Tuesday, April 17, 2012

वर्त्तमान परिदृश्य में जब हम बच्चियों पर अत्याचार जैसे ज्वलंत मुद्दे पर बात करते हैं तो मुझे एक शायर का मशहूर शेर याद आता है-
"किसी दुश्मन के लिए क्या  बददुआ  करें हम
जब अपनी तबाहियों में हमारा अपना ही हाथ हो"
प्रश्न यह है कि जब प्रकृति ने मनुष्य को दो रूपों में (स्त्री और पुरुष) परस्पर पूरक के रूप में बनाया है तो फिर एक को स्वीकृति और दूजे को अस्वीकृति क्यों?प्रकृति भी क्या इस असंतुलन को बर्दाश्त कर पायेगी?क्या ये हालात उतरोत्तर नैतिक पतन के रूप में विभस्तता के  साथ बुनियादी सामाजिक  संरचना को लिजलिजा नहीं कर देगी? फिर कौन रोक पायेगा  समलैंगिकता,बलात्कार की चरम सीमा और बहु पति विवाह जैसी कुरीतियों के घुसपैठियों को?
सवाल अंजाम का नहीं ;सवाल है कि इस समस्या का विष बीज किस विषाक्त मृदा में, किस विषैली हवा और रोशनी  से,किस जहरीली नीर से सिंचित होकर बढ़ता जा रहा है?इसे किस  सांप ने विषैला बना दिया है:-
बेटे की चाहत ,आर्थिक विवशता और सर्वाधिक जहर भरे  सामाजिक सोच ने.?
पुत्र की चाहत को इस अत्याचार की एक वज़ह मैं मानती हूँ.कर्मकांड और अंत्येष्टि क्रिया के लिए आज भी हिन्दू समाज पुत्र को महत्व देता है पुत्रियों के द्वारा यह कार्य जब-जब किया गया वह अखबार की मुख्य खबर बनकर हमारे सामने आया.ऋषि-मुनियों या बड़ों के आशीर्वाद में भी"दूधो नहाओ;पूतो फलो"ने जड़ों की गहराइयों तक अपना अस्तित्व बना लिया था.यह वही समाज है जिसमें विद्या के रूप में सरस्वती,धन के रूप में लक्ष्मी,शक्ति के रूप में दुर्गा और  जननी के रूप में धरती की पूजा की जाती थी.आधुनिक  समाज में अशिक्षित वर्ग जब इन प्राचीन परम्पराओं में ज़कड़ा हुआ तथा अंधविश्वास के हद तक विश्वास को अपनाए हुए कन्या भ्रूण ह्त्या ,जन्म के बाद उन्हें  मारने की कोशिश करना जैसे घृणित घटनाओं को अंजाम देता है तो आक्रोश तो उपजता है पर जब शिक्षित समाज भी ऐसा करता है तो वाकई भय होता है कि हमने मनुष्य के रूप में जन्म लेकर कोई भूल तो नहीं कर दी है.हरियाणा,पंजाब जैसे संभ्रांत राज्यों में लिंगानुपात काफी कम है. बेटी के जन्म के बाद तो चोरी-छिपे इस घटना को अंजाम दिया ही जा रहा था पर आधुनिक तकनीक ने तो गर्भ में ही इन्हें मारने की पुरी व्यवस्था कर ली.PNDT  कानून भी वैसा ही रहा कि मलेरिया का injection  तो बना लो पर पोखर में रहने वाले मछरों से गुपचुप समझौता कर लो.UNICEF  के अनुमान के अनुसार भ्रूण लिंग परीक्षण और चयनित गर्भपात उद्योग के रूप में १००० करोड़ व्यापार हो रहा है.आफरीन भी अपने पिता के दिल में पल रहे  बेटे की चाहत के मनहूस मनसूबे का शिकार बन इस कदर ज़ख़्मी हुई कि मौत के गहन निद्रा में सो गई और हमारे लिए एक सवाल छोड़ गई कि क्या माँ पिता के सामने इतनी बेबस हो जाती है?

हमारे देश में लिंगानुपात ९१४/१००० का है.यह वही देश है जहाँ एक तरफ  अफरीन,फलक, भूमि दम तोड़ देती हैं और दूसरी ओर उपभोक्तावादी समाज बड़े ही बेशर्मी से औरतों की नुमाइश के विभिन्न तरीके खोज रहा होता है. ऊँचे पदों पर आसीन कुछ महिलाओं से ही क्या तरक्की की पहचान हो जायेगी ? कभी नहीं.हम एक कदम आगे बढ़ रहे हैं तो ठीक उसी समय तीन कदम पीछे लौट जा रहे हैं.यही हमारे  सामाजिक विकास का असली सत्य है.  .

मैं अपनी एक सहेली को जानती हूँ जिसे विवाह के कई वर्षों बाद  इसी वर्ष जननी बनने का सुख प्राप्त हुआ. पहले तो डॉक्टर ने बताया कि जुड़वां लड़के होंगे पर जन्म के वक्त जुड़वां लडकियां हुईं .डॉक्टर ने कहा," मैं तीसरे महीने ही जान गया था पर नहीं बताया क्योंकि मैं इन्हें स्वस्थ जन्म लेते देखना चाहता था."अगर हर डॉक्टर इस तरह सही दिशा में जननी के सोच को परिष्कृत कर सकता तो तकनीक के इस अद्भुत इजाद को यूँ शर्मिन्दा ना होना पड़ता.
बेटियों के प्रति अस्वीकृति का अन्य कारण आर्थिक विवशता भी है.सरकार के बनाए आर्थिक मदद की योजनायें,दहेज़ के रोकथाम के लिए बने कानून,आर्थिक समपन्नता  के हाथों पुलिसिया कार्यवाही की असफलता ने लड़कियों के हालात कहीं-कहीं मजबूर कर दिए हैं.मर कर भी उन्हें चैन नहीं मिलता.लाशों से एक ही आवाज़ आती है "हैवानों अब तो चैन से सो जाने दो,बाद में कर लेना हिसाब आहिस्ता-आहिस्ता."आधुनिक समाज में पढी-लिखी लड़कियों को भी आर्थिक विपन्नता या अभाव में जब विवाह की वेदी पर बैठने से महरूम होना पड़ता है या सुरसा की मुख के तरह बढ़ती दहेज़ सामग्री  के लम्बे फेहरिस्त से सामना करना पड़ता है तो वे बेबस माता-पिता और शेष जनक-जननी के लिए सन्देश बन जाते हैं कि अब भी सम्हलो;मत बनो बेटियों के पालक.
मुझे एक वाकया याद आता है कि  लेशा दी की शादी में जब खिचडी खाने की  रस्म के वक्त लड़के ने कार की जिद की थी और दीदी के पिता ने पगड़ी उस लड़के के पैर पर रख दी थी ,दीदी ने बाहर निकल कर रात में डाला ताज़ा सिंदूर लोटे के पानी से धो दिया था और लगभग चिघाडती हुई लड़के और उसके घर वालों को मंडप के बाहर का रास्ता दिखा दिया था.आज दीदी नायब तहसीलदार के पद पर कार्यरत हैं और अपने ही साथ कार्यरत  अन्य बिरादरी के एक लड़के से विवाह कर लिया है.कभी-कभी माता-पिता संवेदनशील होते हुए भी भविष्य के गर्भ में छुपे रूप में अपनी पुत्रियों के रुतबे की कल्पना नहीं कर पाते और उन्हें बोझ समझने की भूल कर बैठते हैं.मैं जब कभी गाँव जाती थी तो एक गीत सुनती थी जो मुझे भी डराया करता था पर पापा हमेशा अच्छा सोचने की सलाह देते थे वे पंक्तियाँ कुछ इस प्रकार थीं:-
काटी अंगूरी के खूनवा निकार लिखी चिठिया,
माई स्याहियो का तरसे तोहार बिटिया
कौनी विधि जियरा के अगिया बुझाई,बैठी कौनो कोनवा में रोहहौ  ना पाई
रोवत मिली तो परत लाठिया,जियत नाही पैबू आपन बिटिया...........
इस गीत के बोल में दहेज़ के दंश झेलती बेटी की करुण चीत्कार की वेदना थी.
अब तीसरी वज़ह का ज़िक्र मैं करती हूँ जो सीधे तौर पर असंवेदनहीनता और पंगु हो चुके  सामाजिक सोच से वास्ता रखता है.शराब हलक में जाते ही क्या अपना और क्या पराया खून...........असंवेदनहीनता ने ही फलक,आफरीन जैसी मासूमों का खूनी मंज़र समाज को  दिखा दिया.देह व्यापार,बलात्कार,वेश्यावृति की अंधी गलियों में धकेल दी जाने वाली मासूमों के आस-पास के लोग भी बेटी को जब इस तरह ग़मज़दा  होते देखते हैं तो यही सोचते हैं कि ऐसे दुर्दिन से तो बेहतर है  कि ये बिचारी जन्म ही ना ले.समाज में गालियों के शब्दकोष माँ,बहन,बेटियों की गालियों से भरे पड़े हैं क्या ये दोयम दर्जे का परिचायक नहीं?कुछ व्यक्ति अपनी माँ ,बेटी,बहन को लेकर जितने संवेदनशील होते हैं की मरने-मारने पर अमादा हो जाते हैं पर जब दूसरों के घर की इज्ज़त की बात आती है तो संवेदनशीलता का हर वर्ण उनकी याददाश्त में धुंधला पड जाता है. आज हर माता-पिता जिनके आँगन में कभी  बेटियों के नुपुर की संगीत लहरी बजी है ;वे खौफज़दा  हैं कि क्या वे  अपनी लाडली को घर से दूर भेज कर सुकून से रह सकते हैं ,जहाँ कुछ मनुष्य भेड़ियों की शक्ल में भी मौजूद हैं .पर कहते हैं ना पाप जब अपने चरम सीमा पर हो तो पापी का पतन ही कर देता है.
ऐसा ही एक वाकया मैंने कहीं पढ़ा  था जो एक ऐसे  व्यक्ति से तालुकात रखता है जिसे लड़कियों की बुरी लत थी,रात के रोशन होते ही उसके दुधिया हवेली का एक कोना गहरी स्याह चादर ओढ़ लेता था और सिसकियों का गवाह बन उठता था.उन चेहरों को पहचानने की ज़हमत वह कभी नहीं करता था,पर एक दिन उस कोने में उसी के अंश की सिसकी गूंजी.बचपन से पिता के मूंछों से खेलती बेटी ठुड्डी पर लगे चोट के निशाँ के रूप में पड़े गड्ढों से भली-भांति परिचित होते हुए किसी कमज़ोर अमर बेल की तरह बढ़ रही थी जिसे मजबूत वृक्ष के रूप में पिता का सहारा था .इसीलिये उस दिन जब  उसके अभ्यस्त हाथ स्वयं को बचाने के प्रयास में गड्ढों के निशाँ पर आये तो वह सिसक उठी "पापा".
वह असंवेदी व्यक्ति इतना संवेदी हो गया कि अपनी जीवनलीला समाप्त कर बैठा.बेटी महफूज़ ही कहाँ है?
बस एक ही बात कहनी है ,"अपने घर की   के इज्ज़त के सदृश दूसरों   के घर की इज्ज़त भी होती  है,लड़कियों को सही  सोच,आत्मविश्वास के पंख दो; उन्हें अपनी बदनीयती से मत डराओ,मत घसीटो उन्हें उन्नति के नाम पर,उन्हें वो सारा आकाश दो जहाँ वे स्वछंदता से भयहीन हो उड़ सकें ;तुम्हारी नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण सोच,तार्किक संवेदनशीलता,उनके लिए मृदा और प्रकाश हैं;तुम्हारी लोभ,लिप्सा,वासनाओं और अंधविश्वास से अछुतापन ही इन नन्हे बीजों के लिए ऑक्सीजन और जल हैं .इन्हें तुम्हारे सहयोग की ज़रूरत है,वरना एक दिन सच में ये विलुप्त हो जायेंगी.तुम्ही बोलो शक्ति के' इ' की शक्ति के बिना क्या शिव भी शव नहीं हो जायेंगे?निष्प्राण,निश्तेज.................................???
क्या कहूँ??????????????
किसने बिगाड़ दिया है इनके रूप को,
कुहासे के साए में तड़पती हैं धुप को 
दहेज़ लोभियों के घृणित साजिशों ने
अंधविश्वास में पुत्र की ख्वाहिशों ने
बनाया समाज के एक तबके को क्रूर
कि बेटियाँ हो गयीं बेबस और मजबूर
पुरुष प्रधान समाज में जी रही  बेकल
कहाँ मिलता जहां इनको  मुकम्मल
जाने कितनी अफरीन;कितनी फलक
सो जायेंगी देख धरा की  एक झलक
क्यों बचा नहीं पा रहे हम इनकी जान को
कैसे  रुखसत कर पायेंगे ऐसे हैवान को?
क्या कहूँ ??????????????
जब अपनी तबाहियों में अपना ही हाथ हो








इतिहास में आस

दोस्तों ,आज मैं विद्यालय की शिक्षा में "इतिहास विषय की शिक्षा" के तरफ आप सबका ध्यान आकृष्ट करना चाहती हूँ.बचपन से एक चिर-परिचित पंक्ति सुनती आ रही हूँ :-
"इतिहास भूगोल बड़ी बेवफा ;रात को पढो ,दिन को सफा"

पर ऐसा मैं इसलिए नहीं मानती क्योंकि मैंने इतिहास पढ़ा है और अर्थशाश्त्र में मास्टर डिग्री लेने के बावजूद इतिहास विषय को तीन वर्षों तक बच्चों को पढ़ाया भी है..
.दो-तीन दिन पूर्व एक समाचार से अवगत हुई जिसमें CITY  MONTESSARY  स्कूल राजाजीपुरम ब्रांच (लखनऊ )की छठी कक्षा की छात्रा ऐश्वर्या पराशर ने सामाजिक अध्धयन विषय में महात्मा गांधी जी के विषय में  जब पढ़ा कि उन्हें' राष्ट्रपिता' उपाधि से संबोधित किया जाता है तो उसके मस्तिष्क में सहज ही एक सवाल उठा "गांधीजी को किस वर्ष और किसने  इस उपाधि से विभूषित किया?" उसने अपने माता-पिता से भी जानना चाहा,नेट पर भी ज़वाब खोजा पर संतोषजनक उत्तर नहीं मिल पाया.उसकी माता उर्वशी पराशर ने उसे RTI के तहत जानकारी लेने की सलाह दी.

१३ फरवरी को उसने प्रधान मंत्री  कार्यालय को पत्र लिखा.वहां इससे सम्बंधित कोई रिकॉर्ड नहीं था.यह प्रश्न  Querry Ministry Of Home Affairs में गया जिन्होंने इसे National Archives Of India को भेजा .NAI की assistant director and central पब्लिक information ऑफिसर जैप्रभा रविन्द्रन के पास भी उत्तर ना था .उन्होंने ऐश्वर्या को इस प्रश्न का जवाब स्वयं ही खोजने के लिए archive आने की अनुमति दी है साथ ही इस विषय से सम्बंधित रेकॉर्ड्स मुहैय्या कराने की बात भी की है.

इस प्रश्न के ज़वाब में कई बातें ध्यान रखनी है जैसे :----------

*  भारतीय संविधान की १८(१) में लिखा गया है "किसी भी व्यक्ति को शैक्षिक, सैन्य या अन्य इस तरह की उपाधि से नवाज़ा नहीं जाएगा."अब यह तो स्पष्ट है कि राष्ट्रपिता की उपाधि भारत सरकार के तरफ से नहीं दी गयी है.
*  यह उपाधि सर्वप्रथम  नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने सिंगापूर रेडियो से ६ जुलाई १९४४ को अपने संबोधन में प्रयुक्त किया था जो इस प्रकार है
"
*  गांधीजी के मृत्यु पर पंडित  नेहरु जी ने रेडियो द्वारा राष्ट्र को संबोधित किया और कहा"राष्ट्रपिता अब नहीं रहे".
*  २८ अप्रैल १९४७ को सरोजिनी नाइडू जी ने गांधीजी को इस उपाधि से संबोधित किया था.
*  २००४ में श्रीमान एल.के.आडवानी ने कहा "गांधीजी को राष्ट्रपिता कहा जाता है पर सरकार ने औपचारिक रूप में ऐसी कोई उपाधि उन्हें नहीं दी है.
यह जिज्ञासा कोई नयी बात नहीं है .बच्चे जिज्ञासु होते हैं .दरअसल एक शिक्षक होने के नाते हम उनकी जिज्ञासा को कैसे सही उत्तर से शांत कर सकते हैं यह सोचने वाली बात है.Jorge  Danison ने जब 'फर्स्ट स्ट्रीट चिल्ड्रेन'नामक अपनी किताब लिखी तो एक सवाल किया था-"हम किन्हें पढ़ाते हैं"और इस प्रश्न का ज़वाब जब उन्हें ठीक से नहीं मिला तो उन्होंने स्वयं ज़वाब दिया था कि अधिकाँश शिक्षक अधिकाँश समय तो सिर्फ  पाठों को ही पढ़ाते हैं,वे बच्चों को कहाँ पढ़ाते हैं"इस बात को मैं इतिहास की एक कक्षा के माध्यम से स्पष्ट करती हूँ .

मैं आठवीं कक्षा में मध्ययुगीन इतिहास पढ़ाने के क्रम में उस दिन 'रज़िया सुलतान 'के विषय में बताना शुरू करती हूँ.अचानक एक छात्रा ने प्रश्न पूछने की अनुमति ली.मुझे अच्छा महसूस हुआ क्योंकि मेरी आकांक्षा ही शुरू से थी बच्चे ३ R 's (reading , writing ,arithmetic )के अलावा reason ,responsibility ,rights ,relations ,recreation ,जैसे अन्य R 's  को  भी  समझें.उसका प्रश्न  था,"हम विद्यार्थी रजिया सुलतान के विषय में आज के युग में क्यों पढ़ें?वह कैसे प्रासंगिक है? मैंने उनकी जिज्ञासा शांत की और कहा जब उनके व्यक्तित्व से परिचित होगी तो खुद ही समझ जाओगी कि वह किस तरह प्रासंगिक है.फिर रज़िया के विषय को मैंने एक प्रेरणा के रूप में उनके समक्ष रखा .वह किस तरह पुरुष प्रधान युग में ,दक्षिण एशिया की पहली महिला शाषक बनी.आज मुस्लिम समुदाय जिस पर्दा प्रथा की जकड़न में है उसे सन १२३६ में ही उसने नकार दिया था ;दरबार हो या युद्ध का मैदान वह मर्दों की वेश-भूषा में ही जाती थी.उसके कुशाग्रबुद्धि,कुशल नेतृत्व के गुणों को देखकर पिता इल्तुतमिश ने बेटों की जगह उसे अपना उत्तराधिकारी बनाया.मैंने रज़िया को आज के युग से जोड़कर प्रस्तुत किया सभी छात्राएं अत्यंत संतुष्ट हुईं.


अब छात्र कैसे शांत बैठ सकते थे.बच्चों को वैसे भी लीक से हटकर प्रश्न रखना बहुत भाता  है.जब आधुनिक भारत के अध्याय शुरू हुए और १९१५ से १९४७ तक गान्धीयुगीन भारत की कक्षा चल रही थी,एक छात्र ने प्रश्न रखा,"सब कहते हैं कि गांधीजी शान्ति के मसीहा थे फिर आप यह बताइये उन्हें अब तक शान्ति का नोबल पुरस्कार क्यों नहीं दिया गया?"यह प्रश्न सच में विचारणीय था .
शान्ति और अहिंसा के लिए पूरा विश्व गांधीजी को याद करता है,उनके शान्ति सिद्धांतों पर चलकर किंग मार्टिन लूथर ,दलाई लामा,नेल्सन मंडेला और आन-सां-सु ने शान्ति का नोबल पुरस्कार प्राप्त किया है फिर वे ही इस पुरस्कार से वंचित क्यों रह गए?हालांकि इस पुरस्कार के ना मिलने से उनकी छवि धूमिल हो रही है ऐसी कोई बात नहीं पर बच्चों की जिज्ञासा का क्या करती?
मैंने उसे से  दो दिनों  का वक्त चाहा,उसने क्या सारे विद्यार्थियों ने कहा "mam ,आप टाल मत जाना"मैंने उन्हें आश्वासन दिया पर ज़वाब क्या दूंगी यही सोचती रही.कुछ दिनों पहले ही महात्मा गांधी जी पर एक लेख तैयार किया था जिसमें श्रीमान 'अशोक रहाटगांवकर'जी की बहस के कुछ अंश जो एक अखबार में प्रकाशित हुए थे, उधृत किये थे और दो दिन बाद उस बहस की मदद से मैंने बच्चों की जिज्ञासा शांत की.
इसमें एक जगह अशोकजी ने प्रोफेसर जेकब कर्म मुलर के विचार रखे हैं कि जब १९३७ में गांधीजी का नाम इस पुरस्कार के लिए विचार में लिया गया तो कमिटी के एक सदस्य ने कुछ कारण गिनाये थे "गांधीजी उद्दात विचारों के सद्गृहस्थ थे इसमें कोई दो मत हो ही नहीं सकते.परन्तु वे एक ही समय पर कई भूमिकाएं अदा करते हैं.कभी वे एक ओर हुक्मशाह बनते हैं तो दुसरी ओर स्वतन्त्रता सैनिक बन खड़े होते हैं. ध्येयवादी बनते हैं तो दुसरी तरफ राष्ट्रवादी.कभी वे अहिंसा के पुजारी बन जाते हैं तो कभी सामान्य राजनीतिज्ञ.यही वज़ह है कि उनकी परिवर्तित भूमिकाओं के कारण ही उनके चयन में बाधा आती गई"
गांधीजी के जीतेजी यह पुरस्कार उन्हें मिल सकता था पर उस समय स्वीडन (नोब्ले पुरस्कार का सम्बन्ध स्वीडन की राजधानी स्टोकहोम  के.निवासी अल्फ्रेड नोब्ले से है)ब्रिटेन का मित्र राष्ट्र था ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ गांधीजी के विरोध को ध्यान में रखते हुए वह नहीं चाहता था कि ब्रिटेन उससे नाराज़ हो इसलिए उसने कई बार यह विचार आने पर भी  टाल दिया.
पुरे आलेख का सार यह है कि अगर बच्चों को सही शिक्षा देनी है तो ज्ञान जो अनंत और अपार जगह-जगह बिखरा पडा है उसे शिक्षक को स्वयं तो खोजना ही है पर बच्चों में भी खोज की वृति जगानी है सब कुछ पाठ्यक्रम और पुस्कों में दे देने से बच्चा सीखेगा,इस मानसिकता को बदलना होगा.
गांधीजी तो चाहते थे सीखना यानी स्वयं में और समाज में परिवर्तन कर देना पर वह हुनर ओर साहस हम कहाँ सीखा पाते हैं .परीक्षा में ऊँची श्रेणी हासिल करना,नौकरी पाना ही तो शिक्षा का लक्ष्य रह गया है .
ऐसे में बच्चों के सहज पर झिन्झोरने वाले प्रश्न खोज की प्रवृति को नयी दिशा देते हैं और "इतिहास में आस "जगाते हैं.

(साभार नेट और अशोकजी के प्रकाशित बहस के कुछ  अंश )