रक्त संबंधों को मर्यादित रूप से संतानोतापत्ति,यौन संतुष्टि,की  सामाजिक सहमति प्राप्त होती है.सिंदूर का लाल रंग रक्त का रंग है जो जीवन को शक्ति देता रहता है ,यह ऊर्जा तथा प्यार का भी रंग है जो सात फेरे,सात वचन के साथ ताउम्र उसकी रक्षा का वचन लेते हुए पुरुष स्त्री को पहना देता है  जो उसके जीवित रहने तक पत्नी धारण करती है .कहा जाता है कि विवाह सात जन्मों का बंधन है और जोडियाँ स्वर्ग में बनती हैं .एक सत्संग में पंडित जी की बात याद आती है.उन्होंने कहा," जिन दम्पति में बहुत लड़ाई होती है वे प्रथम जन्म के विवाह बंधन में बंधे होते हैं और जिनमें बिलकुल लड़ाई नहीं होती, समझ लो, ये उनका सातवें जन्म का विवाह बंधन है."दरअसल ये बात सांकेतिक है .
पति-पत्नी का एक दुसरे की ज़िन्दगी में होना ही संगीत उत्पन्न करता है,विवाह सात फेरे एक दिन में ले लेने मात्र से ही पूर्ण नहीं हो जाता,हम धीरे-धीरे व्यवस्था में जाते हैं ,एक-दुसरे को समझने की राह में और प्रतीक चिन्ह एक आत्मीय सम्बन्ध की दिशा में कड़ी का काम करते हैं.किसी एक व्यक्ति से इतना अपनापन कि उसके लिए सजना संवारना और एहसास करना कि कोई मेरा है और मैं किसी की हूँ ,यह हमसफ़र को भी एहसास दिलाता है कि कोई ऐसी है जो उसके नाम से समाज में पहचानी जाती है और उसके दायित्वों से वह बंधा हुआ है ;यह आत्मीयता स्वतः अनैतिक संबंधों के सारे दरवाजे बंद कर देती है पर इसके लिए इन सारी चीज़ों को दिल से महसूस करना होता है.महिला के द्वारा इन प्रतीकों को धारण करना उसकी दासता का प्रतीक कभी नहीं है यह उसका गौरव है .
कुदरत में गणितीय सिद्धांत नहीं है कि १=१ या स्त्री=पुरुष . यहाँ जैविक तौर पर स्त्री ,पुरुष से अलग है क्योंकि उसे सृजन करने की शक्ति है और इसका अंजाम वह भोग्या के रूप में पुरुष द्वारा शोषित होकर पाती है .इसलिए उसे किसी एक के जीवन से जोड़ा जाना ज़रूरी समझा गया.और प्रमाण के तौर पर सिंदूर,मंगलसूत्र जैसे कुछ प्रतीक चिन्ह दिए गए.ताकि एक सुव्यवस्थित समाज की स्थापना हो सके.

अब बात करते हैं स्वतन्त्रता की,जिसका वास्तविक अर्थ है जो हम वास्तव में होना चाहते हैं वह होने की शक्ति,अपने मूल व्यक्तित्व इच्छा के साथ होना,वही सोचना जो हम चाहते हैं,वही बोलना जो हमारा अंतर्मन कहता है वही करना जो हमारी आत्मा गवाही दे.पर इन सब स्वतंत्रता  के साथ शुरू होता है एक  विवेकपूर्ण चिंतन कि हम वास्तव में जो चाहते हैं क्या वह विवेकसंगत है? उसकी प्राप्ति के साधन क्या हैं?उस स्वतन्त्रता का हम क्या मूल्य चुका रहे हैं?आदि............
आज से कुछ दशकों पूर्व नारी स्वातंत्र्य की राह में प्रतीक चिन्ह अवरोध हैं ये सोच ही कल्पनातीत थी पर आज नारी meal  maker से deal maker हो रही है और कुछ संस्थानों के परिवेश के तहत मंगल सूत्र या सिंदूर लगाना असुविधाजनक हो सकता है. मसलन अगर कोरपोरेट क्षेत्र में कार्यरत महिलाएं पश्चिमी वेश भूषा में इसे असुविधाजनक मानती हैं तो उन्हें जोर ज़बरजस्ती से इन प्रतीकों को पहनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता ये उनके भावनात्मक जुड़ाव से सम्बन्ध रखता है क्योंकि इनके प्रति उनकी श्रद्धा और जुड़ाव होने पर वे अल्प मात्रा में ही सही पर इनको पहनती अवश्य हैं..परिवेश,वेश भूषा के साथ समायोजन में  उन्हें अत्यधिक श्रृंगार बंधन लग सकता है पर ऐसी विचारधारा वाली महिलाओं  की संख्या आज भी बहुत कम है.अगर कोई स्त्री इन प्रतीकों को धारण नहीं करती तो ये मानना भी गलत है कि उसकी आत्मीयता अपने हमसफ़र से नहीं है क्योंकि 
Husband is in his  wife as the  sun is in the colour and wife is in her  husband as fragnance is in a flower .
A successful married life depends upon fidelity,trust,love,understanding and mental capability.If there is love between the couples ,all other adjustments are easy and the best proof of love is TRUST .It comes in the form of a sense ,a well being,peace ,contentment,and the feeling that"I BELONG TO SOMEONE AND SOMEONE BELONGS TO ME."
हम किस तरह की नारी मुक्ति  की बात कर रहे हैं .विकास की राह में इन चिन्हों के साथ ही कई महिलाएं आगे बढ़ रही हैं.अपने अस्तित्व ,अपनी पहचान बना पा रही हैं ,प्रतिभा पाटिल जी को देश का बच्चा बच्चा जानता है पर उनके पति को कितने लोग जानते हैं?
 सिंदूर,बिंदी धारण करने से अगर स्वतंत्रता हटती है तो फिर हमारे देश की प्रथम महिला आज उस पद पर कैसे होती ?लोक सभा स्पीकर मीरा कुमार जी आज सदन के उस पद को कैसे सुशोभित कर रही होती?दरअसल यह दासता और आज़ादी की  बात ही बेमानी है .प्रतीक चिन्ह स्त्री की किस  सीमा का निर्धारण करते हैं ?जो सीमा विवाहित स्त्री के लिए है वह तो अविवाहित लड़कियों के लिए भी है.नैतिक मर्यादा,पारिवारिक संबंधों की गरिमा,आपसी आत्मीयता की रक्षा यह तो पुरुष पर भी उतना ही लागू होता है.फिर देखा जाए तो इन चिन्हों को पहनाने वाला पुरुष तो खुद नैतिक सीमाओं में बंध जाता है वह  तो अपनी कई आज़ादी खो देता है मसलन ; देर रात तक घर से बाहर  नहीं रहना,दोस्त भी जांच परख कर बनाना ,अपनी महिला मित्रों  की सूची  पत्नी के मस्तिष्क  में पाक साफ़ रूप से अंकित कर देना वगैरह वगैरह.............
मुझे   याद है जब  अपने विवाह के अल्बम में सिंदूर दान  की तस्वीर देखकर मैंने पूछा,"आप इस तस्वीर में क्यों अत्यंत गंभीर लग लगे हैं ?"उन्होंने  ने कहा,पता  नहीं सिंदूर पहनाते  ही मुझे ऐसा  एहसास हुआ  कि कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी  है आज से एक अनजानी सी लडकी की ज़िम्मेदारी मुझे सिर्फ  मुझे लेनी  है ."सच कहूँ तो निष्कर्ष  तो यही  है कि प्रतीक चिन्हों से या विवाह व्यवस्था से दोनों ही मर्यादा और सीमा के दायरे में अपने अस्तित्व का विकास करते हैं .किसी की स्वतन्त्रता का हनन इससे नहीं होता .

'quality  of  लाइफ' के  एक session में एक दम्पति ने कहा उनका रिश्ता ३६ के आंकड़े (एक दूजे से बिलकुल विपरीत)पर आधारित है,दुसरे ने कहा ६३ पर(हर बात पर आमने सामने)तीसरे ने कहा ३३ पर(पत्नी पति की अनुगामिनी) और चौथे ने कहा कि उनका रिश्ता ६६ के आंकड़े (पति पत्नी का अनुगामी )पर आधारित है.मैं एक बात स्पष्ट तौर पर कह सकती हूँ कि ये सभी आंकड़े ही  दासता और स्वतन्त्रता की बहस जारी रखेंगे.इसलिए ज़नाब, मेरी मानिए तो २२ का आंकड़ा रखिये "दो कदम तुम भी चलो,दो कदम हम भी चले"जहां न कोई बंधन न कोई आज़ादी .........बस विवाह व्यवस्था में होना ही सबसे बड़ी बात है.एक आदर्श समायोजन,एक आदर्श स्थिति. यह सही है क्यों कि एक सुखद दाम्पत्य ,जीवन के हर कठिन पल में मजबूती के साथ टिके रहने का हौसला देता है .परम्पराएं छोटी-छोटी होती हैं पर सुन्दर संबंधों की आधारशिला का काम भी करती हैं.

.कभी तारों को चमकने के लिए ,फूलों को खिलने के लिए,पक्षी को उड़ने के लिए संघर्ष करते देखा है? नहीं ना,क्योंकि यह सहज हैं .इसी प्रकार सहज सम्बन्ध और उससे जुडी मान्यताएं और परम्पराएं कभी संघर्ष नहीं करते.
 मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह है कि मैं प्रतीक चिन्हों को धारण कर गौरवान्वित होती हूँ क्योंकि यह मेरी सबसे सुदृढ़ शक्ति के रूप में मुझे भावनात्मक रूप से अपने हमसफ़र के संग जोड़े रखता है.जहां तक मेरी स्वतन्त्रता की बात है ,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो विवाह के बाद और निखर गयी क्योंकि मुझे सदा इनकी प्रेरणा मिलती रही.समाज पति-पत्नी को एक साथ सम्मान के नज़र से देखता है पर एक मर्यादित और गरिमामयी सम्बन्ध की भी सदैव अपेक्षा करता है.मैं इन चिन्हों को पहन कर सदा सुहागन रहने की ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ क्योंकि
"सब कुछ तो मिल गया है तुझे मांगने के बाद
उठते नहीं हैं हाथ मेरे इस दुआ के बाद "
मैंने माँगी थी जो दुआ वो  कबूल हो गयी .
सिंदूर,मंगलसूत्र धारण करने से स्त्री की लावण्यता में एक निखार आता है यह अवश्य ही आत्मीय भावना की प्रेरक शक्ति का प्रभाव होता है .इनका खो जाना एक स्त्री  के जीवन का सबसे बुरा वक्त होता है.हमारे समाज की व्यवस्था ऐसी है कि आज भी विवाहिता सम्मान की दृष्टि से देखी जाती है.किसी भी शुभ कार्य में पति-पत्नी का साथ उपस्थित होना अच्छा माना जाता है.

सौभाग्य प्रतीक काला मंगल  सूत्र
विवाहिता की गरिमामयी शोभा है
रक्तिम लाल रंग के सिंदूर ने ही तो
चमकाई दुल्हन के मुख की आभा है

सात फेरे और सात वचन संग वह
साथ सात जन्म का ही तो चाहती है
हर विवाहिता स्वयं के लिए वरदान
एक बस सदा सुहागन का मांगती है