Friday, October 12, 2012

श्रधांजलि

एक दोपहर जब एक बड़ी कंपनी के कर्मचारी लंच टाइम से वापस लौटे ,तो उन्हें एक मेल मिला ."उसमें लिखा था कि कल उनका एक साथी गुज़र गया जो उनकी तरक्की में बाधक था .श्रधांजलि सभा मीटिंग हॉल में रखी गई है."
पहले तो लोगों को जानकार दुःख हुआ उनका साथी नहीं रहा फिर वो उत्सुकता से सोचने लगे आखिर कौन था वह जो हम सब की तरक्की में बाधा बन रहा था.चलो अब वह नहीं रहा.जैसा कि अक्सर होता है लोग किसी के गुज़र जाने के बाद उसकी बुराइयां भी भूल जाते हैं ,इसलिए सब उसके जाने का अफ़सोस करने लगे.
हॉल में दरी बिछी थी और दीवार से पहले पर्दा लगा था.वहां एक सूचना लगी ,"गुज़रने वाले की तस्वीर परदे के पीछे दीवार पर लगी है.एक-एक कर आप जाएं उसे श्रधान्जली दें और फिर निश्चिंत होकर तरक्की की राह पर कदम बाधाएं क्योंकि अब तरक्की का वह बाधक नहीं रहा.सभी कर्मचारी तो बिलकुल हैरान थे.
वे एक-एक कर परदे के पीछे जाते और जब वे दीवार पर लगी तस्वीर देखते तो अवाक् रह जाते.उनके मुंह से बोल ही न निकलते .
दरअसल दीवार की जगह पर एक दर्पण(mirror )लगा था,जिसके नीचे लिखा था:"दुनिया में केवल एक ही व्यक्ति है जो आपकी तरक्की को रोक सकता है,आपको सीमाओं में बाँध सकता है और वह आप खुद हैं."
हॉल के बाहर बॉस कर्मचारियों का स्वागत कर कह रहा था,"अपने नकारात्मक पहलू (negative aspect) को श्रधांजलि दे चुके मेरे नए साथियों आपका स्वागत है."

Thursday, October 11, 2012

Oh ! this sloppy crawl ......

एक पर्ची ,उस पर अंग्रेज़ी के अक्षरों में लिखे कुछ शब्द जिसे पढ़ पाना सागर मंथन के सदृश,पढ़ कर समझने में सफल तो अमृत पा  लिया और दुर्भाग्यवश न पढ़ पाए तो ये शब्द विष बन जाएंगे .....

हाँ ,यही तो होती है "Tragedy of doctor's prescription "

आज कंप्यूटर के तेजी से बढ़ते प्रचलन से अगले कुछ दशकों में कागज़-कलम संग्रहालय में रखी जाने वाले वस्तुओं की सूची में नाम दर्ज कराने की कतार में खड़े होने को तैयार हैं.तकनीक क्षेत्र में तीव्रता से बदलते परिवेश में विद्यालयों में प्रयुक्त शिक्षा के ये अहम् साधन कब ऐतिहासिक पृष्ठों की शोभा बन जाएं ,कुछ कहा नहीं जा सकता.
प्रिय पाठकों
,आप सभी को हिन्दी की क्लास में सुलेख और इंग्लिश की क्लास में handwriting के होम वर्क याद होंगे ,जो ना चाहते हुए भी हमें प्रतिदिन एक-एक पेज लिखने ही होते थे.नौकरी प्राप्त करने के लिए भेजे जाने वाले दरखास्त (application )  भी कभी-कभी स्वयं की handwriting में ही भेजने की शर्त होती थी.इसका उद्देश्य उम्मीदवार के व्यक्तित्व की पहचान करना होता था और लिखावट विशेषज्ञ (handwriting analyst ) इस बात को बखूबी अंजाम भी देते थे.मुझे याद है मेरे छोटे भाई की लिखावट सुन्दर न होने की वज़ह से वे मुझसे ही application लिखवाते थे.पर एक बार उनसे यही कहा गया,"यह लिखावट आपकी नहीं है"उन्होंने यह बात स्वीकार की पर जानकारी के लिए पूछा "आप इतने विश्वास पूर्वक यह बात कैसे कह रहे हैं?"तब उन analyst  ने कहा'" आप जिस जॉब के लिए आये हैं उस क्षेत्र में कलात्मक लिखावट के प्रति रुझान बहुत कम देखने को मिलता है.ऐसी लिखावट के व्यक्ति शिक्षा,कला या साहित्य से जुड़े लोग ही हो सकते हैं."
शिक्षण व्यवसाय से जुड़े लोगों के लिए लिखावट की स्पष्टता एक अपेक्षणीय शर्त होती है.एक और महत्वपूर्ण व्यवसाय जो इस शर्त की अनिवार्यता से जुडा होना चाहिए वह स्वास्थ्य के साथ-साथ जीवन-मृत्यु से सम्बंधित चिकित्सा का क्षेत् है.पर आम तौर पर देखा जाता है कि स्कूली शिक्षा में प्रतिदिन सुलेख का गृह कार्य करने वाले विद्यार्थियों में से वे कुछ लोग जो आगे उच्च शिक्षा के बाद डॉक्टर बनते हैं वे जाने कितनी जल्दबाजी में होते हैं कि prescription में ऐसी  handwriting लिखते हैं मानो कोई चींटी स्याही भरी दवात से बाहर आकर कागज़ पर रेंग गई हो (sloppy crawls)और tragedy यह कि इस लिखावट को डॉक्टर भले ही समझ रहा हो पर जिसके लिए लिखा जा रहा है उसे या फिर कैमिस्ट को समझ में आ जाए इसकी कोई निश्चितता (certainity)नहीं होती है.शायद इसलिए एक लोक प्रचलित उपमा भी लोग देते हैं "his/her  handwriting is as illegible as doctor's prescription."विशेष रूप से गाँव ,कस्बों और छोटे शहरों के कुछ chemist drug prescription नहीं पढ़ पाते.
इसका कारण क्या है-असावधानी,जल्दबाजी या असंवेदनशीलता ? जाहिर सी बात इतने आदर्श पेशे से जुड़े  लोग वाकई अपने मरीज के प्रति पूर्णतः संवेदनशील होते हैं.उन्हें स्वस्थ देखने और उनकी स्वास्थ्य संबंधी परेशानी को सुन कर मृदु स्वभाव और मधुर वाणी का भी परिचय देते हैं और उनके(मरीज) लिए कल्याणकारी (शिवम्)भी साबित होते हैं.जो मरीज को पूर्ण सत्यता से अपनी स्वास्थ्य संबंधी बात कहने का विश्वास देता है. जब
सत्यम,शिवम् तक बात आ जाती है तो उसे सुन्दरम भी बनाने की कोशिश करना अत्यावश्यक है.पर्ची(prescription )में सुन्दर,स्पष्ट अक्षरों में लिखे दवा के नाम मरीज को अप्रत्यक्षतः सन्देश देंगे कि उसका डॉक्टर जल्दी में नहीं है और उसका धैर्यपूर्वक पूरा ध्यान रख रहा है .बस यही तो है एक चिकित्सक की सत्यम से शिवम् और फिर सुन्दरम तक की संछिप्त पर बेहद आवश्यक यात्रा जो उसके इस पेशे को बहुत ही महान बनाती है.तभी तो मरीज अपने डॉक्टर को भगवान मानता है.

मेरे एक पहचान की महिला के साथ एक वाक्या हुआ.उनके चेहरे पर rashes हो गए थे.उन्होंने अपने फॅमिली डॉक्टर से consult किया .दवा दूकान से उन्हें  वही दवा नहीं दी गई जो डॉक्टर ने लिखी थी या यूँ कहिये उन्हें गलत दवा मिल गई पर कुछ महिलाओं में इतना धैर्य कहाँ होता है कि कवर पर लिखे नाम से दवा का मिलान भी कर लें और वह भी चेहरे का मामला हो तो फिर तो बस और भी जल्दबाजी हो जाती है.....अक्सर ऐसा होता है कि एक तो लापरवाही और दूसरे डॉक्टर के handwriting की वज़ह से लोग दवा के कवर पर लिखे नाम को पर्ची परprescription लिखे उस नाम से मिलाने की ज़हमत नहीं उठाते .
खैर ,वह दवा रात सोने के पहले लगानी थी.अतः वे दवा लगा कर सो गई.मध्य रात्रि में चेहरे पर जलन से वे अर्ध निद्रा में ही उठीं और चेहरे से दवा धोया पर सवेरे वे rashes और भी फ़ैल गए थे और कुछ दिनों बाद उनके चेहरे की गोरी रंगत स्याह हो गई.वे कुछ ना कर सकीं. शिकायत भी क्या करती ?? फॅमिली डॉक्टर होने का लाभ उन साक्षर शिक्षित डॉक्टर को मिला.पर आज जब भी मैं उन दीदी से मिलती हूँ तो यही ख्याल आता है "काश!वे डॉक्टर निरक्षर शिक्षित डॉक्टर होतीं !दीदी भी सावधान होती तो उनके चेहरे की वह चमकती रंगत यूँ परिवर्तित हो कर विकृत न होती.
'दैनिक जागरण' अखबार १२ सितम्बर २०१२ को जब मैंने यह समाचार पढ़ा कि महाराष्ट्र राज्य के senior doctors  ने लिखावट सुधारने की मुहिम चलाई है तो बहुत प्रसन्नता हुई.मेडस्केप इंडिया नाम से ट्रस्ट बनाया गया है ताकि कैपिटल letters में स्पष्ट लिखावट के प्रति जागरूकता फैलाई जाए और इसके ज़रिये दवा संबंधी गड़बड़ियों और मेडिकल practitioner को (illegible scribbles)कानूनी झंझट से बचाया जा सके.महाराष्ट्र सरकार में स्वास्थ्य मंत्री सुरेश शेट्टी जी ने कहा,"महाराष्ट्र मेडिकल कौंसिल अगर जन हित में कोई अभियान चलाती है तो सरकार उसे पूरा समर्थन देगी."
मेडस्केप इंडिया doctors के लिए इस दिशा में (HANDWRITING LEGIBILITY) कार्यशालाएं आयोजित करने जा रहा है.जिसके अंतर्गत 'drug prescription  लिखते वक्त doctors capital letters  के साथ correct spellings  पर भी ध्यान रखें. अगर small letters  प्रयुक्त किये जाएं तो उनका झुकाव(slant ) लगभग 15-20  डिग्री से अधिक न हो.इसमें भी विशेष रूप से O,E और T की स्पष्टता(clearity ) पर ज्यादा ध्यान दिया जाये.doctors  अपने contact  number  पर्ची में अवश्य दें ताकि किसी भी असहुलियत में उनसे संपर्क किया जा सके.'
Maharashtra Medical Council,Dental Council,Neurologists Association ,Gynaecologists Association ,Homoepathy Council,Ayurvedic Council,Federation Obsteric And Gynaecological Society Of India(FOGSI) जैसी 24 संस्थाओं से यह आग्रह किया गया है कि वे इस दिशा में पहल करें.एक सर्वेक्षण के अनुसार USA में इस असावधानी की वज़ह से करीब 7000 मौत प्रत्येक वर्ष होती है. भारत देश में ऐसे आंकड़े उपलब्ध ही नहीं हो पाते .कारण स्पष्ट है कुछ तो इस ब्लॉग में लिखी घटना सरीखी स्थितियां होती हैं और कुछ देश के लम्बी कानूनी कार्यवाही का भय.स्पष्ट सबूत (दवा की पर्ची ,chemist की रसीद ,दवा के पैकेट इत्यादि) होते हुए भी लोग शिकायत दर्ज नहीं कराते.
Medscape India  की ग्रुप प्रेसिडेंट डॉक्टर सुनीता दुबे का कहना है "Due to lack of clarity in doctor's written prescriptions,the number of deaths caused in India and internationally are on a shocking rise..........an incorrect drug is administered to the patient which a lot of time proves fatal or nearly fatal."
इस छोटे पर अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू पर जितना जल्दी कार्यान्वन हो उतना ही अच्छा है.फिर लिखावट की असावधानी के फलस्वरूप होने वाली असामयिक मौत या दुर्घटना भी नहीं होगी,ना ही दीदी के साथ हुई लापरवाही की वज़ह से कोई मेरी तरह पूर्वाग्रही हो कर यह सोचेगा,काश!वे doctor निरक्षर शिक्षित पेशेवर होती .. साथ ही लोक प्रचलित उपमा (as  illegible as doctor's prescripion )भी लोगों की जुबां पर कभी नहीं होगा.
विश्व स्तर पर सभी doctors से हमारी अपील है कि वे इस दिशा में अवश्य सोचें और कितनी भी जल्दी हो पर prescription पर दवा का नाम स्पष्ट handwriting में ही लिखें.आपकी यह सावधानी और संवेदनशीलता कई लोगों को सही दिशा दे कर मुसीबत से बचा सकेगी.
धन्यवाद.
(ब्लॉग में लिखित कथन"काश!वे निरक्षर शिक्षित पेशेवर होती " सिर्फ एक विशेष डॉक्टर के लिए उठे उदगार हैं जिनका सम्बन्ध इस ब्लॉग की व्यक्तिगत घटना से है.कृपया इसे अन्यथा न लिया जाए.मैं इस पेशे से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति की अमूल्य सेवा का सदा सम्मान करती हूँ.)

(चित्र और जानकारी नेट से साभार)

Sunday, October 7, 2012

सफ़ेद अंडे ढोते 'काले चींटे'

face बुक पर लोग इन करते ही एक पोस्ट दिखाई दिया अति सर्वत्र वर्जयेत. तीन अमूल्य शब्द पुरातन,चिरकालिक पर वर्त्तमान परिदृश्य में पूर्णतः अस्वीकार्य.....आप सब मेरे इस कथन से असहमत हैं तो एक पल के लिए टी.वी on करिए और सुनिए लोग बोल रहे हैं ,कितना,क्या,कहाँ,किससे और क्यों स्वयं उन्हें ही नहीं पता है.नेतागण कुछ भी बयान दे रहे हैं.....राज ठाकरे जी बिहार राज्य के बाशिंदों को (infiltrators in mumbai )कह कर महाराष्ट्र से भगाने की धमकी देते हैं.माँ,माटी,मानुष(3M) के आधार को सर्वस्व मानने वाली ममता जी UPA सरकार को money,muscles, mafia (3M) के आधार पर चलने की टिप्पणी करती हैं.हालांकि इसी दल को इनका समर्थन भी मिला हुआ था.गुजरात परिवर्तन पार्टी के मुखिया केशुभाई पटेल जी नरेन्द्र मोदी जी को निर्मल बाबा की उपाधि देते हैं और कहते हैं कि उनके चारों तरफ 420  हैं और वे खुद 840  हैं,उन्हें झूठ बोलने और जनता को मूर्ख बनाने की आदत पड़ गयी है.मूर्ख बनाने की प्रतियोगिता हो तो मोदी चैम्पियन होंगे." दिग्विजय जी ने मोदी जी के लिए बयान दे दिया,"there are no similarities between swami vivekanand and modee and it would have been better had his yatra been calles hitler yatra " मोदी जी ने सोनिया जी के द्वारा अपव्यय के कुछ साक्ष्य जुटा कर प्रचार करना शुरू कर दिया अर्थात हर जगह अति--------- बयानबाजी की अति ,सुविचारों की,कुविचारों की,अभाव की,प्रचुरता की,भ्रष्टाचार की,अपराध की,समाज का अति पतन और मेरे इस ब्लॉग में भी अति की अतिव्यन्जना.
माननीय प्रधानमंत्रीजी पहले इतने खामोश रहे कि उनकी खामोशी उन्हें  हज़ार ज़वाब से  भली लगी और फिर जब मुख खोला  तो इतना कहा (पैसे पेड़ पर नहीं उगते)कि यह अति वर्त्तमान सरकार के अस्तित्व पर ही भारी पड़ने लगा.वे भूल गए ............
अति का भला न बोलना,अति की भली ना चुप
अति का भला न बरसना,अति की भली न धूप

अपने कार्यकाल के मुहाने से कुछ ही कदम पीछे खड़ी सरकार ने आर्थिक सुधारों के नाम पर जो अति वृष्टि की है उसने मुझे बचपन की पढी एक लघु कथा याद दिला दी, जिसमें कौवे के मुख से रोटी गिराने के लिए चालाक लोमड़ी हर दांव-पेंच खेलती है और अंत में उसकी तारीफ़ कर कहती है '"तुम गाना बहुत अच्छा गाते हो."कौवा अति उत्साही होकर गाने के लिए मुख खोलता है और रोटी नीचे गिर जाती है,लोमड़ी का मकसद पूरा हो गया.हाँ,देश की राजनीतिक घटना क्रम में थोडा विपरीत हुआ .देश की आम जनता,विपक्ष,विदेशी अखबारों ने मनमोहन जी को ऐसे-ऐसे विशेषणों से नवाज़ना शुरू किया कि वे अपनी छवि के प्रति अति प्रतिरक्षात्मक हो गए .हालांकि वे इस बात से पूर्णतः वाकिफ हैं कि इन सुधारों के तात्कालिक प्रभाव नहीं दिखेंगे पर यह लालसा भी है कि 2014  की शुरुआत में इन्ही सुधारों के कुछ शुरुआती धुंधले रंग जनता को दिखाई देने लग जाएंगे वह और सकारात्मक प्रभाव के लिए आशान्वित हो जाएगी और पिछली सारी पीड़ा को भूल कर पुनः इसी दल को सत्ता में लाने के लिए कमर कस लेगी .अगर ऐसा हुआ तो तीसरे मोर्चे की संभावना एक मृगमरीचिका ही साबित होगी.यहाँ मैं आपको अपने सफ़ेद अण्डों को ढो कर ले जाते कतारबद्ध काले-काले चींटों का दृश्य याद दिला दूँ.अगर एक भी चींटा गुड के किसी अन्य धेले की तरफ मुड गया तो पीछे के सारे चींटे उसी का अनुसरण कर मध्य से ही कतार तोड़ देते हैं.इसलिए बहुत संभव है कि आज न नुकुर करने वाले बहुत से दल पुनः कांग्रेस के साथ गठबंधन की राजनीति करेंगे.इस समीकरण पर आम जनता सिर्फ गुनगुना कर रह जाएगी  "ना-ना करते प्यार तुम्ही से ...."
अन्ना जी का कहना है,"राजनीति में गन्दगी है."केजरीवाल के साथ रहे योगेन्द्र यादव जी कहते हैं "राजनीति आज का युगधर्म है,इससे पृथक नहीं रहा जा सकता ",आम जनता का कहना है राजनीति एक नशा है,सत्ता का मद व्यक्ति को विवेकहीन कर देता है .इसके(राजनीति) लिए विरोधाभासी गुणों का होना भी शायद ज़रूरी है जैसे एक ईमानदार चोर,एक truthful liar इस तरह की बातों को दूर करने के लिए मैं अपने ही ब्लॉग 'अजी नाम-वाम में क्या रखा है' की पंक्तियाँ दोहरा रही हूँ.
जब राजतंत्र ही नहीं तो राजनीति शब्द का प्रयोग क्यों ? जो
शब्द राज करने की दुर्भावना से ग्रसित है.शाषण व्यवस्था जनतंत्र,प्रजातंत्र,लोकतंत्र है तो जननीति,लोकनीति,प्रजानीति कहिये जो जन सेवा का सदभाव ले आये.
प्रजातंत्र की परिभाषा में भी कुछ परिवर्तन होने चाहिए.जिसके अनुसार"प्रजातंत्र आधारभूत नैतिक मूल्यों की नींव पर खड़ा जनता के लिए,जनता के द्वारा,जनता का मजबूत
शाषण है."एक नेता सर्वप्रथम जनसेवक है.उसे न केवल people based  बल्कि people +value  based  प्रजातंत्र को अपनाना होगा.तभी वह ऐसे निर्णय ले सकेगा जो समग्र के हित में हों. .
एक मूल्य परक राष्ट्र की कल्पना को मूर्त रूप देने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को परिवर्तित नहीं अपितु रूपांतरित होने की आवश्यकता है.परिवर्तन तो अस्थाई है जबकि रूपांतरण स्थाई है.जैसा स्वामी मित्रानंद कहते हैं,"If Indians transform to become physically fit,emotionally strong,intellectually refined,culturally rooted,actively patriotic and spiritually uplifted with the vision of oneness,India will be revitalised.
अगर किसी भी राजनीतिक दल ने people+value based democracy को ध्यान में रखकर अपने कार्य काल को पूरा किया है तो उन्हें सरकारी खर्च पर विज्ञापन द्वारा प्रचार की ज़रूरत ही कहाँ है?क्या कस्तूरी के महक को साबित करने के लिए मृग कसम खाता है ?अरे उसे तो स्वयं भी इस गुण का पता नहीं होता पर सारा वन उस खुशबू से सुवासित हो जाता है.अच्छे नेतृत्व,अच्छे कार्य,अच्छे कार्य मूल्य स्वयं साबित होते हैं .उन्हें प्रचार करने की ज़रूरत नहीं पड़ती.पर दुर्भाग्यवश हमारे नेता स्व हित,स्व हक में इस कदर स्वकेंद्रित हो गए कि भारत निर्माण और जनतंत्र का असली अर्थ ही ओझल होता जा रहा है.आम जनता की  तो इतनी ही फ़रियाद है
आर्थिक नीति बना लो,विदेश यात्रा भी कर लो
भले छीन लो सफ़र ऐ.सी के वसूल के सेवा कर
मगर झोली में डालो,दो जून के रोटी की सुविधा
हमारे लिए बेहतर शिक्षा और नौकरी के अवसर.

black ants स्वयं को हर हालात पर पाक-साफ़ बताने वाले ,श्वेत झकाझक खादी पहने और भ्रष्टाचार की कालिख का आरोप ढोते अपने रहनुमाओं को देख कर क्या हम बार-बार  श्वेत अंडे ढोते हुए काले चींटों को याद करें ?जब इन चींटों से इनके अण्डों को हटाने की कोशिश करो तो ये बेहद आक्रामक हो उठते हैं. विपक्षी दल सत्तासीन दल के कार्यों पर नजर रखे उचित है ,लोकतंत्र का तकाज़ा भी है कि वह सरकार को तानाशाह बनने से रोके.पर क्या पिछले 9 वर्षों से विपक्ष की भूमिका निभा रही भाजपा का साथ ही यह कर्त्तव्य नहीं कि ऐसे हालात से उबरने के लिए यथोचित रणनीति भी सुझाए ?
.भाजपा ने अपनी छवि सिर्फ विरोध के लिए विरोध करने वाले राजनीतिक दल की बना ली है .रियायती दर पर रसोई गैस की उपलब्धता सीमित करने के फैसले का विरोध करने वाले राज्य सरकार तथा विपक्षी दलों में से किसी ने भी भारत देश में सौर उर्जा की प्रचूरता को देखते हुए इसे इंधन के विकल्प के रूप में विकसित करने की दूरदर्शिता पर भी क्यों नहीं ध्यान दिया?नहीं, इस दूरगामी सोच से ज्यादा आसान है विरोधी शोर का ऐलान...और एक बात..... क्या डीजल पेट्रोल की बढ़ती कीमत के लिए एक अंश भी हम जनता ज़िम्मेदार नहीं हैं?कम दूरी को भी तय करने के लिए हम पैदल नहीं बल्कि वाहन का प्रयोग पसंद करते हैं,एक ही परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने अलग-अलग वाहन रखता है,एक ही कार्यस्थल पर जाने के लिए कार पुलिंग या सार्वजनिक वाहन को वरीयता ना देकर हम अपने-अपने निजी वाहन का प्रयोग करते हैं.क्या वर्त्तमान में गाड़ियों की संख्या नित्य बढ़ती नहीं जा रही?जन्म दिवस हो तो किशोर आयु की संतान को भी गाडी उपहार दे दो....प्रजातंत्र की प्रजा को भी देश की इस दयनीय स्थिति जिम्मेदारी कुछ अंशों में लेनी होगी.सिर्फ रैली में भीडतंत्र का हिस्सा बनने से काम नहीं चलेगा.कितने युवाओं को तो यह भी पता नहीं होता की जिस रैली का वे हिस्सा बने हैं उसका मकसद क्या है?

आरोप-प्रत्यारोप की यह त्वरित प्रवृति   एक बेसब्र पीढी को जन्म दे रही है इस फास्ट प्रतिक्रियात्मक बयानबाजी के मलबे में देश के विकास की सोच कहीं ज़मींदोज़ हो गई है.व्यक्तिगत तौर पर भावनाओं में आये उतार-चढाव को सार्वजनिक जीवन में संयमित करने में हमारे रहनुमा ही असफल हो रहे हैं तो फिर आम जनता क्या करे ? इसी समस्या से जुड़ा एक अहम् पहलू है भ्रष्टाचार जो मानो एक विशाल समंदर सा हो गया है,जिसे तैरना आता है वह बीच मझधार में अठखेलियाँ करे,जिसे गहराई में उतरने से भय लगता है वह किनारे पर खडा होकर आती-जाती लहरों से ही खेल कर संतुष्टि कर ले और जिसे तैरना भी नहीं आता,गहराई से भी डर लगता है वह तट पर खडा लहरों की उतार-चढ़ाव को ही कोसता रहे.और देश की आम जनता इन सभी वर्गों के क्रिया कलाप की साक्षी भर बनी रहे.
किसी भी दल का कोई सशक्त चेहरा नज़र नहीं आता,आम जनता मानो एक मॉल में खड़ी है जहां एक ही उत्पाद के कई ब्रांड उसे दिग्भ्रमित कर रहे हैं .उसके अपने पसंदीदा ब्रांड का तो उत्पादन ही बंद हो गया है.मजबूरन उसे इन्ही में से एक का चयन करना है ताकि बस किसी तरह काम चलता रहे.
आम जनता अपने सभी रहनुमाओं से हुंकार भर पूछती है कि उनके पास इस भ्रष्टाचार के दाग को देश के लोकतंत्र के परिवेश से साफ़ करने के लिए किस डिटर्जेंट की रणनीति है ? उसकी प्रमाणिकता क्या है ? वह रणनीति कितनी कारगर साबित होगी ? 'मेरे कपडे उसके कपडे से अधिक सफ़ेद हैं'या 'उसके कपडे मेरे कपड़ों से ज्यादा काले हैं' का बेसुरा विज्ञापन बंद करें और अपने विवेक से देश के समग्र विकास की रूप रेखा जनता के समक्ष प्रस्तुत करें.यह स्पष्टतः दृष्टिगोचर है कि मुद्दा देश के विकास का नहीं बल्कि कुर्सी पर काबिज़ होने का ज्यादा है अगर देश की फ़िक्र है तो मध्यावधि चुनाव जैसे अपव्यय पूर्ण कदम का इतनी बेसब्री से इंतज़ार क्यों है ? इसका अर्थ तो यही है कि बस सब मौके की प्रतीक्षा में हैं.जिसके भाग्य से छींका गिर जाए.एक अफ्रीकन कहावत है"Until lions have their historians ,tales of the hunt will always glorify the hunter. "सुशाषण देने का दावा करने वाले नीतीश जी बिहार को विशेष राज्य का दर्ज़ा दिलाने की मांग को लेकर अधिकार यात्रा पर निकलते हैं तो छात्र संगठनों के साथ स्थानीय समस्या से जूझ रहे लोगों का भी विरोध उन्हें झेलना पड़ता है.फिर सुधार किसके लिए और कहाँ किये गए ? घटक दल अत्यधिक स्वकेंद्रित न हों . नीतीश जी का कहना है जो बिहार को विशेष राज्य का दर्ज़ा देगा उसे समर्थन देंगे.नेतागण भूल रहे हैं कि भारत राज्यों का समूह है जिसका विकास 'अपनी-अपनी ढपली;अपना-अपना राग' के तर्ज़ पर नहीं बल्कि 'मिले सुर मेरा तुम्हारा'के तर्ज़ पर ही संभव है.आम जनता को पहले इस्तेमाल करो फिर विश्वास करो के अनुसार प्रयोगवादी और यथार्थवादी होना पडेगा .उसे एक मजबूत लोकतंत्र चाहिए.अति की व्यंजना को लांघता,घिसटता,सिसकता,कराहता,चीखता कमज़ोर धराशाई लोकतंत्र से वह बिफर गई है.अति की अवधारणा से प्रत्येक नेता बाहर निकले और अखंड भारत के नागरिक होने का सबूत दे.

2014  के नए समीकरण,तीसरे मोर्चे की मृगमरीचिका सब एक भ्रम हैभाजपा ने Great coal robbery  नाम की पुस्तिका को घर-घर बांटने का फैसला कर जनता को आकाश (2G),पाताल ( coal),जमीन(राष्ट्रमंडल खेल)में हुए लूट की तरफ ध्यान आकर्षित करने का फैसला किया है.वहीँ पार्टी लाइन से  अलग भाजपा के एक वरिष्ठ नेता बी.सी.खंडूरी जी ने मनमोहनजी को एक अच्छा अर्थशास्त्री बताते हुए कहा,"पी.एम्.अत्यधिक दबाव में हैं...समस्या का तुरत -फुरत हल निकालने की बजाए हमें भ्रष्ट व्यवस्था में बदलाव के लिए उसकी जड़ों पर प्रहार करना होगा."और फिर अगले ही दिन अपने बयान से पलट भी गए.सपा ने सरकार को यह कह कर बचा लिया कि वह इस समय किसी साम्प्रदायिक दल को सत्ता में आने से रोकना चाहती है पर विपक्षी दलों द्वारा बुलाए गए बंद में अपना सक्रिय सहयोग भी दिया . डीजल के मूल्य वृद्धि,रसोई गैस के सब्सिडी वाले सिलिंडर सीमित करने और रीटेल में भारत बंद का आयोजन कर भाजपा ने सरकार को नकारा भी बताया और फिर यह भी कह दिया कि फिलहाल उसकी दिलचस्पी सरकार गिराने में नहीं है.वे यह नहीं बता पा रहे हैं कि अगर सब कुछ गलत है तो इसे सही करने की रणनीति क्या होनी चाहिए.यानि अगर केंद्र सरकार नीतिगत मामलों में परिपक्व नहीं है तो भाजपा भी इस दृष्टिकोण से कमज़ोर ही साबित हो रही है क्योंकि समस्या की diagnosis करने के बाद remedy उसके पास है नहीं.अन्ना जी के दिग्भ्रमित आन्दोलन और केजरीवाल से नीतिगत अलगाव ने संशय की स्थिति ला दी है. इधर ममता दी की रैली के प्रभाव ने एक नया रंग दिखाना शुरू कर दिया है .यानी प्रत्येक जगह विरोधाभास ...एक छद्म राजनीति..... जब तक केंद्र में थे अपने राज्य के लिए लड़ते रहे अब जब बाहर आ गए तो देश की अखण्डता याद आ रही,पहले खूब क्रोध और तल्ख़ अंदाज़ दिखाए,अब पूछ रहे हैं केंद्र सरकार इतना गुस्सा क्यों करती है. (अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है) ? अर्थात वही मुहावरा हवा का रुख क्या होगा कहना मुश्किल.....ऊँट किस करवट बैठेगा ?? unpredictable ....
बस ,कुछ नए similes ( as unpredictable as politicians ,as uncertain as politics )अंग्रेज़ी व्याकरण में
जोर-शोर से गति लेने को तैयार है.ऐसे अनिश्चित परिस्थितियों में नेता गण वाकयुद्ध करते हैं; फिर उपयुक्त समय आने पर एक ही टेबल पर जोड़ तोड़ की राजनीति खेलते हैं.आरोप-प्रत्यारोप का अंतहीन बेसुरा राग अलापना छोड़ कर गठजोड़ के मधुर तान सुनाते हैं और आम जनता हर बार स्वयं को ठगा सा महसूस करती है .नया चुनाव,नई सरकार और आम जनता बस वहीँ की वहीँ खड़ी रह जाती है.सरकार और सुधार का अवनी-अम्बर मिलन बस क्षितिज सा ही रह जाता है .
प्रमुख समस्या यह है कि जब कोई दल स्पष्ट बहुमत से जीत हासिल करता नहीं दिखता तब क्षेत्रीय दल उभर कर सामने आते हैं,गठबंधन की राजनीति तैयार होती है,मोल-भाव के खेल जमते हैं और भ्रष्टाचार के विषैले बीज पनपते हैं.ज़रूरत है राजनीतिक दलों को सशक्त होकर ,मजबूत असरकारी विकास योजनाओं के साथ पाक-साफ़ छवि ले कर उभरने की, जो आम जनता पर विश्वास कायम रख सके या फिर गठबंधन की राजनीति के नियम स्पष्ट हों,दलों के साझा निर्णय पहले से ही स्पष्ट हों.किसी भी मुद्दे पर अचानक समर्थन वापिस लेने जैसे कदम उठाने की नौबत ही क्यों आये.?एक और मुख्य समस्या यह है कि शिक्षित वर्ग वोटाधिकार का प्रयोग नहीं करता. गरीब अशिक्षित जनता मामूली तोहफों के लालच में अपना मताधिकार बेच देती है. .2009  के आम चुनाव में 28  करोड़ से ज्यादा मतदाताओं ने अपने अधिकार का प्रयोग ही नहीं किया था,ऐसे सुप्त लोकतंत्र में फिर कैसे शिकवे ???कैसी शिकायत ??? प्रजातंत्र में प्रभुत्व स्थापित रखने की राजशाही सोच इसी प्रवृति की भयावह उपज है.
इस देश के रहनुमाओं ने क्या-क्या नज़ारे दिखा दिए
मुल्क जिसका हक़दार था और जिन मंज़र की थी ज़रूरत
उन्ही ख्वाबों को तो हकीकत की ज़मीं से महरूम कर गए
अवाम को किस कदर पहले से भी ज्यादा मजबूर कर गए !
मुझे वह सुप्रसिद्ध पंक्ति याद आती है"सिंहासन खाली करो कि जनता आती है"सभी व्यस्क भारतीय नागरिकों से अपील है "सजग हों,विवेकपूर्ण हों'और अपने वोटाधिकार का प्रयोग करें,इससे बड़ा जन आन्दोलन, जन क्रान्ति और कोई नहीं है."
राजनीति मेरा पसंदीदा विषय नहीं है पर एक भारतीय नागरिक होने के नाते यह मेरा कर्त्तव्य है कि देश के हालात को समझ कर अपने वोटाधिकार का विवेकपूर्ण प्रयोग करूँ.
(ब्लॉग में लिखे कोई भी शब्द अगर आप में से किसी को नागवार गुज़रें तो मुझे अपने द्वारा दी गई प्रतिक्रिया में ज़रूर बताएँ.मैं किसी विशेष दल की समर्थक नहीं हूँ बस एक सशक्त,विवेकी नेतृत्व वाले दल की तलाश है और उसी तलाश में इस ब्लॉग के माध्यम से आप सभी को शामिल करना मेरा उद्देश्य है).2014 के लिए अब भी वक्त है...

Saturday, October 6, 2012

अमराइयाँ गाँव की

इस ब्लॉग को लिखने के पीछे दो उद्देश्य हैं ;प्रथम सभी पाठकों/लेखकों को उनके बचपन के दोस्तों की याद दिलाना और यह भी ध्यान रखना कि हम बड़े ऐसी कोई रंजिश आपस में ना रखें जिसका प्रभाव हमारे बच्चों के मस्तिष्क पर फ्रेम में जडी किसी तस्वीर सा स्थिर हो कर रह जाए.दुसरा यह सन्देश देना कि अपने बच्चों को उनके दोस्तों के साथ जी भर कर खेलने दें. सुखद साथ की ये स्मृतियाँ आगे की राह में उनके चरित्र के अल्पांश का निर्माण भी कर जाती हैं .बस इतना ध्यान ज़रूर रखें कि आपके बच्चे, अपने दोस्त या बाल सखा के संग एक स्वस्थ वातावरण में खेलें .
दरअसल ,इस बार जब मेरी बिटिया हॉस्टल से घर आयी तो बातों ही बातों में उसने सहसा तीर की मानिंद एक प्रश्न छोड़ दिया ,"माँ, मैं तो फ़ोन पर अपनी सहेलियों से इतनी सारी बातें करती हूँ क्या आपको अपने बचपन की किसी सहेली की याद नहीं आती?"अब यह बाल गोपाल का यशोदा मैया से पूछे प्रश्न "मैया मेरी कबहूँ बढ़ेगी चोटी"जैसा बाल सुलभ प्रश्न तो था नहीं जिसमें एक प्रश्न के उत्तर के बाद उस उत्तर से ही प्रश्नों का निर्माण होने की अंतहीन क्रिया चलती रहती,यह तो बालपन और किशोरावस्था के संधिकाल का मासूमियत भरा अल्हड सा प्रश्न था जहाँ उत्तर की प्रतीक्षा का भी धैर्य नहीं होता.मैंने ज़वाब दिया,"याद आती है"उसने छोटे से शब्द 'हूँ' से काम चलाया और अपनी पढ़ाई में लग गयी.
पर उसके प्रश्न ने मुझे वो फाइल खोलने को विवश कर दिया जिसमें मैंने अपनी छठी,सातवीं.......कक्षाओं के परिणाम,समाचार पत्र में छपी कुछ रचनाओं की कटिंग और तमाम ऐसी चीज़ें सम्हाल कर रखी थीं जिनसे खाली वक्त में रु-ब-रु होना मुझे कभी-कभी बेहद सुकून देता है. .व्यग्रता से खोजने के बावजूद मैं वो हासिल ना कर पायी जो चाहिए था. बिटिया के जाने के बाद उसके प्रश्न से जुडी खोज की अधूरी कोशिश पुनः आरम्भ हुई और कहते हैं न "जिन ढूंढे तिन पाइयाँ"मुझे वह सम्पति मिल गयी जो हर किसी के बचपन की अनमोल धरोहर होती है चाहे वह द्वापर युगीन कृष्ण-सुदामा हों या फिर आधुनिक काल की मेरी बेटी.
मुझे मेरी प्यारी सी सहेली अनुपमा सिंह की तस्वीर और उसका लिखा हुआ अंतिम ख़त जिसके पन्ने बिलकुल पीले पड़ चुके थे वे मिल गए.अब यह अनुपमा कौन थी यह भी बताती हूँ,नाम के अनुरूप वास्तव में अनुपम,उस उम्र की लड़कियों से बिलकुल परे,चंचलता,चपलता से उसका दूर-दूर तक कोई वास्ता ना था,गहरी बड़ी-बड़ी आँखों में अजीब सी उदासी झलकती थी.मैं हर गर्मी की छुट्टियो में अपने गाँव जाती थी;पिताजी का यह मानना था कि शहर में पली-बढी लड़कियां अगर गाँव के वातावरण से भी परिचित रहे तो उनके लिए अच्छा ही होगा तब ये तो कल्पनातीत ही था कि गाँव भी शहर की तरह कुछ हद तक ही सही पर आधुनिक सुविधाओं से अवश्य ही सुसज्जित हो जायेंगे.अनुपमा सागर में पढ़ती थी;मेरी तरह वह भी गर्मियों में ही वहां आती थी,मैं आम के बगीचे में खेल रही थी वह मुझे वहीँ मिली.जाने, उसमें क्या आकर्षण था कि मेरा बालमन उससे दोस्ती को इच्छुक हो गया.उसने भी शायद कुछ ऐसा ही एहसास किया था तभी तो उस दिन के उपरान्त हम घंटों बाते करते,पेड़ों पर चढ़ते और खेलते रहते.
एक दिन वह मुझे अपने घर ले गयी,जब मैंने उसकी माँ को वैधव्य हाल में देखा तो पूछा"अनु,तुमने कभी बताया नहीं "उसकी झील सी बड़ी आँखों में मानो सैलाब उमड़ आया,कहने लगी,"मुझे मेरे जन्म का बेहद अफ़सोस है,इधर मैंने दुनिया में आँखें खोली;उधर पापा ने सदा के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं ,माँ का यह रूप अनायास ही मेरे जन्म से जुड़ गया है"उसकी गहरी झील सी आँखों में पानी के स्रोत का रहस्य अब मेरे लिए रहस्य नहीं रह गया था.हाँ, एक बात और हुई उस दिन के बाद से मैं अपने पिता से गहरे जुड़ाव में बंध गयी जो आज भी कायम है.
मैं वापस शहर आ गयी पर कच्ची अमिया से पके आम तक की सारी खुशबू मानो अनु की यादों से जुड़ गयी अगले वर्ष गाँव जाना ना हो सका,दो वर्ष बाद जब गयी अनु फिर दिखी पर मुझसे कटी सी रही,मैंने ही जिद कर उसे आम के बगीचे में बुलाया और कहा,"अनु,मैं इस बार कम दिनों के लिए आयी हूँ ,कल चली जाउंगी,मुझे बस स्टॉप छोड़ने आ जाना"उसने तो मानो अधर ही सी रखे थे,बस हाँ में सर हिलाया और चली गयी.
अगले दिन इंतज़ार में मेरी आँखें पथरा सी गयी पर वह नहीं आयी उसके भाई ने मुझे यह अंतिम पत्र पकड़ा दिया.
उसके बाद मेरा गाँव जाना कुछ वर्ष के अंतराल में होने लगा पर वह मुझे नहीं मिलती, दादाजी ने बताया ब्राह्मण और ठाकुर के किन्ही दो परिवारों में भीषण विवाद हुआ नतीज़तन पुरे गाँव में इन दो वर्णों ने बोल-चाल बंद कर दी है .मैंने पूछा था इसमें हम कहाँ दोषी हैं?दबंग दादाजी की आँखों में क्रोध स्पष्ट दिख रहा था .मैंने भी उनका मान रखते हुए शांत रहना बेहतर समझा .पर बड़ों के इस रवैये को आज तक मेरा दिल माफ़ नहीं कर सका है .अनु मेरी पहली और आखिरी बाल सखी साबित हुई.जब बी.एड. कर रही थी तो अंतिम बार गाँव जाना हुआ पता चला अनु का विवाह हो गया है.
दोस्तों ;उसकी खामोशी,उदासी ,असमय ओढी परिपक्वता ने मुझे उन्ही दिनों से ही कुछ -कुछ संवेदनशील बना
दिया था मैंने यह कविता "अमराइयाँ गाँव की"उसीकी याद में लिखा है ;उसकी तस्वीर,उसके अंतिम ख़त भी इस ब्लॉग के साथ हैं .मैं इस वर्ष अपनी बिटिया, जिसने अपने एक अल्हड से प्रश्न से, मेरे ज़ेहन में पडी धूमिल यादों को ताज़ा कर दिया ;उसके साथ गाँव अवश्य जाउंगी बस ईश्वर से यही दुआ मांगती हूँ कि अनु की खबर ही मुझे मिल जाए........................ताकि .मेरी खोज को विराम मिल सके.
ओ सखी ,कहाँ भूली हूँ मैं,
घनी अमराइयाँ गाँव की.
वो मस्ती,वो अमिया खाना
और राहत ठन्डे छाँव की


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परिपक्वता में मासूमियत
खासियत तेरे स्वभाव की
कभी बेफिक्री में न हंसना
संकेत करते थे अभाव की


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पहली बारिश का सोंधापन
और खेल कागज़ के नाव की
अब भी दिल में बसी वैसे ही
मीठी यादें तेरे उस गाँव की


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रुनझुन बजती मधुर वह धुन
जो करती नुपुर तेरे पाँव की
पर शोर बहुत है इस दिल में
तेरे उस खामोश से ठांव की


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संभाल रखी हैं निशानियाँ
मैंने एक-एक तेरे चाव की
तेरी यादों के थे कितने ज़ख्म
किसे परवाह थी इस घाव की


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चार दशकों की ये ज़िन्दगी
अब है उन लम्हों के दांव की
तू नहीं है पर तेरी यादें ही अब
हैं अनमोल रत्न के भाव की .


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यकीन नहीं है तो छूकर देखो

समाज के किसी भी घटना क्रम से जब राजनीति जुड़ जाती है तो वह घटना अत्यधिक पेचीदा और रहस्यमयी हो जाती है.इसे राजनीति का मायावी प्रभाव कहा जाए या हमारी सोच और समझ का दायरा यह निर्णय करना कठिन है.इस बार भी यही हुआ अनुराधा बाली और गीतिका शर्मा दोनों ही राजनीति रसूख रखने वाले शख्स से जुडी थी .एक ने वैवाहिक सम्बन्ध बनाया तो दूसरी का जुड़ाव जीविकोपार्जन की वज़ह से रहा .अनुराधा बाली जिस तरह से रूप सौंदर्य की लावण्यता की वज़ह से चन्द्रमोहन की अर्धांगिनी बनी उस घटनाक्रम को देखने के बाद कई महत्वपूर्ण बात सामने आती है...........
प्रथम --यह कि बुद्धिमत्ता से तालुकात रखने वाली कुछ महिलाएं अपनी ज़िंदगी से जुडी बेहद महत्वपूर्ण व्यक्तिगत फैसले लेने पर उस बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता को भावावेग में भुला बैठती हैं.
दूसरी बात कि समाज(स्त्री-पुरुष) की एक विचित्र मानसिकता यह है कि राजनीतिक रसूख रखने वाले किसी भी व्यक्ति से अपना सम्बन्ध बताने पर लोग गौरवान्वित होते हैं .कुछ तो इस सम्बन्ध के भरोसे को अलादीन का चिराग समझ हर काम को चुटकी में पूरा हो जाने का दावा करते हैं.
तीसरी बात कुछ महिलाएं अपने शौहर के ऊँचे रुतबे और ओहदे पर होने से इसे status सिम्बल मान कर अपने नात-रिश्तेदार,पड़ोसियों से एक सुरक्षात्मक दूरी बना लेती हैं जो उनके लिए सदैव घातक साबित होता है. इस अकेलेपन का अवसाद और अलगाव उनकी ज़िंदगी को बेमकसद बना देता है जिसकी परिणति समाज के समक्ष इस भयावह रूप में दृष्टिगोचर होता है.
दूसरी घटना में गीतिका शर्मा की भी उम्र(२३ वर्ष) कोई बहुत परिपक्व अवस्था की नहीं थी. इस अवस्था में बच्चे अक्सर पहला गलत काम करते हैं वह कि अपनी बातों को घर के बेहद करीबी रिश्तों से साझा नहीं करते हैं.वे गैरों को तो अपना मान लेते हैं पर अपनों से दूरी बना लेते हैं.दूसरी गलती यह कि जल्द से जल्द सफलता की सीढ़ियों को चढ़ने के क्रम में जिन दुर्गम और अवांछित राहों से गुज़रने का समझौता कर लेते हैं वे उसकी मंजिल के शिखर से बेखबर रहते हैं.उन्हें यह बात समझ नहीं आ पाती कि साहस उचित है पर दुस्स्साहस कदाचित नहीं.
ऐसे किसी भी सम्बन्ध बनाने के पूर्व स्त्रीयों को अपनी बाह्य सुन्दरता के साथ अपनी असीम शक्ति,साहस,बुद्धिमत्ता जैसी आतंरिक शक्तियों पर भी भरपूर भरोसा करना चाहिए .पुरुष में शक्ति है पर स्त्री के असीम शक्ति पुंज से वह हार भी जाता है.मुझे नारायण दत्त तिवारी की पत्नी और बेटे पर फक्र है कि उन्होंने अपना हक कानून के द्वारा साबित करवाया इसमें उन्हें ना तो किसी महिला संगठन की मदद मिली ना ही और किसी अपेक्षित की पर उन्होंने अपनी कानूनी जीत हासिल की.यह उचित भी इसलिए था क्योंकि बच्चे को नाजायज़ मानने वाला समाज माता पिता को नाजायज़ क्यों नहीं मानता जिनकी क्षणिक भावावेग की वासना और लिप्सा एक बच्चे को समाज की नज़र में नए अस्वीकार्य विशेषण से नवाज़ देती है भला उस बच्ची/बच्चे का क्या कसूर है.
इतिहास गवाह है कि हर युग में स्त्री त्याग ,समर्पण,शक्ति,बुद्धिमता की साक्षात प्रतिमूर्ति रही है पर पुरुष प्रधान समाज ने हमेशा उसे जांचने-परखने और उनकी कर्तव्यनिष्ठा को भुलाने की हिमाकत की है.दूसरी ओर स्वयं स्त्रियों ने ही अपने त्याग ,अपनी वेदना ,अपने समर्पण से स्वस्तित्व की अलग परिभाषा रच दी है .इतिहास के पन्नों पर ऐसे कितने पुरुषों से सम्बंधित इबारतें लिखी हैं जिनकी पत्नियों के त्याग ने ही उन्हें जग को प्रकाशित करने में मदद की पर उन स्त्रियों की लिखित-अलिखित गाथा से वे पन्ने भीगे हैं.अगर आप को यकीन नहीं है तो वे पन्ने छूकर देखो जो उनकी छुपी अश्रुधाराओं से अब तक गीले हैं चाहे वे उर्मिला हों यशोधरा या.............
आज इन्ही भीगे पन्नों की  इबारतों से आपको रु-ब-रु करवाने जा रही हूँ................
1
गांधारी क्यों बांधी तुमने आँखों पर पट्टी
इस तरह तुम आज आदर्श तो ना बन सकी
पति की उस नियति और अशक्त अवस्था में
उनकी नेत्र ज्योति क्यों
तुम ना बन सकी ?
2 ...............
अपने चक्षु खुले रख कर अपने बच्चों का
सही मार्गनिर्देशन क्या नहीं कर सकती थी
सौ पुत्रों की माता थी तुम, एक बार सोचो
सुन्दर
सौ इतिहास ना रच सकती थी?
3 ...............
पति की कमजोरी संग कमज़ोर पड़ जाना
यह पति के प्रति सही सहयोग नहीं होता

अपनी शक्ति और संपूर्ण समर्थता से तेरा
ध्रितराष्ट्र से जुड़ना सोचो,कितना सही होता.

4 ..................
द्रौपदी!विचारों, तुमने भी तो की है गलती
क्यों खुद को वहां दांव पर लगने ही दिया
पुरुषों की भरी सभा में थे मौजूद पति भी
फिर क्यों अबला बन चीर हरने ही दिया
5 .................
यूँ चुपचाप अपमान का घूंट पी जाना
नारी का धर्मं तो कभी बनता नहीं है

ऐसे पुरुषों के साथ क्यों रहना ही बोलो
जिनमें अपनेपन का मर्म होता नहीं है

6 .....................
सीता,तुम तो अपना सर्वस्व छोड़ कर
पति का साथ देने ही तो वन गयी थी
उस स्वर्ण लंका के चमक से अछूती
राम की याद में ही तो जोगन भई थी

7 ..................
फिर राम ने कैसे ना दिया साथ तेरा
उन विवश,विषाद अश्रु भरे क्षणों में
सामजिक संशय के मर्यादा बोध से
छवि तुम्हारी बिखेर दी रज कणों में
8 ...................
यशोधरा! तुम्हारे त्याग को ही देखो
इतिहास के किस ग्रन्थ ने याद रखा है
आज जिन महात्मा बुद्ध की गाथा से
प्राचीन इतिहास सुवासित महक उठा है
9 ...................
मोक्ष प्राप्ति ही करनी थी तो क्यों
बांधा तुम्हारे संग सूत्र विवाह का
चुपचाप धीरे से सघन रात्रि में ही
संग छोड़ा तुम्हारा और राहुल का

10 .....................
देख लो तुम्हे तो उर्मिला के सदृश ही
इतिहास ने पूर्णतः है विस्मृत किया
पूछा उसने भी नहीं अपने स्वामी से
क्यों मुझे जीते-जी यूँ है मृत किया
??
11 .....................
अपने प्रति जिम्मेदारियों का एहसास
उर्मिला भी लक्षमण को ना दिला सकी
पति से चौदह वर्ष जुदाई की कल्पना
उसे भी कैसे और क्यों ना रुला सकी

12 .................
सच कहूँ भरे हैं हमारे ऐतिहासिक ग्रन्थ
ऐसी कितनी ही मार्मिक गाथाओं से
यकीन नहीं है तो छूकर देखो पन्ने जो
अब तक भीगे हैं उन छुपी अश्रुधाराओं से
****************

(किसी भी धर्मं या सम्प्रदाय को आहत करना इस blog का उद्देश्य नहीं है. मैं ब्लॉग में उल्लिखित सभी पात्रों की महानता के प्रति पूर्ण आदर और श्रधा रखती हूँ.सिर्फ भाव प्रबलता की अभिव्यक्ति के लिए उन सम्मानित पात्रों का उल्लेख किया गया है.अगर किसी भी आदरणीय पाठक को कोई भी आपत्ति हो तो मैं वह अंश बिना किसी वाद-विवाद या बहस के हटा लेने का वचन देती हूँ,साथ ही क्षमाप्रार्थिनी भी रहूंगी)
धन्यवाद

हमदम,तेरे साथ चलूँ तो....

आज हरितालिका तीज के शुभावसर पर आप सबों के सुखद दाम्पत्य और अखंड सौभाग्यवती रहने की सुखद कामना के साथ यमुना का प्यार भरा नमस्कार.
विवाह संस्था और पारिवारिक मूल्यों पर मेरी गहरी आस्था और अटूट विश्वास है.हरितालिका तीज का यह निर्जला व्रत पत्नी अपने पति की मंगल कामना के लिए रखती हैं.हालांकि देश के कुछ राज्यों बिहार,झारखण्ड,छत्तीसगढ़ ,मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में प्रचलित इस व्रत का महिमा मंडन देश के इन्ही राज्यों के साथ पंजाब,हरियाणा में भी प्रचलित व्रत करवा चौथ की तरह हिन्दी सिनेमा ,धारावाहिक इत्यादि द्वारा ना होने के कारण बहुत कम लोग ही इससे परिचित हैं पर फिर भी  तीज के रूप में उपासना आज भी इन राज्यों की माटी में सोंधी महक के रूप में समाई है.आप के मस्तिष्क में सहज ही एक प्रश्न उठ गया होगा-"पति अपनी पत्नियों के लिए ऐसा कोई व्रत क्यों नहीं रखते ?"यही प्रश्न मुझसे एक नवविवाहिता ने भी पूछा.मेरा मानना है कि पति जो घर से बाहर अपने परिवार के सुख-सुविधाओं के लिए दिन भर भटकता है ,जोखिम उठाता है क्या यह उसके व्रत की एक बानगी नहीं ?व्रत का सीधा अर्थ किसी गहरे संकल्प से भर जाना होता है.फिर वह अच्छे मार्ग पर बढ़ने का,जीवन को सर्वोत्तम ढंग से जीने का या अपने कार्य को निष्ठां पूर्वक करने का हो सकता है.इस नज़रिए से पति प्रत्येक दिन व्रत रखता है क्योंकि वह प्रतिदिन अपने परिवार के सुचारुपूर्ण ढंग से रोजी-रोटी की व्यवस्था का संकल्प करता है.जो काम काजी महिलाएं हैं ;व्रत उपवास उनकी आस्था का प्रश्न है पर वे कामकाजी महिलाएं और गृहणी भी प्रतिदिन एक व्रत से गुज़रती हैं और वह है अपने परिवार के साथ-साथ अपने जीवन को भी सर्वोत्तम बनाने का व्रत(संकल्प).
क्या है मान्यता-
इस व्रतोत्सव के लिए कहा जाता है कि जब भगवान शिव को पाने के लिए माँ पार्वती तपस्या रत हो गई तो पुत्री के कठोर तप को देख राजा हिमालय ने देवर्षि नारद से परामर्श कर बेटी का विवाह भगवान विष्णु से करने का निर्णय लिया.भगवान शिव को अपना वर मान चुकी माँ पार्वती को इस बात की जानकारी होने पर बहुत दुःख हुआ. उन्होंने मन की पीड़ा अपनी सखियों से कही.पिता की नज़रों से पार्वती को बचाने के लिए सखियों ने उन्हें घने जंगल में छुपा दिया जैसे किसी का हरण किया जाता है ठीक उसी तरह सखियों ने माँ पार्वती को छुपाया..हरण होने के कारण ही इस व्रत को हरितालिका कहा जाता है.इस दौरान माँ पार्वती ने वन की एक कन्दरा में शिव की प्रतिमा बना उनका पूजन किया.उस दिन भाद्र पद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीय तिथि थी .पार्वती जी ने निर्जला व्रत करते हुए दिन-रात शिव की आराधना की. उनकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर भगवन शिव प्रकट हुए और उन्होंने पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वर दिया.तभी से यह व्रतोत्सव मनाया जाता है .
मैं वर्त्तमान में पति द्वारा पत्नी को वेतन दिए जाने जैसे बेमानी फैसले के मद्देनज़र जब हरितालिका तीज जैसे पारंपरिक व्रत-त्योहारों का आकलन करती हूँ तो समाज के बदलते परिवेश में विवाह संस्था के विकृत होते स्वरुप पर क्षुब्ध भी होती हूँ.पर यह फैसला समाज के बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा क्यों लिया गया यह भी गौर करने वाली बात है.अनुराग बसु की मूवी 'बर्फी'के कुछ प्रारम्भिक शब्द"आज का प्यार ऐसा,दो मिनट नूडल्स जैसा,फेस बुक पर पैदा हुआ,कार में हुआ ये ज़वां,कोर्ट में जाकर मर गया"आज के प्रेम की विकृत सच्चाई को बताती है.पर कुछ स्थितियों में पति द्वारा पत्नी को वेतन दिए जाने का यह फैसला निहायत ज़रूरी भी है क्योंकि..........
१) कुछ गैरजिम्मेदार पति अपनी कमाई का कुछ हिस्सा शराब,पार्टी या अपने अवैध संबंधों पर खर्च करने से बाज़ नहीं आते ऐसे में दिन भर समर्पण और त्याग की देवी बनी पत्नियों के लिए यह सकारात्मक कदम है .
२) पति की मृत्यु की दुखद घटना के बाद परिवार वाले पुत्र की कमाई और उसके बैंक जमा पूंजी को किसी ना किसी दांव-पेंच से काम क्रिया में लगाने का बहाना बना विधवा को उससे वंचित कर आर्थिक दृष्टि से मजबूर कर देते हैं.यह वक्त उस विधवा के लिए इतना दुखद होता है रुपये-पैसे के विषय में वह अपनी सोच की दिशा निर्धारित नहीं कर पाती,जिसका बेजा लाभ रिश्तेदार उठा लेते हैं.ऐसे बुरे वक्त में तात्कालिक ज़रूरत के लिए कम से कम उसके खाते में जमा पूंजी सहायक हो सकेगी.
३) जो दंपत्ति विवाह व्यवस्था को एक समझौता और घुटन भरा बंधन मान कर दाम्पत्य जीवन की ज़द्दोज़हद में उलझे होते हैं उनके लिए यह फैसला स्वागत के योग्य हो सकता है .

जिन दम्पत्तियों के संबंधों का अटूट भवन आपसी विश्वास की नींव और भरोसे की छत के साथ खडा होता है उन्हें ऐसे किसी भी फैसलों का कभी भी इंतज़ार नहीं रहता क्योंकि उनके आपसी रिश्ते इस सुदृढ़ भवन में बेहद महफूज़ होते हैं.
"हमदम तेरे साथ चलूँ तो......"इस हरितालिका तीज के शुभावसर पर इन्ही मधुर संबंधों की अभिव्यक्ति है.इसे जीवन भर हर वह विवाहिता एहसास करती है जिसे ईश्वर ने जीवन साथी के रूप में एक विवेकी व्यक्ति का उपहार दिया है.
तुम साथ हो तो मुझे सम्पूर्णता का एहसास होता है
जीवन के हर एक मोड़ पर पर्व सा उल्लास होता है.
..................
तुम्हारा साथ जीवन को सुवासित झोंकों से भरता है
तेरे सिवा दूजा ना कोई ,इस दिल दर्पण में बसता है
...................
आँखें मैं बंद करूँ जब भी, वही तेज़ कदमों की चाल
शरारती नयन तेरे और दमकते माथे पर बिखरे बाल
..................
एक थिरकन नख से शिख को,मादक लय दे जाती है
तुम्हारी पद चाप तुम्हारे आने का,दस्तक दे जाती है.
..................
चहरे पर फ़ैली वही चिर परिचित, मोहक सी मुस्कान
चारों तरफ उड़ती नज़रें, उनसे भी ज्यादा चौकस कान
.................
सबकी निगाहें तेरे सुदर्शन व्यक्तित्व पर सिमट जाती हैं
बुरी नज़रों से बचाने की इच्छा अमरबेल सी लिपट जाती है
....................
और फिर जब कभी भी मेरा यह मन उदास हो जाता है
तुम्हारे साथ का स्मरण ही एक सुखद सांझ हो जाता है
.....................
जीवन की उबड़-खाबड़ और पथरीली इन राहों पर
संग बिताए पल-पल की उन भूली-बिसरी यादों पर
..................
तेरे सानिध्य की यादें ही ,मुझे मलहम सी लगती हैं
भावनाएं मेरी फिर तो अनकहे शब्दों में भी सजती हैं
.....................
क्या कहूँ जीवन की डगर है कठिन मुझे जिस पर
विचारवान हो चलना है बहुत सम्हल-सम्हल कर

....................
तेरा भरोसा इस डगर को भी आनंद से भर देता है
दामन खुशियों से भरकर,दुःख
मेरे सारे  हर लेता है
.......................
दुनिया सारी संग भी हो ,तेरी जुदाई पर खलती है
इस सूनेपन को भी तेरी सुधियाँ ही आकर भरती हैं
......................
एक सच्चा सा दिल ही तेरा ,सब पर भारी पड़ता है.
सब हो पर तेरे बिन मुझे ,यह जीवन खाली लगता है.
....................
सब के साथ चलती हुई मैं, कुछ दूर ही थक जाती हूँ
हमदम तेरे साथ चलूँ तो, सीढियां भी चढ़ जाती हूँ.
.................
तेरे बिन मेरी पहचान तो किसी हुजूम में खो जाती है
प्रियतम तेरा साथ है तो यमुना वजूद में हो पाती है.
.................
तेरा साथ पाकर तो हर जगह मैं ही मैं नज़र आती हूँ
हाथ तेरा पल भर छूटे तो मृगछौने सी सहम जाती हूँ
......................
अनगिनत सितारों के बीच बस एक चन्दा ही काफी है
जैसे एक सूर्य की रश्मियाँ धरा पर उजाला फैलाती हैं

...................
वैसे इस जीवन की राहों पर, हमसफ़र ही सच्चा साथी है
बिन जिसके तूफानी थपेड़ों से, टूटी जीवन की नैया जाती है.
...................

रोशन हैं;दो घर तुझसे

 "क्या बेटियाँ पराई होती हैं"
यह शीर्षक जब-जब दिखाई दिया,ज़ेहन में बचपन से अब तक समाई कई गीतों की स्वर लहरियां हिलोरें लेने लगी.जिनमें बेहद ही सुरीले अंदाज़ में बेटियों के पराये होने की बात कही गयी है.
१- बहन पराया धन है कहना,उसको सदा नहीं रहना,बहना याद करे......
२- बाबुल तेरे अंगना की मैं हूँ ऐसी चिड़िया रे,रात भर बसेरा है सुबह उड़ जाना है.....
३- इन अंखियों की तू है मोती.....बेटी सदा ही पराई होती......



४- ये गलियाँ,ये चौबारा ,यहाँ आना ना दोबारा ,अब हम तो भये परदेशी....
ऐसे गीतों की लम्बी फेहरिस्त है.अब जब बचपन से ये परायेपन की घुट्टी ताल मिश्री की तरह पिलाई जाए तो बेटियाँ भी भला क्या करें?वे भी मान बैठती हैं कि उनका कोई अपना घर है ही नहीं.पर मैं समझती हूँ कि बेटियों की परवरिश के दौरान परायेपन का टैग लगाकर अभिभावक बहुत गलत करते हैं. अनजाने में ही वे सम्पूर्णता के साथ अपनेपन का भाव लेकर बेटियों के परिवार से जुड़ने की प्रवाहमयी सरिता पर खुद ही बाँध बना देते है और फिर इस बाँध की दीवारें तोड़ने का साहस वे इस भय से नहीं करती कि कहीं तबाही ना आ जाए .यहाँ तक कि उसकी विदाई के वक्त घिसी- पिटी सी नसीहत दोहराई जाती है'"अब तुम्हारा घर वही है जहां डोली जा रही है अर्थी भी वहीँ से उठनी चाहिए.बेटी, तुम जिनकी अमानत थी हमने तुम्हे उनको सौंप दिया है"
हाँ इस उपरोक्त सन्देश में यह भाव भी छुपा होता है कि जहां हम तुम्हे भेज रहे हैं वह भी तुम्हारा अपना घर है . इस घर की तरह वहां भी तुम्हे बहुत प्यार ,दुलार और एक मजबूत संरक्षण मिलेगा.
पर अमानत को लेने वाले सभ्य और सुसंस्कृत हुए तो बिटिया के भाग्य जग गए और अगर बदकिस्मती से वे लोभी,लालची हुए तो फिर फूल सी बिटिया उस वीराने में कैसे खिली रह पायेगी???????इस बात का अंदाजा ही वे नहीं लगा पाते.<!--
बेटियों को हमेशा यह विश्वास दिलाये रखें कि वे उनके लिए आजीवन महत्वपूर्ण हैं .उनकी ज़िंदगी परिवार समाज के लिए कीमती है.ऐसे में वे विवाह के बाद भी अगर दुर्भाग्य से घरेलु हिंसा या दहेज़ के दानव का शिकार होने लगें तो उनमें उनका मुकाबला करने की हिम्मत रहेगी . वे कभी भी आत्मघाती कदम नहीं उठाएंगी.अपनी किसी भी परेशानी को आपसे वैसे ही बांटने की हिम्मत और अधिकार रखेंगी जैसे वे विवाह के पहले करती थी.
इन छुटियों में जब मैं शिलौंग गयी तो स्थानीय चालक से एक अच्छी बात पता चली कि वहां दहेज़ जैसी कोई प्रथा नहीं है.उत्तर पूर्व भारत में बेटियाँ विदा नहीं होती लडके उनके घर आते हैं.मुझे इस दहेज़ रहित सामाजिक संरचना पर बेहद नाज़ हुआ.
दरअसल यह सोच और मानसिकता सर्वाधिक रूप में उत्तर भारत के कई राज्यों में प्रचलित है.यहाँ बचपन से ही बेटियों की शिक्षा के सम्बन्ध में भी एतराज़ किया जाता है यह कहकर"अरे इन्हें पढ़ा-लिखा कर क्या फ़ायदा पराई हैं अपने घर चली जाएंगी आपको इनसे क्या मिलेगा"वे यह भी मानते हैं की लड़कियों से वंश नहीं चलता.वे तो सदैव परायों के लिए ही पाली जाती हैं.लोग यह भूल जाते हैं कि यही बेटियाँ बहु बन कर वंश वृद्धि में सहायक बनती हैं.और सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह कि उसी राज्य उत्तर प्रदेश में जवाहर लाल नेहरु जी का वंश आज भी फलित पुष्पित हो रहा है जबकि उनकी एकलौती संतान बेटी (इंदिरा प्रियदर्शिनी )ही थी.आज भी सर्वाधिक जाना पहचाना गांधी वंश उन्ही(इंदिरा जी) से ही आगे बढ़ रहा है.वे तो कभी पराई नहीं मानी गयीं.
मैं स्वयं भुक्तभोगी हूँ.जब अपने गाँव जाती तो पापा को घर पर सब कहते,"कलक्टर बनवाना है क्या बेटी को ?बन भी गयी तो आपके किस काम की?? सारा राज भोग तो ससुराल वाले करेंगे"मैं बहुत चकित होती यह सोचती कि क्या समाज हमारी शिक्षा से लाभान्वित हो यह ज़रूरी नहीं?? यह अपना घर; पराया घर क्या है, इसकी परिभाषा तो उन दिनों समझ नहीं पाती,हाँ चुनौती समझ कर और भी जुनून तथा मेहनत से पढ़ती.

मेरी बड़ी दीदी एक सशक्त उदाहरण है उन्होंने और उनके परिवार(ससुराल) वालों ने पापा की कई जिम्मेदारियों को बखूबी अंजाम दिया और आज भी घर की ज़िम्मेदारी में सबसे पहले वही सलाह मशवरा देती हैं.यह पिता और पिता तुल्य ससुर जी के संबंधों का विस्तार था.प्रशंसनीय बात यह कि उनकी शादी  पान पत्ते पर मात्र सवा रुपये रखा कर की गयी थी.वज़ह उनके ससुर जी को दहेज़ शब्द से ही नफरत थी,वे बस एक सुशील बहु की आकाक्षा रखते थे.पर अफ़सोस की बात यह है कि दीदी को अपनी दोनों बेटियों के विवाह में दहेज़ देने पड़े,जबकि छोटी बेटी सरकारी नौकरी करती थी.यह इस समाज का विरोधाभासी कटु और स्याह पक्ष है.हाँ, उन्होंने बेटियों को परायेपन का टैग नहीं आत्मविश्वास का टैग लगा कर विदा किया था कि जब भी कोई मुसीबत आये अपनी अच्छी शिक्षा और संस्कार का सहारा लेना; फिर भी समाधान ना हो तो घर का हर सदस्य तुम्हारे साथ है.बेहिचक चली आना या हमें सूचित करना.
माता-पिता को बेटी को कभी यह सन्देश नहीं देना चाहिए कि वह उनके पास पराई अमानत है.बल्कि हर कदम पर बताना चाहिए ," वे उन्ही का अंश होती हैं और उनके लिए वे आजीवन बेहद महत्वपूर्ण हैं." उन्हें शिक्षित कर स्वावलंबी बनाना माता-पिता की उनके प्रति पहली ज़वाबदेही है.विवाह व्यवस्था समाज में आपसी संबंधों के विस्तार के लिए की गयी है.फिर भला शादी के उपरान्त माता-पिता के घर से बेटियों का नाता क्यों टूटे?जिस बेटी को पाल पोस कर हर सुख-दुःख में भागीदार बनाया वह पराई क्यों और कैसे हो सकती है?इस बात का हमेशा ख्याल रखा जाना चाहिए. कि समाज में मान-सम्मान प्रतिष्ठा से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है बच्चों की खुशी ,सुख और उनकी समाज और परिवार में सुरक्षा.

दरअसल ये रिश्ते इतने जटिल होते नहीं जितने बना दिए जाते हैं वज़ह है अहम् भाव .सबसे प्रथम कड़ी शुरू होती है इस अहम् से कि बहु
बार -बार मायके क्यों जाए,उसकी ज़रूरत पहले ससुराल में है
.अब ज़रा सा गौर किया जाए तो स्पष्ट है ------- क्या उस बहु के ससुराल आने के पूर्व घर नहीं चल रहा था?अगर माता-पिता को ज़रूरत है तो क्या ससुराल वालों की सहयोगपूर्ण जिम्मेदारी नहीं बनती कि उसे (बहु) वहां(मायके) भेजें?यकीन मानिए इससे उस बहु के मन में सम्मान की भावना जागृत होगी और वह दो घरों को जोड़ने के लिए एक मजबूत सेतु का काम करेगी.

हाँ, यहाँ बेटी के माता-पिता को थोड़ी सावधानी रखनी होगी कि प्यार के वशीभूत हो बार-बार उसे अनावश्यक रूप से ना बुलाएं .आखिर बेटी जब पढ़ने के लिए उनसे दूर जाती है तब भी तो वे उसके बगैर रह रहे थे न !तब उन्होंने बेटी को पढ़ाई में विघ्न ना हो ये ख्याल कर अपने से दूर रखा . अब भी वह कुछ जिम्मेदारी निभाने की राह पर ही तो बढ़ रही है.

यहाँ एक बात मैं और देखती हूँ कि कुछ बेटियाँ शादी के उपरान्त स्वयं को ससुराल में इतना व्यस्त कर लेती हैं कि माता-पिता के प्रति कर्त्तव्य को यह कह कर टाल देती हैं ," अब वहां हमारा क्या काम है? भैया-भाभी हैं ,उनकी(माता-पिता) सेवा करने के लिए,मैं अपनी ससुराल के लिए हूँ."ससुराल वालों के प्रति अपने कर्त्तव्य निभाना बहुत अच्छी बात है पर ज़रूरत पड़ने पर भाई-भाभी की मदद करना बेटियों को सदा परिवार के करीब रखने में भी सहायक होता है .साथ ही दो परिवार के स्नेह डोर की मजबूती भी इससे बनी रहेगी.भाई-भाभी भी बेटियों(बहनों) को पैत्रिक सम्पति पर हक के प्रतिद्वंदी के तौर पर कभी ना समझें.
बेटियों से भी मैं यही कहना चाहूंगी कि परम्पराओं ने भी उन्हें कभी पराया नहीं बनाया है;उन्हें ज़रूरत अपने वजूद,अपने अस्तित्व को मजबूती के साथ समाज के समक्ष रखने की है.यकीन करिए जब तक आप पूर्ण विश्वास के साथ स्वयं को दोनों घरों से जुडा मानती रहेंगी सभी को आप प्रिय और अपनी लगेंगी और यही अपनापन सर्वाधिक प्रिय होता है,जिसे अपना मानो वही प्रिय हो जाता है.अपना स्थान बेटियाँ समाज,परिवार,देश में खुद स्थापित कर लेती हैं,यही उनके आत्मविश्वास की दिव्य ज्योति है.


"दो घरों को जोड़ने वाली एक मजबूत सेतु और इज्ज़त है बेटी
अपनेपन से एक नहीं दो आशियाने को करती ज़न्नत है बेटी."

एक बार एक कार्यक्रम के दौरान counsellor ने हम सभी महिलाओं से प्रश्न किया,"अगर एक ही वक्त में आपके ससुराल और मायके दोनों जगह विवाह समारोह का आयोजन रखा गया हो तो आप का निर्णय किस स्थान पर जाने का होगा?"कई ज़वाब थे .मेरा ज़वाब था,"जहां मेरी ज्यादा ज़रूरत होगी मैं वहां जाने का निर्णय लूंगी."कभी-कभी ऐसा होता है कि ससुराल पक्ष में कोई ज़िम्मेदार हेल्पिंग हैण्ड ना हो और मायके में कई सहायक हों,या फिर हालात इसके ठीक विपरीत भी हो सकते हैं ऐसे में महज़ एक दर्शक की भूमिका निभाने से ज्यादा अच्छा है ज़िम्मेदारी निभाना.
अगर दोनों ही जगह हेल्पिंग हैण्ड की कमी नहीं है तो विवाह समारोह में एक जगह जाएं और reception में दूसरी जगह .वह भी ज़रूरत के हिसाब से पति-पत्नी(दोनों पक्ष) सहयोगिता पूर्ण माहौल में निर्णय ले लें.
बस समझदारी से अपनी बिटिया की परवरिश अभिभावक करते रहे तो परायेपन का यह शब्द उनकी बिटिया की ज़िंदगी के शब्दकोष से नदारद होगा.और उनकी बिटिया अपने नुपुर के रुनझुन की मधुर आवाज़ से दोनों घरों में संगीत लहरी बिखेरती रहेगी और गायेगी----

"माँ ने तो हमें जन्म दिया,सासू ने दिया हमें प्यारा पिया
रोशन हो दो घर मुझसे,मैं बन सकूँ ऐसा एक दीप्त दिया"

बेटियाँ पराई नहीं होती हैं ;अपने पराये के दायरे से कोसों दूर बेटियाँ भी तो बस अपना ही अंश होती हैं. जिस भारतीय संस्कृति की परम्पराओं के तहत ये दुहाई दी जाती है कि "बेटियाँ पराई होती हैं"वास्तव में दोष उस संस्कृति की परम्पराओं का नहीं ;दोष उस पर अमल करने वालों की सोच और समझ का है.


ठीक उस तरह जैसे अपने चहरे पर अवांछित तत्त्व की मौजूदगी से बेखबर होकर अपने आईने को दोष देना.
एक मशहूर शेर अर्ज़ करती हूँ
"यकीन मानिए हमारे ही चहरे पर धुल है
इलज़ाम लगाना आईने पर फ़िज़ूल है."