Friday, December 16, 2011

भोर हुई निराशावादी ने आज फिर की शिकायत ,उफ़ ये बोझिल जिंदगी क्यों करती नहीं मुझ पर इनायत?
वही सुबह,वही काम रोज, कहाँ से करूँ बोलो श्रीगणेश,एक जिंदगी कितने काम, कुछ भी होता नहीं शेष     
व्यतीत होती मेरी जिंदगी एक-एक दिन के कठिन  इंतज़ार में,पद,पैसा,प्रोन्नति सब यूँ खड़े लम्बी कतार में
उगता सूर्य देता मुझे  निराशा, दोपहर का देता, असहनीय ताप है,डूबता सूर्य है दे जाता मुझे कितना संताप है
इतना काम करता पर मुझे मिलता नहीं कोई प्रतिफल,सुख बन गया मृगमरीचिका  घोर अन्धकार में है कल
भोर हुई आशावादी ने, किया जीवन का स्वागत,खुशनुमा है मेरी जिंदगी ,मुझे नहीं किसी से  कोई शिकायत
हर लम्हा नव जीवन है, हर दिन है एक नया जन्म,कर्म करते जाना है मुझको, क्षितिज से हैआज  मेरा मिलन
उगते सूर्य ने दी नयी आशा, दोपहर का दे रहा है तेज,डूबता सूर्य बता रहा है,ये  जीवन नहीं है फूलों की सेज
स्वप्न देखे थे मैंने जो कल, आज उन्हें करना है साकार,एक-एक पल जीना मुझे, कोई लम्हा न हो मेरा  बेकार  आज का काम ख़त्म कर लूँ , कल होगा नया कर्म क्षेत्र ,नहीं पालना कोई  दिवास्वप्नमुझे  खुले रखकर ये दो नेत्र
अब तो कुछ बोलो मेरे दोस्तों, कब तक रहोगे यूँ मौन, बहती यमुना क्या कहती है,कविता में छुपे हैं दो दृष्टिकोण