Sunday, August 11, 2013

दोहराओ मुझॆ बार-बार


गलतियां शायद हो जाती हैं खुदा से भी
तभी तो बार -बार बना कर वो
मिटा देता है अपनी ही खुदाई
ये बनती मिटती दुनिया...
ये बनते मिटते लोग ही...
सबूत हैं इस बात के कि
कमी खुदा की खुदाई में
भी रह ही जाती है ..
गलती उन हाथों से भी
हो ही जाती है.

प्रिय दोस्तों यह ब्लॉग मुझे पुनः प्रकाशित करने पर विवश होना पडा . पूर्व की की गई गलतियों को सोचने और पछताने की जगह उस इतिहास से सबक लेकर ,उसकी अच्छाइयों को अपना कर और बुराईयों को त्याग कर आगे बढ़ना ही ज़िंदगी जीने का असल हौसला है.यदि सचेत होकर,पूरे होश में प्रत्येक कार्य किया जाए तो बहुत सारे अनावश्यक कार्यों और अपराधों या बुराईयों से बचा जा सकता है.मूल्यों पर जीवन जीना आदर्शवाद नहीं बल्कि होश पूर्वक जीने की राह होती है जिसे अपनाना बेहद ज़रूरी है.
कहते हैं लोग ये
ज़रुरत नहीं ..इतिहास को दोहराने की
मैं इतिहास..कहता हूँ
दोहराओ मुझॆ बार-बार
क्योंकि....
सृजन बात नहीं, हर किसी के वश की
सृजन हुनर नहीं, हर किसी हस्त की
सृजन को नहीं ज़रुरत किसी इतिहास की
उसकी बुराइयां,उसकी अच्छाइयों सी ही है मौलिक
वही सृजन एक दिन विध्वंश होगा
ज़रुरत होगी नव निर्माण की
तब हर नव निर्माण को
लेनी होगी उधार में
अच्छाइयां अपने इतिहास की
ताकि अच्छा.....बेहतर बन सके
बेहतर..............सर्वोत्तम बन सके

ज़ेहन में सम्हाल कर रखनी होगी
गल्तियाँ इतिहास की..
ताकि वह बन ना सके
अंग नव निर्माण का
एहसास ही कहाँ हो पाता है
वर्तमान को
अपनी गलतियों का
जो बेसबब उससे बस
होती जाती हैं...................
मैं, इतिहास ही देता हूँ ..
बोध और अवसर
एक सुधार का...
यह ज़रूर है कभी-कभी
वर्त्तमान की गल्तियाँ
इतिहास बन
हो जाती हैं बोझिल...अति बोझिल
फिर भी मैं
कुछ हद तक तो सहायक
हो ही जाता हूँ
एक सुन्दर रूपांतरण का ...
.ज़रूरी है कि....
मेरा विस्मरण ना हो
दोहराया जाऊं बार-बार
ताकि हो बेहद मज़बूत..
हर नवनिर्माण की नींव
विकास का क्रम भी यही कहता है..
है यही व्यवहारिकता

इतिहास ज़रूरी है.
जो अपने इतिहास अपनी जड़ों से
सीखता है जितना
परिष्कृत,रूपांतरित होता है उतना
जीवन में सृजन अल्प और निर्माण है अधिक
इसलिए बनी रहेगी सदा
इतिहास की प्रासंगिकता
नहीं है यह कोई गड़े मुर्दे उखाड़ना
यह है....
अच्छाइयों का जतन
बुराईयों का दफ़न
अतः...
मुझे विस्मृत ना करो
मैं ज़रूरी हूँ
एक बेहतर निर्माण के लिए
एक बेहतर समाज के लिए
मैं इतिहास कहता हूँ
दोहराओ मुझॆ बार-बार
दोहराओ मुझॆ बार-बार
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उलझ जाती हूँ मैं

सूरज ने तोड़ा दम तो निकला चाँद
मिटी गम भरी सिसकी तो निकली हंसी
रात ने ली विदाई तो हंसी किरण
ग़मज़दा हुआ मन तो निकले आंसू
आज भी ठीक उन्ही दिनों की तरह
उठती रही लहर
केंद्र से कगार तक
एक ..दो..तीन.....जाने कितनी बार
उठती,गिरती,बिखरती...
चलता रहा क्रम
इस क्रम में ऐसा क्या था
जो मुझे जोड़ रहा था
तोड़ रहा था.....
उन लहरों के साथ
बिखरती रही मैं भी
सोचती रही ...
लहरें आती हैं ..जाती हैं
ये वही लहर है या हर वक्त
कोई नई लहर आकर
मिटा जाती हैं ..
अपने पहले आई लहर के निशाँ
ठीक जन्म -मृत्यु के खेल के मानिंद
हर बार उलझ जाती हूँ मैं
इस रहस्य में ..
जब-जब मेरा कोई अपना
बहुत अपना
मेरा साथ छोड़ता है
हमेशा हमेशा के लिए
उस दुनिया में जाने के लिए
जहां से कभी कोई भी
आता नहीं लौटकर .
क्या है ये जीवन ???
दो नदियों का संगम
या फिर

क्षितिज का एहसास...?
वो मन कहाँ से लाऊं !!!!
जो जीवन की मिठास चूम सके
मधुर रस में भी झूम सके

मदहोश हो कर नाच सके
रोकर भी मुस्करा सके
कैसे जीत हासिल करूँ
अपने सारे दुःख,विषाद
वेदनाओं पर
सुना है ..

वक्त हर प्रश्न का ज़वाब है...
वक्त हर मर्ज़ की दवा है ...
इंतजार है उसी वक्त का
जिसके आँचल में छुप मैं
जी भर रो सकूँ
ताकि फिर से दे सकूँ ज़माने को
खुशियों की सौगात
आत्मविश्वास की लौ
बह सकूँ निर्बाध....
प्रवाहमयी यमुना बन
सदा की भांति.