Monday, August 6, 2012

मधुमालती,सच कहूँ;तुम बहुत याद आती हो ."

सावन के इस महीने में यादों से तर मस्तिष्क की ज़मीन पर वह सारी हरियाली सजीव हो उठती है जिनके साए तले मेरे हंसते-खेलते बचपन ने, झंझावातों से भरे किशोरावस्था और फिर चुपके -चुपके संजीदगी भरे युवावस्था की ओर कदम बढाया था.वर्त्तमान फ्लैट culture में रहते हुए उषा से निशा तक का वक्त,शीत से वसंत और फिर ग्रीष्म से वर्षा ऋतू का सफ़र मुझे हर पल पिता के घर की खुली वादियों में ले जाता है जहां की हरियाली में गज़ब सा मन मोहक आकर्षण था जिसने आज भी मुझे अपने मोह पाश में बाँध कर रखा है.
घर के पीछे एक नीलगिरी (euclyptus ) का विशाल वृक्ष था उसकी धरा पर गिरी सूखी पतियों से बड़ी भीनी खुशबू फैलती थी.बड़े होकर ज्ञात हुआ यही वह वृक्ष है जो भूजल के स्तर को कम कर देता है पर जीवन के उस वसंतकाल में तो बस अपने घर के आँगन में आराम कुर्सी में बैठ उस नीलगिरी के पीछे रुई से बादल और उन बादलों के पीछे लुकते-छिपते चाँद को निहारना मुझे बेहद अच्छा लगता था.ऐसा प्रतीत होता था मानो कोई रमणी घूँघट की ओट से निहार कर अपना चाँद सा चेहरा छुपा ले रही हो और लुका-छीपी की यह मनमोहक क्रीडा देखते -देखते मैं कब निद्रा देवी की गोद में समा जाती, एहसास ही नहीं होता था.माँ आकर जगाती और अपने कमरे में सोने को कहती जिसकी खिड़की के पीछे से आती रात रानी की भीनी मदहोश खुशबू पुरे कमरे को अपनी रूमानियत से सराबोर कर जाती थी. आँगन में कुछ समय तक एक इमली का वृक्ष भी रहा पर पड़ोस की दादीजी ने भूत-प्रेत के डर से पापा को उस वृक्ष को कटवाने का आदेश दे दिया था.मैं भूत वगैरह तो मानती नहीं थी और उस अल्हड उम्र में पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों से पूर्णतः गाफिल थी पर वृक्ष कट जाने पर फिर भी बहुत रोई थी,क्योंकि इमली खाने की पुरी चटोरी थी.घर के विशाल बागान में आम,अमरुद,शरीफा(सीताफल)सहजन के साथ कनेर फूल के भी पेड़ थे.एक वृक्ष और था जिसके पीछे मान्यता है कि वह हमेशा दो घरों के बीच ही उगता है और अपने नाम के अनुरूप पड़ोसियों से शत्रुता करवा बैठता है.हाँ, ठीक पहचाना--बेर का पेड़; जिसके विषय में कहते हैं कि यह वृक्ष बैर कराता है .ये बात और है कि उस बेर के पेड़ को साझा करने वाले बंगाली परिवार से हमारे हमेशा ही मधुर सम्बन्ध रहे.मुख्य द्वार (लोहे की मजबूत gate ) की दाईं ओर एक टेसू (ढ़ाक,पलाश)का वृक्ष था जो हमारे घर को दूर से ही अलग पहचान देता था.जिसके फूलों के आकर्षण से होली के त्यौहार में सारे बच्चे कट्टी- मिठ्ठी की भावना छोड़ मेरे घनिष्ठ मित्र बन जाते हम सब दो दिन पहले से ही टेसू के फूल रंग बनाने के लिए एकत्रित करने लगते थे.माँ बागान के अधिकाँश हिस्सों में kitchen गार्डेन विकसित करती जिसमें उगाई मौसमी सब्जियों से भोजन की थाली महक जाती थी.वह सारी हरियाली हमारे पीहर के आशियाने की ही नहीं ;;हमारी ज़िंदगी का भी श्रृंगार थी .हरा रंग आँखों को कितनी ठंडक देता था,हरी सब्जियां और ताजे फल की वज़ह से हमें कभी डॉक्टर के पास जाने की नौबत नहीं आती थी.
SDC13398इन सबके बीच सर्वाधिक लुभावनी थी प्यारी सी एक लता जिसे "मधुमालती" से संबोधित किया जाता है.आज भी अगर कहीं मधुमालती की लता दिख जाती है तो ख्यालों में मायके की वह हरियाली,पेड़ पर लगे झूले ,द्वार पर मधुमालती की तोरण ,रसोई की मौसमी सब्जियों,बागान के पके ताजे फल से रचे बसे सुखद और भीनी यादों के झोंकों के संग इस मरू में मरूद्यान का आभास जगा कर अंतर्मन को महका जाती हैं .मैं अपने फ्लैट की छत पर लगे गमलों और उस में उगाये पौधों को देख अपनी उसी मधुमालती से धीमे से कह जाती हूँ ,"देख,मधु, वृक्ष,पौधे,लता की हरियाली बोनसाई बन कर गमलों और छतों में सिमट आयी है. मधुमालती,सच कहूँ;तुम बहुत याद आती हो ."
प्रातः पलकें खुलते ही जब
खिड़की के बाहर देखा
मधुमालती मुख्य द्वार पर
शामियाने की छतरी ताने
एक मृदुल सुवास लिए अपने
गुलाबी सफ़ेद धारी दार
गुच्छेदार फूलों को हिलाकर
मानो अभिनन्दन कर रही थी..................
धीरे-धीरे सूर्य की किरणें
चहुँ ओर उजास फैलाने लगी
मधुमालती के छाँह तले
घर और आस-पास की औरतें
छोटे-मोटे काम निबटाने लगीं
दुनिया जहां की बातों के साथ
मानो उनकी समस्या का हल
उसकी सुवास के बगैर दुष्कर था ...............
दोपहर होते ही माँ की
आँख बचाकर घरों से निकले
नन्हे बच्चों की किलकारियों से
मानो यह निस्तब्ध बेला भी
गुले-गुलज़ार हो जाती

मधुमालती भी खुश हो कर
अपने दो-चार पुष्प बच्चों की
टोकरियों में उपहार दे जाती................
सांझ होते ही इधर देखती
आसमान में तारे टिमटिमाते
उधर मधुमालती के सितारों से
चमकते फूलों के नीचे
युवकों,बुजुर्गों की दुनिया सिमटती
उनके कहकहे और ठहाके
रात के सन्नाटे में भी
कितना उल्लास भर जाते ............

मधुमालती की मादक खुशबू से
उनकी नींद से बोझिल
पलकें मुंदने सी लगती
रात्रिभर पवन के झोंकों में
समाई उसकी भीनी खुशबू
सारे वातावरण को पवित्र करती................
सोचती हूँ काश!!आँगन में
तुलसी के बिरवे की तरह
द्वार पर मंगल सूचक
मधुमालती का तोरण
घर-घर में सजा होता

हरियाली सुख समृधि का
प्रतीक तो है ही
पर्यावरण के संरक्षण का
खुला एक एलान है
मधुमालती को गृह द्वार पर
खूबसूरती से सजाने वालों
हरियाली  आज भी बचाने वालों
आप सब को यमुना का सलाम है..
The tree is our teacher,imparting to us the lesson of nature that if we seek to progress outwardly we must first strengthen ourselves inwardly;we must begin from the base of our own selves before we can hope to build society a new.  (a quote )

Sunday, August 5, 2012

friendship ka ship titanic ship saa naa ho jaye (on friend ship day)

तुलसीकृत रामचरित मानस की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं
जे न मित्र दुःख होहिं दुखारी,तिन्ही बिलोकत पातक भारी...............
निज दुःख गिरि सम रज करी जाना,मित्रक दुःख रज मेरु समाना ...........
अर्थात जो मित्र के दुःख से दुखी नहीं होता वह पाप करता है. अपने पर्वत के सदृश बड़े दुःख को धुल जैसा छोटा और मित्र के धुल जैसे छोटे दुःख को पर्वत सा बड़ा समझना चाहिए.

आज के इस परिवेश में जहां दोस्ती,बंधुत्व भाव सोसिअल नेट्वोर्किंग sites ,parties वगैरह के माध्यम से सहजता से उपलब्ध हैं या यूँ कहिये; आज दोस्ती की पतंग समाज के खुले आकाश में ऊँची और ऊँची उड़ती जा रही है वहां यह नज़र डालना ज़रूरी है कि क्या इस दोस्ती भाव से जुड़े विश्वास की अटूट डोर भी उतनी ही मजबूत रह पायी है या छल,फरेब का मांझा बन कर एक डोर ही दुसरी को काट जमीन पर गिरने को विवश कर रही है और कभी-कभी तो कुछ बदनसीब पतंगों को ज़मीं भी मयस्सर नहीं होता.वे कटी पतंग किसी पेड़ की डाली पर अधर में लटकी रह जाती है.पता है क्यों?वह इसलिए कि
अब दोस्ती में न वह गर्मी है न वादे निभाने का जुनून
क्या करें दिल मिलाते ही नहीं हाथ मिलाने वाले

ऐसा मैं इस लिए कह रही हूँ क्योंकि नित्य घटती घटनाएं जहां दोस्त ही दोस्त का अपहरण कर फिरौती वसूल करता है,कभी-कभी तो ह्त्या जैसे घृणित वारदातों को भी दोस्त ही अंजाम दे देता है,लड़कियों और लड़कों की दोस्ती एम.एम एस ,बलात्कार जैसे अश्लील हरकतों पर आकर दम तोड़ देती है,दोस्ती के नाम पर कोई द्वापर युगीन कृष्ण बनने का दंभ लिए प्रकट तो ज़रूर होता है पर इस घोर कलयुग में दोस्ती की पवित्र चादर मैली कर साफगोई से निकल जाता है.बड़े-बड़े ओहदे वाले किसी गरीब सुदामा के दोस्त बन कर उसकी सादगी का गलत इस्तेमाल कर लेते हैं ,ये सब तो यही सोचने पर मजबूर करता है कि................
जब भी मिलना हो किसी से,ज़रा दूरी रखना
जान ले लेता है सीने से लगाने वाला

मेरे कॉलेज की एक सहेली थी बला की खुबसूरत पर उसकी एक आदत से मैं परेशान हो जाती थी.वह अपने बहुत सारे दोस्त बनाती और उनसे अपने नोट्स पुरे करवाती,उनके पैसों पर चाय नाश्ता करती और फिर चार पांच महीने बाद कोई और दोस्त बना लेती.समझाने पर बोलती ,"अरे!यार, मुझे उन्हें बेवकूफ बनाने में मज़ा आता है"एक दिन मैंने उसे समझाया,"सुनो,अगर तुम किसी को बेवकूफ बनाने में कामयाब होती हो तो यह सोचकर खुश मत हो कि तुम स्मार्ट हो बल्कि तुम यह सोचो कि वे सब तुम पर कितना विश्वास करते हैं,ये उनके विश्वास की जीत है जिसे तुम अपनी कामयाबी मान रही हो"जाने इस बात ने उस पर क्या असर किया उसने सच्ची दोस्ती निभाने का वादा किया और उस दिन के बाद किसी को बेवकूफ नहीं बनाया.
एक कहावत है'a friend in need is a friend indeed "जो ज़रूरत में काम आये वही वास्तव में दोस्त है"पर आजकल तो दोस्त ज़रूरत के साथ ही आते हैं और अगर किसी वज़ह से उनकी ज़रूरत पुरी ना हो पाए तो दोस्ती में दरार शुरू हो जाती है .दोस्त बनकर हितैषी भाव प्रदर्शित करने वालों का हुजूम कब आपकी बर्बादी का सबब बन जाए आपको पता तक नहीं चल पाता .उस वक्त के लिए तो एक मशहूर शेर ही सटीक लगता है...................
भीड़ में हर एक के हाथों में शगुफ्ता फूल थे
सर मेरा ज़ख़्मी हुआ बताओ किसके पत्थर से ??????????????

दोस्ती की किताब के किस पन्ने पर लिखा है कि अगर दोस्त ज़रूरत पुरी न कर पाए ,एक दूजे के मुताबिक़ उपयोगी न बन पाए या नसीब और पुरुषार्थ के बल पर ऊँचे ओहदे पर पहुँच कर अपनी कुछ सीमाओं की वज़ह से दोस्त को सहयोग न कर पाए तो उसे दुश्मन का खिताब दे दिया जाए.दोस्ती का रसायनशास्त्र chemistry इतनी शीघ्रता से परिवर्तित होना क्या सही है?

ऐसे में यही आशंका रह जाती है कि कहीं इस फ्रेंडशिप का शिप titanic शिप सा  न हो जाए
ऐसा नहीं है कि दोस्ती शब्द हर जगह एक कैंसर की तरह हो गया है.आज भी कई दोस्त पवित्रता के साथ हित भाव बंधुत्व बनाए हुए हैं.मुझे आज भी याद है पापा जब कार्य की व्यस्तता की वज़ह से हमें गाँव नहीं छोड़ पाते थे तो अपने दोस्त रहमान चाचा जिनका घर भी पास के गाँव में था उनके साथ बेफिक्र भेज देते थे.दोस्ती विश्वास की डोर से बंधी होती है चूँकि ये रक्त सम्बन्ध नहीं होते इसलिए विश्वास का यह पर्दा बेहद झीना होता है जो शक की हल्की से कैंची से भी तार-तार हो जाता है अतः एक दुसरे की मजबूरी,स्थिति ,को समझना दोस्ती के लिए अत्यावश्यक है.लड़कियों को इस लिहाज़ से हमेशा सजग रहने की ज़रूरत है कि मित्र बनाने के समय थोड़ा धैर्य से काम लें,लड़के हो या लडकियां स्वयं को बेवज़ह इस्तेमाल न होने दें ,दोस्त की कोई बात नागवार गुजरे तो स्पष्ट कहने का साहस रखें और एक बात अवश्य करिए कि अपने दोस्तों के विषय में घर के बड़ों को अवश्य अवगत करायें. ऐसी बात या ऐसी दोस्ती जो घर के बड़ों से छुप कर की जाए उसके बिगड़ने पर बेबसी के सिवा कुछ हाथ नहीं आता.सीधी सी बात यह है कि.............
चाहे जिससे भी वास्ता रखना
चल सको उतना फासला रखना

दोस्ती की सहज उपलब्धता,नए अंदाज़,नए तरीकों और इन सब की नजाकत को कुछ यूँ समझने की कोशिश करते हैं....................
दोस्ती के मायने कैसे,बदले हैं वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य में
मासूम,हित भाव,दम तोड़े हैं इस नवीन परिदृश्य में
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दोस्त तो मिलते हैं कई सोसिअल नेट वोर्किंग साइटों में
या फिर कभी यूँ ही कहीं भी होती, छोटी बड़ी, पार्टियों में
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भरोसा कभी न तोड़ने की,आपस में दी तसल्ली जाती है
मिलते रहेंगे, कहने की,कवायद भी खूब
निभाई जाती है
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द्वापर युगीन कृष्ण सुदामा,आज भी मिलते हैं जग में
निर्बाध रक्त दोस्ती का,बहता है उनके संपूर्ण रग-रग में
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आज भी इस युग का सुदामा, जाता नहीं श्रीकृष्ण के घर
श्रीकृष्ण ही रहते हैं देखो उसके,घर आने को सदैव तत्पर
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आना कृष्ण का घर सुदामा के ,दे जाता मीडीया को कवरेज
प्रचार तो सुदामा का भी होगा,स्वागत से फिर क्यूँ हो गुरेज़
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किमकर्तव्यविमुढ़ हो करता,हद से ज्यादा स्वागत-सत्कार
सारी असलियत समझता रहता,सुनता अंतर्मन की चीत्कार
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सुदामा को सदैव ही कृष्ण की,पद प्रतिष्ठा का है रहता भान
निभाये कैसे वह दोस्ती,सामने लक्षमण रेखा के हैं निशान
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एक ही बार चने के लिए,छला सुदामा ने कृष्ण को द्वापर युग में
छला जा रहा सुदामा आज,देखो बार-बार इस घोर कलयुग में
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कृष्ण को तो हर दिन इस युग में एक ,नया सुदामा मिल जाएगा
चंद लम्हों की इस पहचान को,क्या बिचारा सुदामा भूल पायेगा?
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ऐसी दोस्ती किस काम की जो,झूठ,फरेब,छल के पंक में सनी रहे
द्वापर युगीन दोस्ती की मिठास,काश! इस कल युग में भी बनी रहे
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(blog में लिखे शेर किसी मशहूर शायर के हैं )

Thursday, August 2, 2012

भीगी श्रावणी पूर्णिमा(d first and final call)

यमुना का प्यार भरा नमस्कार और रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाअगर कोई भाई - बहन आपस में रूठे हुए हों तो मेरी गुजारिश है कि इस शुभ अवसर पर सारी नाराज़गी मिटा लें
यह पर्व आज से महज़ चार-पांच वर्ष पूर्व मेरे लिए बहुत ही खुबसूरत होता था ,मैं बेसब्री से इस श्रावणी पूर्णिमा का इंतज़ार करती थी पर अब यह पर्व अपनी अज़ीज़ प्रिया के दुखों से जुड़ गया है जिसकी वज़ह से इस अवसर पर पूर्ण उल्लास नहीं रह पाता.
अपने हमसफ़र के स्थानान्तरण होने पर नए स्थान के नए विद्यालय से जुड़ने के क्रम में ही प्रिया से मेरी मुलाक़ात हुई थी.प्रथम दिन ही विद्यालय के अध्यापक-अध्यापिकाओं के अच्छे-खासे समूह में वह एक चेहरा था;आत्मविश्वास से लबरेज़,हंसता-मुस्कराता,चंचल सी आँखें,लब मानो सब कुछ इसी क्षण बोल जाएंगे.हाँ, प्रिया में गज़ब सा आकर्षण था.औपचारिक बातचीत के बाद कुछ ही दिनों में हम दोनों में एक अनाम रिश्ते की घनिष्ठता हो गयी.वह मुझसे दस वर्ष छोटी थी पर हम हर बात बेझिझक करते,मुझे नए परिवेश में उसका भरपूर सहयोग मिलता था.मैं अपनी बिटिया के लिए कुछ भी पसंदीदा भोजन बनाती तो प्रिया के लिए भी अलग डिब्बे में अवश्य पैक करती;उसे मेरे हाथों का बना केक बहुत पसंद था .वह एक कुशल शिक्षिका थी,उसके मुख की भाव-भंगिमा,अभिव्यक्ति उसकी कही गयी बातों को बेहद खूबसूरती से सामने वाले को समझा देते थे.शायद इसी लिए वह प्रिया थी, सबकी चहेती.
वह अपनी बातों में अपने भाई टुकटुक का ज़िक्र ज़रूर करती,यूँ कहिये कि उसकी बातें उसी से आरम्भ होती और उसी पर ख़त्म हो जाती थी.एक दिन उसने कहा,"मैम, आज मेरे घर के लिए बहुत खुशी का दिन है मेरा भाई यु.के.जा रहा है."मैं तो उसके हर पल में इस कदर शामिल हो गयी थी कि उसकी खुशी मेरी अपनी खुशी थी और उसका दुःख मेरा निजी दुःख.उसके भाई का जन्मदिवस विजयादशमी को होता था.टुकटुक जब जन्म दिवस के शुभ अवसर पर कोलकाता से घर गया तो वह हर रिश्तेदार से मिला क्योंकि उसे परदेश जाना था.पहली बार उसने मुझसे भी फोन पर बात की "मैम मैं बेहद खुश हूँ,आपका भी आशीर्वाद चाहिए" मुझे भी बहुत खुशी हुई.वह कुछ दिनों बाद वापस चला गया.
दीपावली पर जब मैं अवकाश पर थी ,एक दिन अचानक प्रिया का कॉल आया,उसने कहा,"मैम,मैं भाई से मिलने जा रही हूँ"मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ सोचा ,अभी तो बीस दिन पूर्व ही वे सब मिले थे.मैं व्यग्र हो गयी पर उसने आगे कुछ कहे बिना ही फोन रख दिया .अगले दिन कॉल करने पर उसने बताया "टुकटुक बहुत बीमार है,उसे डेंगू हो गया है.उसके पुरे शरीर पर पट्टियां बांधी गयी हैं."जब यह बात मैंने अपने पतिदेव को बताई तो उन्होंने इतना ही कहा "बात गंभीर है"मैंने प्रिया को झूठी सांत्वना दी कि सब ठीक हो जाएगा जबकि जानती थी, बहुत कुछ क्षण भर में प्रिया की ज़िंदगी को बदल देने वाला था.मैं रात भर ठीक से सो नहीं पायी.रात के ठीक दो बजे उसके किसी रिश्तेदार का कॉल मिला.उन्होंने इतना ही कहा," प्रिया के सेल में जो मुख्य नंबर हैं उनमें सूचित कर बुरी खबरदे रहा हूँ ,टुकटुक इस दुनिया में नहीं रहा."ज़ेहन में बसे प्रिया के मुस्कराते चेहरे को परिवर्तित होने में एक लम्हा भी न लगा,जानती थी वह होनहार भाई अपनी बहन की मुस्कान भी अपने साथ ही ले गया.
प्रिया ने कार्य से इस्तीफा दे दिया अब उसे अपने माता -पिता का सहारा बनना था.विद्यालय में मेरी बगल की सीट खाली रहती,प्रिया नहीं दीखती थी.कुछ दिनों उपरांत मैंने भी विद्यालय छोड़ दिया.घटना के चार महीनों बाद प्रिया को यह सोच कर अपने घर बुलाया ताकि वह सब भूल कर अपना मन हल्का कर सके .उसने रोते हुए एक ही बात कही,"अगर टुकटुक का विवाह हुआ होता तो कम से कम उसकी कोई निशानी तो हमारे पास होती,हम बहुत अकेले हो गए हैं."मैंने उसे समझाया कि ऐसा होने पर उससे जुडा एक और रिश्ता कितना परेशान होता.पर उसके अव्यक्त दुःख को इन बातों से कब तक दूर किया जा सकता था.
प्रिया से अब भी फोन पर बात होती है पर मैंने अपनी चंचल सी उस प्रिया को हमेशा के लिए खो दिया है. अब जो प्रिया बात करती है उससे मेरी ही आवाज़ नहीं मिल पाती .ऐसा लगता है; आवाज़ किसी गहरी खाई से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है.राखी का त्यौहार उसके लिए अब बेमानी हो गया और उससे जुडी मैं, उसके भाई को कभी नहीं भुला पाती जिसे मैं ने कभी देखा ही नहीं था;जानती थी तो बस प्रिया की ज़ुबानी या फिर एक बार फोन पर बात किया था वही मेरे लिए उससे पहली और अंतिम बात रही. (first & final call)
दिल में छुपा यह गहरा बादल
आँखों की राह बरसता जाए
सूर्य न दिखता, घनघोर मेघ है
कहो,आंसू अब कौन सूखा पाए?
...............
यह गहन उदासी धीमे-धीमे
पारदर्शी बूंदों सी उतर रही है
अब तो हर श्रावणी पूर्णिमा
अश्कों से भीगी गुज़र रही है

..........
भाई के मेरे खिलौने छुपाने पर
ओह!मैं कितना शोर मचाती थी
मिठाई, टॉफी, उपहारों में भी
पना हिस्सा वृहद् बनाती थी
............
किसे चिढ़ाऊं,अब झगडूं किससे
ऐसे कई प्रश्न हैं दिल को मथ रहे
कैसे आ पायेगा वह सुदूर देश से
बस यादें ही अब तो साथ रहे
...........
घर के आँगन में व्यतीत पलों की
धुंधली यादें चटकीली हुई आज
वह ही था मित्र-शत्रु बचपन का
राखी थाली पर धरी हुई आज

...................
संग उसके हँसते-खेलते ही तो
मैं सदियाँ भी पल में जीती थी
पल ही यूँ बन जायेंगे सदियाँ
नहीं किसी क्षण में सोची थी
..............
किससे कहूँ वेदना दिल की
मुझको यहाँ किसका साथ है
गम का अन्धेरा इतना गहरा
हाथों को ना दिखता हाथ है

...................
समझाऊं कैसे जननी को कि
अब सहारा मुझे ही मान ले
जिम्मेदारी निभा सकूँ भाई सी
मेरे कटे पंखों में ऐसी जान दे