Monday, February 24, 2014

सात गुना दो बराबर चौदह (७*२=१४)

दो दिन पूर्व एक हल्के-फुल्के गप शप के दौरान मित्र मंडली में से एक ने कहा,"वैलेंटाइन डे और बाल दिवस आपस में सम्बंधित हैं ,कहो कैसे?"सबने लगभग एक साथ कहा ,"वो तो है क्योंकि दोनों १४ तारीख को ही मनाये जाते हैं."मित्र ने कहा ,"और एक बात यह है कि वैलेंटाइन डे और बाल दिवस के बीच ठीक नौ महीने का अंतर है अर्थात वैलेंटाइन डे असावधानी से मनाये जाने पर बाल दिवस का उपहार मुफ्त में मिल जाता है."बात मज़ाक में ही कही गई थी पर यह मज़ाक ही होता है जो हर कड़वी से कड़वी बात का भी सम्प्रेषण बहुत ही सरलता और गहनता से करने में सक्षम होता है.'प्रेम'का उत्सव मनाना कोई बुरी बात नहीं पर उत्तेजना,भावावेश,में वैलेंटाइन डे को मनाने की जल्दबाजी कतई उचित नहीं है.रिकॉर्ड बताते हैं कि वैलेंटाइन डे पर सबसे ज्यादा गर्भ धारण के आंकड़े बनते हैं.प्रेम और काम को सिर्फ पश्चिम के देशों से ही जोड़ कर नहीं देखा जा सकता .भारत भूमि वात्सायन के कामसूत्र की रचना और खजुराहो की मूर्तियों की गवाह है.दो महीने पूर्व ही मैं खजुराहो भ्रमण पर गई,यह देश विदेश के पर्यटकों का मुख्य आकर्षण बिंदु रहा है.कुछ पर्यटकों से मैंने पूछा कि वे किस दिलचस्पी से यहाँ आते हैं.ज़वाब कुछ गम्भीर तो कुछ रोमांटिक मिले पर एक बात सब ने स्वीकारी कि वे इन मूर्तियों की शिल्प कला के साथ काम पर भी शोध करने आते हैं .वैसे भी अपनी अप्रतिम गहन सुंदरता के कारण खजुराहो की मूर्तियां काम को प्रदर्शित करती हुई अश्लील बिलकुल नहीं लगतीं.यह मूर्तियां 'सत्यम शिवम् सुंदरम 'की अवधारणा पर टिकी हैं मुख्य बात यह कि हम इसके एकांगी पक्ष से अभिभूत होते हैं या सत्यम शिवम् सुंदरम के एकाकार रूप से परिमार्जित होते हैं.इनका निर्माण एक विशेष प्रयोजन से किया गया था जैसा कि गाइड ने बताया कि इन मूर्तियों को इसलिए बनाया गया था क्योंकि युद्ध में अधिकाँश पुरुषों के मारे जाने से पुरुषों के संख्या कम हो गई थी अतः जो बचे थे उन्हें इन मूर्तियों के माध्यम से प्रेरित कर अधिकाधिक स्त्रियों के साथ सम्बन्ध बना कर संतति विकास में योगदान देना था.अर्थात यह स्पष्ट है कि इन मूर्तियों का निर्माण विशेष परिस्थितियों में विशेष उद्देश्य से किया गया था.वैसे भी भारतीय हिन्दू विवाह व्यवस्था काम के संतति पक्ष पर विशेष जोर देती है.
यह सत्य है कि नन्हे जीव से वृहद् प्राणी तक सभी के लिए प्रेम और काम भूख प्यास के सदृश अनिवार्य है पर भूख प्यास के नियम की तरह काम और प्रेम की भी कुछ वर्जनाएं और सिद्धांत हैं जिन्हे पालन करना ज़रूरी है.काम सम्बन्ध बनाने के लिए कम से कम भारत देश में तो मैं विवाह व्यवस्था को अनिवार्य मानती हूँ ऐसा किसी दकियानूसी विचारधारा के वशीभूत नहीं बल्कि भारत देश के सामाजिक ,सांस्कृतिक आर्थिक पृष्ठभूमि के लिए ज़रूरी है .प्रेम जीवन का आधार है पूजा की तरह पवित्र है,भारत भूमि के लिए प्रणयोत्सव की अवधारणा कोई नई बात भी नहीं इसके लिए वैलेंटाइन डे का उधार भी ठीक है पर इस दिन के आड़ में प्रेम काम के सम्बन्ध के परिप्रेक्ष्य में भारतीय संस्कृति में निर्धारित वर्जनाओं से मुंह मोड़ लेना कतई उचित नहीं.भारत जो पहले से ही जनाधिक्य की समस्या,चिकित्सा सुविधाओं की ,कुपोषण,शिशु मृत्यु,प्रसव काल में माता की मृत्यु जैसी समस्या ,आर्थिक विषमताओं से जूझ रहा है वहाँ वैलेंटाइन डे को काम से जोड़कर देखना समस्या को और बढ़ाना ही साबित होगा.
वैवाहिक संस्था के सात अंक,सात फेरे सात वचन का दम इस १४ पर हमेशा भारी पड़ना चाहिए . प्रेम के काम पक्ष या प्रेम की दैहिक भाषा से मैं इंकार नहीं करती पर उचित उम्र,उचित परिवेश में ही यह सुहाता है.दोनों पक्ष सात के बंधन में बंध कर १४ के काम पक्ष को स्वीकार करें .प्रणयोत्सव के काम पक्ष की यही पाक साफ़ परिभाषा है ......
प्रेम का ढाई आखर
कोई तिलिस्म या जादू नहीं
प्रेम का पर्याय सिर्फ प्रेम है
प्रेम खुद की ही परछाई है

प्रेम निःस्वार्थ हो तो
इसके एक अल्पांश मात्र से
विवाह जैसे पारंपरिक सूत्र भी
रक्त संबंधों से ज्यादा
चिरंजीवी हो उठते हैं

खजुराहो के शिल्प सी

होती इसकी सजीवता

छेनी,हथौड़ी के प्रहार से

वे शिल्पें भी कहाँ संकोचित थीं !

मानो अपने शिल्पकार से
कई जन्मों से वे भी परिचित थीं .
यह है असीम प्रेम की दैहिक भाषा
इतनी पवित्र , निशब्द मुखर
कि बस मूक हो जाए
पवित्रता की सर्वोत्कृष्ट परिभाषा .
बस यही तो है
प्रेम की 'दैहिक भाषा'
ढाई आखर प्रेम के काम पक्ष की
असीम रहस्यमयी शक्ति
और.....
पाक साफ़ परिभाषा.

समंदर ऐसा कभी नहीं करता.

समंदर का तट..उस पर शोर मचाती सर पटकती लहरें ....अपनी दूरी का भरसक एहसास कराता दूर तक फैला आसमान...और नीलाभ को स्वयं के दामन में समेटे तरल धरती का नीले आकाश से ही मिलन का झूठा प्रपंच रचता क्षितिज....सब कुछ एक फरेब ..पर फरेब शायद अपने मूल रूप में होने के बावज़ूद भी बहुत लुभाते हैं.तभी तो हर खुशी के मौके पर दीघा के समुद्र तट पर आना पूनम को बेहद पसंद था.यहीं पर उसे एक कॉलेज टूर पर शरद मिला था.१७ वर्ष की अल्हड सी उम्र का वह प्यार आज के युग में बेहद सच्चा साबित हुआ था जब आई.आई एम् से डिग्री लेने के बाद आधुनिक युग के सही सोच वाले युवा की उत्कृष्ट मिसाल देते हुए शरद ने पूनम के माता -पिता से पूनम को जीवन संगिनी बनाने की अनुमति ली थी.और शरद की पूनो घर को दीप्त करने चली आई थी.दो वर्ष के बाद एक नन्ही कली ने उनके घर को महका दिया.उनके घर का प्रत्येक कोना दीघा के समुद्र तट के प्यार का गवाह बन उठता था ऐसा लगता दीघा ने पश्चिम बंगाल की ज़मीन छोड़ उनके घर पर रहना स्वीकार कर लिया है. सच, दोनों का प्यार मानो पूरे वर्ष को शरद पूर्णिमा की रात सा उज्जवल कर देता था.पर किसे पता था कि शरद पूनो की रात इतनी भयावह हो जायेगी...दीघा का समुद्र तट पूरी दुनिया के समुद्र तट को कटघरे में खड़ा कर देगा.
अपने शादी की १५ वीं साल गिरह पर वे हमेशा की तरह दीघा गए .लहरें अचानक ही आक्रामक हो गईं थीं .अचानक एक केकड़ा बच्ची को दिखा भयभीत बच्ची ने आवाज़ लगाईं ,"पापा, देखो ना "लहरों के गर्जन में भी बिटिया की महीन आवाज़ शरद को भीतर तक झकझोर गई,वह दौड़ कर लहरों की बीच गया बिटिया बाहर आ गई थी पर लहरें उसे बहा ले गईं.जिसने सुना वही आह कर बैठा.नियति कठोर होती है ,कुदरत में अप्रत्याशित भी होता है ,पर इतनी कठोरता ,ऐसी अप्रत्याशितता !!!! पूनम मूक थी .समंदर की जलनिधि उसके आंसुओं से और बढ़ रही थी .लहरें अब भी उठ गिर रही थीं पर ये मूक विचार की लहरें थीं ....अपनी जल निधि में वृद्धि करने का क्या यही एक उपाय समंदर को मिला था !!!एक शाम जब सूर्यास्त हो रहा था ,समुद्र तट पर बैठ प्यार भरी बातें करते हुए शरद ने ही कहा था ," समंदर की लहरें अपने साथ ले गई चीज़ों को वापस अवश्य लौटा देती हैं,"वह सोचती रोती रही , शरद ने कितना बड़ा झूठ बोला था   'समंदर ऐसा कभी नहीं करता.'

Friday, February 21, 2014

प्रेम,प्यार,इश्क़,मोहब्बत में एक 'अधूरे' वर्ण की पहेली

ब्लॉग की शुरुआत  एक ताज़ा घटना से ही करती हूँ.हमारे जान पहचान के ही एक इंजीनियरिंग के छात्र ने वैलेंटाइन डे के दिन फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली वज़ह प्रेम में असफलता मानी जा रही है.एक स्त्री ने कहा ,"किसी लड़की के चक्कर में मरा होगा ,माता-पिता के लिए थोड़े ना कोई जान देता है."इसी बाबत चर्चा के दौरान एक युवक ने कहा ,"आँटी ,प्रेम में मरने से ज्यादा अच्छा है मार देना."मैं युवा पीढ़ी के इस सोच से व्यथित हुई,मैंने कहा,"क्यों ,दोनों के मध्य भी तो एक राह है.तुम लोग वैलेंटाइन और प्रेम दोनों के ही अर्थ को समझ नहीं पाते."मुझे उस लडके के असमय मौत के साथ इन युवकों की सोच और वैलेंटाइन डे की प्रासंगिकता ने कुछ सोचने को विवश कर दिया .
प्रेम में एक ना होने के दुःख से लैला-मजनूं,शीरी-फरहाद,हीर-रांझा के साथ मरने की सोच को तो मैं सिरे से खारिज़ करती हूँ पर वैलेंटाइन डे के नाम पर प्रेम के झोंके से भी थोडा गुरेज़ रखती हूँ कारण प्रेम का उत्सव मानना कभी बुरा नहीं है .वर्त्तमान द्वेष घृणा के परिदृश्य में तो यह अत्यंत प्रासंगिक है यह भारत भूमि पर बसंतोत्सव का मुख्य केंद्र बिंदु सदियों से रहा है पर प्रेम के इस पर्व के नाम पर दिखावा,व्यापारीकरण,युवाओं का अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ प्रेम के नाम पर स्वयं के जीवन और भविष्य से खिलवाड़ को मैं उचित नहीं मानती .एक दिन प्रेम का ज्वार और फिर एक दिन प्रेम के नाम एसिड अटैक...प्रेम में मर जाना ...मार देना ...यह युवा पीढ़ी सीख जाती है पर प्रेम का असली रूप क्या है नहीं जान पाती.
पर प्यार की वह राह क्या है..जिस पर इस कुदरती प्रेम के कदम सलीके से,सहजता से बढ़ें ...जीवन के उपहार को समझते हुए ...जीवन के महत्व को अपने ,अपने परिवार,समाज,देश,और विश्व के लिए ज़रूरी मानते हुए ये कदम विकास की राह पर बढ़ें ....वे लैला मजनूं की तरह फना ना हों .....ऐसी ऐतिहासिक इबारतें समाज को कोई नई दिशा ना दे सकेंगी....प्रेम में पड़ कर वैलेंटाइन डे मनाने के साथ एक अहम् बात याद रखनी है कि 'बड़े भाग मानुष तन पावा' प्रेम का यह एक दिन मानना उचित है कम से कम एक दिन तो दुनिया प्यार से लबरेज़ हो जाए पर इसके बाद मरने मारने और जीवन नष्ट करने की बात तो कोई प्रेम नहीं सिखाता.वे कौन से बिंदु हैं जो वैलेंटाइन डे को युवाओं के लिए प्रेम की नई सोच बना दें ....प्रेम की ऐसी कौन सी परिभाषा है जिससे रूबरू होना आज का तकाज़ा है.आज मैं इस ब्लॉग के माध्यम से ऐसे ही कई प्रश्नों के ज़वाब पर पर केंद्रित होंती हूँ....
एक संकलित कविता की कुछ पंक्तियाँ उद्दृत कर रही हूँ...
चाँद अगर मिल सका ना मुझको
क्या होगा सारा उजियारा
रूठ गए यदि तुम ही मुझसे
फिर जीवन का कौन सहारा
तुम्ही सुधामय अमर प्रीती हो
तुम्ही मिलन का मधुर गीत हो
बिन तुम्हारे रह जाएगा
मेरा भाव सिंधु ही खारा.

यह सच है कि प्रेम में खोने का भाव पीड़ादायक होता है जैसा कि ऐतिहासिक इबारतों में दर्ज़ शीरी-फरहाद,लैला-मजनूं,हीर-रांझा के प्रेम और उसकी दुखद परिणति साबित करती है.पर दोस्तों मैं इस ऐतिहासिक प्रेम को अत्यंत संकुचित मानती हूँ.वह प्रेम ही क्या जो व्यापक होकर समाज को प्रेममय ना बनाये.उपरोक्त पंक्ति में 'बिन तुम्हारे रह जाएगा...भाव सिंधु ही खरा' क्या सिंधु का कोई महत्व नहीं होता .जो सुधा मयी है वह समाज हित में भी अमृत हो सकता है पर जब वह हासिल नहीं हो पाता तो उसे मिटा देना कहाँ का न्याय है और प्रेम का कैसा रूप है .आप सब ने गौर किया होगा या नहीं पर प्रेम और उसके समानार्थक सभी शब्द प्यार,इश्क़,मोहब्बत में एक वर्ण आधा है अर्थात इनमें से कोई भी शब्द सम्पूर्ण नहीं है .प्रेम में असफल होने वाले,प्रेम में जान दे देने वाले सभी लैला मजनूं,शीरी फरहाद ,हीर-रांझा ने बस इस अधूरे वर्ण के महत्व को नहीं समझा .दरअसल दो वर्णों की सम्पूर्णता के बीच सभी शब्द(प्यार,इश्क़,मोहब्बत) का आधा वर्ण दो प्रेमियों के संकीर्ण दायरों के बीच अन्य रिश्तों और समाज की व्यापकता से जुड़ा है प्रेम तो दो के बीच ही होता है पर आधा का वह अल्पांश उस प्रेम से लाभान्वित होना चाहिए इसके लिए प्रेम में मर कर नहीं बल्कि प्रेम में जीकर उसके प्रवाह से पूरी मानवता को प्रेममय बनाना है.प्यार की सम्पूर्णता तभी है जब उस आधे वर्ण को भी समझा जाए वह संतान,माता-पिता,भाई-बहन या कोई भी प्रियजन हो सकता है.यह आधा भाग ही प्यार शब्द में सेतु का काम कर प्यार को चिरंजीव बना देता है.जिसने इस आधे वर्ण की पहेली को गहनता से समझ लिया उसके लिए प्रेम इबादत है बोझ या पलायन नहीं.हमारे प्रेम से कुछ अन्य लोग भी जुड़े हैं ...हमारा प्रतिबिम्ब औरों के वज़ूद में भी है...अपनत्व से भरा यह एहसास प्रेम को व्यापक अर्थ देकर ह्रदय को बेहद नम बना देता है.इस आधे का भाव बहुत प्रीतिकर बहुत मोहक है प्रेम में अगर मिलन ना हो तो भी उसे अलग-अलग होकर भी जिया जाए और दूसरे की खुशी में उस प्रेम को रूपांतरित कर दिया जाए .प्रेम में पड़कर..जान दे देना या जान ले लेना बहुत ही अव्यवहारिक तथा पलायनवादी धारणा है.प्रेम का भाव तो वह मज़बूत पकड़ है जो पतंग को डोर से और डोर को पतंग से जोड़कर..रवि का रश्मि से ..रश्मि का रवि से...सुमन का सुगंध से ..सुगंध का सुमन से ...जोड़ कर एक दूजे का अस्तित्व बनाये रखती है पर यह जुड़ाव प्रकृति के हित में है विरोध में नहीं ..पतंग को आकाश में पूर्णता से उड़ने की छूट होते हुए भी वह अपनी आजादी को नहीं स्वीकार करता ...सुमन और सुगंध औरों की खुशी के लिए भी जीते हैं...सूर्य की रश्मियाँ जन-जन को प्रकाशित करती हैं.सूर्य के अस्त हो जाने पर भी वे रश्मियाँ ऊर्जा बन कर जन -जन को संचालित करती हैं...सुगंध सुमन से पृथक हो कर भी इत्र बन औरों के काम आ जाता है.अपने प्रिय से अलग होकर भी किसी भी रूप में अपना अस्तित्व बचाये रखता है ताकि कुदरत उससे लाभान्वित हो सके .ऐसे प्रेम में होना व्यक्ति को आतंरिक और बाह्य सुंदरता से भर देता है और नेत्र इस प्रेम की चमक का दर्पण बन जाते हैं.
इंसान के अकेले आने और अकेले जाने का जीवन दर्शन चाहे प्रत्येक संस्कृति ,सभ्यता , देश काल का अभिन्न अंग रहा हो पर हकीकत तो यह है कि जन्म के बीज रूप में ही उसका अस्तित्व प्रेम में पड़ जाता है क्योंकि उसकी उत्पति ही प्रेम की परिणति के रूप में होती है.स्त्री-पुरुष के हाड मांस ,रक्त मज्जा से बना बीज जन्म के साथ माँ के प्रेम में होता है .जन्म के बाद पूरी जीवन यात्रा में अपनी रिक्तता को सिर्फ प्रेम से भरता है.और जब मृत्यु होती है तो अपने पीछे प्रेम ही छोड़ कर चला जाता है.
अगर प्रकृति में प्रेम ना होता तो कला के समस्त आयाम लेखन,शिल्प,नाट्य,चित्र,गीत-संगीत,कितने संकुचित और अधूरे-अधूरे से होते.प्रेम ही तो वह भाव है जो अपने संयोग और वियोग दोनों ही पक्ष में प्रकृति की धूप-छाँव की प्रमाणिकता को मूक और मुखर दोनों रूपों में व्यक्त करने की क्षमता रखता है.संयोग की धौकनी से धड़कता है तो वियोग के अंसुअन से भीगता है.कला क्या विज्ञान के नियम भी प्रेम से इंकार नहीं कर सकते .ब्रह्माण्ड का कण-कण गुरुत्वाकर्षण शक्ति से गतिमान है प्रेम के अस्तित्व की इससे बड़ी प्रमाणिकता और क्या होगी . एक नन्हे से बच्चे को भी मैंने प्यार से हाथ पकड़ कर मुस्कराते देखा है .एक प्रेम से भरा ह्रदय अपने आस-पास की फ़िज़ा को भी प्रेममय बना देता है.हाँ भौतिक शास्त्र का नियम 'समान समान को विकर्षित करते हैं' ..प्रेम शास्त्र में नहीं लागू हो पाता यहाँ तो मीलों दूर बैठा प्रेमपूर्ण ह्रदय अपने जैसे कई प्रेम भरे ह्रदय को आकर्षित कर प्रेम का संवाहक बन जाता है.
प्रेम के सभी रूपों में वैवाहिक प्रेम तो स्वयं में एक तपस्या है जो कभी एकांत में बजती वेणु की ध्वनि है तो कभी पारिवारिक नीड़ में पंछी का कलरव.एक के चेहरे की प्रेममयी छवि मानो वह पारस कि जिसे छू दे वही सोना हो जाए उस प्रेम की आभा से दीप्त हो जाए.आँखों से ढलके स्वाति की बूँद किसी और की आँखों की सीप में कुछ यूँ बंद हो जाएं कि मोती का जन्म हो जाए.यही प्रेम मयी खुशी समाज की खुशी का आधार है युग बदल जाए..प्रेम का माध्यम बदल जाए पर प्रेम का भाव अपरिवर्तनीय है वह हमेशा निश्छल है पवित्र है.नित्य नूतनता का एहसास वैवाहिक प्रेम का तकाज़ा है.बहती धारा सा निरंतर प्रवाह..प्राणदायिनी वायु सा अदृश्य झोंका जो जीवन के प्रत्येक पहलू,प्रत्येक रिश्ते को छूकर अपने होने का एहसास कराये .पति-पत्नी का प्रेम पूरे परिवार को प्रेम सिक्त कर सके...बस यही है दो वर्णों की सम्पूर्णता के बीच उस आधे वर्ण की अपूर्णता की पहेली....प्रेम मूक हो या मुखर इसकी भाषा अत्यंत बोधगम्य है,बशर्ते इस शब्द के वर्ण में निहित रहस्य (दो वर्णों की अपूर्णता नहीं ;ढाई वर्णों की सम्पूर्णता)को समझा जा सके.जो प्रेम,प्यार,इश्क़,मोहब्बत में असफल होने की बात करते हैं उनसे बस यही गलती हो जाती है कि वे अपने अस्तित्व के सम्पूर्ण वर्णों पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं और अपने साथ अटूट सम्बन्ध के रूप में समाज परिवार के आधे वर्ण को पूर्णतः उपेक्षित कर देते हैं और उनका प्रेम डबरा बन जाता है जिसका जल अपनी ही संकीर्ण दीवारों में टकरा-टकरा कर वापस लौट जाता है और एक दिन बिना समाज का हित किये मृतप्राय हो जाता है.
प्रेम तो ऐसा है कि ना मिल कर भी गीत बन जाए........


जब रिसता है प्यार तुम्हारा

बह उठती है गीतों की धारा .

Wednesday, February 19, 2014

चाय के' कप' और 'होंठ' के बीच की दूरी

दोस्तों,राजनीति आज संसद के गलियारे से चाय के चौपालों पर दस्तक दे रही है.राजनीति के इस बदलते रूख पर गीत संगीत की शौक़ीन मैं गुनगुना रही हूँ..."एक गर्म चाय की प्याली हो..देश में जन-जन की खुशहाली हो"पर यह जन-जन की खुशहाली सिर्फ चायवालों तक ही तो सीमित नहीं.....चाय परोसने के लिए कप भी चाहिए और अगर ये कप मिट्टी के बने कुल्हड़ हों तो मान ,मानुष और माटी की त्रिवेणी बह जायेगी.'आम के आम गुठलियों के दाम'वाली कहावत चरितार्थ हो जायेगी.आप सोच रहे होंगे वो कैसे.देखिये ,पहली बात अब तक किसी भी राज नेता ने हमारे कुम्हारों की सुध नहीं ली है ये भी आम जनता हैं इन्हे इस चाय चौपाल के बहाने काम मिल जाएगा और नेताओं को एक विशेष वर्ग का वोट हासिल हो जाएगा.दूसरी बहुत अहम् बात यह कि अब तक किसी भी राजनीतिक दल ने बहुत ही महत्वपूर्ण और ज्वलंत बिंदु 'पर्यावरण संरक्षण'को चुनावी घोषणा पत्र में मुद्दा नहीं बनाया है तो यह काम भी चाय चौपाल में कुल्हड़ के प्रयोग से हो जाएगा.प्लास्टिक के कप तो बिलकुल प्रतिबंधित हों और कागज़ के कप को भी इस लिए प्रतिबंधित किया जाए कि इससे वन का कटाव होगा तो बस बात माटी पर रूक गई माटी का कप माटी में मिल कर ईको-फ्रेंडली ही साबित होगा.है ना .....हल्दी लगे ना फिटकरी;रंग चीखा आये 'वाली बात.
चुनाव में अब भी कुछ महीने बचे है कप और होंठ के बीच की यह दूरी और इसके बीच कई स्लिप्स (many a slip between cup and lip )...कदम सोच समझ कर तार्किकता से तो रखने होंगे .
यूँ भी चाय ही एक ऐसी चीज़ है जिसने सिर्फ जोड़ने का काम किया है...कोई नाराज़ है चाय पर बुला लो (दूरियां नज़दीकियां बन जाएँगी)...कोई मीटिंग सीटिंग करनी है चाय के बगैर अकल्पनीय ....(जहां चाय-वाय मिल जाय वहीं बात बन जाय)...लड़की के विवाह के रिश्ते तय करने हैं ट्रे में चाय पकड़ाकर प्रस्तुत कर दी जाती हैं(शायद मेरी शादी का ख्याल दिल में आया है...इसीलिये मम्मी ने मेरी तुझे चाय पे बुलाया है )रिश्वत की बात हो तो भैया ज़रा चाय पानी का तो इंतज़ाम कर दो...एक कप चाय पर लाखों करोड़ों की डील हो जाती है..अब तो गाँव में भी ताज़े गुड के दही वाले शरबत से आवभगत अफ़साने से हो गए हैं ...हम सब सभ्य हो गए हैं तभी तो एक शायर ने भी अर्ज़ किया है
सभ्यता के नाम पर गाँव से क्या शहर में आये

एक प्याला चाय बन कर रह गई है ज़िंदगी

फिर चाय तो भारतीय राष्ट्रीय आय का भी अच्छा स्त्रोत है..भारत चाय का .ज़बरदस्त निर्यातक भी है .और चाय की विविधता के क्या कहने !!!!!!!!!अदरक वाली,नीम्बू वाली,फीकी,तेज़,कड़क,दूध वाली,हरी,हर्बल जैसी कई विविधताओं के बाद भी वह सिर्फ चाय है चाय और कुछ भी नहीं.विविधता में एकता की इससे अच्छी मिसाल कहाँ मिलेगी?
अब थोड़ी गम्भीर बात करती हूँ .एक चायवाला राजनेता बन जाए तो बार-बार ध्यानाकर्षित क्यों किया जाए ?एक शिक्षक उप राष्ट्रपति बन जाए तो उसके जन्म दिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मना लो ....बच्चों से बहुतों को प्यार होता है पर हम एक प्रधानमंत्री से ही बाल दिवस को जोड़ते हैं ...एकता दिवस,सद्भावना दिवस ,युवा दिवस ....जाने कितने दिवस .....किसी भी एक आम बहादूर बच्चे के नाम पर या किसी भी आम संवेदनशील व्यक्ति के जन्म दिवस पर है .???...है भी तो समंदर में बस एक बूँद सा .अब क्या हम चाय दिवस भी मनाएंगे? लोग शक्ति इसीलिये चाहते हैं मणिशंकर अय्यर का बयान आम आदमी के काम की एक तरह से नज़रअंदाजी ही है.जब लोगों के काम को महत्व नहीं मिलता तो वे पॉवर चाहते हैं .सच तो यह है कि चायवाले,रिक्शेवाले,सफाई कर्मचारी,जूते बनाने वाले सभी ज़रूरी है समाज की आधारशिला है आम आदमी को एक राष्ट्रपति की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ज़रुरत नहीं पड़ सकती पर इन आधारभूत कार्यों से जुड़े लोगों के बगैर एक दिन भी काम ना चले.एक चाय वाला अगर कुशलता और ईमानदारी से चाय बेचता है तो वह एक राष्ट्रपति के बराबर ही सम्मान क्यों नहीं पाता ...??बस यही से सत्ता और पॉवर का भयानक खेल शुरू हो जाता है जिस दिन प्रत्येक व्यक्ति के काम को सम्मान प्रत्येक व्यक्ति को उचित पहचान मिलनी शुरू हो जायेगी समाज से अपराध ख़त्म हो जाएंगे.मणि शंकर अय्यर की यह टिप्पणी कोई नई बात भी नहीं है .अमेरिका में ऐसा ही हुआ था.


अब्राहम लिंकन के पिता जूते बनाते थे,और लिंकन राष्ट्रपति बन गए.अमेरिका के रईस क्षुब्ध थे.सीनेट को सम्बोधित करते प्रथम भाषण में ही लिंकन को एक शख्श ने रोका और कहा ,"श्रीमान लिंकन,आप दुर्घटना वश राष्ट्रपति बन गए हो ,तुम्हारे पिता जूते बनाते थे,मैंने यह जो जूता पहना है तुम्हारे पिता ने बनाई है मैं क्या मेरे परिवार के प्रत्येक सदस्य के जूते तुम्हारे पिता के ही हाथों बने हुए हैं."सीनेट ठहाकों से गूँज गया.सब ने सोचा कि लिंकन को हतोत्साहित कर दिया गया पर लिंकन जैसे शख़सियत को अपमानित करना सम्भव ही नहीं है.हाँ ,लिंकन की आँखों में आंसू ज़रूर आ गए.उन्होंने कहा,"मैं आपके प्रति आभारी हूँ कि आपने मुझे मेरे पिता की महानता की याद दिलाई,वे एक कुशल मोची थे,मैं उतना कुशल राष्ट्रपति बन पाउँगा या नहीं ...पता नहीं.जैसा कि आपके और आपके परिवार के सदस्यों के जूते पिता ने बनाये हैं पर चूँकि अब वे इस दुनिया में नहीं है अतः मैं पूरी सभा को बताना चाहता हूँ कि उन्होंने थोडा बहुत यह काम मुझे भी सीखाया है आप के जूते अगर अधिक कसे ढीले या मरम्मत के लायक हों तो मेरे पास भेज दीजियेगा मैं उनकी मरम्मत कर दूंगा.हो सकता है कि मेरा काम मेरे पिता के काम की तरह कुशल ना हो और आपको संतुष्ट ना कर सके पर मैं सर्वोत्तम देने की कोशिश करूँगा."

पूरी सभा निस्तब्ध थी .लोग विश्वास नहीं कर सके.यह आदमी किस मिट्टी का बना है ...पूरी सभा में ऐसा अपमान पर इसने तो अपमान को सम्मान बना दिया था.
सच है काम तो बस काम है तन्मयता,ईमानदारी,सम्मान के साथ किया हुआ काम सम्मान पाने का अधिकारी है पर हम एक चाय वाले को' अबे सुन' कह कर बुला लेते हैं....एक रिक्शे वाले से दो रूपये पर बहस कर लेते हैं...एक सफाई कर्मचारी को अलग बर्तन या गिलास में पानी पीने देने से नहीं घबराते ....जबकि हमारा संविधान इसे गलत मान चुका है... पर इन्ही में से कोई अगर राजनेता बन जाए पॉवर में आ जाए तो बस बिछ-बिछ जाते हैं.....तब हमारी सोच की परिधि उस शक्ति को केंद्र मान उसके चारों ओर घूमने लगती है.....मुद्दा मोदी जी के चाय बेचने वाले से सम्भावित प्रधान मंत्री बनाने के सफ़र का नहीं है ....प्रश्न है उस सोच को बदलने का कि एक चायवाला एक प्रधानमंत्री की तरह ही सम्मानीय क्यों नहीं ....सामाजिक संरचना के टी स्टाल में एक चाय के कप और होंठ के बीच इतनी दूरी क्यों .....जब कि दोनों अपने अपने कार्य को शिद्दत से करते हैं .एक चायवाला, एक रिक्शे वाला ,एक कुम्हार ईमानदारी से अपने और अपने परिवार का पेट पालता है पर वह अपमानित होता है .आम जनता ,मोदीजी और सभी राजनेताओं को इस बात की गहराई समझनी होगी कि चुनाव के बाद भी समाज के इन आधारभूत ढाँचे से जुड़े लोगों की फ़िक्र करें आज eleventh hour  में कोई ३९ बिल पास कराने को आतुर है तो कोई आम जनता का सबसे बड़ा शुभचिंतक होने के दावे कर रहा है....
बस एक गुज़ारिश है कि हम जनता को statesman चाहिए politician नहीं क्योंकि james freeman clarke की माने तो
"A politician thinks of the NEXT ELECTION  .A statesman of the NEXT GENERATION."

कुदरत में है एक बात सही

वह एक शख्श ....
जिससे कभी थी ना मैं मिली
मेरे तसव्वुर में ...
हक़ीक़त बन उभर आता था
उभरती थी उसमें
पिता सी ही रोबीली छवि
वही घनी मूंछें कर्नल सी
और मूंछों से छुपती मुस्कान
कोमलता कठोरता का
था वह कितना अद्भुत भान

वही गहरी आँखें पिता सी
सब कुछ देख पाने की क्षमता
सारी पीड़ाएं..सारी खुशियां
वही सागर सा ह्रदय विशाल
समझती जो हर विवशता
पिता के नज़्म गीतों को सुनते
अकसर उभर आता था वो चेहरा
फिर वह ख्वाब होने लगा अज़ीज़
पिता की हकीकत से भी ज्यादा
और फिर एक दिन....
जिम्मेदारी की बेबस आवाज़ ने
मानो फेंका कंकड़ तालाब में
पूछा पिता ने..........
"कोई पसंद हो तो देना बता"
जाने कहाँ से आया साहस
जाने कैसे हिले अधर
"जो भी हो बस हो आप सा"
गए एक साथ सुर बिखर

पिता के लिए था अप्रत्याशित
ऐसा मुझे लगा नहीं
हाँ एक गौरव था रहा झलक
एक संतुष्टि की थी चमक.....
'हर रूप में देखा इस छवि को
ओह!है कितनी भोली नादाँ
या फिर ये है मेरे
असीम प्यार का प्रतिदान ??'
मैं नादाँ थी...
वैवाहिक सम्बन्ध के
एक पहलू से सर्वथा अनभिज्ञ
भीगे पलक से देखा था
थे भीगे पिता के भी दृग
और फिर वह दिन भी आया
जब था पिता संग वो खड़ा
ख्वाब अब हकीकत बना
पिता की हर खूबी हर बात थी मौज़ूद
कहाँ से ढूंढा पिता ने अपना ही वज़ूद
होगा कितना पिता ने परखा
होगा कितनों की भीड़ में देखा
सच है ....मैंने जी भर सोचा
यह पिता ही कर सकते थे
मेरी पसंद उनकी पसंद बनी
अपनी पसंद में भी तो वे ही थे
पिता छोड़ बहुत दूर गए हैं
अपनी ही छवि छोड़ गए हैं
जीवन के चिर परिचित सी ही
जानी पहचानी राहों में
सागर से जन्मीं दरिया
है सागर की ही बाहों में

वही संरक्षण;वही दुलार
वही विश्वास;वही प्यार
इस शाख में भी है वही
मज़बूत दरख़्त सी छाया घनेरी
क्या खोजती ऐसा ही बिटिया मेरी

क्या उसके लिए भी वही
प्यारी सी है दिखती छवि
कुदरत में है एक बात सही
अपने हमसफ़र में हैं खोजती
बेटियां पिता सी ही छवि.

Saturday, February 8, 2014

पुरुषों को भी होती है चाहत

ईश्वरीय अनुकम्पा से 'प्रेम' मेरे लिए कभी संघर्ष का विषय नहीं रहा.किशोरावस्था से प्रेम की जिस परिभाषा को मन ने गढ़ना शुरू किया व्यस्क होने पर वही दामन में उपहार बन समा गया.स्त्री पुरुष के बीच प्रेम की इस विषय-वस्तु को मैंने कांच और पत्थर के रिश्ते सा नहीं बल्कि नीर-क्षीर मिश्रण सा महसूस किया है जहां दो पृथक वज़ूद मिलकर एकसार हो जाते हैं.मैंने स्त्री को अगर पुरुष की बराबरी की चाहत में छटपटाते देखा तो पुरुषों में भी स्त्रियों के मानक महानताओं की ऊंचाई पाने की चाहत देखी.इसलिए मेरे लिए प्रेम ज़िंदगी के गणित के योगात्मक पहलू (१+१=२) की बजाय गुणात्मक (१*१=१ ) पहलू है जहां एक एक मिलकर दो नहीं बल्कि एक और एक गुणात्मक रूप से  एक हो जाते हैं ..एक शरीर..एक धड़कन...सुख-दुःख सब साझा होकर एक ....बस यही प्रेम की स्पष्ट...साफ़ और सरल परिभाषा है.क्योंकि........
ज़िंदगी.....सिर्फ...
एक ही छत के नीचे रहने का नाम नहीं
बात-बात पर एहसान जताने का काम नहीं
हल्की दरारों को खाई बनाने का पथ नहीं
सांसें गिन-गिन कर बढता खींचता रथ नहीं
शाम होते ही लौट आते हैं पंछी भी नीड़ को
रहने खाने का इंतज़ाम करना आता कीट को
पर.......
मनुष्य ज़िंदगी रहने-खाने के अतिरिक्त भी कुछ है
एक छत के नीचे रहते हुए
करने होते हैं साझा ....
कुछ मूक संवाद....कुछ अनदिखे कष्ट
समझनी होती है....
हंसते होठों की पीड़ा...रोती आँखों की क्रीड़ा
थामने होते हैं हाथ....
जो घंटों बेलती हैं रोटियां....वर्षों कमाती हैं रोटियां
मिलाने होते हैं कदम.....
भूत,वर्त्तमान,भविष्य के....चलती-थमती रहस्य के
देने होते हैं हक़.....
बात अपनी समझाने के...मान -इज्जत पाने के
सुनने होते हैं पल....जो निकले ....
विकलते मन के आर-पार....पोरों से बहते सस्त्र धार
क्या कभी साझा किया विश्रांत क्षणों को ??????
कभी साहस कर तोड़ा एक-दूजे के मौन को ????
स्त्री ने पुरुष से...पुरुष ने स्त्री से ....पूछा कब ????
बिन बात के भी क्यों....होठं फड़कते हैं तेरे
बिन मेघ के ही क्यों....नयन बरसते हैं तेरे
मार हर मौसम की कैसे....शरीर सहते हैं तेरे
बिन हथेली स्पर्श से क्यों ...दृग बर्फ पिघलते हैं तेरे
जज़बात किस भय से यों ...मूक रहते हैं तेरे
क्या कभी झाँक कोशिश की देखने की ?????
अंतस का वह गहन कूप...परिणति थे जो अंसुअन के
समस्त छुपी वेदनाओं के...पिघलते लावा दहक तपन के
ये कैसी पहचान कि....
पंख टूट जाएं तो ...उड़ान का एहसास हो
पर्ण बिखर जाएं तो...दरख्त का आभास हो
नींद आँखों को छोड़े.. तो स्वप्न का वास हो
संयोग में ही मानो..पतझड़ का मधुमास हो
सर्द कब्रों को बस गर्म अश्कों ही का आस हो
एक छत के नीचे रहने वाले.....
दो विपरीत ध्रुव नहीं.....दो विपरीत कूल नहीं
पूरक होते एक-दूजे के
ख़ास होता अर्थ नन्हे वज़ूद का
सच है कि स्त्री............
कृतज्ञ समर्पित हो जाती है
वात्सल्य प्यार स्नेह लुटाती है
कोख,तन मन मस्तिष्क के....समस्त बोझ उठाती है
त्याग स्वहिस्से का अधिकार...महानता का तमगा पाती है
रीति रस्म रिवाज़ों के ...भावना सूत्र से बंध जाती है
आँचल के अमृत घट से...राखी के रेशम सूत्र से
चुटकी भर रक्तिम सिन्दूर से..मान की स्नेह जंजीर से
पर सदियों से बराबरी की आकांक्षा में ....स्त्री...
अक्सर यह समझ नहीं पाती कि....
पुरुषों को भी होती है चाहतस्त्री सी ऊंचाइयां छूने की.
-yamuna

Better to be value than to teach & preach value

Mother was busy to give a special look to the room..she shifted T.V.from sitting room to that particular room...placed a small tripod beside the bed to keep medicines on that...soft cushions on sofas.....soft comfortable mattressess on the bed covered with light sky blue coloured & floral printed bedsheet ...
Seeing the whole preparation 14yrs daughter curiously asked,"Maa,what are these preparation for?" mother smiled & said,"Your grandmother is coming to stay with us...your papa loves his mother very much & I love your papa very much...the preparation is all about that."
With shining eyes the daughter responded happily,"Oh! so sweet of you ma, I too will do the same preparation when you & papa will come to  my job station...."
Mother embraced her daughter ....she thought "ITS BETTER TO BE VALUE THAN TO TEACH VALUE."

' Kohinoor ' (Times Ascent); I treasure

I would like to begin  my blog with Sandeep Aurora 's line collected by me from his article 'Boredom Dead' published on Dec 18,2013 in Times Ascent

"Use technology to make your boredom fruitful"
Its my pleasure to get an opportunity to allow my collection (kohinoor) from  Times Ascent to  radiate .which I used to  treasure every Wednesday.Three yrs back I left my job due to transferable nature of my life partner's job .To me  'Times Ascent' has never ever been a source of searching for a job....but it has been proved  as a good source of sweet water lake to quench my thirst for learning.I treasure all the nice articles especially from 'Voice of HR' as the section  gives me the way to enter my life partener's job to understand him better his comforts...his stress ,articles from Talent Diaries I collect due to being  passionate  about  writing .
I would like to show the shining rays of this kohinoor.....here are some glimpses of my collection....

Articles by Viren Naidu

1)As my daughter is the most precious gem in our life i liked the article ' Mum's The World 'published on May 5,2010 as those days I was working lady so it had become an eyecatching headline "many working mothers feel that by working they are taking some thing valuable away from their children:time"...& the unique ways to address this dilemma showed  me some beautiful ways...to cope with my passion ,upbringing my only lovely daughter ...as well as with  teaching job.

2)Feb8,2012 questions during a job interview (No Straight Question)modern day interview ques are insightful well researched & slightly twisted .The example by  the ques 'if your work life were to featured in the news what would the headline say & why?was really interesting I conveyed it  to my husband .I like to do this as his busy schedule seldom allows him to go through the articles.(its also true that  i do believe ....."if one has interest ;time never becomes  an issue.....if you love & like to do the thing you always have time for it.")
3)oct,10,2012 'Bossophobia '
Are all bosses by definition dictators?if not,then why fear them"
4)March 7,2012 Advantage Women Inc
How even today women's achievements continue to be defined by gender.further these gender association get highlighted every year on the 8th of march that women's day section I like the most.

HR Voice

This corner of Times Ascent attracts me due to my  love for  life partner as I wish him to flourish in his very job of HR.

1)Self Empowerment v/s Self Branding by Mukund M Patil well illustrated with the example of Eklavya & Sachin Tendulkar
2)The Story Of My Mentor by Snehil Sarkar most likeable line"the last yet most valuable lesson people are your biggest asset."

Talent Diaries ........its my favourite corner

1)June 19,2013 'The Art Of Asking (Marshal Goldsmith)
Peter Drucker once said,"The leader of the past knew how to tell,the leader of the future will know how to ask."
the ques "Have you ever asked your wife how you can become a better husband." is quite relevant to the article.
2)Nov 6,2013 HR  ,Slow And Steady (Ninad Karpe)
in the article two points are appreciable
a) Its a social social world
b) Knowledge is free
3)Dec18,2013 'Boredom Dead' (Sandeep Aurora)  liked the line "use technology to make your boredom fruitful inspired me."
4) Will an HR  manager ever get the coveted CEO 's
answer by T V Rao widely regarded as 'THE FATHER OF INDIAN HRD'  is quite readable article.

now,some other collected gems.....

in the list first I would like to mention two very nice articles by Lynn Lobo
Oct 26,2012 'Are you a monogamous worker '?
'Superstitious Traps ' I agree with Sudhanshu Pandit director HR Symantee India "Your employees cultural and personal ideas are their own;as long as they do not cause inconvenience or discomfort to others or affect performance."
1)12 June 2013 "when women take career breaks employer should continue to engage with them (Kalpana Marparia)
2)March 27,2013 'Leadership It Takes Two To Tango' (Priya C Nair)
India Inc  -Shared Leadership
"The organization must have a high spirited workforce employee friendly HR policies and a strong and passionate leader who could actually work with the employees and management...."
3)May 16,2012 from 'Disengagement To Departure (Sheetal Srivastava)
eye catching line "It is said that people don't leave companies they leave bossess.
4)19 June 2013' Induction With A Difference'
new techniques cited by (palak bhatia) quizzes,two min chat,musical prog.etc
5)Peak Hour Idea Traffic (Dr David Rock)
Why working professionals should not live in the false belief that decisions can be made all day long.
6)Are you an organization that nobody wants to leave.(Rustam Lawyer)
strategies for retaining & nurturing an efficient work force .
I read the article for my life partner.
7)11Sept,2013 CSR-The Next Level (Susir Kumar)
CSR -create shared value drive business growth & aid is employee align .As my home town is Jamshedpur(TISCO steel city with Value Stronger Than Steel)& my husband works with ACC- we can say Value Higher Than Skyscraper (Cementing Relationship.....Sada Atoot Raho))...so having the Combo of two value based working culture  ....sometimes I try to understand  the CSR  of both TISCO  as well as ACC  thus ...the article gave me insight to  this way .
8)11th Sep,2013 a culture of success (Govind Krishna) critical role of HR  in creating an organizational culture...HR  plays a significant role in preventing the clash of culture.
9)'Talent  Issues ? Look within' by Manis Sinha.
"Build your own talent before you set out to buy someone."
10)Sep 4,2013 criticism that doesn't hurt by yasmin taj tells about constructive criticism extremely beneficial in this very sensitive work force of gen y.
11)28 Aug,2013 'the breakdown of hierarchies' by Ritu Mehrotra allows to play a rational role without being influenced by hierarchy.
12)'Do You Have A Hobby' by Unnati
Hobbies can help one unwind and distress in a big way.
13)April 18,2012 'Workaholism ,An Acceptable Trait ?(Arshie Chevalwala)
A thought ful line from the article..."There is a thin line between passion for your work and an unhealthy commitment to it."
14)'Are Appraisal Really A Nuisance ?'(Palak Bhatia)
15)Oct 16, 2013 'Is The Boss Always Right ? (Sunil Nayak)
some recent articles which i really liked ....are.....
1) From Mediocre To Excellent by Lalit Jain
2)A Zero-Tolerance Policy by Ankita Shreeram
3)Voice Of HR 29th january liked the winner vikas gera's view.(5 points)
4)Has HR Branded Itself? by S Mukherjee,

5)Manage,Monitor,Assess by Jarpreet Sethi
6)Virtual Team Spirit by Palak Bhatia

the best one i've collected is 'Once Upon A Time.....by
Ankita Shreeram
as i love  teaching job & story telling makes the job vital...i like this article very much.


At last but not least ...I am really thankful to Times Ascent for  all the collected gems .....I would like to be enriched all time (past,present,future)with more precious gems of times ascent for lifelong.........
With regards
yamuna pathak .

Tuesday, February 4, 2014

१)लूटेरी से पगली (२)लाल निशाँ

१)
लूटेरी से  पगली
एक ज़लज़ला
.आया ..और चला गया
लाशें बिछ गईं
लाशों की राह से गुज़रते
कुछ तलाशती
निराश हताश होती
वह औरत......
बंद कर दी गई
सलाखों के पीछे
साबित किया गया
लूटेरी है वह.
चुराती थी
बेज़ुबान ,बेकीमती
लाशों की
बेशकीमती चीज़ें .

नहीं कबूला उसने
उन जौहरियों के सामने
कि .................
तलाश थी उसे
सबसे बेशकीमती
कोहिनूर की
जो होती है बस
माँ के पास.
हर लाश के गले को
टटोलती
पाना चाहती थी
वह ताबीज़...
हर अला-बला से बचाने
अपने लाल को
पहना दी थी उसने.
उन अधजली लाशों में
कौन सा होगा
उसका अपना चेहरा
इसी तलाश में
उसने था टटोला
बस यही ना कबूला
सहा अत्याचार इतना
कि अब वह माँ नहीं
लूटेरी और फिर ......
लूटेरी से पगली बन गई है.
२)
लाल निशाँ

खतरों के आस-पास
लगा दिए जाते हैं
लाल निशाँ .
पर
कैसा विरोधाभास है !!!!!!!!!
वर्षों से खतरा साबित होते
पुरुषों की बजाय

स्त्रियों के लिए
निर्धारित कर दिए जाते हैं
यही ....
लाल निशाँ (सिन्दूर).

१)मेनका और रम्भा (२) किरदार

1)
मेनका और रम्भा
आनन के नभ पर फैलते
तुम्हारे ये घन कुंतल
जब हो जाएं
कपास की रूई से सफ़ेद........भरना मत इसमें कृत्रिम रंग .
झील की गहराई लिए
सुंदरता से दीप्त
ये दो नयन हो जाएं जब
बुझे दीपक से
तब भी.....................लड़ना मत रोशनी से जंग.
दामिनी सी दमकती
ये दन्त पंक्तियाँ भी
एक-एक कर दे जाए
पीड़ा जनक विदाई..........जड़ना मत झूठे ३२ दन्त .
सुराहीदार गर्दन की
कंठ ग्रंथि से उठती
मधुर गहरी गहरी सी आवाज़
आभास देने लगेंगी
सितार,वीणा,गिटार के
कम्पित तार का .............रोकना मत यह सप्त स्वर .
सुडौल,सुन्दर,स्वर्ण सी
दमकती काया
रह जायेगी
एक अस्थि पंजर मात्र
तब भी..............................समझना मत मेरे प्रीत का अंत .
मेरी ...
जन्म-जन्मान्तर की प्रेयसी
तुम्हारे ...
अंतर्मन के सौंदर्य का मोती
जिसे..
तुम्हारे ...
दिल की गहराइयों में उतर कर

पा लिया था मैंने
प्रथम मिलन में ही ....


वह दिव्य सौंदर्य
जीवित रखेगा सदा
तुम्हारे अंदर की
मेनका और रम्भा को.

2)

किरदार
गुलाब के विषय में
ठीक-ठीक कह लेते हो तुम
सुगंध से परिपूर्ण
सुन्दर है यह.
हाँ..यही है इसकी मौलिकता.
क्या हो सकते हो
इतने ही प्रमाणिक
किसी इंसान के लिए??
अंगुलिमाल ....वाल्मीकि
साधू संत....दुराचारी
कैसे हो जाता है ??
परिस्थितियां,समय,घटनाएं
इस कदर हो जाती हैं
असरदार...कि
हो जाता है
हैवान...इंसान
इंसान...हैवान .
फिर भी......
पहचानना हो ...
किरदार
किसी इंसान का जब........

परिस्थितियों की तुला पर
तौलने की कोशिश ना करना
परिस्थितियां भारी
व्यक्तित्व हो जाएगा हल्का
किसी अन्य की कसौटी पर

परखने की भूल ना करना
फंस जाओगे भ्रमजाल में
इसलिए कहती हूँ.......
केंद्रित होना बस
उसकी मौलिकता पर.
क्योंकि
गुलाब भी होता है
श्रीविहीन...
सर्द की बयार से
धूप की मार से
फिर भी....तुम उसे
गुलाब ही तो जानते हो
खूशबूदार...सुन्दर गुलाब.

TWINKLE & TEARS .....

1)
TWINKLE & TEARS
woman .....
with twinkles & tears in her eye ....
wants to see the whole sky
give her vision as clear as crystal
give her freedom to measure
the sky of her part.....
believe me.....
she'll never be lost in crowd
but will make the society proud .

2)




SUCCESSIVE FLIGHTS
little drops.....
reason for the existence of vast ocean
small words.......
give the meaning to poetry or fiction
many heads....
play role for success of organization
many hands.....
put ideas to action for building nation
countable stairs....
show us way to the upper floor
small steps.....
take a man to the last door
SUCCESSIVE FLIGHTS........
ENABLE AN EAGLE TO SOAR
many units.....
is required to make anything more
as..........so........
success depends on....
small actions done in heart core
happiness lies in......
seeing charm even in the chore.
3)
MIRAGE

Oh ! life......
why  do you change ???
with the presence & absence of loving ones
from sunny to cloudy
dusty & stormy.
i see your various shades
sometimes beautiful as rainbow
which colour should i choose??
oh!!!!!!!!!!!!!!
colours of rainbow......like mirage
visible for few minutes
can't colour whole life
i want to keep my loving ones
close....very close
hidden in my heart
so that no cloud may cover them
i don't like cloud...
i don't want rain.
4)
OUR INTENSE REALIZATION
Night seems extreme dark when dawn is at the distance of only two hours'
Wave seems at its highest when it has to cover only the two troughs .
Path seems difficult when destination is at the distance of only two steps.
Energy seems exhausted when success is to be captured by only two blinks .
to Win the War of this digit '2' just Equip yourself with the Weapon of WWW (Wait,watch,& work)
5)
TAKE LOVE LEAD




one day...
the LID on the POT
desperately..
grumbled to its soulmate (pot)
.......!!!!!......??????????
ignoring my needs...my thirst..
you quench the thirst of everyone
comes to you last or first
ahhhhh!!!!!!!!!
darling !!! what i can do ??
people come bend & lean
take as much as
they need
but....
you are always on my head
never came down & said
a drop of water is my need.
so........................
"be polite & take love lead"
-YAMUNA PATHAK