Wednesday, September 17, 2014

ट्रिप्लेट ऑफ़ ' टॉयलेट,टैप,ट्रेनिंग '(3 T's Of (TOILET,TAP,TRAINING)

माननीय प्रधानमंत्री जी ने स्वाधीनता दिवस और शिक्षक दिवस दोनों ही अति विशेष अवसरों पर जिस एक बहुत ही तुच्छ समझे जाने वाले मगर बेहद ज़रूरी मुद्दे को जनता के सामने रखा और अपनी संवेदनशीलता से अवगत कराया .....वह है शौचालय की व्यवस्था .
शौचालय से सम्बंधित स्वच्छता महिलाओं के लिए आत्मसम्मान के साथ सुरक्षा से भी जुड़ा मुद्दा है.घर पर शौचालय के अभाव में सामान्य महिलाओं के अलावा गर्भवती महिलाओं और महीनों के कुछ विशेष दिनों का सामना करने वाली महिलाओं को बहुत दिक्कत हो जाती है.है.प्रियंका ने जब शौचालय के अभाव की वज़ह से अपनी ससुराल छोड़ी तो लोग हँसते ताना देते थे ,"कैसी महिला है इतनी छोटी सी बात के लिए ससुराल छोड़ आई पर उसके पति ने उसकी सही सोच में उसका साथ दिया.स्वयं प्रियंका के शब्दों में '"पति ने कहा मैं सोच ही नहीं पाया कि शौचालय से सम्बंधित समस्या इतनी महत्वपूर्ण है."और आज सब प्रियंका को कहते हैं ,"तुमने बहुत नाम कमाया अच्छी सोच की दिशा में लोगों को ले गई." .बैतूल.कुशीनगर सभी स्थानों से महिलाओं ने आवाज़ उठाई .श्री बिन्देश्वरी पाठक जी ने सुलभ शौचालय की दिशा में कदम उठाया था .आज ज़रुरत है शौचालय प्रत्येक घर में हों .आंकड़े बताते हैं कि बिहार के ७६% झारखण्ड के ९२% छत्तीसगढ़ के ७५% घरों में शौचालय नहीं हैं .कई गाँव में शौचालय बनाये गए पर उनमें से कुछ साफ़ सफाई के अभाव में इस्तेमाल नहीं होते ,कुछ बारिश के दिनों में उपले रखने और मवेशी बांधने के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं.गाँव के कई विद्यालयों में भी यह आधारभूत सुविधा नहीं है पर जहां है वहां के भी हालात ऐसे हैं कि उन शौचालयों का इस्तेमाल करना बहुत मुश्किल है.गन्दगी से पटे शौचालय अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं पर इस्तेमाल नहीं हो पाते. इसके पीछे दो मुख्य समस्या है ...प्रथम; पानी के टैप की समुचित व्यवस्था का अभाव और दूसरी टॉयलेट ट्रेनिंग की कमी. शौचालय इस्तेमाल के बाद उसे साफ़ छोड़ने की व्यवस्था सरकार का काम नहीं बल्कि इस्तेमाल करने वाले का सामजिक और नैतिक कर्त्तव्य है.हम सब जानते हैं एक कुत्ता भी अगर किसी स्थान पर बैठता है तो उस स्थान को पहले अपनी पूँछ से साफ़ कर देता है फिर वहां बैठता है .जब एक जानवर गन्दगी से परहेज़ रखता है तो हम सब तो इंसान हैं क्या हम इस्तेमाल कर शौचालय को औरों के इस्तेमाल के लिए साफ़ नहीं छोड़ सकते हैं.?विद्यार्थियों को पठन पाठन के अतिरिक्त इस बात की शिक्षा देनी भी ज़रूरी है.कल ही इसी मुद्दे से सम्बंधित कार्यक्रम में टी वी पर बच्चों के इंटरव्यू देख रही थी .जब एक बच्ची से पूछा गया कि टॉयलेट इतना गंदा है आप इस्तेमाल कैसे करते हो ...तो उसका सीधा ज़वाब था,"हम इसे इस्तेमाल नहीं करते ...हम घर से ही फ्रेश होकर आते हैं." ऐसे में वाकई यह एक चिंतनीय विषय है कि इस्तेमाल करने के लिए बने संसाधन का इस्तेमाल क्यों नहीं हो रहा है और यह उस संसाधन पर लगे निवेश की बर्बादी है कि नहीं .लोगों में जागरूकता लाना ज़रूरी है.
गाँव या सरकारी विद्यालयों की ही बात नहीं है यह गैर जिम्मेदाराना व्यवहार हम शिक्षित लोगों में भी देखते हैं.एक मॉल के सिनेमा हॉल में मेरा सामना ऐसी ही एक महिला से हुआ .मैं जब उस अत्यंत साफ़ -सुथरे टॉयलेट के इस्तेमाल के लिए गई तो वहां की सफाई कर्मचारी ने लगभग चिल्ला कर कहा," ओ मैम , आप भी नीचे फर्श को गंदा मत करना ." ऐसी बात सुन कर स्वाभाविक था कि किसी को भी नाराज़गी होती . मैंने अपने परिधान को देखा शायद साड़ी ब्लाउज में सलीके से आँचल संभालती मैं उसे कुछ असभ्य सी लग रही होउंगी...पर मेरा यह भ्रम दूर हुआ क्योंकि उसकी भनभनाहट जारी थी जिसे मैं अंदर से साफ़ साफ़ सुन सकती थी ..वह बड़बड़ाये जा रही थी..."चली आती हैं जींस टॉप में आधुनिक बन कर और तमीज के नाम पर शून्य हैं बच्चों को टॉयलेट ट्रेनिंग भी नहीं दे सकतीं मेक अप देखो तो इतना ज्यादा ." अब मुझे उसकी नाराज़गी स्पष्ट समझ में आ रही थी .मैंने अपनी सहेली से कहा ,"यार यह तो गलत बात है कितना साफ़ यह टॉयलेट है और शिक्षित सभ्य लोग भी इसे गंदा करने से बाज़ नहीं आते ."उसने लापरवाही से कहा ,"छोड़ ना यार,क्या फर्क पड़ता है ;उसे इसी काम के लिए रखा गया है और उसे पैसे भी मिलते हैं और तू ना अपने अंदर की ये समाज सेविका को मार दे वरना एक दिन खुद मरेगी ." अजीब सी बात थी .मैं सोचती रही जहां सारी सुविधाएं होने पर भी लोग टॉयलेट का इस्तेमाल जिम्मेदारी से नहीं करते फिर जहां पानी के नलों की सुविधाएं नहीं होती होंगी वहां तो शौचालय बस कंक्रीट का कूड़ादान ही होता होगा.ऐसा कितनी बार हुआ है कि सफर के दौरान किसी ढाबे होटल या सड़क के किनारे बने टॉयलेट का इस्तेमाल हम सिर्फ इसलिए नहीं कर पाते कि अपनी ज़रुरत पूरी हो जाने पर किसी ने दूसरों की ज़रुरत का कोई ख्याल नहीं किया था.कितनी बार तो ढाबों या होटलों के मालिक को कहते सुना है ,"क्या करूँ मैडम अब महिलाओं को कुछ बोल भी नहीं सकते ,हमेशा तो स्वीपर खड़ा नहीं रहेगा वह दिन में एक बार साफ़ कर चला जाएगा ."बात उनकी बिलकुल सही है .हमारी खुद की नैतिक जिम्मेदारी की शिक्षा पर मैं क्षुब्ध हो जाती हूँ .
अपने घरों में हम प्रतिदिन स्वयं ही शौचालय की सफाई कर लेते हैं और सार्वजनिक शौचालय के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं रखते हैं.हमें स्वयं को ,अपने बच्चों को यह प्रशिक्षण देना ही होगा कि टॉयलेट्स का होना एक महत्वपूर्ण बात है पर उसको साफ़ रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है.पक्के फर्श पर पड़े मल बीमारी का कारण होते हैं और होटलों ढाबों के आस पास तो भोजन पर भी यह गन्दगी असर करती है.अगर सार्वजनिक स्थानों पर हमारी ज़रुरत का ध्यान रखा जाता है तो यह हमारा कर्त्तव्य है कि हम उस ज़रुरत के संसाधन के प्रति सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी अवश्य रखें .अगर समय पर ये संसाधन उपलब्ध ना हों तो हम सब मुश्किल का सामना करते हैं फिर भी इसे इस्तेमाल के बाद साफ़ सुथरा नहीं छोड़ते यह हमारी बहुत बड़ी भूल है.
चलिए हम सब प्रधानमंत्री जी की इस संवेदनशीलता के साथ अपनी समझदारी ,सामाजिक जिम्मेदारी की जुगलबंदी करें और स्वच्छता के लिए 3 टी के triplet ( toilet , tap , training ) को अपनाएं .टॉयलेट के निर्माण के साथ पानी के टैप की व्यवस्था हो और इसके साफ़ सफाई रख रखाव की ट्रेनिंग लें भी दें भी . इसे इस्तेमाल के बाद साफ़ छोड़ा जाए ताकि दूसरों को इसे इस्तेमाल करने में कोई असुविधा न हो .

हिन्दी की 'मलयज शीतलाम '(१४ सितम्बर )

collage2मेरे प्रिय ब्लॉगर साथियों
हिन्दी दिवस पर आप सभी को हार्दिक शुभकामना
दोस्तों ,इस वर्ष मैं हिन्दी दिवस के अवसर पर बहुत प्रसन्न हूँ.इसकी दो ख़ास वजहें हैं;प्रथम हमारे प्रधान मंत्री जी के द्वारा प्रत्येक राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय सम्बोधन पर राष्ट्रभाषा को ही माध्यम बनाना जो कि सम्पूर्ण भारत देश को अपनेपन के सूत्र से जोड़ पा रहा है .दूसरी ख़ास वज़ह यह कि मैं पहली बार दक्षिण भारत में रहने के लिए आई हूँ.और लगभग हर पांचवे उत्तर भारतीय की तरह मेरा भी यही भ्रम था कि भारत देश के इस भाग में हिन्दी कम प्रचलित है .पर मैं आप सब को बताने में बहुत गर्व महसूस कर रही हूँ कि यहां भी लिंक भाषा के रूप में अंग्रेज़ी नहीं बल्कि अपनी राष्रभाषा हिन्दी का ही प्रयोग होता है.
अब एक वाक्या बताती हूँ .हुआ यूँ कि यहां एक महिला जो पिछले २० वर्षों से रह रही थी उसके पुत्र ने १२ वीं तक की शिक्षा यहीं के सीबीएसई बोर्ड के विद्यालय से ग्रहण की अब उसे बाहर जाने के लिए कुछ कागज़ी कार्यवाही पूरी करवानी थी जब वह सरकारी कार्यालय पहुँचा तो एक कर्मचारी ने उसे कहा,"२० वर्षों से यहां रह रहे हो कन्नड़ भाषा नहीं आती ."उस लडके ने ज़वाब दिया ," अंकल, मैं अगर कन्नड़ ना जानूँ तो मेरा काम चल जाएगा पर अगर आप हिन्दी भाषा नहीं जानेंगे तो इस राज्य से बाहर जाने पर लोगों को अपनी बात समझने के लिए आपको कदम कदम पर मुसीबत आएगी .आप तो जन्म ही भारत देश में लिए हैं ,आपको हिन्दी भाषा नहीं आती ?" उसके बाद उन कर्मचारी ने हिन्दी भाषा में ही बात की .दरअसल अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी भाषा की अनभिज्ञता नहीं बल्कि अपने क्षेत्र ,राज्य की भाषा का अस्तित्व बचाने का प्रयास रहता है जो हमें भ्रमित करता है कि उन क्षेत्र या राज्य के बाशिंदे हिन्दी भाषा नहीं जानते.कुछ बेहद स्थानीय लोगों को छोड़ कर अमूमन सभी लोग काम से काम काम चलाऊ हिन्दी का ज्ञान अवश्य रखते हैं .
मेरे यहां एक माली काम करता है जिसे सिर्फ कन्नड़ भाषा आती है .यह बात और है कि मुझे भी सिर्फ हिन्दी आती है फिर भी बगीचे का काम प्रतिदिन बखूबी सम्पन्न हो जाता है .मैं हिन्दी के शब्द और वाक्य बोलती हूँ साथ में इशारों से अभिनय कर उसे वह समझती हूँ अब वह उन सभी चीज़ों को हिन्दी भाषा से ही समझता है और जब कहीं मुश्किल आती है तब काम पर आने वाली घरेलू सहायक जिसे हिन्दी भाषा का ज्ञान है वह हमारे बीच अनुवादक का काम कर देती है. आपको यहां यह बताने पर मुझे पुनः गर्व हो रहा है कि वह महिला कन्नड़ भाषा से स्नातक है .
हिन्दी हमारी कथनी करनी और लेखनी की भाषा है.मुझसे अक्सर लोग एक प्रश्न करते हैं,"आप हिन्दी भाषा की प्रबल समर्थक हैं फिर भी अपना फेस बुक अकाउंट और वैल्यू पेज दोनों में ही अधिकतर अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग करती हैं .ऐसा विरोधाभास क्यों ?"अब यहां मैं एक पढ़ी हुई घटना का ज़िक्र करती हूँ.collage1
गांधी जी अपने वर्धा आश्रम में रूकने के दिनों में ब्रह्म मुहूर्त में ही नित्य क्रिया से निवृत हो कर ,थोड़ा पत्र लेखन वगैरह कर प्रतिदिन आगुन्तकों से भेंट करते थे. एक दिन एक अँगरेज़ सज्जन उनसे मिलने आये.चूँकि वे थोड़ा बहुत हिन्दी भाषा जानते थे अतः उन्होंने गांधी जी से हिन्दी भाषा में ही बात चीत शुरू की.परन्तु गांधी जी उनसे अंग्रेज़ी भाषा में बातचीत जारी रखे हुए थे.जब वे सज्जन जाने लगे गांधी जी ने अंग्रेज़ी भाषा में ही उन्हें सम्मान सूचक शब्द कहे.अब उन सज्जन से रहा ना गया उन्होंने पूछ ही लिया,"महात्मा जी,मैं तो आप से हिन्दी भाषा में बात करता रहा ,तहज़ीब यह कहती है कि जिस भाषा में बात किया जाए ज़वाब भी उसी भाषा में दिया जाए पर आप तो अंग्रेज़ी भाषा में बात करते रहे,ऐसा क्यों "गांधी जी ने ज़वाब दिया,"मान्यवर,आप की बात बिलकुल सही है पर जब आप मेरी मातृभाषा के प्रति इतना सम्मान,आदर और प्रेम रखते हैं तो मैं भी आपकी भाषा का आदर करूँ यही तहज़ीब है ."यह सुन कर वे सज्जन गांधी जी के प्रति और भी श्रद्धावान हो गए .
वस्तुतः भाषा हमारी अभिव्यक्ति का माध्यम है .हमारे विचार ज्ञान के वाहक होते हैं.ज्ञान के प्रसार के रूप में कोई भी भाषा आदर युक्त होती है.अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग हिन्दी भाषा के प्रति बेरूखी कभी नहीं है बल्कि ज्ञान के सागर में गंगा जमुनी संस्कृति का मिलन है.किसी भी अन्य भाषा को सीखने या प्रयोग करने से अपनी भाषा के प्रति सम्मान और महत्व काम नहीं होता अपितु द्विगुणित हो जाता है क्योंकि उन अन्य भाषाओं के ज्ञान को हम हिन्दी भाषा के माध्यम से प्रसार करते हैं और हिन्दी भाषा में अथाह ज्ञान सागर को जान जान तक उस अन्य भाषा के माध्यम से पहुंचा सकते हैं.
मेरे प्यारे साथियों ,हिन्दी भाषा की लहर जो अभी चल रही है उसने सोशल मीडिया के माध्यम से उन शेरो शायरी कविताओं ग़ज़ल गीत कहानियों लोकोक्तियों को भी पुनर्जीवित कर दिया है जो हमारी नई युवा पीढ़ी इतिहास के पन्नों पर देखने वाली थी.आज वे सभी विधाएँ हिन्दी भाषा में प्रतिदिन सैकड़ों पेज साइट्स के माध्यम से रोज़मर्रा की ज़िंदगी में शामिल होती जा रही हैं.
हिन्दी भाषा मुझे कई कारणों से बहुत प्रिय है सबसे प्रथम प्रशंसनीय बात है कि इस भाषा की शब्दावली और व्याकरण निश्चित ,बहुल और पूर्णतः स्पष्ट है .एक उदाहरण देती हूँ .हिन्दी भाषा में धर्म के लिए जो शब्द प्रचलित है वह अंग्रेज़ी के रिलिजन शब्द से बेहद व्यापक है 'सनातन धर्म 'सनातन अर्थात जो अनादि काल से चला आ रहा है और धृ अर्थात धारण करना जबकि रिलिजन faith से जुड़ा है और faith कभी भी इच्छानुसार ,परिस्थिति वश,बदल सकता है.हिन्दी भाषा का शब्द भण्डार बेहद सार गर्भित है.अंग्रेज़ी भाषा कि शब्दावली में छेड़ छाड़ संभव है और वह परिलक्षित भी हो रहा है 'that' dat हो गया 'you' u , 'we' v ,'express ' xpress ....पर क्या इतनी सहजता से हम हिन्दी को विकृत कर सकते हैं कभी भी नहीं वह मान्य भी नहीं होगा इसे अशुद्ध किया ही नहीं जा सकता है.
हिन्दी भाषा के मान सम्मान को बढ़ाने में इस प्रतिष्ठित अनुपम जागरण मंच का भी अमूल्य योगदान है.हिन्दी भाषा माँ गंगा की तरह पावन है.राष्ट्रीय नदी गंगा उत्तर भारत के राज्यों से बहती उन्हें ही संचित करती है पर हिन्दी भाषा की गंगा तो उत्तर ,दक्षिण पूरब पश्चिम चतुर्दिक दिशा में बोलचाल के रूप में प्रवाहमान है.
collage3मैं इस प्रतिष्ठित मंच से अपने ब्लॉग के माध्यम से प्रधान मंत्री जी से सविनय निवेदन करना चाहती हूँ कि इस ‘हिन्दी दिवस ‘के अवसर पर वे देश के सभी राज्यों में यह नियम अनिवार्य बना दें कि किसी भी सूचना दायक बोर्ड पर (रैलवे स्टेशन,माइलस्टोन या दुकानों बाजारों के बाहर लगे बोर्ड पर ) लिखी सूचनाओं शब्दों और वाक्यों को उस राज्य की राजभाषा,और अंग्रेज़ी भाषा (जो प्रायः मैंने ओडिशा,पश्चिम बंगाल और अब कर्नाटक में देख रही हूँ) के साथ साथ अनिवार्य रूप से हिन्दी भाषा की देवनागरी लिपि में लिखा होना एक नियम बना दें .इससे उन सभी साक्षर लोगों को लाभ पहुंचेगा जो कि अपनी मातृभाषा या राष्ट्रभाषा हिन्दी से तो साक्षर हैं पर अंग्रेज़ी भाषा की रोमन लिपि से अनभिज्ञ हैं .ऐसी परेशानी मैं ने महसूस की है जब अन्य राज्यों में आने पर राजभाषा में ही लिखे सूचना बोर्ड को मैं साक्षर और शिक्षित होने के बावजूद पढने में पूर्णतः असमर्थ थी.(अभी कन्नड़ भाषा मेरे लिए मुश्किल है )अन्य राज्यों के स्थानीय लोग भी जब दक्षिण भारत या ओडिशा,बंगाल जैसे राज्यों में जाते हैं तो उन्हें अंग्रेज़ी या वहां की राजभाषा में लिखे शब्दों को पढने में असमर्थता महसूस होती है. अगर मेरा यह सन्देश प्रधान मंत्री जी तक पहुँच जाए तो मैं अपने इस अनुपम मंच की बहुत बहुत आभारी रहूंगी.इस अनुपम मंच से जुड़े वैचारिक यात्रा के सभी सहयात्रियों को हिन्दी दिवस पर पुनः बहुत सारी शुभकामना

स्किल @ गुड पे स्केल विद 'वैल्यू'

मेरे प्रिय ब्लॉगर साथियों
आज engineers डे है जो महान अभियंता मोक्षगुंडम विश्वेशरैय्या जी की याद में मनाया जाता है जिनका जन्म 15  सितम्बर 1860  को हुआ था १७ सितम्बर को विश्व कर्मा जी की जयन्ती भी मनाई जाएगी .जीविकोपार्जन से जुड़े आप सभी लोगों को विशेष कर इंजीनियर्स साथियों को मेरी बहुत बहुत शुभकामना .रोज़ी रोटी के लिए अपने गाँव शहर छोड़ कर देश विदेश के कोने कोने में कार्यरत लोगों के सामने कुछ आज मैं एक बहुत ही अहम प्रश्न रखना चाहती हूँ .डॉक्टर्स डे ,टीचर्स डे इंजीनियर्स डे हम मनाते हैं पर क्या कभी स्किल से जुड़े टेलर्स डे ,प्लम्बर्स डे,कार्पेंटर्स डे ,पोर्टर्स डे ,स्वीपर्स डे ,कुक्स डे ,मैकेनिक्स डे ,ड्राइवर्स डे ,मना कर किसी भी एक स्किल को हमने सम्मान दिया है. ????
आज ब्लॉग की शुरूआत एक छोटी सी बेहद प्रासंगिक कहानी से करती हूँ .
एक सेठ जी के पास बड़ी मिल थी.लाखों लोगों के जीविकोपार्जन का केंद्र ,लाखों का उत्पादन और सेठ जी करोड़ों में खेलते थे.एक बात ज़रूर थी कि वे अपने कर्मचारियों का बहुत ध्यान रखते थे.अचानक एक दिन मिल बंद हो गई .मिल में कार्यरत कर्मचारियों ने बहुत कोशिश की पर मिल चालू ना हो पाई.सेठ जी ने कर्मचारियों से किसी ऐसे व्यक्ति को ढूंढ कर लाने कहा जो मशीन ठीक कर दे .अगले दिन एक कर्मचारी एक ऐसे युवक को लेकर आया जो बहुत ही साधारण दिखता था और किसी भी खराब पड़ी मशीन को ठीक करने का दावा कर रहा था.उसने सेठ जी को कहा,"मैं मशीन ठीक तो कर दूंगा पर पूरे 15,000 की धन राशि लूँगा."सेठ जी उत्पादन के नुकसान को ध्यान में रख हामी भर दी.उस युवक ने अपने पास से एक हथौड़ा निकाला ,मशीन का सूक्ष्म निरीक्षण किया और एक विशेष स्थान पर हथौड़ा मारा और मशीन चल पड़ी.अब बारी सेठ जी की थी .वे पैसे देने से मुकरने लगे...उन्होंने कहा,"बस एक हथौड़े मारने का 15,000क्यों दूँ?" युवक ने हँस कर कहा,"इसलिए कि हथौड़ा मारना तो सब जानते हैं लेकिन कहाँ मारना है यह तो विशेषज्ञ या कुशल व्यक्ति ही जानता है 15,000उसी कुशलता की कीमत और विशेषज्ञता का मोल है."

दोस्तों,हम सभी को शैक्षणिक डिग्री के साथ कोई ना कोई विशेषज्ञता या कौशल ज़रूर हासिल करना चाहिए जो निजी लाभ के साथ साथ सार्वजनिक लाभ की दिशा में भी सहायक हो सके.हमारे प्रधान मंत्री जी ने भी कौशल विकास ( skill development )पर जोर देने की बात कही है.
Copy of Desktopपर प सब एक बार गौर से सोचिये क्या स्किल्ड जॉब को हमारा समाज बहुत सम्मानित करता है?क्या किसी सूटेड बूटेड बढ़ई,प्लम्बर,मोची ,कुक इत्यादि को आप ने देखा है?क्या डॉक्टर्स डे ,इंजीनियर्स डे की तरह कभी भी हमने कार्पेंटर्स डे,प्लम्बर्स डे ,ड्राइवर्स डे ,पोर्टर्स डे,स्वीपर्स डे या स्किल से जुड़ा कोई भी दिवस मनाने का ख्याल हमने कभी भी किया है ?आज तक तो कभी नहीं .
दरअसल हमारी मनोवैज्ञानिक और आर्थिक आदत है अगर किसी भी सेवा या वस्तु के साथ हाई प्राइस टैग लग जाए तो उसका हमारे लिए मूल्य बढ़ जाता है .सड़क पर सजी दुकानों में लगी शर्ट सस्ती है तो कोई ध्यानाकर्षण नहीं कर पाती पर वही सम्मान के साथ मॉल में बिकने को चली जाए तो अभिजात्य वर्ग भी उसे खरीदने को तैयार हो जाता है इसलिए आज सर्वाधिक ज़रुरत यह है कि स्किल डेवलपमेंट की बात के साथ स्किल @ गुड पे स्केल विद वैल्यू ( कौशल का आर्थिक और नैतिक विकास ,अच्छे वेतन पैमाने और उसके कौशल के सम्मान ) की भी बात हो .
इस सन्दर्भ में कुछ बहुत ही अहम बिन्दुओं पर ध्यानाकर्षण आवश्यक है.
1) हमारे देश में कुशल श्रम शक्ति है पर वह लो कॉस्ट स्किल्ड है.वैश्विक अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए हमें उच्च स्तर का कौशल विकसित करना होगा जो अपनी ब्रांड के साथ देश का भी ब्रांड बन सके.उसे सस्ती श्रम शक्ति नहीं बल्कि आर्थिक,नैतिक,सामाजिक रूप से सशक्त श्रम शक्ति के रूप में बाज़ार के लिए उपलब्ध कराया जाए.इसके लिए मानव संसाधन के विकास का भवन चार मज़बूत स्तम्भों साक्षरता,कुशलता,अनुसंधान और विकास पर तैयार करना होगा.प्रत्येक नागरिक को सही अर्थों में साक्षर बनाया जाए ( देश की भाषा ,क्षेत्रीय भाषा के साथ विश्व स्तर पर प्रचलित भाषा में लेखन पाठन और बोध क्षमता विकसित हो ),जिस भी कुशलता या दक्षता का प्रशिक्षण दिया जाए वह घरेलू बाज़ार के साथ वैश्विक बाज़ार की मांग और आवश्यकता के अनुरूप भी हो इसके लिए विशेष अनुसंधान कर ही उसका विकास किया जाए.
2) आज ट्रॉली वाले बैग्स ने कुलियों की संख्या कम कर दी है , चमकते (glossy waxy )पैकेजिंग में बंद स्नैक्स ने ताज़ा भुना स्नैक्स तैयार करने वाले गली गली में खुली दुकानों को बंद कर दिया है,रेड़ी मेड कपड़ों ने कुछ हद तक मुहल्लों के दर्जियों को बेकार कर दिया है.ज़रुरत है इन पारम्परिक व्यवसायों को कायम रखा जाए .इन्हे वर्त्तमान बाज़ार की मांग के अनुसार तैयार किया जाए .जमशेदपुर शहर के बाज़ार में कुछ स्नैक्स (भुना चूड़ा मूंगफली,सत्तू,चना इत्यादि)बनाने वाले बैठते हैं .उसने दो बच्चों को बाहर पढने भेज दिया है एक बच्चे को पुश्तैनी व्यवसाय सीखा दिया है .वह अपने भुने स्नैक्स को बहुत ही अच्छी पकैजिंग करते हैं और बिलकुल फ्रेश माल ही बेचते हैं .शहर के प्रत्येक कोने से लोग वे स्नैक्स खरीदने वहीं आते हैं इसी प्रकार वहां एक फकीरा ब्रांड के नाम से भी स्नैक्स खूब बिकते हैं.ऐसे ही मुझे घर पर आने वाला एक कबाड़ी वाला याद आता है माँ उसे टीन के पुराने कनस्तर दे देती और वह बहुत ही कुशलता से उन टीन को जोड़ कर बॉक्स/ट्रंक बना देता था.ज़रुरत है उन सभी पारम्परिक कौशल को वर्त्तमान बाजार के अनुसार विकसित किया जा सके .
3) लोगों को अपने यहां काम करने वाले घरेलू सहायकों/सहायिकों को भी बेहतर काम करने का कौशल विकसित करना चाहिए.अच्छे साफ़ सुथरे ढंग से कम तेल मसालों में पौष्टिक भोजन कैसे बनाना है,उसे किस तरह परोसना है,गैस का किफायती इस्तेमाल किस तरह करना है,सब्जियां कैसे धोनी है,एप्रन का इस्तेमाल ,साफ़ तौलिये का प्रयोग सिखाना ज़रूरी है.अगर स्थानांतरण के दौरान हम कहीं और चले गए तो ये सिखाई हुई बातें उसे काम की कुशलता से अपने हक़ में रूपये पैसे का मोल भाव करने में मदद कर सकेंगी. मेरी एक रिश्तेदार हैं उन्होंने घर पर वाशिंग मशीन नहीं रखा है .पूछने पर कहती हैं घर आकर कपडे ले जाने वाले धोबी के जीविकोपार्जन का क्या होगा .
4) मैं जब भी टी वी पर अपराध से जुड़े समाचार या कार्यक्रम देखती हूँ तो पाती हूँ कि अपराध को अंजाम देने वालों में कुछ घरेलू सहायक,ड्राइवर
,प्लम्बर,केबल ठीक करने या बिजली का काम करने वाला,या ऐसे ही कोई स्किल से जुड़े लोगों का नाम आ जाता है.यह सच है कि ऐसी कुशलता या व्यवसाय से जुड़े सभी लोग अनैतिक और अवैधानिक काम या सीधे अर्थों में कहे तो ऐसी अपराधिक प्रवृत्ति के नहीं होते पर यह भी एक कटु सत्य है कि दिल्ली के जघन्य दामिनी काण्ड को एक बस चालक ,एक मैकेनिक ने ही अंजाम दिया था .देश की जनसख्या का 65 % भाग 35  वर्ष से नीचे आयु वर्ग का है.इनमें कौशल विकास के साथ नैतिक मूल्यों का विकास भी बहुत ज़रूरी है ताकि कुशल,अनुशाषित मूल्यों से लबरेज़ श्रम शक्ति तैयार हो . इन्हे काम देने में इनकी नैतिकता पर कोई संशय ना हो और विश्वास के साथ इन्हे राष्ट्र्रीय और अंतराष्ट्रीय बाज़ार के लिए उपलब्ध किया जा सके .इसके लिए साथ में इन्हे कौशल विकास के साथ नैतिक मूल्य और फिर काम लगाने पर अच्छी पे स्केल भी दी जाए ताकि इनके मूल्य किसी आर्थिक परेशानी में भी डावांडोल ना हो पाएं.

5) एक वक़्त था जब ढ़ाका के मलमल के विषय में भारत शान से कहता था कि यह इतना महीन होता है कि एक थान मलमल माचिस की डिब्बी में या हाथ की कनिष्ठा में लपेटा जा सकता है. आज भी कई ऐसे हस्त कौशल हैं जो बहुत सुन्दर हैं पर या तो उनका वाज़िब दाम देने को लोग तैयार नहीं या फिर उन्हें मिलते जुलते सस्ते कच्चे माल से बनने वाले उसी आवश्यकता को पूरे करने वाले सस्ते उत्पादों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है और ऐसे परम्परागत सुन्दर हस्त कौशल पराजित हो जा रहे हैं.ज़रुरत है उन हस्त कौशल को वर्त्तमान तकनीक विकास से जोड़ कर बाज़ार और मानवीय मनोविज्ञान से उनका ताल मेल बिठाया जाए .एक ऊनी कालीन नए डिजाईन की सिंथेटिक रेशों से बनी सस्ती कालीन से प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाती है तो इसके लिए ज़रूरी है कि विज्ञापन का सहारा लेकर ऐसे कुशल लोगों को वाज़िब खरीदार तक पहुँचाया जाए ताकि उनकी कारीगरी की वाज़िब कीमत मिल सके और क्रेता सही और विक्रेता के बीच की दूरी मिट सके.
6 ) कम्पनीज एक्ट २०१३ के अंतर्गत कंपनियों को अपने शुद्ध लाभ का 2% CSR ( Corporate   Social Responsibility   पर खर्च करना अनिवार्य है इसके तहत साक्षरता को कौशल विकास के साथ जोड़ कर ऐसे कुशल लोग तैयार किये जा सकते हैं जो स्थानीय ज़रूरतों के अनुकूल हों और उन्हें आस पास के कल कारखानों ,कुटीर उद्योगों या स्व रोजगार जैसे वैज्ञानिक ढंग से तकनीक का प्रयोग करते हुए मुर्गी पालन,मधुमखी पालन ,दर्ज़ी बढ़ई जैसे कौशल से जीविकोपार्जन में मदद मिल सके.एक साक्षर अपने कौशल की दिशा में सही मायनों में शिक्षित भी हो सके उसे डिजिटल फ्रैंडली बनाया जाए ताकि वह बैंक से सम्बंधित काम ,बाज़ार से सम्बंधित विपणन के काम को वैश्विक स्तर पर समझ कर उसे स्थानीय लोगों को उच्च स्तरीय गुणवत्ता के साथ उपलब्ध करा सके इससे उसका कौशल अच्छे वेतन पर आधारित हो जाएगी.
7) हमारे देश में लगभग प्रत्येक आयोजन सेलिब्रेट होते हैं.क्या कांच और लाह की चूड़ी बनाने वालों के लिए ,पीतल के बर्तन तालों को बनाने वालों के लिए कभी कोई प्रदर्शनी आयोजित की जाती है क्या मोची,बढ़ई,दर्ज़ी , चालक इन्हे सम्मानित करने के लिए कोई विशेष दिन का आयोजन किया जाता है ?ज़रुरत समाज में ऐसे स्किल को सम्मान और पहचान देने की है .प्रधानमंत्री जी के 'मेक इन इंडिया 'का नारा भी तभी सफल हो सकता है.
8) सामाजिक जागरूकता से जुड़ा कोई भी अभियान कौशल को भी अगर जोड़ सके तो बेहतर होगा .यहां मैं नमो चाय पर चाय चर्चा का ज़िक्र करूंगी .इस अभियान में अगर मिट्टी के कुल्हड़ का प्रयोग प्लास्टिक ,पेपर और थर्माकोल की कप के जगह होता तो पर्यावरण फ्रेंडली अभियान के साथ यह कुम्हार के कौशल से जुड़कर उनका भी सम्मान और आय बढ़ा जाता और पेपर के लिए वृक्ष भी कटने से बचते ;अवशेष कुल्लहड़ की मिट्टी माटी में मिल जाती.

स्किल डेवलपमेंट सम्पूर्ण रूप से हो जिसे हम होलिस्टिक डेवलपमेंट कहते हैं.जो भी कौशल सीखा जाए चाहे वह तकनीक,भाषा,संगीत,मशीन,विज्ञान ,घरेलू ज़रूरतों को पूरा करने से सम्बंधित (घरेलू सहायक,रसोइये,मोची,कुम्हार चालक इत्यादि) हो उसे इस तरह सीखा या सिखाया जाए कि वह उचित आर्थिक लाभ का आधार बन सके . न सिर्फ घरेलू बाज़ार की मांग बल्कि ज़रुरत पड़ने पर वैश्विक बाज़ार के लिए भी आपूर्ति को तैयार हो सके.उसे सही अर्थों में स्किल @ गुड पे स्केल विद वैल्यू के मापदंड पर खरा तैयार किया जाए .मानव संसाधन को विकसित करने का यही नैतिक,आर्थिक,सामाजिक और तात्कालिक तकाज़ा है .