Monday, November 17, 2014

तुम बहुत अनोखे हो

तुम्हे अपने जैसा बनाना
कभी चाहा ही नहीं मैंने
तुम्हारा आकाश
ज़मीन तुम्हारी
ब्रह्माण्ड तुम्हारा
मुट्ठी तुम्हारी
मुझसे बेहद अलग हैं
तुम्हारे अनुभव
संभावनाएं तुम्हारी
तुम्हारे सपने
आँखें तुम्हारी
तुम्हारा क्षितिज
मुझसे बहुत आगे है
मेरी प्यारी बिटिया ……
अक्श तुम में
ज़रूर देखती हूँ मैं अपना
पर चाहत है …देखूं तुझे
तेरी ही सम्भावनाओं में
क्योंकि ….यूं भी
किसी को बदलना
अपने अनुसार
कभी चाहा ही नहीं मैंने
जो जैसा मिला
पूर्णता से स्वीकार लिया
ताकि पहचान रख सके
मेरा हर अज़ीज़
अपने ही अनोखेपन में .

bal diwasप्रिय ब्लॉगर साथियों/पाठकों
बाल दिवस के अवसर पर इस अनुपम मंच से जुड़े सभी परिवार के प्रत्येक बच्चे और दुनिया के विशाल आँगन के हर कोने में बसे बच्चों को बहुत सारा प्यार और आशीर्वाद.
प्रत्येक बच्चा स्वयं में अनोखा होता है असीमित संभावनाएं लिए वह इस धरती पर जन्म लेता है पर उन संभावनाओं को मूर्त रूप देने के लायक उसे वातावरण नहीं मिल पाता.मैं अक्सर सोचती हूँ कि प्रत्येक बच्चा अगर बाय चांस नहीं बाय चॉइस ( by choice ;not by chance )होता तो शायद उनकी संभावनाओं को मूर्त रूप देना कितना आसान होता.पर यह हमारी विडम्बना ही है कि हमारे समाज में अधिकाँश बच्चे सामाजिक दबाव ,परम्पराओं और धर्म जनित आवश्यकताओं के वशीभूत जन्म लेते हैं.कुछ अवैध बच्चे जो किसी पाशविक प्रवृति की भयानक भूल से उपजे होने के कारण तिरष्कृत और पशुवत व्यवहार के बीच ज़िंदगी गुज़ारने को मज़बूर होते हैं . जिन परिवारों में खाने के लाले पड़े होते हैं वह ‘जितने बच्चे ;काम करने के लिए उतने हाथ’ की विचारधारा के साथ बच्चों का जन्म स्वीकारता चला जाता है,यह भूल जाता है कि आने वाला हर बच्चा खाने के लिए मुंह ,सोचने विचारने के लिए एक मस्तिष्क ,और महसूस करने के लिए एक ह्रदय भी साथ लाता है.
आज बाल दिवस पर अख़बारों में टी वी कार्यक्रमों में ,कई ब्लॉग्स में कूड़ा बीनते,बाल श्रम करते ,शिक्षा से वंचित बच्चों के साथ साथ यौन शोषित ,एकाकी परिवार से जुड़े समृद्ध बच्चों की समस्याओं पर भी चर्चा होगी जो हर युग काल देश की समस्या है.आज बच्चे जिन समस्याओं से रू-ब-रू हो रहे हैं कमोबेश यही समस्या हर पीढ़ी हर युग झेलता है .प्रह्लाद अपने ही पिता हिरण्यकश्यप के अहंकार का शिकार था ,कृष्ण कन्हैया अपने ही मामा कंस के साथ साथ पूतना जैसी राक्षशी के आतंक के साये में पले बढे और इनसे निजात पा सके. ध्रुव अपने पिता की दूसरी रानी के सौतेले व्यवहार का दुःख झेलने को विवश था.श्री राम माँ कैकेयी के निज स्वार्थ के वशीभूत दुःख झेलने को अभिशप्त हुए थे.परियों की कहानियां भी इससे अछूती नहीं रहीं .सिंड्रेला अपनी ही सौतेली माँ के आक्रोश का शिकार होती थी.इतिहास गवाह है किसी भी युद्ध का शिकार अबोध मासूम बच्चे ही सबसे ज्यादा होते हैं चाहे वे यौन उत्पीड़ित हुए हों ,यतीम या अनाथ पर यह सच है कि शक्ति के वीभस्त प्रदर्शन का उत्सव बच्चों की दबी चीख और सिसकियों के साथ ही मनाया जाता रहा है .इतिहास भरसक कोशिश करता है कि अपनी लेखनी इस विषय पर ना चलाये क्योंकि इसका मानना है कि बच्चों से इतिहास क्या बनाना वे तो भविष्य निर्माता होते हैं.बस यहीं भारी चूक हो जाती है.बच्चे बहुत सुलझे अपने उम्र के अनुसार समझदार और संवेदनशील होते हैं.यह सच कहा जाता है समझदारी उम्र से नहीं आती उम्र से तो सिर्फ चालाकी विकसित होती है.बच्चों को उन्ही की नज़र से समझ पाना बहुत मुश्किल होता है .यही वह काम है जिसके लिए स्किल डेवलपमेंट की कोई व्यवस्था नहीं हो सकती विशेष तौर पर प्रथम बच्चे के जन्म पर दूसरे और तीसरे बच्चे के जन्म पर भी नहीं क्योंकि प्रत्येक बच्चा स्वयं में अनोखा होता है जिसे उसी के अनोखे रूप में स्वीकार करने की ज़रुरत होती है जो शायद कोई अभिभावक नहीं कर पाता चाहे वह शिक्षित हो या अशिक्षित हो.इसीलिये प्रत्येक पीढ़ी अपने आगे की पीढ़ी से खफा है और यह कवायद अनवरत जारी है.प्रत्येक बच्चे को उसकेेे संभावनाओं के संग स्वीकार करने को कोई अभिभावक तैयार नहीं है .जब कभी बच्चा अकेला बैठ जाता है हम अभिभावक प्रश्नों की झड़ी लगा देते हैं “क्यों अकेला है..क्या सोच रहा है..कुछ मार पीट हुई क्या?”ना जाने किन आशंकाओं से घिर हम उसके अकेलेपन को खतरे की घंटी मान लेते हैं हम यह भूल जाते हैं कि प्रत्येक सृजन को अकेलेपन की दरकार होती है .एक ऐसा क्षण जब वह संवेदनशील हो अपने समस्त संभावनाओं पर विचार करता है.किसी भी महान पुरुष का जन्म दिवस या उनसे जुडी घटनाओं का उत्सव हो हम कई बाल नेहरू ,बाल गांधी बना कर अनजाने ही गलती कर जाते हैं जबकि किसी भी अस्तित्व व्यक्तित्व की पुनरावृति कभी नहीं होती यह होनी भी नहीं चाहिए क्योंकि अनोखापन ही प्रकृति की सुंदरता का आधार है.बच्चे के विकास में शिक्षक अभिभावक समाज के लोगों को इस प्रकार मदद करनी है कि वह स्व व्यक्तित्व में पूर्ण विकसित हो सके.जैसा ओशो कहते हैं..”  a real  father , real mother real teacher will be blessing to the child.the child will feel helped by them so that he becomes more  rooted in his nature more grounded more centered so that he starts loving himself rather than feeling guilty about himself .”
बच्चों से जुडी सभी समस्याओं को खत्म करने से ज्यादा ज़रूरी है कि ऐसा वातावरण विकसित हो कि ये समस्याएं उत्पन्न ही न हो सकें. अगर हर समृद्ध परिवार यह प्रण ले कि वह बच्चों को होटल घरों या कारखानों में काम पर नहीं लगाएगा.बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं ,उन्हें अपने उम्र के बच्चों के साथ कोई भी आर्थिक सामाजिक भेदभाव विद्रोह की ओर ले जाता है.ज़रुरत है शिक्षा की पहुँच प्रत्येक बच्चे तक हो रोज़गार के अवसर प्रत्येक को उसकी योग्यताओं के आधार पर सुलभ हो.हर बच्चा एक उपहार है उसे सम्मान के साथ जीने का अधिकार है.मार पीट सजा से नहीं वे सिर्फ और सिर्फ प्यार की भाषा समझते हैं.हम वयस्क इतने विरोधाभासी हैं कि बच्चे हमसे कुछ भी सीख नहीं पाते और वयस्क होकर वे अपने बचपन को ही याद करते हैं .शायद यही वज़ह है कि बचपन अपनी उम्र में जिन मस्तियों ,अठखेलियों चंचलता को जीता है उसी की ऊर्जा प्राणवान बन जीवन के शेष बसंत को बहार देती रहती है.ज़रुरत है बचपन अधूरा ना रहे अन्यथा वह विद्रोही होकर शेष आधे भाग की तलाश में पूरी उम्र गुज़ार देने को विवश हो जाएगा और प्रत्येक सभ्यता संस्कृति देश काल युग आधी अधूरी व्यक्तित्व वाली मानव सम्पदा को ढोने के लिए अभिशप्त होती रहेगी.

निवेदन है ..(urgent)

आदरणीय सर जी (मोदी जी)
सादर प्रणाम
आप को एक प्रधान सेवक के रूप में देख कर हर तीसरा भारतीय गौरवान्वित है.मैं भी थी पर आपके प्रत्येक लिंक पर अपनी शिकायत भेजने पर जब उचित कार्यवाही नहीं हो रही तब बहुत अफ़सोस हो रहा है .मैं वाकई बहुत परेशान हूँ.
घटना 7 नवम्बर 2014 की है जब नौकरी के स्थांतरण के कारण हम फ़लकनामा एक्सप्रेस से सिकंदराबाद(आंध्र प्रदेश) से खड़गपुर (पश्चिम बंगाल  ) आ रहे थे.हमारा बर्थ A1  19 और 20 था हमारे  सामान  की पैकिंग  अग्रवाल  पैकर्स  मूवर्स ने की थी .११ बजे भोजन कर हम सो गए थे ऐश  कलर की VIP  जिसमें हमारे जेवर करीब साढ़े तीन लाख के कॅश पंद्रह हज़ार थे और नीली सफारी जिसमें कपडे थे हमने चेन लॉक कर  दिया था .श्रीकाकुलम रेलवे स्टेशन पर ७:३० बजे जब नींद खुली हमारा सामान चोरी हो चूका था उस बोगी में कोई पोलिस नहीं थी दो लडके गुंटूर से विशाखापत्तनम करंट टिकट लेकर चढ़े थे .१२:३० बजे हमें पार्वतीपुरम आंध्र प्रदेश राज्य परिवहन निगम  के एक बस  कंडक्टर  समुखा   का  फ़ोन  आया  कि दो सूटकेस  बस में मिला  है एक के अंदर के कागज़ात पर लिखे नंबर से फ़ोन कर रहा हूँ.हम १३ नवम्बर को सूचना के आधार पर पार्वतीपुरम पहुंचे   वहां   सूटकेस  में बेहद  अस्त  व्यस्त ढंग से हमें काग ज़ात वाला सूटकेस मिला पर जेवर और कॅश गायब थे .दूसरा सफारी हमारा नहीं था.हमने श्रीकाकुलम में  टी सी श्री बी आर जी राऊ   (फ़ोन   नंबर 9440267080 ) को सूचित किया उन्होंने FIR लिखा था खुर्दा रोड पर पुलिस (श्री मिश्रा) ने हमसे  पूछताछ     कर सूचना   को विशाखापत्तनम ,विज़ियनगरम (Vizianagram)और वाल्तेयर (valteir)को भेजा  .
ज़रूरी सूचनाएं   इस प्रकार हैं ...
१) जो दो लडके करंट टिकट ले  कर चढ़े थे उनका विवरण है
a) B.Raajshekhar (Guntoor to Vishakhapatnam) ID 972892804617 ticket no.90932610(berth no. 22)
b) A.Devkumar (M-44) BERTH NO.13
A.Prabhakarrao (M-44) berth no 14
90937780/81 EFT NO.0825436(Guntoor to Vishakhapatnam)
c)  bus conductor  APSRTC  Parvateepuram---------Samukha phone no. 7382921064
APSRTC thana Mr.Rama Rao ----7382920773
APSRTC ....Mr.prabhakar rao -----7382921064

सर जी आपसे करबद्ध प्रार्थना है कि हमारी शिकायत [पर उचित कार्यवाही का आदेश दिया जाए और सामान जल्द से जल्द बरामद किया जाए.कुछ तसवीरें भेज रही हूँ जो इस शिकायत से सम्बंधित हैं  भारतीय रेलवे सुरक्षित नहीं हैं कृपा कर हमारी मदद   करें      .
सधन्यवाद
यमुना पाठक
दिनेश कुमार  पाठक
जमशेदपुर झारखण्ड

Friday, October 17, 2014

वह एक 'अखंड दीप'

वैचारिक यात्रा के प्रकाशवान पथ के प्रत्येक पथिक को दीपोत्सव की बहुत सारी शुभकामना....
प्रत्येक वर्ष यह पर्व हमें अंधकार से प्रकाश की तरफ जाने की प्रेरणा दे जाता है बचपन में खूब सारे पटाखे निडर होकर जलाती थी ...किशोरावस्था में फूलझड़ी जलाने लगी और अब जब भी दीपावली का त्यौहार आता है ...घर परिवार समाज के तौर तरीकों ,परम्परा संस्कृति में व्यस्त ....मैं एक रहस्य में खो जाती हूँ ....दीपों की माला तो नहीं पर एक अखंड दीप हर व्यक्ति के पास देख सकती हूँ .उस दीप में विवेक,बुद्धि,संवेदनशीलता का तेल जितना ज्यादा डाला जाए दीप की लौ उतनी ही तेज होती है.और मन मस्तिष्क की शुद्धता उस लौ के दर्शन सूर्य की तेज रोशनी में भी कराती है.यह मेरा अपना अनुभव है ....col3
एक दीप है काफी
तम हरने के लिए
हूँ सोचती....
हज़ारों ...लाखों ..अनगिनत दीप भी
क्यों दूर कर पाते नहीं
कालिमा अमावस की
प्रश्न की उज्जवल दामिनी
है मस्तिष्क में कौंध जाती
प्रज्ज्वलित दीप और यह स्याह रात्रि
कौन किस पर हुआ भारी
??
संघर्ष की साक्षी..
बन जाती प्रत्येक संध्या
आँगन की तुलसी समक्ष...
एक दीप है जल उठता
दीवाली तो नहीं ..पर
दीपोत्सव है हर रात मनता
दूर करने को गहन तमस
एक अखंड दीप है जलता

दिवस की आपाधापी
यश की कौंधती रोशनी
सुख वैभव की मरीचिका में
दीप वह अदृश्य रहता .
जैसे-जैसे होती जाती
गहरी और गहरी निशा
आपाधापी ....सुख वैभव के बोध में
छाने लगती स्पष्टता
गलतियों की भयावहता
भाग-दौड़ की असारता
सर्वस्व पाकर भी रिक्तता
यह बोध है भीख मांगता
टुकड़े भर रोशनी की .
याचना गहरी जितनी
झिलमिलाहट दीप के लौ की उतनी
परन्तु अगले दिवस पुनः
मरीचिका यश सुख वैभव की
है परास्त करने लगती
लौ तो है झिलमिलाती
पर बेमानी सी हो जाती

फिर भी है वह अखंड दीप
दिवा की चमक में
चाहे हो जाए बेमानी
उससे एक टुकड़े भर रोशनी की
करता हर मनुष्य याचना
छा जाती जब ...
गहन तमस की निस्तब्धता
देख अखंड दीप की उज्जवलता
चिर सत्य बन यह गूँज उठता


मसो मा ज्योतिर्गमय .

Friday, October 10, 2014

सरहद पर सांसें चलने दो

एक ही ज़मीन से जुड़े दो भाई ...भारत और पाकिस्तान ....सरहद कुरुक्षेत्र बन गया हैं.....सरहद के समक्ष कई सवाल हैं वह अपने साथ हुए बार बार के धोखे से सिसकती रहे ...भाई से आक्रान्त हो शिकायत करे ...या कि सीना तान कर गुस्ताखी का ज़वाब गुस्ताख़ हो कर दे ....ज़ाहिर है इस बार तीसरे विकल्प को अपनाया गया है और हो भी क्यों ना ...पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र की मदद से इस मसले को सुलझाना चाहता है जबकि बेहतर यह होता कि वह किसी भी तीसरी शक्ति को यह बताता ....
अम्नो इन्साफ को गारत नहीं होने देंगे
खूने इंसान की तिज़ारत नहीं होने देंगे
भाई से भाई को हर वक़्त लड़ाने वालों
यहां अब हम महाभारत नहीं होने देंगे

(एक शायर)

आज जब पूरे विश्व के समक्ष भारत पाकिस्तान शान्ति के नोबेल पुरस्कार के सम्मान से नवाज़े जाने के लिए चुन लिए गए हैं तो क्या उपर्युक्त चार पंक्तियाँ प्रत्येक पाकिस्तानी और हिन्दुस्तानी का मूल मंत्र नहीं बन जाना चाहिए ??जब एक विज्ञापन देखती हूँ "भाई को गिराने की आदत थी मुझे बनाने की आज मैं किसी चीज़ से नहीं डरता " तो मुझे ये भारत पाक दो भाईयों की दास्ताँ ही लगती है.यूं तो भारत ने हमेशा ही शान्ति,सुलह और धैर्य का परिचय देकर एक अदद भाई की भूमिका निभाई है पर पाकिस्तान उस बच्चे की तरह व्यवहार कर रहा है जो कंचे के खेल में क्रोध और क्षोभ में अपने सारे कंचे गँवा बैठता है.शिक्षा ,स्वास्थ्य ,विज्ञान के क्षेत्र में करने की बजाये रक्षा सामग्रियों पर खर्च कर वह स्वयं को कितना खोखला कर रहा है इसका उसे भान नहीं है.
तेरी बदहालियाँ ऐ पाके ज़मीं करती कई सवाल तुझसे
ओ बेखबर हुकमरान इस पाके ज़मीं को दोजख ना कर
मुनासिब है ज़रूरी है वतन हक़दार है जिन खुशियों का
ओ मुल्क के हुक्मरानों अवाम को उनसे महरूम ना कर .


उसकी सबसे बड़ी बेचैनी भारत में एक सुदृढ़ सरकार बन जाने से उपजी उसकी हताशा है.भारत एक तरफ विकास के रास्ते पर अग्रसर शिक्षा ,स्वास्थय, खेल ,विज्ञान ,अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में नित्य आगे बढ़ता जा रहा है पाकिस्तान अपने इस भाई के प्रगति पथ से खुश और उसका अनुकरण करने की बजाये कौरवों की तरह अपने ही कुल का नाश करने पर आमादा है .युद्ध से ना उस युग में भलाई हुई थी ना अब होगी ..समस्याएं तलवार से नहीं कलम से सुलझती हैं जिसका सबूत है भारत पाक संयुक्त नोबेल शान्ति पुरस्कार .संयुक्त राष्ट्र संघ में उसके द्वारा कश्मीर के मसले को उठाना ही यह साबित करता है कि पूरे विश्व पटल पर वह भारत को गुनाहगार ठहराना चाहता है.कश्मीर में बाढ़ से आई तबाही पर वहां के बाशिंदों की सहायता के लिए जिस तरह से भारतीय जवानों ने तत्परता दिखाई वह इस बात का बड़ा सबूत है कि भारतीय तलवार बन्दूक गोली बारूद नहीं प्यार और सेवा की भाषा से इत्तिफ़ाक़ रखता है.
यूं भी कश्मीर विभाजन के समय ही भारत का हिस्सा माना जाता रहा है...

हर आँख का तारा है तारा ही रहेगा
ज़न्नत का नज़ारा है नज़ारा ही रहेगा
दहशत से कभी हम ना दबे हैं ना दबेंगे
कश्मीर हमारा है हमारा ही रहेगा


(एक शायर)
कश्मीर के मुद्दे को पाकिस्तानी हुकमरान चुनावी मुद्दा बना देते हैं और फिर ज़ंग की इबारत उस मुद्दे का सबब बन जाता है.आज जब मलाला ने बालिका शिक्षा के पक्ष में आवाज़ बुलंद Copy of Copy of value pageकर शान्ति के नोबल पुरस्कार से पाक की ज़मीं को पूरे विश्व में गौरवान्वित किया है ...तब इस साहसी बिटिया के पैगाम को पाकिस्तान को समझना चाहिए.कितना सुखद होता वह इस बार बार के ज़ंग के रक्त बहाना छोड़ इसे कभी ना ख़त्म होने वाली दोस्ती ,अपनत्व और अहदे वफ़ा की शक्ल में तब्दील कर देता .१७ वर्षीया पाकिस्तान की साहसी मलाला युसूफजाई और ६० वर्षीय हिन्दुस्तानी सिपाही कैलाश सत्यार्थी को संयुक्त रूप से शान्ति नोबल पुरस्कार से नवाज़ा जाना ना सिर्फ भारत पाक दो वतनों के लिए बल्कि शान्ति की स्थापना की दिशा में पहल का स्वागत करने वाले कई और मुल्कों के लिए भी एक बहुत ही सार्थक और सकारात्मक सन्देश बन सकता है.महज़ सत्रह वर्ष और सोच बेहद परिपक्व तभी तो मलाला ने दोनों वतनों के बीच शांति की दिशा में एक खासा पहल की और गुज़ारिश की कि जिस दिन कलम के दो सिपाही शान्ति का नोबेल प्राइज ले रहे हों तो दोनों वतन के हुक्मरान श्रीमान नरेंद्र मोदी जी और श्रीमान नवाज़ शरीफजी साथ साथ वहां ज़रूर मौजूद रहे.
काश यह प्रतीकात्मक एकता एक नए मधुर रिश्ते की ऐसी बीज बो जाए कि वह स्वस्थ मज़बूत वृक्ष बन ना सिर्फ दो मुल्कों को बल्कि पूरी दुनिया को अपनी शीतल छाँव से उपकृत करता रहे.




नींव बन जाए भरोसे की ....छत हो मोहब्बत की...और आपसी सौहाद्र की दीवारें

काश सिसकती सरहद पर खिल जाएं ढेर सारे खूशबू बिखेरते गुलों से तबस्सुम .

Tuesday, October 7, 2014

प्रगति पथ (प्रोग्रेस पाथ )का पी2 पी2 पी2 मॉडल

दोस्तों ,अब जब लाल किले की प्राचीर से योजना आयोग को ख़त्म कर देने की घोषणा हो चुकी है अर्थशास्त्र की छात्रा/शिक्षिका रह चुकने के कारण मैं इस विषय पर गहनता से सोचने को विवश हूँ.मुझे खुशी इस बात की भी है कि एक प्रजातांत्रिक देश के नागरिक होने के अधिकार को सिर्फ वोट देने तक ही सीमित ना रखते हुए प्रधानमंत्री जी ने आम जनता से प्रशासन में भी सुझाव मंगवाने की शुरुआत कर जनभागीदारी को व्यापक क्षितिज दिया और जनतंत्र ,जननीति और जननेता की परिकल्पना को साकार करने की दिशा में ठोस कदम उठाया है. आज जब मैं यह ब्लॉग लिख रही हूँ तो संतुष्ट हूँ कि मेरी अर्थशास्त्र की पढ़ाई धोबी के हिसाब और घरेलू सहायिका के पगार निश्चित करने या अपने बच्चे को घर पर पढ़ा कर ट्यूशन फीस बचाने तक ही सीमित नहीं आज मैं democratically empowered हूँ इस ब्लॉग में निहित सुझाव को mygov.in पर भी भेज सकती हूँ .
यह सच है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय से ही विभिन्न कारणों जैसे द्वितीय विश्व युद्ध से उपजी आर्थिक कठिनाइयाँ ,परतंत्र भारत के संसाधनों के भरपूर दोहन और पूंजी के विदेश चले जाने से उपजे बिखराव के फलस्वरूप एक संस्था की नितांत आवश्यकता महसूस की जा रही थी जो सुनियोजित और चरणबद्ध तरीके से तत्कालीन कठिनाइयों को दूर कर .देश में आशावाद की लहर ला सके और १५ मार्च १९५० को योजना आयोग की विधिवत स्थापना की गई थी
वर्त्तमान परिदृश्य बहुत बदल चुका है .परिवर्तन कुछ इस तरह भी कि आज ही इस अनुपम पेज पर ढ़ा 'मज़बूती का नाम गांधी' बहुत अच्छा लगा.आज देश के हालात बहुत बदल गए हैं हम नन्हे से ग  'G ' -- GRAM (ग्राम) से विशाल ग G --GLOBAL (ग्लोबल) या नन्हे से 'व 'V विलेज (VILLAGE )से विशाल ' व 'V वैश्विक (VAISHAVIK) स्तर पर तक आ गए हैं टेलीग्राम युग से इंटरनेट के सफर ने पुरानी चुनौती के साथ नई चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं .आर्थिक मज़बूती किसी भी देश की सुदृढ़ता के लिए रीढ़ की हड्डी का काम करता है.पर सामाजिक और नैतिक मज़बूती से भी मुख मोड़ा नहीं जा सकता .योजना आयोग के जगह नई संस्था के लिए मैं प्रगति पथ (प्रोग्रेस पाथ )के नाम का ही प्रयोग कर रही हूँ.
कुछ लोगों का मानना है कि नाम वाम से कोई फर्क नहीं पड़ता है पर मैं नाम के प्रभाव पर बहुत विश्वास करती हूँ .आज भारत एक विकासशील देश होने के साथ शक्तिशाली देश भी साबित हो गया है ऐसे परिदृश्य में आज योजना बनाने से ज्यादा प्रगति पथ पर अग्रसर होने पर ज्यादा ज़ोर देने की ज़रुरत है.इस संस्था की संरचना,आत्मा,सोच ,दिशा ,डिज़ाइन नई हो जो एक नए विश्वास के साथ देश को रचनात्मक सोच ,सार्वजनिक निजी सहभागीदारी,केंद्र राज्य सहभागीदारी , ,संसाधन के विवेकपूर्ण प्रयोग के साथ मिनिमम इनपुट मैक्सिमम आउटपुट का किफायती संज्ञान भी दे सके .
सर्वप्रथम बात यह कि योजना आयोग समाप्त कर देने से क्या योजना शब्द का औचित्य भी समाप्त हो गया ? नहीं क्योंकि प्रगति पथ पर बढ़ने के लिए भी किसी बिंदु से शुरुआत करनी होगी या जहां तक पहुँच चुके हैं वहां से नई दिशा की खोज ,उस राह पर आने वाली संभावित बाधाओं से जूझने और आई परिष्टितियों के अनुकूल तैयार होने के लिए योजना बनानी ही होगी.पूर्व निश्चित तथा सुस्पष्ट लक्ष्यों का अल्पकालीन,मध्यकालीन और दीर्घकालीन आवश्यकता और प्राथमिकता के साथ निर्धारण करने ,उनके लिए संसाधनों का आबंटन ,उनकी प्राप्ति (संभावित और वास्तविक)का आकलन इन सबके लिए एक सुस्पष्ट योजना ज़रूरी होगी.हिटलर और मुसोलिनी के समय क्रमशः जर्मनी और इटली में आयोजन का उद्देश्य राजनितिक दृष्टिकोण से देश को शक्तिशाली बनाना था आज भारत देश को प्रगति के पथ पर ले जाने के लिए आर्थिक,सामाजिक राजनितिक ,वैश्विक सभी क्षेत्रों में काम करना है.पूर्ण रोजगार की प्राप्ति,आर्थिक असमानता को काम करना,गरीबी दूर करना,स्वच्छ भारत की स्थापना,वैश्विक पटल पर सुदृढ़ता ,साधनों का युक्तियुक्त विवेकपूर्ण प्रयोग कर अधिकाधिक प्रतिफल पाना,संतुलित क्षेत्रीय विकास ,तकनीक सामरिक आत्मनिर्भरता ,सामाजिक सुरक्षा,आर्थिक स्थिरता जैसे कई बिन्दुओं पर ध्यान देना है.
अब तक योजना आयोग का मुख्य कार्य योजना तैयार करना और उसकी प्रगति का मूल्यांकन करना था .यह केवल परामर्श दे सकता था विकास परियोजनाओं को कार्यान्वित करने का कार्य केंद्रीय तथा राज्य सरकारों का होता था. और लालफीताशाही भ्रष्टाचार तथा अकुशलता की संभावना बनी रहती थी .यह अनेक विभाग तथा उपविभाग के द्वारा काम करता है जो परामर्शदाता मुख्य या सह सचिव के अंतर्गत होते हैं कुछ विभाग निदेशकों के अंतर्गत काम करते हैं योजना आयोग का अध्यक्ष देश का प्रधानमंत्री होता है.प्रशासनिक कार्य एक उपाद्यक्ष तथा आयोग के अन्य नियुक्त तथा वैतनिक सदस्यों के निरीक्षण में होता है.कुछ अंशकालीन सदस्य मंत्री परिषद से भी होते हैं.यह एक सामूहिक समिति के रूप में कार्य करता है.उपाध्यक्ष योजना समन्वय योजना मूल्यांकन प्रशासन तथा आर्थिक विभाग के अंतर्गत विषयों का अधिकारी होता है.पूर्णकालिक सदस्य किसी एक ग्रुप के अधिकारी होते हैं ..उद्योग श्रम यातायात एवं शक्ति ग्रुप,कृषि एवं ग्रामीण विकास ग्रुप,दृष्ट योजना ग्रुप,तथा शिक्षा वैज्ञानिक अनुसंधान एवं सामाजिक सेवा ग्रुप.
नई गठित संस्था के लिए कुछ सुझाव यह हैं..
Copy of MY EXPERIMENTSसर्वप्रथम बात यह कि अब नई गठित संस्था एक स्वायत संस्था हो ; उसका संवैधानिक अस्तित्व अवश्य हो .इसे विभिन्न मंत्रालय के अधिकारियों से अनिवार्य रूप से विचार विमर्श की ज़रुरत ही ना पड़े.सदस्यों की नियुक्ति योग्यता और विशेषज्ञता (तकनीक और बौद्धिक) को ध्यान में रख कर हो.सदस्यों की अपेक्षित योग्यता और नियुक्ति के मानदंड तथा प्रक्रिया का लिखित विवरण अवश्य हो ताकि वे कभी भी मनमाने ढंग से नियुक्त या हटाये ना जा सकें. राजनीति प्रशासन से इसे पूर्णतः अछूता रखा जाए ताकि किसी भी प्रकार के दलगत आरोप प्रत्यारोप से संस्था मुक्त रहे और अपने कार्य की पारदर्शिता बरकरार रख सके.सरकार बदल जाने पर भी इस संस्था में बदलाव ना हो और यह अपने कार्य को निर्बाध पूरा कर सके और लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में अनवरत प्रवाहित रह सके.1) संस्था की रूप रेखा बनाने वाले, 2 )क्षेत्रीय अनुसंधान कर कार्यों और 3)लक्ष्यों की प्राथमिकता तय कर इसे क्रियान्वित करने वाले ,तथा तय समय सीमा के दौरान मॉनिटरिंग और कार्य पूर्ण होने पर मूल्यांकन करने वाले ये तीनों ही विभाग अलग अलग हों .सदस्यों और विभागों का रूप मात्रात्मक नहीं अपितु गुणात्मक हों ताकि संस्था के काम काज में मितव्ययिता बनी रहे.इस के तीन ही विभाग हों..प्रथम संस्था के निर्माण और रूप रेखा से सम्बंधित...दूसरा,मूल्यांकन और नियंत्रण से सम्बंधित और तीसरा प्रशासनिक कार्यों से सम्बंधित विभाग हों.प्रोफ़ेसर श्री मन्ना नारायण जी की मानें तो "लोगों को इस बात का पूर्ण विश्वास होना चाहिए कि कराधान तथा सेवा शुल्क वगैरह के माध्यम से उनके द्वारा दी गई प्रत्येक पाई का उन के कल्याण और विकास के लिए समुचित रूप से व्यय होगा...."सबसे मुख्य बात साधनों के बंटवारे की होती है .चूँकि वित्त मंत्री बजट से सीधे तौर पर जुड़े होते हैं यह कह कर साधनों का वित्तीय बंटवारा उनकी जिम्मेदारी में दे देना उचित नहीं .अभी तक वित्तीय साधनों का बंटवारा वित्तीय आयोग की सिफारिशों पर किया जाता है पर कुछ मामलों में बंटवारा योजना आयोग भी कर देता है अतः वित्तीय साधनों के आबंटन में दुहरापन आ जाता है .इसके लिए किसी अन्य बौद्धिक वित्तीय विशेषज्ञ समिति को यह कार्य सौंपा जाए.यह एक लचीली संस्था हो जिसमें तेजी से आये वैश्विक और राष्ट्रीय स्थानीय परिवर्तनों के साथ समुचित परिवर्तन किया जा सके चाहे वह लक्ष्य निर्धारण से सम्बंधित हो या साधनों के आबंटन से सम्बंधित और ऐसा तभी संभव है जब इसे राजनीतिक प्रभाव से दूर रखा जाए.इसे सलाह मशवरा देने ,नियंत्रण रखने और दिशा निर्देशन के लिए एक निकाय की स्थापना हो जिसमें एक एक आर्थिक,सामाजिक,राजनितिक,वैश्विक,तकनीक विशेषज्ञ हों और चार या पांच थिंक टैंक हों ..देश में ईमानदार तथा दक्ष मनुष्यों की वृद्धि किये बिना बड़े पैमाने पर कोई भी कार्य करना और उसका समुचित प्रतिफल पाना संभव नहीं.इस संस्था के अध्यक्ष के रूप में कोई एक ऐसा व्यक्ति हो जो अर्थशास्त्री,वित्तीय विशेषज्ञ,तकनीक जानकारी,समाजशास्त्री होने के साथ साथ एक उच्च कोटि का जननीतिज्ञ भी हो .इस पद को देश का प्रधानमंत्री ही बखूबी निभा सकता है क्योंकि वह जनता के ही फैसले से आता है और उस जनता के कल्याण के प्रति उसकी पूर्ण जवाबदेही होती है.
संस्था के निर्माण में सार्वजनिक उत्साह और सहयोग की कोई कमी ना हो क्योंकि जैसा कि प्रोफ़ेसर लुइस कहते हैं ,"सार्वजनिक उत्साह किसी भी योजना को चिकनाने वाला तेल और आर्थिक विकास का पेट्रोल दोनों ही है-अर्थात एक गत्यात्मक शक्ति जो सब कुछ संभव बनाती है." और सबका साथ ;सबका विकास 'के लक्ष्य के मद्देनज़र हमारे माननीय प्रधान मंत्री जी ने इस सार्वजनिक उत्साह से जन जन को लबरेज़ कर दिया है.
नई सोच की दिशा में एक नया कदम
नवदृष्टि लिए संस्था का हो नव रूपांतरण
विकास के सुगन्धित फूलों से अब
महक उठेगा अपना यह गुलशन
हमारा अभियान प्रगति पथ
सपनों ने है भर ली एक नई उड़ान
एक ही दिशा में हैं सबके चिंतन
सहयोगिता और सहभागिता ही
बन गई है हर दिल की धड़कन
हमारा अभियान प्रगति पथ

Friday, October 3, 2014

सिर्फ रावण ही क्यों जले !!!

वज़ूद औरतों का भी बचा कर रखिये

सिर्फ मर्दों से ही कुदरत चला नहीं करती
Backgrounds
पराई अमानत नहीं;तुम्हारी अपनी बेटी
नारी के मान सम्मान को बढ़ाता नवरात्रि का यह पर्व हर वर्ष दो बार स्त्रियों के प्रति हमें बहुत संवेदनशील कर देता है ..दहेज़ प्रथा,बलात्कार,घरेलू हिंसा,यौन अत्याचार,जैसे ना जाने कितने महिषासुर को खत्म करने के संकल्प से भारतीय समाज की भुजाएं फड़कने लगती हैं....इस अवसर पर कन्याओं का विशेष सम्मान उनकी पूजा... करता भारतीय समाज कन्या भ्रूण हत्या ,बाल विवाह जैसे शुम्भ निशुम्भ को मार गिराने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई देता है....पर अफ़सोस यह कि भारतीय समाज बेहद विरोधाभासी है.एक तरफ कन्या जन्म पर पांच वृक्ष लगाकर विवाह का खर्च उठाने की बात कर अनजाने ही दहेज़ के दानव को मरने नहीं देता दूसरी तरफ लिंग असमानता पर अफ़सोस भी करता है .आप ही बताइये क्या दहेज़ प्रथा के कारण भी कन्या का जन्म वित्तीय बोझ नहीं माना जाता ...परिवार में दो पुत्र का जन्म हो जाएं तो कोई बात नहीं दो पुत्रियां हों तो दस वृक्ष ज़रूर लगा लेना ताकि उनके विवाह के समय दहेज़ लोलुप पुत्रों को उनके अभिभावक को संतुष्ट कर सकें ....फिर स्त्री पुरूष लिंगानुपात कैसे संतुलित रह सकता है ....या तो उन्हें जन्म ना लेने दो या फिर जन्म लें तो दहेज़ की बलि चढ़ जाने दो ....ऐसा क्यों ना हो कि वर और वधू दोनों के माता पिता पाँच- पाँच वृक्ष लगाएं और सहभागिता से विवाह का खर्च आधा आधा बाँट लें ....ऐसा ही उचित है क्योंकि आज माता पिता पुत्री को भी वही शिक्षा दे रहे हैं जो पुत्रों को मिल रही है.संतान पुत्र हो या पुत्री हमें लिंग विभेदीकरण के भाव से ऊपर उठना ही चाहिए ...वह सिर्फ संतान है ना पुत्र ना ही पुत्री ...और यह भाव सबसे पहले घर की स्त्री ही उत्पन्न कर सकती है .. ऐसे निर्णयों और भाव के साथ उसकी प्रतिबद्धता को कोई चुनौती नहीं दे सकता .बेटियों की शिक्षा के बावजूद दहेज़ देने की मज़बूरी क्यों रहती है.हमारे समाज में बेटियों के विवाह में दहेज़ का विरोध करने वाले ही बेटों की शादियों में खुल कर दहेज़ की मांग करते हैं. गलती तो यहीं से शुरू हो जाती है.हाल ही में मेरे एक रिश्तेदार की बेटी ने (बैंक में पी ओ ) जिसका विवाह भी बैंक में पी ओ के पद पर आसीन लडके से तय हुआ था जब होने वाले श्वसुर से कहा ,"आप मेरे माता -पिता से दहेज़ में कार और नगद की मांग कर रहे हो जब कि मैं स्वयं कमा रही हूँ ..मैं इस शादी से इंकार करती हूँ ...तो लगभग सभी ने उस बेटी का ही विरोध किया पर उसने भी स्पष्ट कह दिया ,"मुझे अपनी ज़िंदगी जीने का अधिकार है.पर सवाल वही कि ऐसा कब तक चलता रहेगा ??दहेज़ के इस दानव को समाप्त करना बहुत आवश्यक है. Backgrounds3विजयादशमी के अवसर पर प्रतिवर्ष रावण दहन की परम्परा तो मुझे और भी ज्यादा उद्वेलित करती है .रावण प्रकांड विद्वान और शिव भक्त भी था .और उसे आज तक गलती की सज़ा दी जा रही है ...सच कहूँ तो जब एक बार उसे राम जी द्वारा मार दिया गया तो पुनः हर वर्ष उसे मारने की परम्परा बुराई की संरचना कर उसका प्रतिकार करते रहने का एक दुष्चक्र के सिवा कुछ और नहीं है. रावण दहन के साथ दहेज़,अनाचार,अत्याचार,उत्पीड़न के ऐसे दानव जिनका दहन नहीं होता बल्कि वे दर्द की तपन देते हैं क्या उन्हें समूल नष्ट करने की इच्छाशक्ति की कोई अग्नि समाज प्रज्ज्वलित करता है ???क्या हर बेटी यह कहती सुनाई देती है 'मैं पराई अमानत नहीं;तुम्हारी अपनी बेटी हूँ '....क्या रावण दहन कर हम अपने अंदर के रावण को समाप्त कर पाते हैं ? ??कल बच्चों की एक फैन्सी ड्रेस प्रतियोगिता में एक सात वर्ष के बच्चे को रावण बने देखा .मज़े की बात यह कि उसके नौ सिर ही थे ..बीच में उसके स्वयं के सिर के दोनों तरफ चार चार सर ..मुझे अच्छा लगा क्योंकि वह ऐसा कर संतुलित रह पा रहा था ...रावण के दस सिरों में संतुलन .कैसे हो सकता है ...ठीक मध्य में तो कोई भी सिर नहीं था .....यह भी प्रतीकात्मक है जब हमारी बुद्धि विवेक में संतुलन नहीं होता तब हम पथ भ्रष्ट होने लगते हैं...रावण के दस सर तो फिर भी दृष्टिगोचर होते हैं पर हम में से प्रत्येक के एक सर के पीछे छुपा नौ सर प्रत्येक रावण दहन के अवसर पर और भी ज्यादा अहंकारी हो उठता है यह क्यों नहीं दिखाई देता ? ????? एक पापी को पत्थर मारने के सवाल पर जब यह बात सामने आती है कि पहला पत्थर वही उठाये जिसने कभी कोई पाप नहीं किया तो पत्थर लिए हज़ारों हाथ क्यों झुक जाते हैं ....चलो अच्छा है उस मूवी में हाथों में पत्थर लिए लोगों में कम से कम इतनी ईमानदारी तो है कि वे इस प्रश्न की नैतिकता से जुड़ जाते हैं हाथ नीचे कर लेते हैं .पर रावण को जलाने वाले हज़ारों लाखों हाथ क्या अपने निष्पाप होने के आत्मविश्वास से भरे होते हैं ????तो फिर सिर्फ रावण ही क्यों जले ??/प्रतीकात्मक ही सही प्रत्येक घर में अपना  भी एक पुतला बना कर जलाया जाए.
जब रामायण की शुरुआत की बात करें तो राजा दशरथ की रानी कैकेयी भी नारी समाज को मार्ग दिखाती है. .एक बुद्धीजीवी स्त्री होने के बावजूद वे मंथरा जैसी दासी के बहकावे में आ गईं अपने विवेक बुद्धि से अपने परिवार के हित की बात उन्हें नहीं सूझी .स्त्रियां प्यार,समर्पण त्याग करूणा की मूरत होती हैं पर कैकेयी ने तो अपने प्यार और सेवा के बदले दशरथ जी से स्वकेंद्रित होकर मांग रखी ...परिवार हित या समाज हित को विस्मृत कर गईं .जो स्वीकार्य नहीं हो सकता.आज समाज में कुछ स्त्रियों के उदाहरण मिल जाते हैं जो घरेलू सहायिकाओं के बातों में आकर अपना घर परिवार बिगाड़ बैठती हैं .कुछ अपने पति से प्रेम और समर्पण के बदले उनसे कुछ अस्वीकार्य मांग कर बैठती हैं जो परिवार के हित में सही साबित नहीं होता .कैकेयी के किरदार के द्वारा हमें यह समझने की ज़रुरत है कि हम अपने पति से ऐसी कोई मांग न करें जो परिवार के हित में न हो. एक बात यह भी गौर तलब कि सीता जी के स्वर्ण मृग को देख कर उसे लाने का आग्रह करना भी हम स्त्रियों के लिए एक प्रतीकात्मक शिक्षा देता है...कोई वस्तु कितनी भी लुभावनी ,मनमोहक हो उसे हासिल करने की हमारी लालसा हमारे परिवार जनों को किसी बड़ी परेशानी में डाल सकती है.आज कुछ स्त्रियां जिन्हे आवश्यकता और लालसा में फर्क नहीं समझ आता ;सोने चांदी के आभूषणों ,आकर्षक वस्तुओं की खरीदारी के लिए या महज़ अपने शौक की पूर्ति और आपसी प्रतियोगिता के लिए घर के पुरुषों को गलत ढंग से आय अर्जित करने के लिए प्रेरित कर देती हैं. स्त्रियों को इस प्रवृत्ति से दूर रहने की आवश्यकता  है . (नोट : भारतीय संस्कृति के महान आदर्श और त्याग की प्रतीक देवी सीता मेरे लिए पूजनीय हैं मैं उनके प्रति असीम श्रद्धा भाव रखती हूँ कृपया इसे सहजता से स्वीकारा जाए ) वरात्रि ,विजयादशमी जैसे पर्व त्यौहार से जुडी परम्पराओं का निर्वाह संस्कृति की शाश्वतता के लिए आवश्यक है तो इसे सही विधि से स्वपरिष्करण का साधन मानना इसे प्रासंगिक बनाये रखने के लिए अपरिहार्य है.घर परिवार समाज में सृजन का अधिकार कुदरत ने स्त्री को ही दिया है.ज़रुरत है वह सृजन के साथ परिष्करण भी करती रहे.चूँकि स्त्री भावप्रधान होती है अतः वह अपने प्यार सद्बुद्धि शक्ति से सही दिशा निर्देशन की क्षमता भी रखती है.वह समाज की प्रत्येक विकृति की कॉस्मेटिक सर्जरी करने वाली कुशल सर्जन बन सकती है ..बस ज़रुरत है एकता ,दृढ़ता और सही अर्थों में नारी शक्ति प्रदर्शन की ...इस के लिए उसे पुरुषों से ना तो आचार विचार उधार लेने की ज़रुरत है ना ही खान पान और पहनावा की...वह अपने नारी स्वरुप में ही जहां खड़ी हो जाए वहां वह ना + अरि है ...ना किसी की दुशमन ...ना कोई उसका दुश्मन ... ज ज़रुरत है स्त्री अपने बुद्धि ,विवेक ,प्रज्ञा का घर परिवार समाज के सही दिशा निर्देशन में प्रयोग करे.आज स्त्रियों के शक्ति का सूर्य स्वयं के अस्तित्व ,सुरक्षा ,मान सम्मान के प्रति एक भय संशय अनिश्चितता के मेघों से ढक गया है जिसे दूर करने के लिए एकता स्वज्ञान स्वशक्ति के भान की तेज हवा की ज़रुरत है.....


आज उसे कुछ याद नहीं कि कौन सा ये साल है
पर पूछती स्वयं से क्यों अस्मिता मेरी हलाल है ....
कल तक थी शांत धरा आज भयंकर भूचाल है




शान्ति की मूरत थी कभी अब हाथ में करवाल है .....

शोलों सी जलती आँखें लब पर एक ही सवाल है
समाज में इतनी विकृतिया कहाँ क़ानून बहाल है ....
क्रान्ति का जब करती नाद न परिवार बना ढाल है
परित्यकता हो कर भी समक्ष समाज के विकराल है .....
चुप रहे आखिर कब तक जब समाज का ये हाल है
शांत दरिया के उफान पर फिर क्यों करे कोई मलाल है.....
देख लो हर रिश्ते में वह चाहे वृक्ष से टूटी एक डाल है
बुझी किस्मत रोशन करने हाथ में ली जलती मशाल है ....
दीन दुखी अबला कब ; वह आज भी साक्षात त्रिकाल है
नारी सदियों से रही सशक्त स्वयं में ही एक मिसाल है ......
बदलती है रूप तस्वीर का जिस पर अत्याचार का जाल है




यह कमल खिल उठता वहीं कीचड से भरा जहां ताल है ....

नाद गूंजे 'विजयी भव 'का चहुँ ओर ऐसा एक बवाल है

यह वह हर वक़्त तुम्हारा, सबला तुमसे ही हर काल है.



शुभ नवरात्रि शुभ विजयादशमी

Saturday, September 27, 2014

नरेंद्र(सितम्बर १८९३)….नरेंद्र ‘एक बार फिर’ (सितम्बर २०१४)

दोस्तों ,ऐसा अक्सर होता है कि सूर्योदय के साथ हममें से कुछ या तो अलार्म बंद कर देते हैं ,सूर्य को कोसते हैं ,उफ़ !! क्या इतनी जल्दी उदित हो गया …या फिर करवटें बदल कर कुछ पल आलस में गुज़ार कर बेमन से ही बिस्तर छोड़ते हैं.कुछ अपने घर की खिड़कियां ही बंद कर लेते हैं ताकि सूर्य का प्रकाश उन तक पहुँच ना सके …पर सूर्य को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता …उसे उदित होना है अपना कर्त्तव्य निभाना है और धरती को उपकृत करना है.कुछ ही हैं जो सूर्योदय के साथ जागरण के लिए तैयार होते हैं …अपने रोम रोम में सूर्य सी ऊर्जा भर स्वकल्याण और लोक कल्याण के लिए सक्रिय होते हैं.सदियां इस बात की साक्षी रही है …कृत्रिमता,आत्मगौरव विस्मृत वातावरण में जब भी किसी सूर्य का उदय हुआ है तो उस सूर्य का स्वागत कर स्वजागरण के लिए बहुत कम ही लोग तैयार हुए हैं.आत्मविस्मृत गौरव को पुनः जागृत करने वाले स्वामी विवेकानंद (नरेंद्र दत्त)के आविर्भाव को तत्कालीन वर्त्तमान भी महसूस नहीं कर सका था…..पर धीरे धीरे उस सूर्य ने अपनी तेजस्वी रोशनी इस तरह फैलाई कि विश्व उस रोशनी से आज भी चमक रहा है…….तो क्या आज फिर से सभ्य जगत के पास अमृत का सन्देश पहुंचाने के लिए भारत वर्ष प्रस्तुत होने गया है ????
जब उन्होंने (स्वामी विवेकानंद जी )आह्वान किया था,“अब तो भारत ही केंद्र है.हे मानव! गतकाल के लिए शोक करना छोड़ वर्त्तमान में प्रयत्न करने हम तुम्हे बुला रहे हैं ..वृथा संदेह दुर्बलता तथा दास जाति सुलभ ईर्ष्या द्वेष को छोड़ इस महायुगचक्र प्रवर्तन में सहायक बनो.” तब भी सुसुप्त जनता में से कुछ ही जागरण के लिए तैयार हुए थे.

१२ जनवरी १८६३ को जन्में नरेंद्र (स्वामी विवेकानंद )को माता भुवनेश्वरी देवी शिव का प्रसाद मानती थीं.उसे रामायण महाभारत की कहानी सुनाती .पुराणों की कहानियों ने बालक पर गंभीर प्रभाव छोड़ा था.रेंद्र माता का बहुत सम्मान करते थे उनके मुख से अतीत युग के धर्मवीरों की कहानियां सुन उनका बाल मन स्वाभाविक चंचलता छोड़ ना जाने किस भाव से घंटों मंत्र मुग्ध हो जाता था .उनकी दृष्टि में जीवन एक स्वछन्द अविराम प्रवाह था.कहते हैं बालपन में कोचवान के वैवाहिक जीवन की अशांति ने उन्हें सदा के लिए विवाह से विरक्त कर दिया था.वे अक्सर बालक व युवकवृन्द को ब्रह्मचर्य के पालन में प्रोत्साहित करते हुए भाव के आवेग में दृढ़ता से कहते ,”यदि तुम काम-क्रोध आदि सैकड़ों प्रलोभनों में भी अविचल रहकर १४ वर्ष तक सत्य की सेवा कर सको तो ऐसे एक स्वर्गीय तेज द्वारा तुम्हारा ह्रदय परिपूर्ण हो जाएगा कि तुम जिसे झूठ समझोगे उस बात को कोई साधारण व्यक्ति तुम्हारे पास प्रकट करने का साहस तक ना करेगा.”पर विवाहित जीवन के उच्च आदर्श के प्रति उनमें कभी अश्रद्धा भी नहीं थी.एक बार उनसे किसी ने पूछा ,”क्या विवाह कर लेने पर धर्म का आचरण या अन्य कोई महान कार्य नहीं किया जा सकता?”उनका ज़वाब था,”क्यों नहीं,जनक ऋषि ने गृही होकर भी ब्रह्म ज्ञान प्राप्त किया था.”एक दिन दर्शनशास्त्री इंगरसोल ने उनसे कहा,”यह जगत एक संतरे की तरह है,जितना हो सके इसे निचोड़ कर इसका रस पीना चाहिए.जब इस बात का कोई प्रमाण नहीं कि परलोक नाम का कुछ है भी तो सांसारिक सुख से वंचित क्यों रहना जहां तक संभव हो तत्परता के साथ इस जगत का उपभोग करना चाहिए.” नरेंद्र ने मृदु हास्य से ज़वाब दिया,“मुझे जगत से किसी प्रकार के भय का कोई कारण नहीं है,स्त्री,पुत्र,परिवार,संपत्ति आदि का कोई बंधन नहीं है,मेरी दृष्टि में सभी स्त्री पुरूष सामान रूप से प्रेम के पात्र हैं…सभी मेरी दृष्टि में ईश्वरस्वरूप हैं सोचो तो मनुष्य को भगवन रूप देखकर मुझे कितना आनद मिलता है,मैं निश्चिन्त होकर रस पान कर रहा हूँ तुम भी ऐसा कर देखो हज़ार गुना अधिक रस मिलेगा.”
हिन्दू धर्म के सम्बन्ध में विदेशियों के भ्रमपूर्ण विश्वासों को दूर कर उसके उदार भावों का आधुनिक वातावरण के अनुकूल वैज्ञानिक युक्तियों द्वारा प्रचार करने के लिए ३१ मई १८९३ को अपने स्वातंत्र्य के गौरव से सर ऊंचा किये उन्होंने (स्वामी विवेकानंद)शिकागो प्रस्थान किया.वे कोलम्बो होते हुए सिंगापुर से हांग कांग पहुंचे सीक्यांग नदी के मुहाने से ८० मील दूर दक्षिण चीन की राजधानी कनतन शहर देख आये.वहां अनेक बौद्ध मठ देखे तथा वहां के सबसे बड़े मंदिर का दर्शन किया.प्राचीन सभ्यता के उत्तराधिकारी दो महान राष्ट्र भारत वर्ष और चीन की स्थिति की उन्होंने आपस में तुलना की और कहा,”सभ्यता की सीढ़ी पर जो चीनी व भारतवासी एक पैर भी अग्रसर नहीं हो रहे हैं उसका एक कारण उनकी गरीबी है.साधारण भारतवासी और चीनी के दैनिक जीवन में छोटी-छोटी चीज़ों का अभाव उसका नित्य प्रति इतना समय नष्ट कर डालता है कि उसे और कुछ सोचने का अवसर तक प्राप्त नहीं होता.“पर जापान को देखकर वे बहुत खुश हुए.नागासाकी,कोबी बंदरगाह,याकोहामा,ओसका,किआतो व टोकियो आदि शहरों को देखकर उन्होंने समझ लिया कि वर्त्तमान काल की आवश्यकताओं को जापानियों ने समझ लिया है.याकोहामा से अपने मद्रासी शिष्यों को एक पत्र में लिखा,”जापानियों के सम्बन्ध में मेरे मन में कई बातें आ रही हैं,एक संछिप्त पत्र में उसे प्रकट नहीं कर सकता ,परन्तु इतना कह सकता हूँ कि हमारे देश के युवकों को प्रतिवर्ष दल के दल में जापान आना चाहिए..और तुम लोग क्या कर रहे हो?जीवन भर वृथा बकते रहते हो.आओ इन्हे देख जाओ…बेपचा कुछ अंश लगातार रटते जा रहे हो..तुम्हारा प्राण मन तीस रूपये की क्लर्की पर निछावर है…अरे,मैं कहता हूँ,क्या समुद्र में जल का अभाव हो गया है?तुम सब अपनी पुस्तकें,गाऊन विश्वविद्यालय डिप्लोमा आदि सब कुछ डूबा क्यों नहीं देते .?” आओ मनुष्य बनो.इस प्रकार वे युवाओं को झकझोरते थे.
याकोहामा से प्रशांत महासागर पार होकर जहाज वकुंवर बंदरगाह में आ पहुंचा यहां से रेल द्वारा कैनेडा के बीच में से तीन दिन चलने के बाद शिकागो पहुंचे.जो उनकी ख्याति को दिशाओं में फैलाएगी उसी नगर में वे अपरिचित से घूम रहे थे.बाद में एक वृद्ध महिला से परिचय हुआ जिन्होंने उनके प्रचार कार्य की व्यवस्था की.उन्ही के घर पर हारवर्ड विश्व विद्यालय के प्रोफेसर जे एच राइट महोदय ने बातचीत के दौरान उनसे कहा,”आप शिकागो महासभा में हिन्दू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में अवश्य जाइए आपको अधिकतर सफलता मिलेगी.”उत्तर में स्वामी जी ने अपनी स्वाभाविक सरलता के साथ वास्तविक कठिनाईयों का ज़िक्र किया .प्रोफ़ेसर ने आस्चर्यचकित हो कहा ,“to ask you Swami, for your credentials is like asking the sun to state its right to shine .”
११ सितम्बर 1893 जगत के इतिहास में एक स्मरणीय दिन .मनुष्य मात्र में भ्रातृभाव की स्थापना व प्रचार के उद्देश्य से जो सभा बुलाई गई थी उसके पूर्ववर्ती वक्ताओं ने चिर परिचित रीतियों के अनुसार ही श्रोताओं को सम्बोधित किया था.परन्तु सबसे प्राचीन सन्यासी सम्प्रदाय के प्रवक्ता ने पहले पहल उस विराट सभा को ‘भगिनी व भ्रातृगण’ कह कर ह्रदय के अंतस्तल से उठे हुए निर्मल आह्वान से सभी के ह्रदय में छिपी हुई प्रेम निर्झरिणी को राह दे दी थी .करतल ध्वनि से कक्ष गूँज उठा था.पर क्या इस कार्य में आगे उन्हें बाधा नहीं आई ??? ऐसा कतई ना था ..उस समय थियोसोफिकल सम्प्रदाय ने पग पग पर स्वामी जी के मार्ग में बाधा डाली.उन्होंने यह नियम भी बना दिया कि समिति के सदस्यों में से यदि कोई भूल कर भी विवेकानंद का भाषण सुनने जाएगा तो वह समिति की सब प्रकार के सहयोग खो देगा.फिर भी इस वैद्युतिक शक्तिशाली तेजस्वी सन्यासी के पवित्र भाव को वे रोक ना सके थे.वे सिर्फ इतना ही कहते ,”साधारण मनुष्य समाज को ही अपना ईश्वर मान कर उसका आदेश पालन अपना कर्तव्य समझता है.मेरे ह्रदय में सत्य की जो वाणी ध्वनित हो रही है उसे ना सुनकर मैं क्यों बाहर के लोगों के ख्याल अनुसार चलने जाऊं.” पाषाण प्राचीर की तरह उनका स्वाभिमान सदा सभी स्थितियों में मस्तक उन्नत किये रहता था.थियोसोफिकल ने स्वामी जी की निंदा कर जिस अकीर्ति का संचय किया था उसी को दूर करने के लिए अनेक वर्ष बाद १९१४ के मार्च मास की ब्रह्मवादीन पत्रिका में ‘ my impressions of swami vivekanand and his work  ‘ नाम से एक लेख लिखा और यथेष्ट सत्साहस का परिचय दिया. वे लिखती हैं,” शिकागो नगर में महिमामय मूर्ति,गैरिक वस्त्र से भूषित उन्नत शिर, मर्मभेदी दृष्टिपूर्ण आँखें ,चंचल होंठ ,मनोहर भारतीय सूर्य की तरह दीप्तमान स्वामी जी जनसमूह के मानस पटल पर दृढ रूप से अंकित हो गए थे.” विवेकानंद जी के भाषण से अमेरिकन राष्ट्र उनका मुरीद हो गया .१८९४ के ५ अप्रैल को बोस्टन इवनिंग ट्रांसक्रिप्ट ने मंतव्य दिया,” he is really a great man,noble,simple,sincere and learmed beyond comparison with most of our schlors. “
न्यूयार्क हेराल्ड नामक सुप्रसिद्ध पत्र ने लिखा ,“शिकागो धर्ममहासभा में विवेकानंद ही सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति हैं.उनका भाषण सुनकर ऐसा लगता है कि धर्ममार्ग में इस प्रकार के समुन्नत राष्ट्र (भारतवर्ष) में हमारे धर्म प्रचारकों को भेजना निर्बद्धता मात्र है.” महाबोधि सोसायटी के जनरल सेक्रेटरी श्री धर्मपाल ने १८९४ के १२ अप्रैल के इंडियन मिरर पत्रिका में लिखा,“स्वामी जी के बड़े बड़े चित्र शिकागो नगर में रास्ते रास्ते पर लगे हैं विभिन्न सम्प्रदाय के लोग इन चित्रों के प्रति भक्ति के साथ सम्मान प्रदर्शित करते चले जा रहे हैं.” अमेरिका ने सन्देश दिया,”भारत वर्ष ने स्वामी जी को भेजा है-इसलिए अमेरिका धन्यवाद दे रहा है.यदि संभव हो तो स्वामी की तरह और भी कुछ आदर्श पुरुषों को भेजने के लिए अमेरिका प्रार्थना कर रहा है..”

मार्च,अप्रैल,मई और जून-इन चार महीनों में शिकागो,न्यूयॉर्क,बोस्टन के चारों ओऱ स्थित छोटे बड़े नगरों में उन्होंने अविराम भाषण दिए.वे जहां भी जाते वहीं जन साधारण स्वचेतना से आंदोलित हो जाती .उन्हें CYCLONIC HINDOO के नाम से पश्चिम जानने लगा था व्याख्यान देते समय कागज़ पर लिखे हुए किसी प्रकार के स्मरण संकेत की सहायता वे नहीं लेते थे..उनका सुन्दर कंठ स्वर स्पष्ट तथा द्विधाहीन था.एक बार उनसे किसी ने कहा,“भारत के हिन्दुओं ने किया क्या है ?-वे आज तक किसी जाति पर विजय प्राप्त नहीं कर सके .”

स्वामी जी ने शांत संयत हो कहा, नहीं कर सके !!! कहिये कि किया नहीं और यही हिन्दू जाति का गौरव है कि उसने कभी दूसरी जाति के रक्त से पृथ्वी को रंजित नहीं किया .वे दूसरों के देश पर अधिकार क्यों करेंगे ? तुच्छ धन की लालसा में ?भगवान ने हमेशा से भारत को दाता के महिमामय आसन पर प्रतिष्ठित किया है.भारत वासी जगत के धर्मगुरू रहे हैं वे दूसरों के धन को लूटने वाले रक्त पिपासु दस्यु ना थे और इसलिए मैं अपने पूर्वजों के गौरव से गर्व अनुभव करता हूँ.”
बड़े दिनों के पर्व में श्रीमती ओली बुल द्वारा आमंत्रित होकर स्वामी जी बोस्टन गए वहां ‘भारतीय नारी जाति का आदर्श’के सम्बन्ध में एक सुन्दर तथ्यपूर्ण भाषण दिया .उसे सुन कर विदूषी नारी समाज ऐसा मुग्ध हुआ कि स्वामीजी के बिना जाने ही उन्होंने उनकी माता को धन्यवाद देकर मेरी की गोद में स्थित बालक ईशा की मनोरम चित्र के साथ एक पत्र लिख भेजा “जगत के कल्याण की जननी मेरी के दानस्वरूप ईशा मसीह के आविर्भाव का दिन हम आज उत्सव के आनंद में बिता रही हैं अपने बीच आपके पुत्र को पाकर आज हम आपका श्रद्धा के साथ अभिवादन कर रही हैं.आपके श्रीचरणों के आशीर्वाद से उस दिन ‘भारत में मातृत्व के आदर्श’के सम्बन्ध में भाषण देकर उन्होंने हमारे नर नारी व बच्चों का महान उपकार किया है .उनकी मातृपूजा श्रोताओं के ह्रदय में शक्ति समुन्नत्ति की उच्चाकांक्षा जगा देगी.आपकी इस संतान में आपके जीवन व कार्य का जो प्रभाव प्रकट हुआ है उसकी सम्यक रूप से उपलब्धि करती हुई हम आपकी सेवा में अपनी आतंरिक कृतज्ञता प्रकट करती हैं.”
Collagesवर्त्तमान प्रधान मंत्री श्री मोदी जी के कृतित्व और व्यक्तित्व में बहुत अंशों तक नरेंद्र (स्वामी जी ) की झलक मिलती है ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वे भारत देश के गौरव को प्रतिस्थापित कर जन जन में चेतना का संचार करें .अपने सुन्दर प्रभावकारी भाषण में वे सबका साथ;सबका विकास और ‘टीम भाव’  TEAM -Together Engaged And Managed )को अधिकाधिक प्रतिबिंबित करें ...हम भारतीय उनमें एक नए उदीयमान सूर्य का दर्शन  कर रहे हैं और उस प्रकाश से ऊर्जावान हो आत्म विकास ,आत्मगौरव ,स्वाभिमान के उजाले को समेत कर परिवार समाज देश को उन्नति के प्रकाशवान राहों पर ले जाने को कृत संकल्प हैं .
प्रधानमंत्री जी की अमेरिका यात्रा पर सभी भारतवासियों को हार्दिक शुभकामना .
ब्लॉग का स्त्रोत श्री सत्येन्द्रनाथ मजूमदार की पुस्तक “विवेकानंद -चरित ” है .इस अद्भुत स्त्रोत की आभारी हूँ


Tags: फिर वही दिल लाया हूँ (शुभ यात्रा )  

दिल कहे रूक जा रे रूक जा …..(विश्व पर्यटन दिवस 27 sep)

मेरे प्रिय ब्लॉगर साथियों/पाठकों
विश्व पर्यटन दिवस के अवसर पर प्यार भरा नमस्कार
च कहूँ तो जीवन स्वयं में ही एक यात्रा है…माँ के गर्भ से …शमशान के कब्र तक का …सफर एक पर्यटन ही तो है..जीवन के विभिन्न पड़ाव ,विभिन्न अनुभव और स्वयं यह पृथ्वी …इससे बड़ा पर्यटन स्थल भला और क्या हो सकता है !!! हिन्दी फिल्मों की दुनिया तो सफर के गीतों के दार्शनिक अंदाज़ से भरी हुई हैं..आदमी मुसाफिर है…, इस मोड़ पर आते हैं कुछ ….,सुहाना सफर और ये मौसम हसीं…, ज़िंदगी एक सफर है सुहाना…., आदि

मुझसे अगर कोई पूछे पृथ्वी पर पसंदीदा जगह कौन सी हैं तो मेरा ज़वाब होगा …रेलवे स्टेशन,एयर पोर्ट,बस स्टॉप और श्मशान घाट….जो ज़िंदगी के अथाई और स्थायी सभी सफर के साक्षी स्थान होते हैं.किशोरावस्था से जीवन का दर्शन बने ये चार स्थान मुझे आकर्षित करते रहे हैं.मिलते हुए लोगों के चहरे की खुशी,बिछड़ते हुए लोगों का दुःख जीवन की समझ को कितना स्पष्ट कर देता है…
निदा फ़ाज़ली का यह अंदाज़ कितना सटीक लगता है…
वक़्त के साथ है मिट्टी का सफर सदियों से
किसको मालूम,कहाँ के हैं ,किधर के हम हैं


हालांकि अब रेलवे स्टेशन के दृश्य पहले से नहीं होते …इंसानी चेहरे में कुछ पाने की तलाश ख़त्म हो गई है .लैप टॉप और मोबाइल की दुनियां ने इसका स्थान ले लिया है .अब पुस्तक भी बहुत कम लोग ही पढ़ते हैं ,आपसी बातचीत कुछ तकनीक सुविधाओं ने तो कुछ आपसी विश्वास की कमी ने बहुत कम कर दी है या यूँ कहूँ कि लुप्त ही कर दी है.यथार्थ की दुनिया को टटोलना अब हमारा शगल नहीं रहा …..ऐसा करना पिछड़ेपन की निशानी माना जाने लगा है.मुझे तब बहुत दुःख होता है जब पर्यटन स्थल के लिए जाते वक़्त इंसानी विश्वास के घायल होने के भय के साये में हम किसी से बात चीत नहीं कर पाते .उस विशेष जगह की यात्रा ख़त्म की और फिर होटल के कमरे में बंद हो कर टी वी देखने लग जाएं .इसलिए मैं थोड़ा जोखिम उठाती हूँ वहां के स्थानीय लोगों को समझने निकल जाती हूँ.प्रत्येक महीने थोड़ी धन राशि बचा कर वर्ष में एक बार पर्यटन के लिए निकलने की योजना को टी वी देख कर कभी ज़ाया नहीं करना चाहती .टी वी तो कभी भी कहीं भी देख सकती हूँ पर उस स्थान विशेष तक आना विशेष योजना से ही संभव हो पाता है.
दुनिया बहुत बड़ी है…कोने कोने तक हम भौतिक रूप से नहीं पहुँच सकते पर जिन पर्यटन स्थल तक पहुँच पाते हैं उस स्थानों से जुडी संस्कृति ,कला, प्राकृतिक सुंदरता जिन्हे कभी छू कर ,कभी सिर्फ देखकर हमने आत्मसात किया वे अन्य पर्यटन स्थल तक पहुँचने के उल्लास और आकांक्षा को द्विगुणित कर देती हैं . आँखें जो देखती हैं मस्तिष्क उसे रिकॉर्ड कर लेता है और मन उसे लिफ़ाफ़े में बंद कर ह्रदय के दराज़ में संभाल कर रख लेता है. कुछ स्थल तो इतने लुभावने होते हैं कि मन बरबस ही कह उठता है…दिल कहे रूक जा रे रूक जा यहीं पर कहीं ,जो बात इस जगह है वो कहीं पर नहीं .मेरे लिए ऐसा एक पर्यटन स्थल है ‘हमारा घर ‘.
दोस्तों ,सच कहूँ मुझे स्थानांतरण कभी बोझिल नहीं लगता .छोटे छोटे सुदूर स्थानों में रहते हुए आस पास के पर्यटन स्थल की यात्रा बहुत सुखद एहसास देते हैं.विभिन्न लोगों से मिलना इसानी संवेदनाओं को समझने उसे महसूस करने का सशक्त माध्यम है.प्रत्येक नए स्थान की नवीनता बारिश की फुहार बन मन मस्तिष्क को भिगो जाती है और उस स्थान के बाशिंदे ,कलाकृतियां ,प्राकृतिक सुरम्यता ,पहनावा ,भाषा,खान पान ,आधुनिक विकास से लबरेज़ संस्कृति और परम्परा की यादें सप्तरंगी इन्द्रधनुष बन एक अनमोल धरोहर बन जाती है.जी चाहता है ऐसे कई इन्द्रधनुष एकत्र करती चलूँ.जिन पलों में नए स्थान नहीं मिल पाते तब घर की चारदीवारी में ही जीवन के वैविध्य रंगों से रूबरू होना अच्छा लगता है.एक आत्मिक यात्रा जो कभी खुद के अंतस में कभी किसी रोचक पुस्तक के साथ पूरी होने लगती है.
भारत देश तो अतीत काल से पर्यटन के लिए अत्युत्तम भूमि रहा है.फाह्यान हॅूंसांग,इत्सिंग मेगस्थनीज़,इब्नबतूता ना जाने कितने विदेशी सैलानियों ने यहां की यात्रा की और यहां की कला संस्कृति समाज के विषय में लिखा .अतीत काल से भारत की ‘अतिथि देवो भव’ के सद्भाव ने विश्व के कोने कोने की संस्कृति सभ्यता को आत्मसात कर अपनी अस्मिता को अक्षुण्ण रखते हुए पर्यटन भूमि के रूप में स्वयं को समृद्ध किया है .वर्त्तमान भारत उन सभी धरोहरों के साथ साथ आधुनिक विकास से जुड़े कई दृश्यों को अपने विशाल आँचल में समेटे भविष्य को गढ़ने को तैयार है .उत्तर में हिन्दुकुश पर्वत से दक्षिण के हिन्द महासागर की यात्रा तक कश्मीर,शिमला,कुल्लू मनाली आदि सदृश बर्फीली पर्वतीय वादियों ,धार्मिक स्थलों केदारनाथ,बद्रीनाथ,मानसरोवर ,ऋषिकेश,अादि के साथ के रामेश्वरम ,ऊटी,दक्षिण के विश्व विख्यात मंदिर मीनाक्षी,तिरूपति ,पदमनाभ आदि के साथ कई ऐतिहासिक महत्व के क्षेत्र मैसूर,हम्पी,श्रीरंगपट्ट्नम ….पूरब के शिलौंग,दार्जिलिंग,सिक्किम की सुरम्य वादियाँ,पश्चिम के द्वारका,जयपुर जोधपुर उदयपुर चित्तोड़,एलिफेंटा ,मुम्बई आदि और मध्य भारत के खजुराहो,पन्ना ,कान्हा किसली आदि पर्यटन स्थलों की सूची इतनी लम्बी कि देखने के लिए बार-बार इस पावन भूमि पर जन्म लेना पड़े . पर्यटन उद्योग के क्षेत्र में भारत के विकास की असीम संभावनाएं आज भी विद्यमान हैं.भारत पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र क्यों था यह इन कुछ पंक्तियों से साबित हो जाता है…..
सिकंदर से कहा सुकरात ने जब हिन्द में जाना
हमारे वास्ते भारत से कुछ सौगात ले आना
जहां तक हो सके तुझसे ले आना कृष्ण की गीता
शहंशाह भूल मत जाना कहानी राम अरु सीता
यद्यपि मुश्किल से आएगा वो गंगाजल भी ले आना
जिसे पीकर ऋषियों ने वेदों के तत्व को जाना
वहां से बांस की एक बांसुरी भी ज़रूर ले आना
बजा कर हम भी देखेंगे कि कैसा स्वर वो मस्ताना
वहां जाकर सिकंदर बृज की धूल भी ले आना
कि जिसमें लेटकर बृजवासियों ने ब्रह्म को जाना
हमारे वास्ते भारत से एक ज्ञानी गुरू भी लाना
सीखेंगे हम भी सच्चिदानंद रूपी ब्रह्म को पाना

(संकलित पंक्तियाँ)
Desktop
जीवन-एक यात्रा 'गर्भ से कब्र तक'
मुझे घूमना बहुत पसंद है.झारखण्ड के बीहड़ जंगलों के बीच बसे छोटे से स्थान में बीते बचपन ने प्रकृति के साथ कला से भी रिश्ता जोड़ दिया .ईश्वरीय अनुकम्पा से जीवन साथी भी पर्यटन और गीत संगीत शेरो शायरी में रुचि रखने वाला ज़िंदादिल इंसान मिला .कुल्लू मनाली की बर्फीली पर्वतीय वादियों से दीघा, पुरी के भीगे रेतीले समुद्र तट…की प्राकृतिक सुषमा …खजुराहो की खूबसूरत शिल्प से ,एलिफेंटा के अतुलनीय गुफा कला ….कोणार्क के सूर्य मंदिर से ….अमृतसर के गुरुद्वारा तक ….विभिन्न स्थानों के पर्यटन के उन्माद में भागते … कभी कभी पैदल चलते हुए थक कर भी थकान का एहसास ना करते हुए ….मैंने एक सबसे सन्तोषजकनक बात जो महसूस की वह यह कि भौतिक यात्राएं हमें सुख ज़रूर देती हैं पर खिलते और परिष्कृत हम आत्मिक यात्रा से ही होते हैं .एक पर्यटन स्थल ऐसा जिसकी यात्रा इंसान अपने जीते जी प्रायः और कुछ यदा कदा ज़रूर करता है …अकेलेपन की स्याह रोशनी में बगैर किसी टिकट ,वीज़ा,पासपोर्ट के की गई उस रहस्यमयी पर्यटन स्थल का वृतांत ना वह लिख सकता है ना किसी को सुना सकता है …बस स्वयं ही समझता है.वह है अपने मृत्यु स्थल के पर्यटन भूमि की यात्रा .

crematorium ,
railway platform,
bus stop…airport
four places
to me
most attractive
spots of meeting & separation
reveal
two aspects of life
very clearly
renew the life
enrich us
nourish each moment
they are great witness of
the coverage of
the whole journey
with flow of time .

Wednesday, September 17, 2014

ट्रिप्लेट ऑफ़ ' टॉयलेट,टैप,ट्रेनिंग '(3 T's Of (TOILET,TAP,TRAINING)

माननीय प्रधानमंत्री जी ने स्वाधीनता दिवस और शिक्षक दिवस दोनों ही अति विशेष अवसरों पर जिस एक बहुत ही तुच्छ समझे जाने वाले मगर बेहद ज़रूरी मुद्दे को जनता के सामने रखा और अपनी संवेदनशीलता से अवगत कराया .....वह है शौचालय की व्यवस्था .
शौचालय से सम्बंधित स्वच्छता महिलाओं के लिए आत्मसम्मान के साथ सुरक्षा से भी जुड़ा मुद्दा है.घर पर शौचालय के अभाव में सामान्य महिलाओं के अलावा गर्भवती महिलाओं और महीनों के कुछ विशेष दिनों का सामना करने वाली महिलाओं को बहुत दिक्कत हो जाती है.है.प्रियंका ने जब शौचालय के अभाव की वज़ह से अपनी ससुराल छोड़ी तो लोग हँसते ताना देते थे ,"कैसी महिला है इतनी छोटी सी बात के लिए ससुराल छोड़ आई पर उसके पति ने उसकी सही सोच में उसका साथ दिया.स्वयं प्रियंका के शब्दों में '"पति ने कहा मैं सोच ही नहीं पाया कि शौचालय से सम्बंधित समस्या इतनी महत्वपूर्ण है."और आज सब प्रियंका को कहते हैं ,"तुमने बहुत नाम कमाया अच्छी सोच की दिशा में लोगों को ले गई." .बैतूल.कुशीनगर सभी स्थानों से महिलाओं ने आवाज़ उठाई .श्री बिन्देश्वरी पाठक जी ने सुलभ शौचालय की दिशा में कदम उठाया था .आज ज़रुरत है शौचालय प्रत्येक घर में हों .आंकड़े बताते हैं कि बिहार के ७६% झारखण्ड के ९२% छत्तीसगढ़ के ७५% घरों में शौचालय नहीं हैं .कई गाँव में शौचालय बनाये गए पर उनमें से कुछ साफ़ सफाई के अभाव में इस्तेमाल नहीं होते ,कुछ बारिश के दिनों में उपले रखने और मवेशी बांधने के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं.गाँव के कई विद्यालयों में भी यह आधारभूत सुविधा नहीं है पर जहां है वहां के भी हालात ऐसे हैं कि उन शौचालयों का इस्तेमाल करना बहुत मुश्किल है.गन्दगी से पटे शौचालय अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं पर इस्तेमाल नहीं हो पाते. इसके पीछे दो मुख्य समस्या है ...प्रथम; पानी के टैप की समुचित व्यवस्था का अभाव और दूसरी टॉयलेट ट्रेनिंग की कमी. शौचालय इस्तेमाल के बाद उसे साफ़ छोड़ने की व्यवस्था सरकार का काम नहीं बल्कि इस्तेमाल करने वाले का सामजिक और नैतिक कर्त्तव्य है.हम सब जानते हैं एक कुत्ता भी अगर किसी स्थान पर बैठता है तो उस स्थान को पहले अपनी पूँछ से साफ़ कर देता है फिर वहां बैठता है .जब एक जानवर गन्दगी से परहेज़ रखता है तो हम सब तो इंसान हैं क्या हम इस्तेमाल कर शौचालय को औरों के इस्तेमाल के लिए साफ़ नहीं छोड़ सकते हैं.?विद्यार्थियों को पठन पाठन के अतिरिक्त इस बात की शिक्षा देनी भी ज़रूरी है.कल ही इसी मुद्दे से सम्बंधित कार्यक्रम में टी वी पर बच्चों के इंटरव्यू देख रही थी .जब एक बच्ची से पूछा गया कि टॉयलेट इतना गंदा है आप इस्तेमाल कैसे करते हो ...तो उसका सीधा ज़वाब था,"हम इसे इस्तेमाल नहीं करते ...हम घर से ही फ्रेश होकर आते हैं." ऐसे में वाकई यह एक चिंतनीय विषय है कि इस्तेमाल करने के लिए बने संसाधन का इस्तेमाल क्यों नहीं हो रहा है और यह उस संसाधन पर लगे निवेश की बर्बादी है कि नहीं .लोगों में जागरूकता लाना ज़रूरी है.
गाँव या सरकारी विद्यालयों की ही बात नहीं है यह गैर जिम्मेदाराना व्यवहार हम शिक्षित लोगों में भी देखते हैं.एक मॉल के सिनेमा हॉल में मेरा सामना ऐसी ही एक महिला से हुआ .मैं जब उस अत्यंत साफ़ -सुथरे टॉयलेट के इस्तेमाल के लिए गई तो वहां की सफाई कर्मचारी ने लगभग चिल्ला कर कहा," ओ मैम , आप भी नीचे फर्श को गंदा मत करना ." ऐसी बात सुन कर स्वाभाविक था कि किसी को भी नाराज़गी होती . मैंने अपने परिधान को देखा शायद साड़ी ब्लाउज में सलीके से आँचल संभालती मैं उसे कुछ असभ्य सी लग रही होउंगी...पर मेरा यह भ्रम दूर हुआ क्योंकि उसकी भनभनाहट जारी थी जिसे मैं अंदर से साफ़ साफ़ सुन सकती थी ..वह बड़बड़ाये जा रही थी..."चली आती हैं जींस टॉप में आधुनिक बन कर और तमीज के नाम पर शून्य हैं बच्चों को टॉयलेट ट्रेनिंग भी नहीं दे सकतीं मेक अप देखो तो इतना ज्यादा ." अब मुझे उसकी नाराज़गी स्पष्ट समझ में आ रही थी .मैंने अपनी सहेली से कहा ,"यार यह तो गलत बात है कितना साफ़ यह टॉयलेट है और शिक्षित सभ्य लोग भी इसे गंदा करने से बाज़ नहीं आते ."उसने लापरवाही से कहा ,"छोड़ ना यार,क्या फर्क पड़ता है ;उसे इसी काम के लिए रखा गया है और उसे पैसे भी मिलते हैं और तू ना अपने अंदर की ये समाज सेविका को मार दे वरना एक दिन खुद मरेगी ." अजीब सी बात थी .मैं सोचती रही जहां सारी सुविधाएं होने पर भी लोग टॉयलेट का इस्तेमाल जिम्मेदारी से नहीं करते फिर जहां पानी के नलों की सुविधाएं नहीं होती होंगी वहां तो शौचालय बस कंक्रीट का कूड़ादान ही होता होगा.ऐसा कितनी बार हुआ है कि सफर के दौरान किसी ढाबे होटल या सड़क के किनारे बने टॉयलेट का इस्तेमाल हम सिर्फ इसलिए नहीं कर पाते कि अपनी ज़रुरत पूरी हो जाने पर किसी ने दूसरों की ज़रुरत का कोई ख्याल नहीं किया था.कितनी बार तो ढाबों या होटलों के मालिक को कहते सुना है ,"क्या करूँ मैडम अब महिलाओं को कुछ बोल भी नहीं सकते ,हमेशा तो स्वीपर खड़ा नहीं रहेगा वह दिन में एक बार साफ़ कर चला जाएगा ."बात उनकी बिलकुल सही है .हमारी खुद की नैतिक जिम्मेदारी की शिक्षा पर मैं क्षुब्ध हो जाती हूँ .
अपने घरों में हम प्रतिदिन स्वयं ही शौचालय की सफाई कर लेते हैं और सार्वजनिक शौचालय के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं रखते हैं.हमें स्वयं को ,अपने बच्चों को यह प्रशिक्षण देना ही होगा कि टॉयलेट्स का होना एक महत्वपूर्ण बात है पर उसको साफ़ रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है.पक्के फर्श पर पड़े मल बीमारी का कारण होते हैं और होटलों ढाबों के आस पास तो भोजन पर भी यह गन्दगी असर करती है.अगर सार्वजनिक स्थानों पर हमारी ज़रुरत का ध्यान रखा जाता है तो यह हमारा कर्त्तव्य है कि हम उस ज़रुरत के संसाधन के प्रति सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी अवश्य रखें .अगर समय पर ये संसाधन उपलब्ध ना हों तो हम सब मुश्किल का सामना करते हैं फिर भी इसे इस्तेमाल के बाद साफ़ सुथरा नहीं छोड़ते यह हमारी बहुत बड़ी भूल है.
चलिए हम सब प्रधानमंत्री जी की इस संवेदनशीलता के साथ अपनी समझदारी ,सामाजिक जिम्मेदारी की जुगलबंदी करें और स्वच्छता के लिए 3 टी के triplet ( toilet , tap , training ) को अपनाएं .टॉयलेट के निर्माण के साथ पानी के टैप की व्यवस्था हो और इसके साफ़ सफाई रख रखाव की ट्रेनिंग लें भी दें भी . इसे इस्तेमाल के बाद साफ़ छोड़ा जाए ताकि दूसरों को इसे इस्तेमाल करने में कोई असुविधा न हो .

हिन्दी की 'मलयज शीतलाम '(१४ सितम्बर )

collage2मेरे प्रिय ब्लॉगर साथियों
हिन्दी दिवस पर आप सभी को हार्दिक शुभकामना
दोस्तों ,इस वर्ष मैं हिन्दी दिवस के अवसर पर बहुत प्रसन्न हूँ.इसकी दो ख़ास वजहें हैं;प्रथम हमारे प्रधान मंत्री जी के द्वारा प्रत्येक राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय सम्बोधन पर राष्ट्रभाषा को ही माध्यम बनाना जो कि सम्पूर्ण भारत देश को अपनेपन के सूत्र से जोड़ पा रहा है .दूसरी ख़ास वज़ह यह कि मैं पहली बार दक्षिण भारत में रहने के लिए आई हूँ.और लगभग हर पांचवे उत्तर भारतीय की तरह मेरा भी यही भ्रम था कि भारत देश के इस भाग में हिन्दी कम प्रचलित है .पर मैं आप सब को बताने में बहुत गर्व महसूस कर रही हूँ कि यहां भी लिंक भाषा के रूप में अंग्रेज़ी नहीं बल्कि अपनी राष्रभाषा हिन्दी का ही प्रयोग होता है.
अब एक वाक्या बताती हूँ .हुआ यूँ कि यहां एक महिला जो पिछले २० वर्षों से रह रही थी उसके पुत्र ने १२ वीं तक की शिक्षा यहीं के सीबीएसई बोर्ड के विद्यालय से ग्रहण की अब उसे बाहर जाने के लिए कुछ कागज़ी कार्यवाही पूरी करवानी थी जब वह सरकारी कार्यालय पहुँचा तो एक कर्मचारी ने उसे कहा,"२० वर्षों से यहां रह रहे हो कन्नड़ भाषा नहीं आती ."उस लडके ने ज़वाब दिया ," अंकल, मैं अगर कन्नड़ ना जानूँ तो मेरा काम चल जाएगा पर अगर आप हिन्दी भाषा नहीं जानेंगे तो इस राज्य से बाहर जाने पर लोगों को अपनी बात समझने के लिए आपको कदम कदम पर मुसीबत आएगी .आप तो जन्म ही भारत देश में लिए हैं ,आपको हिन्दी भाषा नहीं आती ?" उसके बाद उन कर्मचारी ने हिन्दी भाषा में ही बात की .दरअसल अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी भाषा की अनभिज्ञता नहीं बल्कि अपने क्षेत्र ,राज्य की भाषा का अस्तित्व बचाने का प्रयास रहता है जो हमें भ्रमित करता है कि उन क्षेत्र या राज्य के बाशिंदे हिन्दी भाषा नहीं जानते.कुछ बेहद स्थानीय लोगों को छोड़ कर अमूमन सभी लोग काम से काम काम चलाऊ हिन्दी का ज्ञान अवश्य रखते हैं .
मेरे यहां एक माली काम करता है जिसे सिर्फ कन्नड़ भाषा आती है .यह बात और है कि मुझे भी सिर्फ हिन्दी आती है फिर भी बगीचे का काम प्रतिदिन बखूबी सम्पन्न हो जाता है .मैं हिन्दी के शब्द और वाक्य बोलती हूँ साथ में इशारों से अभिनय कर उसे वह समझती हूँ अब वह उन सभी चीज़ों को हिन्दी भाषा से ही समझता है और जब कहीं मुश्किल आती है तब काम पर आने वाली घरेलू सहायक जिसे हिन्दी भाषा का ज्ञान है वह हमारे बीच अनुवादक का काम कर देती है. आपको यहां यह बताने पर मुझे पुनः गर्व हो रहा है कि वह महिला कन्नड़ भाषा से स्नातक है .
हिन्दी हमारी कथनी करनी और लेखनी की भाषा है.मुझसे अक्सर लोग एक प्रश्न करते हैं,"आप हिन्दी भाषा की प्रबल समर्थक हैं फिर भी अपना फेस बुक अकाउंट और वैल्यू पेज दोनों में ही अधिकतर अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग करती हैं .ऐसा विरोधाभास क्यों ?"अब यहां मैं एक पढ़ी हुई घटना का ज़िक्र करती हूँ.collage1
गांधी जी अपने वर्धा आश्रम में रूकने के दिनों में ब्रह्म मुहूर्त में ही नित्य क्रिया से निवृत हो कर ,थोड़ा पत्र लेखन वगैरह कर प्रतिदिन आगुन्तकों से भेंट करते थे. एक दिन एक अँगरेज़ सज्जन उनसे मिलने आये.चूँकि वे थोड़ा बहुत हिन्दी भाषा जानते थे अतः उन्होंने गांधी जी से हिन्दी भाषा में ही बात चीत शुरू की.परन्तु गांधी जी उनसे अंग्रेज़ी भाषा में बातचीत जारी रखे हुए थे.जब वे सज्जन जाने लगे गांधी जी ने अंग्रेज़ी भाषा में ही उन्हें सम्मान सूचक शब्द कहे.अब उन सज्जन से रहा ना गया उन्होंने पूछ ही लिया,"महात्मा जी,मैं तो आप से हिन्दी भाषा में बात करता रहा ,तहज़ीब यह कहती है कि जिस भाषा में बात किया जाए ज़वाब भी उसी भाषा में दिया जाए पर आप तो अंग्रेज़ी भाषा में बात करते रहे,ऐसा क्यों "गांधी जी ने ज़वाब दिया,"मान्यवर,आप की बात बिलकुल सही है पर जब आप मेरी मातृभाषा के प्रति इतना सम्मान,आदर और प्रेम रखते हैं तो मैं भी आपकी भाषा का आदर करूँ यही तहज़ीब है ."यह सुन कर वे सज्जन गांधी जी के प्रति और भी श्रद्धावान हो गए .
वस्तुतः भाषा हमारी अभिव्यक्ति का माध्यम है .हमारे विचार ज्ञान के वाहक होते हैं.ज्ञान के प्रसार के रूप में कोई भी भाषा आदर युक्त होती है.अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग हिन्दी भाषा के प्रति बेरूखी कभी नहीं है बल्कि ज्ञान के सागर में गंगा जमुनी संस्कृति का मिलन है.किसी भी अन्य भाषा को सीखने या प्रयोग करने से अपनी भाषा के प्रति सम्मान और महत्व काम नहीं होता अपितु द्विगुणित हो जाता है क्योंकि उन अन्य भाषाओं के ज्ञान को हम हिन्दी भाषा के माध्यम से प्रसार करते हैं और हिन्दी भाषा में अथाह ज्ञान सागर को जान जान तक उस अन्य भाषा के माध्यम से पहुंचा सकते हैं.
मेरे प्यारे साथियों ,हिन्दी भाषा की लहर जो अभी चल रही है उसने सोशल मीडिया के माध्यम से उन शेरो शायरी कविताओं ग़ज़ल गीत कहानियों लोकोक्तियों को भी पुनर्जीवित कर दिया है जो हमारी नई युवा पीढ़ी इतिहास के पन्नों पर देखने वाली थी.आज वे सभी विधाएँ हिन्दी भाषा में प्रतिदिन सैकड़ों पेज साइट्स के माध्यम से रोज़मर्रा की ज़िंदगी में शामिल होती जा रही हैं.
हिन्दी भाषा मुझे कई कारणों से बहुत प्रिय है सबसे प्रथम प्रशंसनीय बात है कि इस भाषा की शब्दावली और व्याकरण निश्चित ,बहुल और पूर्णतः स्पष्ट है .एक उदाहरण देती हूँ .हिन्दी भाषा में धर्म के लिए जो शब्द प्रचलित है वह अंग्रेज़ी के रिलिजन शब्द से बेहद व्यापक है 'सनातन धर्म 'सनातन अर्थात जो अनादि काल से चला आ रहा है और धृ अर्थात धारण करना जबकि रिलिजन faith से जुड़ा है और faith कभी भी इच्छानुसार ,परिस्थिति वश,बदल सकता है.हिन्दी भाषा का शब्द भण्डार बेहद सार गर्भित है.अंग्रेज़ी भाषा कि शब्दावली में छेड़ छाड़ संभव है और वह परिलक्षित भी हो रहा है 'that' dat हो गया 'you' u , 'we' v ,'express ' xpress ....पर क्या इतनी सहजता से हम हिन्दी को विकृत कर सकते हैं कभी भी नहीं वह मान्य भी नहीं होगा इसे अशुद्ध किया ही नहीं जा सकता है.
हिन्दी भाषा के मान सम्मान को बढ़ाने में इस प्रतिष्ठित अनुपम जागरण मंच का भी अमूल्य योगदान है.हिन्दी भाषा माँ गंगा की तरह पावन है.राष्ट्रीय नदी गंगा उत्तर भारत के राज्यों से बहती उन्हें ही संचित करती है पर हिन्दी भाषा की गंगा तो उत्तर ,दक्षिण पूरब पश्चिम चतुर्दिक दिशा में बोलचाल के रूप में प्रवाहमान है.
collage3मैं इस प्रतिष्ठित मंच से अपने ब्लॉग के माध्यम से प्रधान मंत्री जी से सविनय निवेदन करना चाहती हूँ कि इस ‘हिन्दी दिवस ‘के अवसर पर वे देश के सभी राज्यों में यह नियम अनिवार्य बना दें कि किसी भी सूचना दायक बोर्ड पर (रैलवे स्टेशन,माइलस्टोन या दुकानों बाजारों के बाहर लगे बोर्ड पर ) लिखी सूचनाओं शब्दों और वाक्यों को उस राज्य की राजभाषा,और अंग्रेज़ी भाषा (जो प्रायः मैंने ओडिशा,पश्चिम बंगाल और अब कर्नाटक में देख रही हूँ) के साथ साथ अनिवार्य रूप से हिन्दी भाषा की देवनागरी लिपि में लिखा होना एक नियम बना दें .इससे उन सभी साक्षर लोगों को लाभ पहुंचेगा जो कि अपनी मातृभाषा या राष्ट्रभाषा हिन्दी से तो साक्षर हैं पर अंग्रेज़ी भाषा की रोमन लिपि से अनभिज्ञ हैं .ऐसी परेशानी मैं ने महसूस की है जब अन्य राज्यों में आने पर राजभाषा में ही लिखे सूचना बोर्ड को मैं साक्षर और शिक्षित होने के बावजूद पढने में पूर्णतः असमर्थ थी.(अभी कन्नड़ भाषा मेरे लिए मुश्किल है )अन्य राज्यों के स्थानीय लोग भी जब दक्षिण भारत या ओडिशा,बंगाल जैसे राज्यों में जाते हैं तो उन्हें अंग्रेज़ी या वहां की राजभाषा में लिखे शब्दों को पढने में असमर्थता महसूस होती है. अगर मेरा यह सन्देश प्रधान मंत्री जी तक पहुँच जाए तो मैं अपने इस अनुपम मंच की बहुत बहुत आभारी रहूंगी.इस अनुपम मंच से जुड़े वैचारिक यात्रा के सभी सहयात्रियों को हिन्दी दिवस पर पुनः बहुत सारी शुभकामना

स्किल @ गुड पे स्केल विद 'वैल्यू'

मेरे प्रिय ब्लॉगर साथियों
आज engineers डे है जो महान अभियंता मोक्षगुंडम विश्वेशरैय्या जी की याद में मनाया जाता है जिनका जन्म 15  सितम्बर 1860  को हुआ था १७ सितम्बर को विश्व कर्मा जी की जयन्ती भी मनाई जाएगी .जीविकोपार्जन से जुड़े आप सभी लोगों को विशेष कर इंजीनियर्स साथियों को मेरी बहुत बहुत शुभकामना .रोज़ी रोटी के लिए अपने गाँव शहर छोड़ कर देश विदेश के कोने कोने में कार्यरत लोगों के सामने कुछ आज मैं एक बहुत ही अहम प्रश्न रखना चाहती हूँ .डॉक्टर्स डे ,टीचर्स डे इंजीनियर्स डे हम मनाते हैं पर क्या कभी स्किल से जुड़े टेलर्स डे ,प्लम्बर्स डे,कार्पेंटर्स डे ,पोर्टर्स डे ,स्वीपर्स डे ,कुक्स डे ,मैकेनिक्स डे ,ड्राइवर्स डे ,मना कर किसी भी एक स्किल को हमने सम्मान दिया है. ????
आज ब्लॉग की शुरूआत एक छोटी सी बेहद प्रासंगिक कहानी से करती हूँ .
एक सेठ जी के पास बड़ी मिल थी.लाखों लोगों के जीविकोपार्जन का केंद्र ,लाखों का उत्पादन और सेठ जी करोड़ों में खेलते थे.एक बात ज़रूर थी कि वे अपने कर्मचारियों का बहुत ध्यान रखते थे.अचानक एक दिन मिल बंद हो गई .मिल में कार्यरत कर्मचारियों ने बहुत कोशिश की पर मिल चालू ना हो पाई.सेठ जी ने कर्मचारियों से किसी ऐसे व्यक्ति को ढूंढ कर लाने कहा जो मशीन ठीक कर दे .अगले दिन एक कर्मचारी एक ऐसे युवक को लेकर आया जो बहुत ही साधारण दिखता था और किसी भी खराब पड़ी मशीन को ठीक करने का दावा कर रहा था.उसने सेठ जी को कहा,"मैं मशीन ठीक तो कर दूंगा पर पूरे 15,000 की धन राशि लूँगा."सेठ जी उत्पादन के नुकसान को ध्यान में रख हामी भर दी.उस युवक ने अपने पास से एक हथौड़ा निकाला ,मशीन का सूक्ष्म निरीक्षण किया और एक विशेष स्थान पर हथौड़ा मारा और मशीन चल पड़ी.अब बारी सेठ जी की थी .वे पैसे देने से मुकरने लगे...उन्होंने कहा,"बस एक हथौड़े मारने का 15,000क्यों दूँ?" युवक ने हँस कर कहा,"इसलिए कि हथौड़ा मारना तो सब जानते हैं लेकिन कहाँ मारना है यह तो विशेषज्ञ या कुशल व्यक्ति ही जानता है 15,000उसी कुशलता की कीमत और विशेषज्ञता का मोल है."

दोस्तों,हम सभी को शैक्षणिक डिग्री के साथ कोई ना कोई विशेषज्ञता या कौशल ज़रूर हासिल करना चाहिए जो निजी लाभ के साथ साथ सार्वजनिक लाभ की दिशा में भी सहायक हो सके.हमारे प्रधान मंत्री जी ने भी कौशल विकास ( skill development )पर जोर देने की बात कही है.
Copy of Desktopपर प सब एक बार गौर से सोचिये क्या स्किल्ड जॉब को हमारा समाज बहुत सम्मानित करता है?क्या किसी सूटेड बूटेड बढ़ई,प्लम्बर,मोची ,कुक इत्यादि को आप ने देखा है?क्या डॉक्टर्स डे ,इंजीनियर्स डे की तरह कभी भी हमने कार्पेंटर्स डे,प्लम्बर्स डे ,ड्राइवर्स डे ,पोर्टर्स डे,स्वीपर्स डे या स्किल से जुड़ा कोई भी दिवस मनाने का ख्याल हमने कभी भी किया है ?आज तक तो कभी नहीं .
दरअसल हमारी मनोवैज्ञानिक और आर्थिक आदत है अगर किसी भी सेवा या वस्तु के साथ हाई प्राइस टैग लग जाए तो उसका हमारे लिए मूल्य बढ़ जाता है .सड़क पर सजी दुकानों में लगी शर्ट सस्ती है तो कोई ध्यानाकर्षण नहीं कर पाती पर वही सम्मान के साथ मॉल में बिकने को चली जाए तो अभिजात्य वर्ग भी उसे खरीदने को तैयार हो जाता है इसलिए आज सर्वाधिक ज़रुरत यह है कि स्किल डेवलपमेंट की बात के साथ स्किल @ गुड पे स्केल विद वैल्यू ( कौशल का आर्थिक और नैतिक विकास ,अच्छे वेतन पैमाने और उसके कौशल के सम्मान ) की भी बात हो .
इस सन्दर्भ में कुछ बहुत ही अहम बिन्दुओं पर ध्यानाकर्षण आवश्यक है.
1) हमारे देश में कुशल श्रम शक्ति है पर वह लो कॉस्ट स्किल्ड है.वैश्विक अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए हमें उच्च स्तर का कौशल विकसित करना होगा जो अपनी ब्रांड के साथ देश का भी ब्रांड बन सके.उसे सस्ती श्रम शक्ति नहीं बल्कि आर्थिक,नैतिक,सामाजिक रूप से सशक्त श्रम शक्ति के रूप में बाज़ार के लिए उपलब्ध कराया जाए.इसके लिए मानव संसाधन के विकास का भवन चार मज़बूत स्तम्भों साक्षरता,कुशलता,अनुसंधान और विकास पर तैयार करना होगा.प्रत्येक नागरिक को सही अर्थों में साक्षर बनाया जाए ( देश की भाषा ,क्षेत्रीय भाषा के साथ विश्व स्तर पर प्रचलित भाषा में लेखन पाठन और बोध क्षमता विकसित हो ),जिस भी कुशलता या दक्षता का प्रशिक्षण दिया जाए वह घरेलू बाज़ार के साथ वैश्विक बाज़ार की मांग और आवश्यकता के अनुरूप भी हो इसके लिए विशेष अनुसंधान कर ही उसका विकास किया जाए.
2) आज ट्रॉली वाले बैग्स ने कुलियों की संख्या कम कर दी है , चमकते (glossy waxy )पैकेजिंग में बंद स्नैक्स ने ताज़ा भुना स्नैक्स तैयार करने वाले गली गली में खुली दुकानों को बंद कर दिया है,रेड़ी मेड कपड़ों ने कुछ हद तक मुहल्लों के दर्जियों को बेकार कर दिया है.ज़रुरत है इन पारम्परिक व्यवसायों को कायम रखा जाए .इन्हे वर्त्तमान बाज़ार की मांग के अनुसार तैयार किया जाए .जमशेदपुर शहर के बाज़ार में कुछ स्नैक्स (भुना चूड़ा मूंगफली,सत्तू,चना इत्यादि)बनाने वाले बैठते हैं .उसने दो बच्चों को बाहर पढने भेज दिया है एक बच्चे को पुश्तैनी व्यवसाय सीखा दिया है .वह अपने भुने स्नैक्स को बहुत ही अच्छी पकैजिंग करते हैं और बिलकुल फ्रेश माल ही बेचते हैं .शहर के प्रत्येक कोने से लोग वे स्नैक्स खरीदने वहीं आते हैं इसी प्रकार वहां एक फकीरा ब्रांड के नाम से भी स्नैक्स खूब बिकते हैं.ऐसे ही मुझे घर पर आने वाला एक कबाड़ी वाला याद आता है माँ उसे टीन के पुराने कनस्तर दे देती और वह बहुत ही कुशलता से उन टीन को जोड़ कर बॉक्स/ट्रंक बना देता था.ज़रुरत है उन सभी पारम्परिक कौशल को वर्त्तमान बाजार के अनुसार विकसित किया जा सके .
3) लोगों को अपने यहां काम करने वाले घरेलू सहायकों/सहायिकों को भी बेहतर काम करने का कौशल विकसित करना चाहिए.अच्छे साफ़ सुथरे ढंग से कम तेल मसालों में पौष्टिक भोजन कैसे बनाना है,उसे किस तरह परोसना है,गैस का किफायती इस्तेमाल किस तरह करना है,सब्जियां कैसे धोनी है,एप्रन का इस्तेमाल ,साफ़ तौलिये का प्रयोग सिखाना ज़रूरी है.अगर स्थानांतरण के दौरान हम कहीं और चले गए तो ये सिखाई हुई बातें उसे काम की कुशलता से अपने हक़ में रूपये पैसे का मोल भाव करने में मदद कर सकेंगी. मेरी एक रिश्तेदार हैं उन्होंने घर पर वाशिंग मशीन नहीं रखा है .पूछने पर कहती हैं घर आकर कपडे ले जाने वाले धोबी के जीविकोपार्जन का क्या होगा .
4) मैं जब भी टी वी पर अपराध से जुड़े समाचार या कार्यक्रम देखती हूँ तो पाती हूँ कि अपराध को अंजाम देने वालों में कुछ घरेलू सहायक,ड्राइवर
,प्लम्बर,केबल ठीक करने या बिजली का काम करने वाला,या ऐसे ही कोई स्किल से जुड़े लोगों का नाम आ जाता है.यह सच है कि ऐसी कुशलता या व्यवसाय से जुड़े सभी लोग अनैतिक और अवैधानिक काम या सीधे अर्थों में कहे तो ऐसी अपराधिक प्रवृत्ति के नहीं होते पर यह भी एक कटु सत्य है कि दिल्ली के जघन्य दामिनी काण्ड को एक बस चालक ,एक मैकेनिक ने ही अंजाम दिया था .देश की जनसख्या का 65 % भाग 35  वर्ष से नीचे आयु वर्ग का है.इनमें कौशल विकास के साथ नैतिक मूल्यों का विकास भी बहुत ज़रूरी है ताकि कुशल,अनुशाषित मूल्यों से लबरेज़ श्रम शक्ति तैयार हो . इन्हे काम देने में इनकी नैतिकता पर कोई संशय ना हो और विश्वास के साथ इन्हे राष्ट्र्रीय और अंतराष्ट्रीय बाज़ार के लिए उपलब्ध किया जा सके .इसके लिए साथ में इन्हे कौशल विकास के साथ नैतिक मूल्य और फिर काम लगाने पर अच्छी पे स्केल भी दी जाए ताकि इनके मूल्य किसी आर्थिक परेशानी में भी डावांडोल ना हो पाएं.

5) एक वक़्त था जब ढ़ाका के मलमल के विषय में भारत शान से कहता था कि यह इतना महीन होता है कि एक थान मलमल माचिस की डिब्बी में या हाथ की कनिष्ठा में लपेटा जा सकता है. आज भी कई ऐसे हस्त कौशल हैं जो बहुत सुन्दर हैं पर या तो उनका वाज़िब दाम देने को लोग तैयार नहीं या फिर उन्हें मिलते जुलते सस्ते कच्चे माल से बनने वाले उसी आवश्यकता को पूरे करने वाले सस्ते उत्पादों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है और ऐसे परम्परागत सुन्दर हस्त कौशल पराजित हो जा रहे हैं.ज़रुरत है उन हस्त कौशल को वर्त्तमान तकनीक विकास से जोड़ कर बाज़ार और मानवीय मनोविज्ञान से उनका ताल मेल बिठाया जाए .एक ऊनी कालीन नए डिजाईन की सिंथेटिक रेशों से बनी सस्ती कालीन से प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाती है तो इसके लिए ज़रूरी है कि विज्ञापन का सहारा लेकर ऐसे कुशल लोगों को वाज़िब खरीदार तक पहुँचाया जाए ताकि उनकी कारीगरी की वाज़िब कीमत मिल सके और क्रेता सही और विक्रेता के बीच की दूरी मिट सके.
6 ) कम्पनीज एक्ट २०१३ के अंतर्गत कंपनियों को अपने शुद्ध लाभ का 2% CSR ( Corporate   Social Responsibility   पर खर्च करना अनिवार्य है इसके तहत साक्षरता को कौशल विकास के साथ जोड़ कर ऐसे कुशल लोग तैयार किये जा सकते हैं जो स्थानीय ज़रूरतों के अनुकूल हों और उन्हें आस पास के कल कारखानों ,कुटीर उद्योगों या स्व रोजगार जैसे वैज्ञानिक ढंग से तकनीक का प्रयोग करते हुए मुर्गी पालन,मधुमखी पालन ,दर्ज़ी बढ़ई जैसे कौशल से जीविकोपार्जन में मदद मिल सके.एक साक्षर अपने कौशल की दिशा में सही मायनों में शिक्षित भी हो सके उसे डिजिटल फ्रैंडली बनाया जाए ताकि वह बैंक से सम्बंधित काम ,बाज़ार से सम्बंधित विपणन के काम को वैश्विक स्तर पर समझ कर उसे स्थानीय लोगों को उच्च स्तरीय गुणवत्ता के साथ उपलब्ध करा सके इससे उसका कौशल अच्छे वेतन पर आधारित हो जाएगी.
7) हमारे देश में लगभग प्रत्येक आयोजन सेलिब्रेट होते हैं.क्या कांच और लाह की चूड़ी बनाने वालों के लिए ,पीतल के बर्तन तालों को बनाने वालों के लिए कभी कोई प्रदर्शनी आयोजित की जाती है क्या मोची,बढ़ई,दर्ज़ी , चालक इन्हे सम्मानित करने के लिए कोई विशेष दिन का आयोजन किया जाता है ?ज़रुरत समाज में ऐसे स्किल को सम्मान और पहचान देने की है .प्रधानमंत्री जी के 'मेक इन इंडिया 'का नारा भी तभी सफल हो सकता है.
8) सामाजिक जागरूकता से जुड़ा कोई भी अभियान कौशल को भी अगर जोड़ सके तो बेहतर होगा .यहां मैं नमो चाय पर चाय चर्चा का ज़िक्र करूंगी .इस अभियान में अगर मिट्टी के कुल्हड़ का प्रयोग प्लास्टिक ,पेपर और थर्माकोल की कप के जगह होता तो पर्यावरण फ्रेंडली अभियान के साथ यह कुम्हार के कौशल से जुड़कर उनका भी सम्मान और आय बढ़ा जाता और पेपर के लिए वृक्ष भी कटने से बचते ;अवशेष कुल्लहड़ की मिट्टी माटी में मिल जाती.

स्किल डेवलपमेंट सम्पूर्ण रूप से हो जिसे हम होलिस्टिक डेवलपमेंट कहते हैं.जो भी कौशल सीखा जाए चाहे वह तकनीक,भाषा,संगीत,मशीन,विज्ञान ,घरेलू ज़रूरतों को पूरा करने से सम्बंधित (घरेलू सहायक,रसोइये,मोची,कुम्हार चालक इत्यादि) हो उसे इस तरह सीखा या सिखाया जाए कि वह उचित आर्थिक लाभ का आधार बन सके . न सिर्फ घरेलू बाज़ार की मांग बल्कि ज़रुरत पड़ने पर वैश्विक बाज़ार के लिए भी आपूर्ति को तैयार हो सके.उसे सही अर्थों में स्किल @ गुड पे स्केल विद वैल्यू के मापदंड पर खरा तैयार किया जाए .मानव संसाधन को विकसित करने का यही नैतिक,आर्थिक,सामाजिक और तात्कालिक तकाज़ा है .

Wednesday, September 10, 2014

'THE WHITE ENVELOPE '


In the noise of
many attractive ring tone
I still wait for the devaduta
in sealed white envelope
to me who brings heaven .

The 'trio' of tense
past,future and present
all merge into blue incarnation
letters form the images
I feel enriched with visualization
for me the clock stops
its really seems meditation .

What to say...for your phone call
your assurance makes formal all
'Don't worry mamma'
gives me more worry
'Be cool' takes me to
above the temp. 98.6 degree .

Its the WHITE ENVELOPE
gives me satisfying experience
as silent letters utter a lot
i can understand with stance
longing for home;the sense of distance
that......every moment you experience
i pray to God
He blesses me with power of words
to send to you ...to learn life chords
each word blesses you
that is the return gift
for WHITE ENVELOPE sent by you .

-yamuna

Books - 'FORBIDDEN '

Books - 'FORBIDDEN '

People say...
dwelling on memory
is a matter of stupidity
advertisements say....
attitude of living in past is profitable
to sell a commodity ....
more nostalgic customers ;
more crazy purchasers .

but my sense is quite different here
hidden from your eyes
sitting in the house's extreme corner
from your wooden drawer
often I had read many books 'FORBIDDEN'
child magazines...Champak..Nandan
did appeal me
but those books 'forbidden'
couldn't resist me
although they are damaged by
cruel white termite
yet some of them
chuckle ,smile,laugh,cry
with many characters in real life .
I know @ the age of teen
my action was really mean
but I had been helped by that only
proving a real healer in my loneliness
opening the door for enjoyment
that has shown real friendliness
being honest...I would tell you
@ the age of forty four
I am still the fraud
I like thoughtful people's presence
I love their ideas
appreciate their very existence
as each one of them
reminds me of you

being part of the star
you've gone very far
but my dear father
i know.....
you had secretly approved of
that one hidden scar .

-yamuna

Sunday, September 7, 2014

प्रार्थना------गंगा 'की' नहीं ;गंगा 'के लिए'

प्रार्थना------गंगा 'की' नहीं ;गंगा 'के लिए'

साँझ थी ढल रही...
अलंकृत नभ को कर रही
अस्ताचल सूर्याभा..........
गंगा में थी डूब रही
नयन मेरे अपलक....
गंगा को निहार रहे
मानो पतितपावनी में ....
थे पाप सारे बुहार रहे
दोपहर सा आलोक ना था
पर रोशनी इतनी भी सही
कण कण से गाथा गंगा की
कुदरत में अमृत थी घोल रही
मन ना माना......अंजुली भर
जल अधरों से लगा लिया
भ्रमित हुई खारेपन से मैं
क्या गंगासागर, गंगा से मिला
'उल्टी गंगा बहाना' मुहावरों से
निकल सत्य बन है हुआ खड़ा
या कुदरत ने लेकर करवट
जागरण सुप्त चेतनाओं का किया.

विकल मन के टूटे सितार सी
व्यथित गंगा ही सिसक उठी
गंगासागर के गंतव्य पूर्व ही
प्रदूषण से मैं जूझ रही
मेरी अश्रुधाराएँ ही हैं जो
खारा पानी को कर रही
धर्मानुष्ठान प्रार्थना ही मुझ पर
अब भारी हैं पड़ रही
माता कह कह कर पुत्र ही
दीप सीने पर हैं जला रहे
लावण्य भरी ममता जला कर
मौत असमय हैं बुला रहे


गौमुख की सी वह लावण्यता
फिर तुम मुझे लौटा दो
पाप निज तन मन की स्व में ही
रूपांतरित कर बहा दो
पतित पावन तुम सब बन कर
चलो ! अब मैल मेरे हरो
प्रार्थना 'मेरी' नहीं
अब प्रार्थना 'मेरे लिए' करो
-yamuna

women...women everywhere

1) NO LUST ; NO TEMPTATION

in my childhood..
i received many gifts
dolls,toys,uncountable hugs & kisses
as i was a girl child
dolls attracted me
i had choosen three dolls
treasured them in a small box.

seasons came & went...
a pink winter led me to my adolscence
numerous gifts i received again
colour boxes,chocolates & watches
i had chosen seven colours
spread them on a small canvas.

seasons came & went
a lovely spring clutched my hand ..
led to my youth
i received countable gifts..
some pens,some books & selected dreams
i had not treasured them
as they seemed to be part & parcel of my life

the three treasured dolls ...
resemble the very one dream
father doll,mother doll & daughter doll .
on large canvas of my life
all the seven colours are scattered
the book none but papa's diary
the pen gifted by my destined companion
all gifts add extreme pleasure to my life
thus the invaluable gif t(life) is adorned .
giving sweet enjoyment of childhood
rainbow shade of adolscence
strong purpose of youth
now in adulthood
NO LUST ; NO TEMPTATION
for any more gift
a deep contentment....an immense satisfaction
leads me to tranquility
gives meaning to my very existence
i can live life....in its fullest
till the last breath.

2)
RAKHI'S THREAD TO WEAVE

women..women...
everywhere

in whatsapp d most
in facebook post
in shopping malls
on coloured walls
on fashion ramp
in spicy stories' vamp

i question ....
where are the women ???
clad decently
work efficiently
treated respectfully
welcomed cheerfully .

some of THEM reply
they are hidden...
protected carefully
as MY mother..MY sister
rest all are...
insects on land
dolls in hand
creature downtrodden
always mistaken.

i think ....
women's life
so nicely woven
in GOD's loom
why insulted so badly
to live in gloom
with the birth of women
GOD finishes HIS creation

now its turn of all men of society
to weave women's existence
taking all the threads of RAKHI
as nice as
GOD's woven .

3)
INTRODUCTION ...........I to ME

In this vast world
i stepped on my journey
from womb to the globe
known to my mom only .
days...weeks...months...
years ...and ...decades ...
.......passed .
one day...
i started a search for me
in globe ....nowhere was I
in continent....no mark...why ???
in country....not even with a dot
in state ....not as a drop in a pot
in locality...people refused to recognize
in family...search was enough to mesmerize
was i saddened!!!!
was i disappointed !!!
absolutely no...not @ all
why should the search be misunderstood
as the 'I' to 'ME' was never be introduced.

-yamuna pathak

Friday, March 7, 2014

RED DIARY

1)


RED DIARY


the gentleman...
completely drowned in love
his word,anxiety,care
was only for her sweet heart
but entirely intangible
moreover to people ...negligible
as it was love of post age
who cares love of this stage ?
word by word....
his feelings..his worries...his love
were used to be taken shape
in ink ..crawling...on blank page
where was the existence
of the lady 75 yrs old..
it was only within
the gentleman of 79 yrs old
Alas !he is no more
but their love with crystal clear
her existence is still alive
physically lies with near & dear
emotionally in RED DIARY's dive.
2)


UTTER SILENCE


In utter silence...
she speaks with self
dwindled...uplifted..
dives to depth.
Evidences...
every hustle-bustle
of world outside
with tranquility
rooted  inside .
Making the castles
in the air...
every difference
shoutes @ other
she wants to interrupt
as it's not fair
her thought is
stepped on without care.
So......what ?????
This ignorance ..
cann't bury her thought
a wonderful land
has to be sought
she doesn't lose
her innocent spirit
takes her flight
beyond the limit.
Beyond this GLOBE
she has her own WORLD
freely she wanders around
some one is there to be found .
Someone.........who....
might listen & understand...
feeling the tranquility in real sense
mystic language of this utter silence.
3)
Life :an endless journey of fortune
cann't say....
where,when,why & who
would we meet
the experience would be
sour or sweet
imprinted in mind
as good or bad
cherished by us
as joyous or sad....
yet for a purpose or purposeless
we've to meet
but acquaintance should be
clean & neat
as life is an endless
journey of fortune
it's extremely difficult
to walk in solitude
it's true that
life stationed once & again
one day we meet
an immensely likeable man
who would go with
to the same destination
promise,commitment.....
need not to mention
sharing..caring...
enjoying the journey
making the life
as sweet as honey
it's the very station
of utter happiness
definitely it's the
destination of togetherness.
4)



Girls ...naturally matured girls'.....
life always seems as maze
gain the maturity @ early stage

the first game in their childhood
played is always of motherhood
they play the role of moms of doll
or little teachers call the roll
that's all about the creation
sacrifice,love,care & affection
they have never been a child
naturally grow mature & mild .
5)

The Embarrassed Eagle


There was a vast & open blue sky to soar
the excited eagle ignored even plane's roar
it was very beginning of its flight
having faith on wings see was out of sight
people saw only a small point ......
in the sky where was the giant ???
After each flight it used to land
but couldn't see scissors in a hand
the scissors cut its powerful wing
as it was flying with utmost zing.
Oh ! it cut the wings close to heart
the eagle became a flightless bird ....
as an ostrich with its head to be legged
tormented one ; now no more a fledged
I feel pity for the embarrassed eagle
but how can stop others to giggle ?
-yamuna pathak

नारी सशक्तिकरण नहीं 'मैं हूँ' का संज्ञान

जब कभी भी महिला सशक्तिकरण की चर्चा होती है ,मैं अपने आस-पास के पारिवारिक ,सामाजिक परिचित से रिश्तों के कैनवास पर घंटों रोटी बेलती,पापड -बड़ी अचार बना कर बेचती,सिलाई मशीन पर आँखें जमाये घर परिवार के लिए सुखद स्वप्न की आस लिए,दफ्तर जाते पति के लिए सारी तैयारियां जुटाती,बच्चों को स्कूल भेजती,घर और कार्यस्थल के बीच संतुलन बिठाती सैकड़ों महिलाओं और दूर दराज़ बसी नामचीन अज़नबी रिश्तों के कैनवास पर उभरती ...अखबार की सुर्खियां बनती ...समाज,देश ,विश्व के लिए उपलब्धियां हासिल करती अनेकानेक महिलाओं की विभिन्न तस्वीरों की ना चाहते हुए भी तुलना करने को बाध्य हो जाती हूँ....ध्यान से कैनवास पर देखने के क्षण ... वे सभी तस्वीरें मुझ पर ही हंसती सी प्रतीत होती हैं क्योंकि सब एक ही बात कहती हैं ...महिला सशक्तिकरण को हम सब नहीं मानती....हमें महिला होने के संज्ञान से भी अधिक 'मैं हूँ' के संज्ञान पर विश्वास है.यह तो अमनुष्य स्त्री और पुरुषों की दुनिया है जो हमें अबला (कविताओं में 'अबला जीवन तुम्हारी ..कहानी) भाषणों में सबला...दुष्कृत्य कर पीड़िता...सत्कर्म की आस में साध्वी...जैसे ना जाने कितने विशेषणों में सुसज्जित करता है ....जब चाहा मातृ शक्ति बना पूजा की वेदी पर बिठा दिया ...जब चाहा डायन करार दे निर्वस्त्र घूमा कर सरेआम जला दिया ....इन सब घटना क्रम में कभी भी यह पूछने की ज़हमत ही नहीं उठाया कि मैं या हम सब क्या महसूस करती हैं...हमें मातृ शक्ति का सम्मान ..डायन का अपमान चाहिए भी या नहीं.एक महिला होने के भान की बजाय संपूर्ण रूप से एक मनुष्य होने के संज्ञान में जीवन गुज़ारती ...मैं प्रत्येक महिला दिवस पर महिला सशक्तिकरण जैसे शब्द मृग मरीचिका से खिन्न हो जाती हूँ .
माँ.बहन,बेटी.पत्नी,बहू,देवरानी,जेठानी,के विभिन्न रिश्ते निभाती अपने पारिवारिक वातावरण की तमाम महिलाएं और स्वयं भी इन्ही पारिवारिक सामाजिक रिश्तों को निभाते हुए एक ही बात मैं महसूस करती हूँ ..पुरुष का महिला से या महिला का पुरुष से कोई बैर नहीं एक समझदार,सुशिक्षित ,सुसंस्कृत महिला ना शोषण करना पसंद करती है ..ना ही किसी को या स्वयं को शोषित होना देखना पसंद करती है क्योंकि वह महिला होने से भी ज्यादा एक मनुष्य होने के संज्ञान से भरी होती है.स्वस्तित्व का ज्ञान.. स्वकार्य का भान उसे सशक्तिकरण अबला सबला ...जैसे शब्दों की संकीर्ण सीमाओं से बहुत दूर ले जाता है .वह जानती है जब कभी परिस्थितियां सम होंगी वह उस अनुकूलता को अपने मनुष्य होने के संज्ञान से पूरे परिवार समाज या पृथ्वी को सुसज्जित कर देगी...जब कभी परिस्थितियां विषम होंगी वह अपने बुद्धि कौशल ,मेधा ,प्रज्ञा ,प्रतिभा और समझदारी से उसे अनुकूल बना कर परिवार समाज या सम्पूर्ण कायनात का पतन होने से रोक सकेगी और यह करने के लिए उसे सशक्तिकरण की नहीं संज्ञान की ज़रुरत है.एक व्यक्ति के रूप में अगर अपने कर्त्तव्य की सही व्याख्या समझ सके...अपने सम्मान,अपने वज़ूद को कायम रख सके तो इस संज्ञान से बढकर कोई सशक्तिकरण हो ही नहीं सकता.
घर में जन्मी पांचवी पुत्री संतान ...ससुराल में पांचवी बहू ...और एक दकियानूसी समाज ...जहां स्त्री की मेधा बुद्धि प्रतिभा दक्षता की सर्वथा उपेक्षा की जाती हो मैंने हमेशा वही किया जो मुझे अच्छा लगता है और यह ध्यान अवश्य रखती हूँ कि मेरे उस कृत्य से किसी का अहित नहीं होता ..एक मनुष्य होने का संज्ञान मुझे हमेशा सही राह पर चलने की प्रेरणा देता है .मैंने महसूस किया है कि क्षेत्र चाहे परिवार स्थल हो ,कार्यस्थल या समाज स्थल एक जिम्मेदार और मूल्यपरक महिला को कोई पुरुष महिला के रूप में नहीं एक मनुष्य के रूप में ही देखता है....उसकी अस्मिता से खिलवाड़ करने का साहस कोई स्त्री या पुरुष नहीं कर सकता है यह एक दिव्य शक्ति है जो उसे मनुष्य होने के नाते प्राप्त है किसी मातृ शक्ति या साध्वी होने के नाते नहीं.
जब जन्म से पूर्व ही मार दी जाने वाली पुत्री संतान ,दहेज़ प्रथा के लिए बलि चढ़ती नवयौवनाओं,भाई-बहन की परवरिश की विषमता,अस्मिता का हनन,विचारों के प्रवाह से उत्पन्न पुरुष मित्रता के लिए प्रदूषित नामकरण , डायन ,रखैल के नाम पर शोषण,चीर हरण,तेज़ाब अटैक,तंदूर पर जलाया जाना,वैधव्य का तिरस्कार ,तलाक शुदा ,परित्यक्ता,दूसरी औरत का दंश झेलती ,देह व्यापारमें उलझी , कठपुतली सी नाचती,बाज़ारों में उत्पाद बेचने के लिए देह प्रदर्शन करती,महिलाओं को देखती हूँ तो इसके पीछे कारण के रूप में मैं पुरुष और स्त्री समाज के विभेदीकरण से भी ज्यादा मनुष्य और अमनुष्य का भेद देख पाती हूँ .इसी पुरुष प्रधान समाज में हमारी माता जी,बड़ी बहन ,सासु माँ,कल्पना चावला,पी.टी उषा,कर्णम मलेश्वरी,मृदुला गर्ग,अमृता प्रीतम ,चन्दा कोचर,इंदिरा नूयी,अरुंधती भट्टाचार्य,निशी वासुदेवन,जैसी कई महिलाओं ने अपने अस्तित्व का सबूत दिया ....एक मनुष्य होने का ...अपने कर्त्तव्य और किरदार में संतुलन रख जीवन जीने का रास्ता खोज आगे बढती गईं ....ज़रुरत यह है कि किसी भी महिला को महिला होने के भी पूर्व एक मनुष्य माना जाए ...समाज का दोनों ही वर्ग जिसे तथाकथित समाज स्त्री-पुरुष कहना पसंद करता है पर मैं मनुष्य और अमनुष्य कहना पसंद करती हूँ ...स्त्री के विचारों ,उसकी मेधा को सम्मान दे उसे हाड मांस का पुतला ना समझे .....हाड मांस के अंदर अदृश्य रूप में छुपी उसकी आत्मा को भी समझे यही महिला दिवस का सबसे बड़ा उपहार होगा ....एक मनुष्य के द्वारा एक मनुष्य को ना कि तथा कथित पुरुष प्रधान समाज के द्वारा स्त्री को या स्त्रियों के द्वारा स्वयं को ...
मुझे इस बात का मलाल हमेशा रहता है कि एक विचारवान तबका जिन तक हमारी पहुँच है वे तो इस मनुष्यता को समझ पाते हैं पर नारी सशक्तिकरण के शब्द मृग मरीचिका में उलझे और विचारों की दुनिया से सर्वथा अछूते लोग नारी संज्ञान से भी ज्यादा नारी के 'मैं हूँ' के संज्ञान से रूबरू नहीं हो पाते.
तुम मेरे सशक्तिकरण का देते रहना नारा
'मैं नारी हूँ' कह कर देते रहना नज़राना

मैं कहती हूँ 'मैं हूँ' यह संज्ञान है काफी




मत निकालो हर '८ मार्च' को मेरी झांकी.