मानव जाति के विकास क्रम का गहनता से निरीक्षण करने पर एक बात स्पष्ट हो
जाती है कि समुदाय का उदय वर्ग,धर्मं,जातिसमूह,भाषाई,सांस्कृतिक जमायतों
राष्ट्रों प्रांतों जैसे कई सामाजिक,राजनीतिक ,सांस्कृतिक धार्मिक बोध का
एक प्रतिबिम्ब ही होता है.इसमें तब तक कोई बुराई नहीं जब तक कि प्रतिबिम्ब
को दर्शाने वाला आईना धूमिल ना हो,अगर सामाजिक,राजनितिक,सांस्कृतिक
धार्मिक बोध का आईना साफ़ और चमकदार है तो समाज समुदाय की संकीर्णता और
साम्प्रदायिकता के धूल से धूसरित और वीभस्त कभी ना होने पाएंगे.
साम्प्रदायिकता को सबसे ज्यादा संवेदनशील धर्मं के आधार पर किया जाता है...जब कि धर्मं के आधारभूत सिद्धांतों का साम्प्रदायिकता से कोई वास्ता ही नहीं होता..पर जब सामाजिक और राजनितिक आधार धर्मं के आड़ में अपने निहित स्वार्थ और प्रभाव को बचाने कि कोशिश में लग जाते हैं तब हिंसा कि आग भड़क उठती है.यह मान बैठना कि विभिन्न धर्म के अनुयायियों या समुदायों के सांसारिक हित (सामाजिक,सांस्कृतिक,आर्थिक,राजनितिक)अन्य किसी भी धर्मं के अनुयायियों के सांसारिक हित से भिन्न हैं...तथा परस्पर एक दूसरे के विरोधी हैं...यही भाव धर्मं की संरचना और प्रभाव की व्यापकता से विमुख और धर्मं आधारित सम्प्रदाय की संकीर्णता के प्रति झुकाव में बदल जाता है.लोग यह भूल जाते हैं कि अलग-अलग धर्म एक ही वृक्ष की अलग-अलग शाखाएं हैं..जो एक ही जड़ से पोषित होती हैं और वह है इंसानियत..मानवता की जड़ जो कई महीन शाखाओं जैसे दया,करुणा,प्रेम,सेवा,सदभाव इत्यादि में बंटी ....जमीन के भीतर गहराई से समाई ...पूरे वृक्ष को पोषित करती है.इंसानियत की ये जड़ें जितनी गहराई में समाएगी उतना ही वृक्ष की शाखाओं को भी विस्तार मिल पायेगा...पर अमूमन ऐसा नहीं हो पाता जड़ें गहरी हो कर वृक्ष को थाम लेती हैं पर घृणा,द्वेष,वैमनस्य के टकराव की आंधी शाखाओं को आपस में ही टकरा देती हैं ...और दुःख इस बात का कि कमजोर शाखाएं ही मजबूत शाखाओं से टकराने का दुस्साहस कर बैठती हैं ....और टूट जाती हैं.कुछ लोगों की विद्वेष पूर्ण भावना ,मतभेदों का इस्तेमाल उन सामाजिक आकांक्षाओं संघर्षों इत्यादि को विकृत रूप में उजागर करने के लिए कर लिया जाता है जिसका धर्म के वास्तविक स्वरुप से दूर=दूर तक कोई नाता नहीं होता.जैसा कि सी.जी.शाह कहते हैं,"साम्प्रदायिक प्रचार के प्रभाव में आकर लोग अपने शोषण ,अत्याचार और पीड़ा के वास्तविक स्त्रोत को पहचानने में असमर्थ हो जाते हैं और उनमें एक छद्म साम्प्रदायिक कारण की कल्पना कर लेते हैं."
एक कविता की दो पंक्तियाँ याद आती हैं...
विश्व मानव के ह्रदय में मूल हो सकता नहीं द्रोहाग्नि का
चाहता लड़ना नहीं समुदाय है,फैलती लपटें विषैले व्यक्तियों के श्वास से .
आधुनिक भारत में साम्प्रदायिकता के विकास के लिए ब्रिटिश शाशन की'फूट डालो शाशन करो'की नीति ख़ास तौर पर जिम्मेदार है.उन्होंने हिन्दू,मुसलमान ,सिखों को लगातार ऐसे अलग-अलग समुदायों का दर्ज़ा दिया जिसकी सामाजिक,राजनीतिक पहचान में कुछ भी साझा नहीं था स्कूल कॉलेज में भारतीय इतिहास बुनियादी रूप से साम्प्रदायिक दृष्टि से पढ़ाया जा रहा था . हालांकि यह भी सही है कि देश में मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के कारण ही उन्हें भी सफलता मिल पाई.अगर हम ऐसी किसी भी आंधी ,को रोकना चाहते हैं तो चीज़ों को सही देखने और समझने वालों की एक जमात तैयार करनी होगी जो ना हिन्दू हों ,ना मुसलमान ना सिख, ईसाई ,पारसी...वे सभी मनुष्यों के लिए हों...ऐसे मनुष्य जो साम्प्रदायिकता के संक्रमण से रूग्ण हैं उन्हें ये ज़मात.. राहत और शान्ति दे सके . कोई ऐसा धर्मं जो प्राचीन इतिहास के सम्राट अशोक महान के' धम्म' की ,मध्यकालीन इतिहास के शहंशाह अकबर के 'दीन-ए-इलाही' की और आधुनिक काल के सही अर्थों में 'धर्मनिरपेक्षता 'का जीती जागती मिसाल बने..सही शांत चित्त के लिए हवा,भूमि और व्यवस्था दे सके .
धर्मं बेहद व्यापक शब्द है जिसमें सम्प्रदाय की आंधी की कोई गुंजाईश ही नहीं हो सकती.धर्म एक आध्यात्मिक रूपांतरण है ...अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला जागरण है.राधाकृष्णन जी के अनुसार ,"जिन सिद्धांतों के अनुसार हम अपना दैनिक जीवन व्यतीत करते हैं तथा जिनके द्वारा हमारे सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना होती है वे सब धर्म है,धर्म जीवन का सत्य है और हमारे प्रकृति को निर्धारित करने वाली शक्ति है......धर्मों में विशाल रूप से अनेकता मालूम होती है.इसका कारण यह है कि हम अपने धर्मों के आधारभूत सत्य को नहीं जानते हैं.सभी धर्मों में एक समान तत्त्व,एक समान आधार है जिस पर वह अपना विश्वास तथा क्रिया कलाप आधारित करता है परन्तु वह इमारत जो इस आधार पर बनाई जाती है,प्रत्येक व्यक्ति के साथ भिन्न हो जाती है......धर्म का यह कर्त्तव्य है कि वह हमारे जीवन के प्रति सहज निष्ठा तथा मानवीय प्रकृति की एकता के प्रति विश्वास उत्पन्न कर दे."Jorge के अनुसार
"Basically religion is concerned with two fundamental ideas or experiences-first ,man's relationship to GOD ,& second his relationship to the universe about him including his fellowman. "
पंडित नेहरू के अनुसार,"हिंदुस्तान में धर्म एक व्यापक शब्द है जिसकी( धर्मं) की व्युत्पति 'धृ' धातु से हुई है जिसका अर्थ है धारण करना...एक साथ पकड़ना यह किसी वस्तु की भीतरी आकृति,उसके आतंरिक जीवन के विधान के अर्थ में आता है.इसके अंदर नैतिक विधान,सदाचार,व्यक्ति की सारी जिम्मेदारियां तथा कर्त्तव्य आ जाते हैं."
धर्म के दो रूप होते हैं..एक निष्ठाओं की वह पद्धति जिसके अनुसार व्यक्तिगत जीवन संचालित होता है .दूसरा धर्म पर आधारित सामाजिक पहचान.
धर्मं में प्रयुक्त सभी क्रिया कलाप एक विशेष मक़सद से हैं जो हमें रूपांतरित करते हैं...प्रार्थना प्रकृति के साथ एक होने की कृतज्ञ भावना है,कीर्तन असीम शक्ति के प्रति अपने आनंद और अहोभाग्य को निवेदित करना है...एक उत्सव है भक्ति भाव से भरे हृदय का,मंत्र मन को संयम और एकाग्रता की तरफ ले जाने वाला साधन है,यह उस सार्वभौमिक धर्मं के लिए आवश्यक है जो मानवता में यकीन ,चित्त की शुद्धिकरण और शांत जीवन की आकांक्षा रखते हैं.
उग्रवादी साम्प्रदायिकता का जन्म घृणा,भय तथा अतार्किकता की राजनीति की उपज होता है..इसे रोकने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि व्यक्तिगत ,सामाजिक,राष्ट्रीय व्यवहारों में धर्म के सार तत्त्व को ग्रहण किया जाए .मनु स्मृति के अनुसार....
धृतिः क्षमा दमोसतेय शौचमिन्द्रय निग्रहः
धी विद्या सत्यम क्रोधो दशक धर्म लक्षणम
धैर्य,क्षमा,शान्ति,लोभ न करना,शुद्धता,इन्द्रिय निग्रह,बुद्धि ,विद्या, सत्य तथा अक्रोध धर्म के १० लक्षण हैं.धर्म को किसी भी शर्त में संकीर्ण स्वार्थों के रूप में स्थान ना दिया जाए.प्रत्येक शरीर में निर्बाध बहने वाला लाल रक्त मनुष्यता का हो किसी हिन्दू के भगवा,किसी मुसलमान के हरे या अन्य किसी भी धर्म की संकीर्ण पहचान का द्योतक ना हो .
सच कहा है एक शायर ने ...
इबादत है दुखियों की इमदाद करना
जो नाशाद हों उनका दिल शाद करना
खुदा की नमाज़ और इबादत यही है
जो बर्बाद हों उन्हें आबाद करना.
लेखक hoffing के अनुसार "the essence of religion is faith in the conservation of VALUES.
साम्प्रदायिकता को सबसे ज्यादा संवेदनशील धर्मं के आधार पर किया जाता है...जब कि धर्मं के आधारभूत सिद्धांतों का साम्प्रदायिकता से कोई वास्ता ही नहीं होता..पर जब सामाजिक और राजनितिक आधार धर्मं के आड़ में अपने निहित स्वार्थ और प्रभाव को बचाने कि कोशिश में लग जाते हैं तब हिंसा कि आग भड़क उठती है.यह मान बैठना कि विभिन्न धर्म के अनुयायियों या समुदायों के सांसारिक हित (सामाजिक,सांस्कृतिक,आर्थिक,राजनितिक)अन्य किसी भी धर्मं के अनुयायियों के सांसारिक हित से भिन्न हैं...तथा परस्पर एक दूसरे के विरोधी हैं...यही भाव धर्मं की संरचना और प्रभाव की व्यापकता से विमुख और धर्मं आधारित सम्प्रदाय की संकीर्णता के प्रति झुकाव में बदल जाता है.लोग यह भूल जाते हैं कि अलग-अलग धर्म एक ही वृक्ष की अलग-अलग शाखाएं हैं..जो एक ही जड़ से पोषित होती हैं और वह है इंसानियत..मानवता की जड़ जो कई महीन शाखाओं जैसे दया,करुणा,प्रेम,सेवा,सदभाव इत्यादि में बंटी ....जमीन के भीतर गहराई से समाई ...पूरे वृक्ष को पोषित करती है.इंसानियत की ये जड़ें जितनी गहराई में समाएगी उतना ही वृक्ष की शाखाओं को भी विस्तार मिल पायेगा...पर अमूमन ऐसा नहीं हो पाता जड़ें गहरी हो कर वृक्ष को थाम लेती हैं पर घृणा,द्वेष,वैमनस्य के टकराव की आंधी शाखाओं को आपस में ही टकरा देती हैं ...और दुःख इस बात का कि कमजोर शाखाएं ही मजबूत शाखाओं से टकराने का दुस्साहस कर बैठती हैं ....और टूट जाती हैं.कुछ लोगों की विद्वेष पूर्ण भावना ,मतभेदों का इस्तेमाल उन सामाजिक आकांक्षाओं संघर्षों इत्यादि को विकृत रूप में उजागर करने के लिए कर लिया जाता है जिसका धर्म के वास्तविक स्वरुप से दूर=दूर तक कोई नाता नहीं होता.जैसा कि सी.जी.शाह कहते हैं,"साम्प्रदायिक प्रचार के प्रभाव में आकर लोग अपने शोषण ,अत्याचार और पीड़ा के वास्तविक स्त्रोत को पहचानने में असमर्थ हो जाते हैं और उनमें एक छद्म साम्प्रदायिक कारण की कल्पना कर लेते हैं."
एक कविता की दो पंक्तियाँ याद आती हैं...
विश्व मानव के ह्रदय में मूल हो सकता नहीं द्रोहाग्नि का
चाहता लड़ना नहीं समुदाय है,फैलती लपटें विषैले व्यक्तियों के श्वास से .
आधुनिक भारत में साम्प्रदायिकता के विकास के लिए ब्रिटिश शाशन की'फूट डालो शाशन करो'की नीति ख़ास तौर पर जिम्मेदार है.उन्होंने हिन्दू,मुसलमान ,सिखों को लगातार ऐसे अलग-अलग समुदायों का दर्ज़ा दिया जिसकी सामाजिक,राजनीतिक पहचान में कुछ भी साझा नहीं था स्कूल कॉलेज में भारतीय इतिहास बुनियादी रूप से साम्प्रदायिक दृष्टि से पढ़ाया जा रहा था . हालांकि यह भी सही है कि देश में मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के कारण ही उन्हें भी सफलता मिल पाई.अगर हम ऐसी किसी भी आंधी ,को रोकना चाहते हैं तो चीज़ों को सही देखने और समझने वालों की एक जमात तैयार करनी होगी जो ना हिन्दू हों ,ना मुसलमान ना सिख, ईसाई ,पारसी...वे सभी मनुष्यों के लिए हों...ऐसे मनुष्य जो साम्प्रदायिकता के संक्रमण से रूग्ण हैं उन्हें ये ज़मात.. राहत और शान्ति दे सके . कोई ऐसा धर्मं जो प्राचीन इतिहास के सम्राट अशोक महान के' धम्म' की ,मध्यकालीन इतिहास के शहंशाह अकबर के 'दीन-ए-इलाही' की और आधुनिक काल के सही अर्थों में 'धर्मनिरपेक्षता 'का जीती जागती मिसाल बने..सही शांत चित्त के लिए हवा,भूमि और व्यवस्था दे सके .
धर्मं बेहद व्यापक शब्द है जिसमें सम्प्रदाय की आंधी की कोई गुंजाईश ही नहीं हो सकती.धर्म एक आध्यात्मिक रूपांतरण है ...अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला जागरण है.राधाकृष्णन जी के अनुसार ,"जिन सिद्धांतों के अनुसार हम अपना दैनिक जीवन व्यतीत करते हैं तथा जिनके द्वारा हमारे सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना होती है वे सब धर्म है,धर्म जीवन का सत्य है और हमारे प्रकृति को निर्धारित करने वाली शक्ति है......धर्मों में विशाल रूप से अनेकता मालूम होती है.इसका कारण यह है कि हम अपने धर्मों के आधारभूत सत्य को नहीं जानते हैं.सभी धर्मों में एक समान तत्त्व,एक समान आधार है जिस पर वह अपना विश्वास तथा क्रिया कलाप आधारित करता है परन्तु वह इमारत जो इस आधार पर बनाई जाती है,प्रत्येक व्यक्ति के साथ भिन्न हो जाती है......धर्म का यह कर्त्तव्य है कि वह हमारे जीवन के प्रति सहज निष्ठा तथा मानवीय प्रकृति की एकता के प्रति विश्वास उत्पन्न कर दे."Jorge के अनुसार
"Basically religion is concerned with two fundamental ideas or experiences-first ,man's relationship to GOD ,& second his relationship to the universe about him including his fellowman. "
पंडित नेहरू के अनुसार,"हिंदुस्तान में धर्म एक व्यापक शब्द है जिसकी( धर्मं) की व्युत्पति 'धृ' धातु से हुई है जिसका अर्थ है धारण करना...एक साथ पकड़ना यह किसी वस्तु की भीतरी आकृति,उसके आतंरिक जीवन के विधान के अर्थ में आता है.इसके अंदर नैतिक विधान,सदाचार,व्यक्ति की सारी जिम्मेदारियां तथा कर्त्तव्य आ जाते हैं."
धर्म के दो रूप होते हैं..एक निष्ठाओं की वह पद्धति जिसके अनुसार व्यक्तिगत जीवन संचालित होता है .दूसरा धर्म पर आधारित सामाजिक पहचान.
धर्मं में प्रयुक्त सभी क्रिया कलाप एक विशेष मक़सद से हैं जो हमें रूपांतरित करते हैं...प्रार्थना प्रकृति के साथ एक होने की कृतज्ञ भावना है,कीर्तन असीम शक्ति के प्रति अपने आनंद और अहोभाग्य को निवेदित करना है...एक उत्सव है भक्ति भाव से भरे हृदय का,मंत्र मन को संयम और एकाग्रता की तरफ ले जाने वाला साधन है,यह उस सार्वभौमिक धर्मं के लिए आवश्यक है जो मानवता में यकीन ,चित्त की शुद्धिकरण और शांत जीवन की आकांक्षा रखते हैं.
उग्रवादी साम्प्रदायिकता का जन्म घृणा,भय तथा अतार्किकता की राजनीति की उपज होता है..इसे रोकने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि व्यक्तिगत ,सामाजिक,राष्ट्रीय व्यवहारों में धर्म के सार तत्त्व को ग्रहण किया जाए .मनु स्मृति के अनुसार....
धृतिः क्षमा दमोसतेय शौचमिन्द्रय निग्रहः
धी विद्या सत्यम क्रोधो दशक धर्म लक्षणम
धैर्य,क्षमा,शान्ति,लोभ न करना,शुद्धता,इन्द्रिय निग्रह,बुद्धि ,विद्या, सत्य तथा अक्रोध धर्म के १० लक्षण हैं.धर्म को किसी भी शर्त में संकीर्ण स्वार्थों के रूप में स्थान ना दिया जाए.प्रत्येक शरीर में निर्बाध बहने वाला लाल रक्त मनुष्यता का हो किसी हिन्दू के भगवा,किसी मुसलमान के हरे या अन्य किसी भी धर्म की संकीर्ण पहचान का द्योतक ना हो .
सच कहा है एक शायर ने ...
इबादत है दुखियों की इमदाद करना
जो नाशाद हों उनका दिल शाद करना
खुदा की नमाज़ और इबादत यही है
जो बर्बाद हों उन्हें आबाद करना.
लेखक hoffing के अनुसार "the essence of religion is faith in the conservation of VALUES.