Monday, November 7, 2011

bacchon ki jababdehi

दैनिक जागरण ५ नवम्बर के मुख्या पृष्ठ पर पढ़ा "बी.आई.टी.मेसरा  के architecture विभाग के अंतिम वर्ष के स्टुडेंट  ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली अपने suisidal  नोट में कारण तनाव को बताया suicide  से पहले उसने वेकिपेडिया में इसके विभिन्न तरीकों की खोज की थी "
दूसरी घटना उत्तर २४ परगना जिले की सिटी कॉलेज की बी.ए.द्वितीय वर्ष की स्टुडेंट ने परीक्षा में fail होने पर जान  दे दी.
मैं यह पढ़कर बार-बार ये सोचने को विवश हो जाती हूँ की क्या खराब अंक मिलना ,दोस्तों का साथ छूटना ,प्यार में धोखा  खाना,ये सब जिंदगी से भी बढ़कर महत्वपूर्ण है ?कहा गया है "बड़े भाग मानुस तन पावा"ये जीवन अनमोल है इसे एक झटके में यूँ ख़त्म नहीं किया जा सकता. 
आवश्यकता है बच्चों को समझाने की  "समाज,परिवार ,देश के लिए वे बहुत महत्वपूर्ण हैं उनके  जीवन की उपयोगिता सिर्फ अंक लाने  में ही नहीं बल्कि उनका हँसना,बोलना, खेलना, समाज में तन मन से एक स्वस्थ नागरिक की तरह रहना अपने आप में उनकी उपलब्धि है जरुरत है माता-पिता बच्चे को संस्कारों के आभूषण से अलंकृत करें ताकि वे बड़ी से बड़ी मुसीबतों का सामना हँसते हुए कर सकें यह कार्य वे स्वयं को सुसंस्कृत रख कर ही कर  सकते हैं .
एक दिन में एक बार अपने बच्चे से अवश्य कहिये "तुम मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हो,हम हर परेशानी में तुम्हारे साथ हैं ,हम मिलकर समाधान खोज निकालेंगे" ये वाक्य आपके बच्चे को हमेशा मनोबल देंगे 
social  नेट्वोर्किंग कभी गलत नहीं है वास्तव में कोई अविष्कार गलत नहीं है ,अविवेकपूर्ण उपयोग ही उसे गलत बानाता है .अगर  इसके जरिये अच्छे विचार बांटे जाये तो ये बहुत अच्छा साधन साबित हो सकता है 
मैं एक चिर परिचित पंक्ति उन सारे बच्चों के लिए बोलना चाहती हूँ जो इस तरह के अविवेकपूर्ण कदम लेते हैं 
गर कोई उम्मीद न हो तो भी नाउम्मीद न होना 
जीने के हजारों तरीके हैं दुनिया में,फ़िर क्यों रोना
ये मानव  जीवन इश्वर का दिया अनमोल तोहफा है 
रोकर, हताश हो, इसे न गुजारो कल किसने देखा है ?

soch gahri karo aur apne sakaratmak faisle lo

पेट्रोल के दाम बढ़ गए हैं लोगों में आक्रोश है पर इसके लिए कहीं हम भी कुछ प्रतिशत जिम्मेदार नहीं क्या?
१  हम में से कितने लोग कार-पूलिंग पर यकीन करते हैं? 
२  पैदल चल कर तय कर सकने योग्य दुरी को भी हम क्यों कार से ही करना पसंद करते हैं?
३   अगर घर में चार सदस्य हैं तो सब के लिए अलग गाड़ियाँ  क्यों ?
४   हम में से कितने लोग अपने कार्य स्थल पर पैदल जाना पसंद करते हैं अगर यह नजदीक हो ?
पेट्रोल के सीमित भंडार को सोच समझ कर प्रयोग करना क्या हमारी भी जिम्मेदारी नहीं है? शिक्षित समाज का कर्त्तव्य समस्या के समाधान खोजना होना ज्यादा उचित है बजाये इसके की हम व्यर्थ की बयानबाजी में समय बर्बाद करें आओ सोचें कि हमारा उत्तरदायित्व क्या है ?एक जागरूक नागरिक होने का यही समय है कि सरकार  की  मदद करें अगर हमने अपने स्तर में भी पेट्रोल बचाने की  कशिश की  तो भारत की इतनी बड़ी आबादी इस दिशा में कितना सहयोग देने में सक्षम हो जाएगी