Thursday, December 19, 2013

फैलती हैं लपटें विषैली श्वास से

मानव जाति के विकास क्रम का गहनता से निरीक्षण करने पर एक बात स्पष्ट हो जाती है कि समुदाय का उदय वर्ग,धर्मं,जातिसमूह,भाषाई,सांस्कृतिक जमायतों राष्ट्रों प्रांतों जैसे कई सामाजिक,राजनीतिक ,सांस्कृतिक धार्मिक बोध का एक प्रतिबिम्ब ही होता है.इसमें तब तक कोई बुराई नहीं जब तक कि प्रतिबिम्ब को दर्शाने वाला आईना धूमिल ना हो,अगर सामाजिक,राजनितिक,सांस्कृतिक धार्मिक बोध का आईना साफ़ और चमकदार है तो समाज समुदाय की संकीर्णता और  साम्प्रदायिकता के धूल से धूसरित और वीभस्त कभी ना होने पाएंगे.
साम्प्रदायिकता को सबसे ज्यादा संवेदनशील धर्मं के आधार पर किया जाता है...जब कि धर्मं के आधारभूत सिद्धांतों का साम्प्रदायिकता से कोई वास्ता ही नहीं होता..पर जब सामाजिक और राजनितिक आधार धर्मं के आड़ में अपने निहित स्वार्थ और प्रभाव को बचाने कि कोशिश में लग जाते हैं तब हिंसा कि आग भड़क उठती है.यह मान बैठना कि विभिन्न धर्म के अनुयायियों या समुदायों के सांसारिक हित (सामाजिक,सांस्कृतिक,आर्थिक,राजनितिक)अन्य किसी भी धर्मं के अनुयायियों के सांसारिक हित से भिन्न हैं...तथा परस्पर एक दूसरे के विरोधी हैं...यही भाव धर्मं की संरचना और प्रभाव की व्यापकता से विमुख और धर्मं आधारित सम्प्रदाय की संकीर्णता के प्रति झुकाव में बदल जाता है.लोग यह भूल जाते हैं कि अलग-अलग धर्म एक ही वृक्ष की अलग-अलग शाखाएं हैं..जो एक ही जड़ से पोषित होती हैं और वह है इंसानियत..मानवता की जड़ जो कई महीन शाखाओं जैसे दया,करुणा,प्रेम,सेवा,सदभाव इत्यादि में बंटी ....जमीन के भीतर गहराई से समाई ...पूरे वृक्ष को पोषित करती है.इंसानियत की ये जड़ें जितनी गहराई में समाएगी उतना ही वृक्ष की शाखाओं को भी विस्तार मिल पायेगा...पर अमूमन ऐसा नहीं हो पाता जड़ें गहरी हो कर वृक्ष को थाम लेती हैं पर घृणा,द्वेष,वैमनस्य के टकराव की आंधी शाखाओं को आपस में ही टकरा देती हैं ...और दुःख इस बात का कि कमजोर शाखाएं ही मजबूत शाखाओं से टकराने का दुस्साहस कर बैठती हैं ....और टूट जाती हैं.कुछ लोगों की विद्वेष पूर्ण भावना ,मतभेदों का इस्तेमाल उन सामाजिक आकांक्षाओं संघर्षों इत्यादि को विकृत रूप में उजागर करने के लिए कर लिया जाता है जिसका धर्म के वास्तविक स्वरुप से दूर=दूर तक कोई नाता नहीं होता.जैसा कि सी.जी.शाह कहते हैं,"साम्प्रदायिक प्रचार के प्रभाव में आकर लोग अपने शोषण ,अत्याचार और पीड़ा के वास्तविक स्त्रोत को पहचानने में असमर्थ हो जाते हैं और उनमें एक छद्म साम्प्रदायिक कारण की कल्पना कर लेते हैं."
एक कविता की दो पंक्तियाँ याद आती हैं...
विश्व मानव के ह्रदय में मूल हो सकता नहीं द्रोहाग्नि का

चाहता लड़ना नहीं समुदाय है,फैलती लपटें विषैले व्यक्तियों के श्वास से .
आधुनिक भारत में साम्प्रदायिकता के विकास के लिए ब्रिटिश शाशन की'फूट डालो शाशन करो'की नीति ख़ास तौर पर जिम्मेदार है.उन्होंने हिन्दू,मुसलमान ,सिखों को लगातार ऐसे अलग-अलग समुदायों का दर्ज़ा दिया जिसकी सामाजिक,राजनीतिक पहचान में कुछ भी साझा नहीं था स्कूल कॉलेज में भारतीय इतिहास बुनियादी रूप से साम्प्रदायिक दृष्टि से पढ़ाया जा रहा था . हालांकि यह भी सही है कि देश में मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के कारण ही उन्हें भी सफलता मिल पाई.अगर हम ऐसी किसी भी आंधी ,को रोकना चाहते हैं तो चीज़ों को सही देखने और समझने वालों की एक जमात तैयार करनी होगी जो ना हिन्दू हों ,ना मुसलमान ना सिख, ईसाई ,पारसी...वे सभी मनुष्यों के लिए हों...ऐसे मनुष्य जो साम्प्रदायिकता के संक्रमण से रूग्ण हैं उन्हें ये ज़मात.. राहत और शान्ति दे सके . कोई ऐसा धर्मं जो प्राचीन इतिहास के सम्राट अशोक महान के' धम्म' की ,मध्यकालीन इतिहास के शहंशाह अकबर के 'दीन-ए-इलाही' की और आधुनिक काल के सही अर्थों में 'धर्मनिरपेक्षता 'का जीती जागती मिसाल बने..सही शांत  चित्त के लिए हवा,भूमि और व्यवस्था दे सके .
धर्मं बेहद व्यापक शब्द है जिसमें सम्प्रदाय की आंधी की कोई गुंजाईश ही नहीं हो सकती.धर्म एक आध्यात्मिक रूपांतरण है ...अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला जागरण है.राधाकृष्णन जी के अनुसार ,"जिन सिद्धांतों के अनुसार हम अपना दैनिक जीवन व्यतीत करते हैं तथा जिनके द्वारा हमारे सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना होती है वे सब धर्म है,धर्म जीवन का सत्य है और हमारे प्रकृति को निर्धारित करने वाली शक्ति है......धर्मों में विशाल रूप से अनेकता मालूम होती है.इसका कारण यह है कि  हम अपने धर्मों के आधारभूत सत्य को नहीं जानते हैं.सभी धर्मों में एक समान तत्त्व,एक समान आधार है जिस पर वह अपना विश्वास तथा क्रिया कलाप आधारित करता है परन्तु वह इमारत जो इस आधार पर बनाई जाती है,प्रत्येक व्यक्ति के साथ भिन्न हो जाती है......धर्म का यह कर्त्तव्य है कि वह हमारे जीवन के प्रति सहज निष्ठा तथा मानवीय प्रकृति की एकता के प्रति विश्वास उत्पन्न कर दे."Jorge के अनुसार

"Basically religion is concerned with two fundamental ideas or experiences-first ,man's relationship to GOD ,& second his relationship to the universe about him including his fellowman. "
पंडित नेहरू के अनुसार,"हिंदुस्तान में धर्म एक व्यापक शब्द है जिसकी( धर्मं) की व्युत्पति 'धृ' धातु से हुई है जिसका अर्थ है धारण करना...एक साथ पकड़ना यह किसी वस्तु की भीतरी आकृति,उसके आतंरिक जीवन के विधान के अर्थ में आता है.इसके अंदर नैतिक विधान,सदाचार,व्यक्ति की सारी जिम्मेदारियां तथा कर्त्तव्य आ जाते हैं."
धर्म के दो रूप होते हैं..एक निष्ठाओं की वह पद्धति जिसके अनुसार व्यक्तिगत जीवन संचालित होता है .दूसरा धर्म पर आधारित सामाजिक पहचान.
धर्मं में प्रयुक्त सभी क्रिया कलाप एक विशेष मक़सद से हैं जो हमें रूपांतरित करते हैं...प्रार्थना प्रकृति के साथ एक होने की कृतज्ञ भावना है,कीर्तन असीम शक्ति के प्रति अपने आनंद और अहोभाग्य को निवेदित करना है...एक उत्सव है भक्ति भाव से भरे हृदय का,मंत्र मन को संयम और एकाग्रता की तरफ ले जाने वाला साधन है,यह उस सार्वभौमिक धर्मं के लिए आवश्यक है जो मानवता में यकीन ,चित्त की शुद्धिकरण और शांत जीवन की आकांक्षा रखते हैं.
उग्रवादी साम्प्रदायिकता का जन्म घृणा,भय तथा अतार्किकता की राजनीति की उपज होता है..इसे रोकने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि व्यक्तिगत ,सामाजिक,राष्ट्रीय व्यवहारों में धर्म के सार तत्त्व को ग्रहण किया जाए .मनु स्मृति के अनुसार....
धृतिः क्षमा दमोसतेय शौचमिन्द्रय निग्रहः
धी विद्या सत्यम क्रोधो दशक धर्म लक्षणम

धैर्य,क्षमा,शान्ति,लोभ न करना,शुद्धता,इन्द्रिय निग्रह,बुद्धि ,विद्या, सत्य तथा अक्रोध धर्म के १० लक्षण हैं.धर्म को किसी भी शर्त में संकीर्ण स्वार्थों के रूप में स्थान ना दिया जाए.प्रत्येक शरीर में निर्बाध बहने वाला लाल रक्त मनुष्यता का हो किसी हिन्दू के भगवा,किसी मुसलमान के हरे या अन्य किसी भी धर्म की संकीर्ण पहचान का द्योतक ना हो .
सच कहा है एक शायर ने ...
इबादत है दुखियों की इमदाद करना
जो नाशाद हों उनका दिल शाद करना
खुदा की नमाज़ और इबादत यही है



जो बर्बाद हों उन्हें आबाद करना.
लेखक hoffing के अनुसार "the essence of religion is faith in the conservation of VALUES.

"फूल तोड़ना मना है"

बगीचे में सुन्दर फूल खिले थे..बाहर कठोर से काले बोर्ड परश्वेत रंग से उभरी लिखावट थी "फूल तोड़ना मना है"अलग-अलग व्यक्तित्व ,अलग-अलग मानसिकता ,परिवेश के लोग बगीचे में घूम रहे थे.किसी ने (आत्मानुशासित)कहा,"फूल सुन्दर हैं ;पौधे पर सम्पूर्णता से खिले हैं खिले ही रहने दूँ तो अपने सौंदर्य और सुगंध से कुदरत को कृतज्ञ कर देंगे....किसी ने (स्वकेंद्रित,स्वात सुखाय)कहा,"ओह!ऐसे सुन्दर ,और तोड़ कर कोट पर सजा लिया.किसी ने(कुत्सित मानसिकता)ने फूल को बेदर्दी से तोड़ लिया..किसी ने (वीभस्त मानसिकता)फूल सिर्फ तोड़ा ही नहीं बल्कि उसकी पंखुड़ियों को भी अलग-अलग कर जमीन पर फेंक दिया और उसके ही अन्य साथियों ने अज़ीब सी घिनौनी हँसी के साथ जमीन पर पडी पंखुड़ियों को अपने परों तले कुचलना शुरू कर दिया....काले बोर्ड पर अब भी लिखावट वैसे ही चमक रही थी"फूल तोड़ना मना है"
समाज में स्त्रियों के प्रति पुरुषों की सोच के बस यही हालात हैं .कुछ कोमल ,विवेकी,संवेदनशील ह्रदय क़ानून (फूल तोड़ना मना है)मान जाते हैं और कुछ....!!!!
ऐसी घटनाओं का वर्गीकरण किशोर-व्यस्क,शिक्षित-अशिक्षित,शहरी-ग्रामीण जैसे असंख्य असीमित दायरों से हटकर बहुत ही सीमित छोटा पर बेहद विशाल बिंदु पर टिका है और वह है...व्यक्तिगत सोच,विचार,व्यवहार और मानसिकता."
महिलाओं के प्रति पुरुषों के द्वारा बलात्कार,यौनाचार,शोषण कहीं पर फटे कपडे,सिले जूतों में कुपोषित,शोषित किशोर का किसी महंगी कार में कुत्ते के साथ बैठे हम उम्र अन्य किशोर/किशोरी को देखने से उपजा आक्रोश है......तो कहीं अतिपोषित संभ्रांत व्यक्ति के भावनात्मक खालीपन से उपजी अकिंचनता की कुंठा......कहीं पर यह स्त्री के मन में बसे लोभ लालच के दहकते अंगार पर स्वेच्छा से चलने के दुस्साहस का भयंकर परिणाम है.......तो कहीं पर पारिवारिक आपसी रिश्तों के अवमूल्यन का छुपा हुआ घिनौना सच है.
आज के मशीनी युग में मानव रूपी मशीन ही सर्वथा खाली और बेकार है..सृजन के अवसर ही ख़त्म होते जा रहे हैं..पहले एक कुम्हार घड़े बनाता था तो सृजन के आनंद से भर उठता था..कुंठा के लिए जगह ही नहीं थी...एक मोची अपने बनाये जूते किसी और के पैरों में देखकर सर्जक होने के गरिमा बोध से उत्साही हो उठता था ......मानव की शक्ति और ऊर्जा तो आज भी वही है पर उसके निष्काशन के लिए जगह कहाँ है?फिर खाली मन मस्तिष्क कामातुर होने में ज़रा भी हिचक नहीं दिखता .....फिर चाहे वह गरीब की कुटिया के बाहर खुले आसमान के नीचे टूटी खाट पर लेटा कोई किशोर /व्यस्क/बुजुर्ग हो या फिर किसी पॉश कॉलोनी के ए.सी कमरे में मुलायम गद्दे पर मखमली कम्बल ओढ़ा कर औंधा पड़ा कोई किशोर/व्यस्क/बुजुर्ग हो.
पारिवारिक ताना बाना जिस तरह से आज बदला है वह स्वयं में एक चुनौती है...तीन पीढ़ियों के साथ एक ही छत के नीचे रहते हुए अनुभव और मूल्य सीखता -सीखाता परिवार आज तीन सदस्यों के पारिवारिक संरचना में तब्दील हो गया है जो किसी त्रिभुज के तीन बिंदुओं की तरह सीधे तौर पर सिर्फ दो ही मिलने की प्रवृत्ति रखते हैं.. (माँ/संतान या फिर पिता/संतान)अगर तीनों मिलने की जुगाड़ भी करते हैं तो त्रिभुज के कोण के विभाजक रेखा के केंद्र पर मिलने की तरह ..अति व्यस्तता उन्हें सम्पूर्णता से कभी मिलने ही नहीं देती है.सम्बन्धों का ऐसा विभाजन और विखंडन कभी नहीं रहा और फिर तीनों ही बाहर कहीं खुशी तलाशने लगते हैं जो कभी भी सही दिशा में नहीं जाता.
आधुनिक संचार साधनों की सहज सर्वसुलभता 'एक तो करेला उस पर नीम चढ़ा ' की कहावत चरितार्थ करता है...अंगुली के एक स्पर्श पर शील से अश्लील सामग्री उपलब्ध है...शील तो समाज में परिवार,शिक्षक सभी सीखा रहे हैं ..आवरण तो अश्लील पर है तो बस आवरण हटाने की उत्कंठा...और फिर उसे प्रायोगिक करने की लालसा कुछ असंयमी पुरुषों का शगल बन जाता है.
विज्ञापन सिनेमा धारावाहिकों में स्त्रियों को सजावटी तथा लुभावनी रूप में ही प्रस्तुत और प्रदर्शित किया जा रहा है...यह ठीक है कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता है पर यह महिलाओं के सम्मान का लाजतंत्र भी हो...सिनेमा से समाज तक माँ,बहन,बेटी के नाम पर भद्दी गालियां और कुछ मुहावरे लाज की हर सीमा लांघ जाते हैं.जिस समय निर्भया के लिए न्याय की गुहार का प्रदर्शन हो रहा था उसी वक्त पुलिस को चूड़ियाँ दिखाई जा रही थी...क्या चूड़ियाँ पहनने वाले हाथ ही गाड़ियां नहीं चला रहे....देश के विकास में योगदान देते सैकड़ों उत्पाद नहीं बना रहे...इसी लिए रायपुर की २२ वर्षीया सौम्या गर्ग ने "चूड़ियाँ पहन र घर बैठने"जैसे आम जुमले को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में चुनौती दी है ऐसे मुहावरे स्त्री को कमतर और कमज़ोर साबित करते हैं. स्त्री की दक्षा,प्रतिभा का प्रस्तुतीकरण करते समाचार विज्ञापन सिनेमा धारावाहिक 'समुद्र में एक बूँद' और 'ऊंट के मुंह में जीरा ' की तरह साबित हो रहे हैं.परिवार,समाज में यह सब देखता पुरुष स्त्री को सहज उपलब्ध मान बैठते हैं.विज्ञापनों तथा अन्य संचार साधनों की यह प्रवृत्ति भी रूकनी चाहिए.इस दिशा में स्वयं स्त्रियां भी कदम बढ़ा सकती हैं...."सजना है मुझे सजना के लिए "वे किसी भी शर्त में स्वयं को लुभावने उत्पाद के रूप में प्रस्तुत करने की इज़ाज़त किसी को ना दें.
स्त्रियां घर से बाहर..
निकलते वक्त ही

सज-धज जाती हैं

क्यों नहीं सजती वे ही स्त्रियां

घर पर

अपने पति के लिए ?
यह प्रश्न मेरे लिए
बहुत मायने रखता है.
रचाती हूँ मेहंदी
सजाती हूँ बिंदी
भरती हूँ मांग
लगाती हूँ महावर
और तुम्हारे प्यार का सिंदूरी रंग
रंग जाता है मेरे कपोलों को
मेरी कजरारी आँखों की सुंदरता को
ज़ज्ब कर लेती हैं
तुम्हारी आँखें
फिर नहीं समाती उन आँखों में
किसी और रमणी की सुंदरता.
नहीं मिल पाती
सुंदरता की कोई उपमा
बाहर तुम्हे
सोचती हूँ ............
हर स्त्री क्यों नहीं करती ऐसा.....
सजे-धजे





















सिर्फ अपने
और अपने पति के लिए .

घरों पर स्त्रियां बचपन से ही भेदभाव में पलती हैं..जो अधिकतर घर की बड़ी -बुजुर्ग महिला सदस्य ही करती हैं.पुरुष अनजाने ही यह सब देखते सुनते हैं और स्वयं को स्त्रियों से श्रेष्ठ समझने लगते हैं .जब घर से बाहर किसी श्रेष्ठतर महिला से उनका सामना होता है तो उनके अहम् की भुरभुरी दीवार ढहने लगती है और उसे बचाने के लिए अपने पौरूष का वे गलत इस्तेमाल कर जाते हैं.
महिला यौन उत्पीड़न के पीछे ऐसे कारणों की लम्बी फेहरिस्त है...बात चाहे १६ दिसम्बर की हो या बाद की कमोबेश उपरोक्त कारण ही इसके लिए जिम्मेदार हैं...पुलिस सजग हो ..क़ानून कठोर से कठोरतर हो जाए ऐसा होना चाहिए पर सर्वप्रथम उपरोक्त मानसिकता में सुधार ज़रूरी है.सृजनशीलता का विकास,पारिवारिक ताने-बाने की मज़बूती,मूल्यों और नैतिकता का विकास,संयम आध्यात्मिकता,संचार साधनों का सकारात्मक योगदान,स्त्रियों /पुरुषों का स्वानुशाशण सभी बात मायने रखते हैं....तस्वीर तभी बदलेगी.हाल ही में शक्तिपुंज ट्रेन से घर लौट रही थी...सवार होते ही बोगी के अंदर लड़ाई चल रही थी ...मालूम हुआ किसी लडके ने सोती हुई अनजान लड़की को छूने की कोशिश की थी...बोगी के सारे यात्री एकजुट हो गए थे और कुछ ही देर में लड़का पुलिस के गिरफ्त में था ...ऐसी बात नहीं कि जागरूकता नहीं आई है ...
ज़रुरत है स्त्री-पुरुष दोनों को ही मर्यादा की सीमा समझने की...यह समझने की कि उनकी ज़िंदगी पूर्णतः स्वतंत्र ,स्वकेंद्रित,स्वात सुखाय नहीं
है...उस ज़िंदगी की कुछ आर्थिक,नैतिक,पारिवारिक,सामाजिक,राष्ट्रीय और वैश्विक सीमाएं है जिसे लांघने का दुस्साहस उन्हें नहीं करना है .





कठोर क़ानून भी बन कर पारित हो गया..शिक्षा प्रणाली भी बदल रही है..लडके लड़कियां एक साथ गणित ,भौतिक विज्ञान,जीवविज्ञानपढ़ रहे हैं उन्हें यौन शिक्षा भी क्यों ना दी जाए...सही गलत स्पर्श क्या है...समय पूर्व यौन सम्बन्ध बनाने के शारीरिक दुष्परिणाम क्या हैं...समाज विशेष में ऐसे सम्बन्धों के लिए क्या-क्या प्रतिमान निर्धारित हैं..वगैरह वगैरह.सबसे मुख्य बात कि स्त्री-पुरुष विद्यालय,कार्यालय,परिवार में एक दूसरे के लिए खतरा नहीं बल्कि पूरक बन कर रहे.. ..दाएं और बाएं पैरों की तरह ...जिस प्रकार शरीर की सही गति के लिए दोनों पैरों का संतुलन और पूरकता अनिवार्य है ..दायां पैर आहत हो तो बायां पैर उसका पूरक बन गति को कायम रखता है....और बायां पैर जब भी मुश्किल महसूस करे दायां पैर उसका पूरक बन गति की अवरूद्धता से शरीर को उबार लेता है.वैसे ही समाज की गति के लिए स्त्री-पुरुष के आपसी रिश्तों का संतुलन और एक की अशक्तता में दूसरे के सहयोग की ज़रुरत है."मैं तुम्हारा ख्याल रखता हूँ;तुम मेरा ख्याल रखती हो."
यही वर्त्तमान संक्रमणकालीन युग का तकाज़ा है.



जब एक पुरुष
पहचानने लगता है स्त्री को
उसके रूप,सौंदर्य की लावण्यता से नहीं
बल्कि...
उसकी दक्षा,मेधा,प्रतिभा
बुद्धि,बोध की विलक्षणता
और उसके आत्मविश्वास से

देता है हौसला यह कहकर ....
छू लेना ऊंचे आकाश को
यह पहचान....यह हौसला
स्त्री के हर रूप
माँ,बहन,बेटी,पत्नी के
कन्धों पर
दो मज़बूत पंख बन उभर आता है
पहुँच जाती हैं वे शिखर पर
जहां से ...आकाश
बेहद करीब लगने लगता है
और सच कहूं !!!!!!!!!!
तब
उस पुरुष के व्यक्तित्व की ऊंचाई
हो जाती है .....स्त्री के लिए

आकाश से भी ऊंची .





एक नए विश्वास ; एक नई किरण के साथ............................

यमुना पाठक