Saturday, October 6, 2012

अमराइयाँ गाँव की

इस ब्लॉग को लिखने के पीछे दो उद्देश्य हैं ;प्रथम सभी पाठकों/लेखकों को उनके बचपन के दोस्तों की याद दिलाना और यह भी ध्यान रखना कि हम बड़े ऐसी कोई रंजिश आपस में ना रखें जिसका प्रभाव हमारे बच्चों के मस्तिष्क पर फ्रेम में जडी किसी तस्वीर सा स्थिर हो कर रह जाए.दुसरा यह सन्देश देना कि अपने बच्चों को उनके दोस्तों के साथ जी भर कर खेलने दें. सुखद साथ की ये स्मृतियाँ आगे की राह में उनके चरित्र के अल्पांश का निर्माण भी कर जाती हैं .बस इतना ध्यान ज़रूर रखें कि आपके बच्चे, अपने दोस्त या बाल सखा के संग एक स्वस्थ वातावरण में खेलें .
दरअसल ,इस बार जब मेरी बिटिया हॉस्टल से घर आयी तो बातों ही बातों में उसने सहसा तीर की मानिंद एक प्रश्न छोड़ दिया ,"माँ, मैं तो फ़ोन पर अपनी सहेलियों से इतनी सारी बातें करती हूँ क्या आपको अपने बचपन की किसी सहेली की याद नहीं आती?"अब यह बाल गोपाल का यशोदा मैया से पूछे प्रश्न "मैया मेरी कबहूँ बढ़ेगी चोटी"जैसा बाल सुलभ प्रश्न तो था नहीं जिसमें एक प्रश्न के उत्तर के बाद उस उत्तर से ही प्रश्नों का निर्माण होने की अंतहीन क्रिया चलती रहती,यह तो बालपन और किशोरावस्था के संधिकाल का मासूमियत भरा अल्हड सा प्रश्न था जहाँ उत्तर की प्रतीक्षा का भी धैर्य नहीं होता.मैंने ज़वाब दिया,"याद आती है"उसने छोटे से शब्द 'हूँ' से काम चलाया और अपनी पढ़ाई में लग गयी.
पर उसके प्रश्न ने मुझे वो फाइल खोलने को विवश कर दिया जिसमें मैंने अपनी छठी,सातवीं.......कक्षाओं के परिणाम,समाचार पत्र में छपी कुछ रचनाओं की कटिंग और तमाम ऐसी चीज़ें सम्हाल कर रखी थीं जिनसे खाली वक्त में रु-ब-रु होना मुझे कभी-कभी बेहद सुकून देता है. .व्यग्रता से खोजने के बावजूद मैं वो हासिल ना कर पायी जो चाहिए था. बिटिया के जाने के बाद उसके प्रश्न से जुडी खोज की अधूरी कोशिश पुनः आरम्भ हुई और कहते हैं न "जिन ढूंढे तिन पाइयाँ"मुझे वह सम्पति मिल गयी जो हर किसी के बचपन की अनमोल धरोहर होती है चाहे वह द्वापर युगीन कृष्ण-सुदामा हों या फिर आधुनिक काल की मेरी बेटी.
मुझे मेरी प्यारी सी सहेली अनुपमा सिंह की तस्वीर और उसका लिखा हुआ अंतिम ख़त जिसके पन्ने बिलकुल पीले पड़ चुके थे वे मिल गए.अब यह अनुपमा कौन थी यह भी बताती हूँ,नाम के अनुरूप वास्तव में अनुपम,उस उम्र की लड़कियों से बिलकुल परे,चंचलता,चपलता से उसका दूर-दूर तक कोई वास्ता ना था,गहरी बड़ी-बड़ी आँखों में अजीब सी उदासी झलकती थी.मैं हर गर्मी की छुट्टियो में अपने गाँव जाती थी;पिताजी का यह मानना था कि शहर में पली-बढी लड़कियां अगर गाँव के वातावरण से भी परिचित रहे तो उनके लिए अच्छा ही होगा तब ये तो कल्पनातीत ही था कि गाँव भी शहर की तरह कुछ हद तक ही सही पर आधुनिक सुविधाओं से अवश्य ही सुसज्जित हो जायेंगे.अनुपमा सागर में पढ़ती थी;मेरी तरह वह भी गर्मियों में ही वहां आती थी,मैं आम के बगीचे में खेल रही थी वह मुझे वहीँ मिली.जाने, उसमें क्या आकर्षण था कि मेरा बालमन उससे दोस्ती को इच्छुक हो गया.उसने भी शायद कुछ ऐसा ही एहसास किया था तभी तो उस दिन के उपरान्त हम घंटों बाते करते,पेड़ों पर चढ़ते और खेलते रहते.
एक दिन वह मुझे अपने घर ले गयी,जब मैंने उसकी माँ को वैधव्य हाल में देखा तो पूछा"अनु,तुमने कभी बताया नहीं "उसकी झील सी बड़ी आँखों में मानो सैलाब उमड़ आया,कहने लगी,"मुझे मेरे जन्म का बेहद अफ़सोस है,इधर मैंने दुनिया में आँखें खोली;उधर पापा ने सदा के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं ,माँ का यह रूप अनायास ही मेरे जन्म से जुड़ गया है"उसकी गहरी झील सी आँखों में पानी के स्रोत का रहस्य अब मेरे लिए रहस्य नहीं रह गया था.हाँ, एक बात और हुई उस दिन के बाद से मैं अपने पिता से गहरे जुड़ाव में बंध गयी जो आज भी कायम है.
मैं वापस शहर आ गयी पर कच्ची अमिया से पके आम तक की सारी खुशबू मानो अनु की यादों से जुड़ गयी अगले वर्ष गाँव जाना ना हो सका,दो वर्ष बाद जब गयी अनु फिर दिखी पर मुझसे कटी सी रही,मैंने ही जिद कर उसे आम के बगीचे में बुलाया और कहा,"अनु,मैं इस बार कम दिनों के लिए आयी हूँ ,कल चली जाउंगी,मुझे बस स्टॉप छोड़ने आ जाना"उसने तो मानो अधर ही सी रखे थे,बस हाँ में सर हिलाया और चली गयी.
अगले दिन इंतज़ार में मेरी आँखें पथरा सी गयी पर वह नहीं आयी उसके भाई ने मुझे यह अंतिम पत्र पकड़ा दिया.
उसके बाद मेरा गाँव जाना कुछ वर्ष के अंतराल में होने लगा पर वह मुझे नहीं मिलती, दादाजी ने बताया ब्राह्मण और ठाकुर के किन्ही दो परिवारों में भीषण विवाद हुआ नतीज़तन पुरे गाँव में इन दो वर्णों ने बोल-चाल बंद कर दी है .मैंने पूछा था इसमें हम कहाँ दोषी हैं?दबंग दादाजी की आँखों में क्रोध स्पष्ट दिख रहा था .मैंने भी उनका मान रखते हुए शांत रहना बेहतर समझा .पर बड़ों के इस रवैये को आज तक मेरा दिल माफ़ नहीं कर सका है .अनु मेरी पहली और आखिरी बाल सखी साबित हुई.जब बी.एड. कर रही थी तो अंतिम बार गाँव जाना हुआ पता चला अनु का विवाह हो गया है.
दोस्तों ;उसकी खामोशी,उदासी ,असमय ओढी परिपक्वता ने मुझे उन्ही दिनों से ही कुछ -कुछ संवेदनशील बना
दिया था मैंने यह कविता "अमराइयाँ गाँव की"उसीकी याद में लिखा है ;उसकी तस्वीर,उसके अंतिम ख़त भी इस ब्लॉग के साथ हैं .मैं इस वर्ष अपनी बिटिया, जिसने अपने एक अल्हड से प्रश्न से, मेरे ज़ेहन में पडी धूमिल यादों को ताज़ा कर दिया ;उसके साथ गाँव अवश्य जाउंगी बस ईश्वर से यही दुआ मांगती हूँ कि अनु की खबर ही मुझे मिल जाए........................ताकि .मेरी खोज को विराम मिल सके.
ओ सखी ,कहाँ भूली हूँ मैं,
घनी अमराइयाँ गाँव की.
वो मस्ती,वो अमिया खाना
और राहत ठन्डे छाँव की


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परिपक्वता में मासूमियत
खासियत तेरे स्वभाव की
कभी बेफिक्री में न हंसना
संकेत करते थे अभाव की


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पहली बारिश का सोंधापन
और खेल कागज़ के नाव की
अब भी दिल में बसी वैसे ही
मीठी यादें तेरे उस गाँव की


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रुनझुन बजती मधुर वह धुन
जो करती नुपुर तेरे पाँव की
पर शोर बहुत है इस दिल में
तेरे उस खामोश से ठांव की


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संभाल रखी हैं निशानियाँ
मैंने एक-एक तेरे चाव की
तेरी यादों के थे कितने ज़ख्म
किसे परवाह थी इस घाव की


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चार दशकों की ये ज़िन्दगी
अब है उन लम्हों के दांव की
तू नहीं है पर तेरी यादें ही अब
हैं अनमोल रत्न के भाव की .


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यकीन नहीं है तो छूकर देखो

समाज के किसी भी घटना क्रम से जब राजनीति जुड़ जाती है तो वह घटना अत्यधिक पेचीदा और रहस्यमयी हो जाती है.इसे राजनीति का मायावी प्रभाव कहा जाए या हमारी सोच और समझ का दायरा यह निर्णय करना कठिन है.इस बार भी यही हुआ अनुराधा बाली और गीतिका शर्मा दोनों ही राजनीति रसूख रखने वाले शख्स से जुडी थी .एक ने वैवाहिक सम्बन्ध बनाया तो दूसरी का जुड़ाव जीविकोपार्जन की वज़ह से रहा .अनुराधा बाली जिस तरह से रूप सौंदर्य की लावण्यता की वज़ह से चन्द्रमोहन की अर्धांगिनी बनी उस घटनाक्रम को देखने के बाद कई महत्वपूर्ण बात सामने आती है...........
प्रथम --यह कि बुद्धिमत्ता से तालुकात रखने वाली कुछ महिलाएं अपनी ज़िंदगी से जुडी बेहद महत्वपूर्ण व्यक्तिगत फैसले लेने पर उस बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता को भावावेग में भुला बैठती हैं.
दूसरी बात कि समाज(स्त्री-पुरुष) की एक विचित्र मानसिकता यह है कि राजनीतिक रसूख रखने वाले किसी भी व्यक्ति से अपना सम्बन्ध बताने पर लोग गौरवान्वित होते हैं .कुछ तो इस सम्बन्ध के भरोसे को अलादीन का चिराग समझ हर काम को चुटकी में पूरा हो जाने का दावा करते हैं.
तीसरी बात कुछ महिलाएं अपने शौहर के ऊँचे रुतबे और ओहदे पर होने से इसे status सिम्बल मान कर अपने नात-रिश्तेदार,पड़ोसियों से एक सुरक्षात्मक दूरी बना लेती हैं जो उनके लिए सदैव घातक साबित होता है. इस अकेलेपन का अवसाद और अलगाव उनकी ज़िंदगी को बेमकसद बना देता है जिसकी परिणति समाज के समक्ष इस भयावह रूप में दृष्टिगोचर होता है.
दूसरी घटना में गीतिका शर्मा की भी उम्र(२३ वर्ष) कोई बहुत परिपक्व अवस्था की नहीं थी. इस अवस्था में बच्चे अक्सर पहला गलत काम करते हैं वह कि अपनी बातों को घर के बेहद करीबी रिश्तों से साझा नहीं करते हैं.वे गैरों को तो अपना मान लेते हैं पर अपनों से दूरी बना लेते हैं.दूसरी गलती यह कि जल्द से जल्द सफलता की सीढ़ियों को चढ़ने के क्रम में जिन दुर्गम और अवांछित राहों से गुज़रने का समझौता कर लेते हैं वे उसकी मंजिल के शिखर से बेखबर रहते हैं.उन्हें यह बात समझ नहीं आ पाती कि साहस उचित है पर दुस्स्साहस कदाचित नहीं.
ऐसे किसी भी सम्बन्ध बनाने के पूर्व स्त्रीयों को अपनी बाह्य सुन्दरता के साथ अपनी असीम शक्ति,साहस,बुद्धिमत्ता जैसी आतंरिक शक्तियों पर भी भरपूर भरोसा करना चाहिए .पुरुष में शक्ति है पर स्त्री के असीम शक्ति पुंज से वह हार भी जाता है.मुझे नारायण दत्त तिवारी की पत्नी और बेटे पर फक्र है कि उन्होंने अपना हक कानून के द्वारा साबित करवाया इसमें उन्हें ना तो किसी महिला संगठन की मदद मिली ना ही और किसी अपेक्षित की पर उन्होंने अपनी कानूनी जीत हासिल की.यह उचित भी इसलिए था क्योंकि बच्चे को नाजायज़ मानने वाला समाज माता पिता को नाजायज़ क्यों नहीं मानता जिनकी क्षणिक भावावेग की वासना और लिप्सा एक बच्चे को समाज की नज़र में नए अस्वीकार्य विशेषण से नवाज़ देती है भला उस बच्ची/बच्चे का क्या कसूर है.
इतिहास गवाह है कि हर युग में स्त्री त्याग ,समर्पण,शक्ति,बुद्धिमता की साक्षात प्रतिमूर्ति रही है पर पुरुष प्रधान समाज ने हमेशा उसे जांचने-परखने और उनकी कर्तव्यनिष्ठा को भुलाने की हिमाकत की है.दूसरी ओर स्वयं स्त्रियों ने ही अपने त्याग ,अपनी वेदना ,अपने समर्पण से स्वस्तित्व की अलग परिभाषा रच दी है .इतिहास के पन्नों पर ऐसे कितने पुरुषों से सम्बंधित इबारतें लिखी हैं जिनकी पत्नियों के त्याग ने ही उन्हें जग को प्रकाशित करने में मदद की पर उन स्त्रियों की लिखित-अलिखित गाथा से वे पन्ने भीगे हैं.अगर आप को यकीन नहीं है तो वे पन्ने छूकर देखो जो उनकी छुपी अश्रुधाराओं से अब तक गीले हैं चाहे वे उर्मिला हों यशोधरा या.............
आज इन्ही भीगे पन्नों की  इबारतों से आपको रु-ब-रु करवाने जा रही हूँ................
1
गांधारी क्यों बांधी तुमने आँखों पर पट्टी
इस तरह तुम आज आदर्श तो ना बन सकी
पति की उस नियति और अशक्त अवस्था में
उनकी नेत्र ज्योति क्यों
तुम ना बन सकी ?
2 ...............
अपने चक्षु खुले रख कर अपने बच्चों का
सही मार्गनिर्देशन क्या नहीं कर सकती थी
सौ पुत्रों की माता थी तुम, एक बार सोचो
सुन्दर
सौ इतिहास ना रच सकती थी?
3 ...............
पति की कमजोरी संग कमज़ोर पड़ जाना
यह पति के प्रति सही सहयोग नहीं होता

अपनी शक्ति और संपूर्ण समर्थता से तेरा
ध्रितराष्ट्र से जुड़ना सोचो,कितना सही होता.

4 ..................
द्रौपदी!विचारों, तुमने भी तो की है गलती
क्यों खुद को वहां दांव पर लगने ही दिया
पुरुषों की भरी सभा में थे मौजूद पति भी
फिर क्यों अबला बन चीर हरने ही दिया
5 .................
यूँ चुपचाप अपमान का घूंट पी जाना
नारी का धर्मं तो कभी बनता नहीं है

ऐसे पुरुषों के साथ क्यों रहना ही बोलो
जिनमें अपनेपन का मर्म होता नहीं है

6 .....................
सीता,तुम तो अपना सर्वस्व छोड़ कर
पति का साथ देने ही तो वन गयी थी
उस स्वर्ण लंका के चमक से अछूती
राम की याद में ही तो जोगन भई थी

7 ..................
फिर राम ने कैसे ना दिया साथ तेरा
उन विवश,विषाद अश्रु भरे क्षणों में
सामजिक संशय के मर्यादा बोध से
छवि तुम्हारी बिखेर दी रज कणों में
8 ...................
यशोधरा! तुम्हारे त्याग को ही देखो
इतिहास के किस ग्रन्थ ने याद रखा है
आज जिन महात्मा बुद्ध की गाथा से
प्राचीन इतिहास सुवासित महक उठा है
9 ...................
मोक्ष प्राप्ति ही करनी थी तो क्यों
बांधा तुम्हारे संग सूत्र विवाह का
चुपचाप धीरे से सघन रात्रि में ही
संग छोड़ा तुम्हारा और राहुल का

10 .....................
देख लो तुम्हे तो उर्मिला के सदृश ही
इतिहास ने पूर्णतः है विस्मृत किया
पूछा उसने भी नहीं अपने स्वामी से
क्यों मुझे जीते-जी यूँ है मृत किया
??
11 .....................
अपने प्रति जिम्मेदारियों का एहसास
उर्मिला भी लक्षमण को ना दिला सकी
पति से चौदह वर्ष जुदाई की कल्पना
उसे भी कैसे और क्यों ना रुला सकी

12 .................
सच कहूँ भरे हैं हमारे ऐतिहासिक ग्रन्थ
ऐसी कितनी ही मार्मिक गाथाओं से
यकीन नहीं है तो छूकर देखो पन्ने जो
अब तक भीगे हैं उन छुपी अश्रुधाराओं से
****************

(किसी भी धर्मं या सम्प्रदाय को आहत करना इस blog का उद्देश्य नहीं है. मैं ब्लॉग में उल्लिखित सभी पात्रों की महानता के प्रति पूर्ण आदर और श्रधा रखती हूँ.सिर्फ भाव प्रबलता की अभिव्यक्ति के लिए उन सम्मानित पात्रों का उल्लेख किया गया है.अगर किसी भी आदरणीय पाठक को कोई भी आपत्ति हो तो मैं वह अंश बिना किसी वाद-विवाद या बहस के हटा लेने का वचन देती हूँ,साथ ही क्षमाप्रार्थिनी भी रहूंगी)
धन्यवाद

हमदम,तेरे साथ चलूँ तो....

आज हरितालिका तीज के शुभावसर पर आप सबों के सुखद दाम्पत्य और अखंड सौभाग्यवती रहने की सुखद कामना के साथ यमुना का प्यार भरा नमस्कार.
विवाह संस्था और पारिवारिक मूल्यों पर मेरी गहरी आस्था और अटूट विश्वास है.हरितालिका तीज का यह निर्जला व्रत पत्नी अपने पति की मंगल कामना के लिए रखती हैं.हालांकि देश के कुछ राज्यों बिहार,झारखण्ड,छत्तीसगढ़ ,मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में प्रचलित इस व्रत का महिमा मंडन देश के इन्ही राज्यों के साथ पंजाब,हरियाणा में भी प्रचलित व्रत करवा चौथ की तरह हिन्दी सिनेमा ,धारावाहिक इत्यादि द्वारा ना होने के कारण बहुत कम लोग ही इससे परिचित हैं पर फिर भी  तीज के रूप में उपासना आज भी इन राज्यों की माटी में सोंधी महक के रूप में समाई है.आप के मस्तिष्क में सहज ही एक प्रश्न उठ गया होगा-"पति अपनी पत्नियों के लिए ऐसा कोई व्रत क्यों नहीं रखते ?"यही प्रश्न मुझसे एक नवविवाहिता ने भी पूछा.मेरा मानना है कि पति जो घर से बाहर अपने परिवार के सुख-सुविधाओं के लिए दिन भर भटकता है ,जोखिम उठाता है क्या यह उसके व्रत की एक बानगी नहीं ?व्रत का सीधा अर्थ किसी गहरे संकल्प से भर जाना होता है.फिर वह अच्छे मार्ग पर बढ़ने का,जीवन को सर्वोत्तम ढंग से जीने का या अपने कार्य को निष्ठां पूर्वक करने का हो सकता है.इस नज़रिए से पति प्रत्येक दिन व्रत रखता है क्योंकि वह प्रतिदिन अपने परिवार के सुचारुपूर्ण ढंग से रोजी-रोटी की व्यवस्था का संकल्प करता है.जो काम काजी महिलाएं हैं ;व्रत उपवास उनकी आस्था का प्रश्न है पर वे कामकाजी महिलाएं और गृहणी भी प्रतिदिन एक व्रत से गुज़रती हैं और वह है अपने परिवार के साथ-साथ अपने जीवन को भी सर्वोत्तम बनाने का व्रत(संकल्प).
क्या है मान्यता-
इस व्रतोत्सव के लिए कहा जाता है कि जब भगवान शिव को पाने के लिए माँ पार्वती तपस्या रत हो गई तो पुत्री के कठोर तप को देख राजा हिमालय ने देवर्षि नारद से परामर्श कर बेटी का विवाह भगवान विष्णु से करने का निर्णय लिया.भगवान शिव को अपना वर मान चुकी माँ पार्वती को इस बात की जानकारी होने पर बहुत दुःख हुआ. उन्होंने मन की पीड़ा अपनी सखियों से कही.पिता की नज़रों से पार्वती को बचाने के लिए सखियों ने उन्हें घने जंगल में छुपा दिया जैसे किसी का हरण किया जाता है ठीक उसी तरह सखियों ने माँ पार्वती को छुपाया..हरण होने के कारण ही इस व्रत को हरितालिका कहा जाता है.इस दौरान माँ पार्वती ने वन की एक कन्दरा में शिव की प्रतिमा बना उनका पूजन किया.उस दिन भाद्र पद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीय तिथि थी .पार्वती जी ने निर्जला व्रत करते हुए दिन-रात शिव की आराधना की. उनकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर भगवन शिव प्रकट हुए और उन्होंने पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वर दिया.तभी से यह व्रतोत्सव मनाया जाता है .
मैं वर्त्तमान में पति द्वारा पत्नी को वेतन दिए जाने जैसे बेमानी फैसले के मद्देनज़र जब हरितालिका तीज जैसे पारंपरिक व्रत-त्योहारों का आकलन करती हूँ तो समाज के बदलते परिवेश में विवाह संस्था के विकृत होते स्वरुप पर क्षुब्ध भी होती हूँ.पर यह फैसला समाज के बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा क्यों लिया गया यह भी गौर करने वाली बात है.अनुराग बसु की मूवी 'बर्फी'के कुछ प्रारम्भिक शब्द"आज का प्यार ऐसा,दो मिनट नूडल्स जैसा,फेस बुक पर पैदा हुआ,कार में हुआ ये ज़वां,कोर्ट में जाकर मर गया"आज के प्रेम की विकृत सच्चाई को बताती है.पर कुछ स्थितियों में पति द्वारा पत्नी को वेतन दिए जाने का यह फैसला निहायत ज़रूरी भी है क्योंकि..........
१) कुछ गैरजिम्मेदार पति अपनी कमाई का कुछ हिस्सा शराब,पार्टी या अपने अवैध संबंधों पर खर्च करने से बाज़ नहीं आते ऐसे में दिन भर समर्पण और त्याग की देवी बनी पत्नियों के लिए यह सकारात्मक कदम है .
२) पति की मृत्यु की दुखद घटना के बाद परिवार वाले पुत्र की कमाई और उसके बैंक जमा पूंजी को किसी ना किसी दांव-पेंच से काम क्रिया में लगाने का बहाना बना विधवा को उससे वंचित कर आर्थिक दृष्टि से मजबूर कर देते हैं.यह वक्त उस विधवा के लिए इतना दुखद होता है रुपये-पैसे के विषय में वह अपनी सोच की दिशा निर्धारित नहीं कर पाती,जिसका बेजा लाभ रिश्तेदार उठा लेते हैं.ऐसे बुरे वक्त में तात्कालिक ज़रूरत के लिए कम से कम उसके खाते में जमा पूंजी सहायक हो सकेगी.
३) जो दंपत्ति विवाह व्यवस्था को एक समझौता और घुटन भरा बंधन मान कर दाम्पत्य जीवन की ज़द्दोज़हद में उलझे होते हैं उनके लिए यह फैसला स्वागत के योग्य हो सकता है .

जिन दम्पत्तियों के संबंधों का अटूट भवन आपसी विश्वास की नींव और भरोसे की छत के साथ खडा होता है उन्हें ऐसे किसी भी फैसलों का कभी भी इंतज़ार नहीं रहता क्योंकि उनके आपसी रिश्ते इस सुदृढ़ भवन में बेहद महफूज़ होते हैं.
"हमदम तेरे साथ चलूँ तो......"इस हरितालिका तीज के शुभावसर पर इन्ही मधुर संबंधों की अभिव्यक्ति है.इसे जीवन भर हर वह विवाहिता एहसास करती है जिसे ईश्वर ने जीवन साथी के रूप में एक विवेकी व्यक्ति का उपहार दिया है.
तुम साथ हो तो मुझे सम्पूर्णता का एहसास होता है
जीवन के हर एक मोड़ पर पर्व सा उल्लास होता है.
..................
तुम्हारा साथ जीवन को सुवासित झोंकों से भरता है
तेरे सिवा दूजा ना कोई ,इस दिल दर्पण में बसता है
...................
आँखें मैं बंद करूँ जब भी, वही तेज़ कदमों की चाल
शरारती नयन तेरे और दमकते माथे पर बिखरे बाल
..................
एक थिरकन नख से शिख को,मादक लय दे जाती है
तुम्हारी पद चाप तुम्हारे आने का,दस्तक दे जाती है.
..................
चहरे पर फ़ैली वही चिर परिचित, मोहक सी मुस्कान
चारों तरफ उड़ती नज़रें, उनसे भी ज्यादा चौकस कान
.................
सबकी निगाहें तेरे सुदर्शन व्यक्तित्व पर सिमट जाती हैं
बुरी नज़रों से बचाने की इच्छा अमरबेल सी लिपट जाती है
....................
और फिर जब कभी भी मेरा यह मन उदास हो जाता है
तुम्हारे साथ का स्मरण ही एक सुखद सांझ हो जाता है
.....................
जीवन की उबड़-खाबड़ और पथरीली इन राहों पर
संग बिताए पल-पल की उन भूली-बिसरी यादों पर
..................
तेरे सानिध्य की यादें ही ,मुझे मलहम सी लगती हैं
भावनाएं मेरी फिर तो अनकहे शब्दों में भी सजती हैं
.....................
क्या कहूँ जीवन की डगर है कठिन मुझे जिस पर
विचारवान हो चलना है बहुत सम्हल-सम्हल कर

....................
तेरा भरोसा इस डगर को भी आनंद से भर देता है
दामन खुशियों से भरकर,दुःख
मेरे सारे  हर लेता है
.......................
दुनिया सारी संग भी हो ,तेरी जुदाई पर खलती है
इस सूनेपन को भी तेरी सुधियाँ ही आकर भरती हैं
......................
एक सच्चा सा दिल ही तेरा ,सब पर भारी पड़ता है.
सब हो पर तेरे बिन मुझे ,यह जीवन खाली लगता है.
....................
सब के साथ चलती हुई मैं, कुछ दूर ही थक जाती हूँ
हमदम तेरे साथ चलूँ तो, सीढियां भी चढ़ जाती हूँ.
.................
तेरे बिन मेरी पहचान तो किसी हुजूम में खो जाती है
प्रियतम तेरा साथ है तो यमुना वजूद में हो पाती है.
.................
तेरा साथ पाकर तो हर जगह मैं ही मैं नज़र आती हूँ
हाथ तेरा पल भर छूटे तो मृगछौने सी सहम जाती हूँ
......................
अनगिनत सितारों के बीच बस एक चन्दा ही काफी है
जैसे एक सूर्य की रश्मियाँ धरा पर उजाला फैलाती हैं

...................
वैसे इस जीवन की राहों पर, हमसफ़र ही सच्चा साथी है
बिन जिसके तूफानी थपेड़ों से, टूटी जीवन की नैया जाती है.
...................

रोशन हैं;दो घर तुझसे

 "क्या बेटियाँ पराई होती हैं"
यह शीर्षक जब-जब दिखाई दिया,ज़ेहन में बचपन से अब तक समाई कई गीतों की स्वर लहरियां हिलोरें लेने लगी.जिनमें बेहद ही सुरीले अंदाज़ में बेटियों के पराये होने की बात कही गयी है.
१- बहन पराया धन है कहना,उसको सदा नहीं रहना,बहना याद करे......
२- बाबुल तेरे अंगना की मैं हूँ ऐसी चिड़िया रे,रात भर बसेरा है सुबह उड़ जाना है.....
३- इन अंखियों की तू है मोती.....बेटी सदा ही पराई होती......



४- ये गलियाँ,ये चौबारा ,यहाँ आना ना दोबारा ,अब हम तो भये परदेशी....
ऐसे गीतों की लम्बी फेहरिस्त है.अब जब बचपन से ये परायेपन की घुट्टी ताल मिश्री की तरह पिलाई जाए तो बेटियाँ भी भला क्या करें?वे भी मान बैठती हैं कि उनका कोई अपना घर है ही नहीं.पर मैं समझती हूँ कि बेटियों की परवरिश के दौरान परायेपन का टैग लगाकर अभिभावक बहुत गलत करते हैं. अनजाने में ही वे सम्पूर्णता के साथ अपनेपन का भाव लेकर बेटियों के परिवार से जुड़ने की प्रवाहमयी सरिता पर खुद ही बाँध बना देते है और फिर इस बाँध की दीवारें तोड़ने का साहस वे इस भय से नहीं करती कि कहीं तबाही ना आ जाए .यहाँ तक कि उसकी विदाई के वक्त घिसी- पिटी सी नसीहत दोहराई जाती है'"अब तुम्हारा घर वही है जहां डोली जा रही है अर्थी भी वहीँ से उठनी चाहिए.बेटी, तुम जिनकी अमानत थी हमने तुम्हे उनको सौंप दिया है"
हाँ इस उपरोक्त सन्देश में यह भाव भी छुपा होता है कि जहां हम तुम्हे भेज रहे हैं वह भी तुम्हारा अपना घर है . इस घर की तरह वहां भी तुम्हे बहुत प्यार ,दुलार और एक मजबूत संरक्षण मिलेगा.
पर अमानत को लेने वाले सभ्य और सुसंस्कृत हुए तो बिटिया के भाग्य जग गए और अगर बदकिस्मती से वे लोभी,लालची हुए तो फिर फूल सी बिटिया उस वीराने में कैसे खिली रह पायेगी???????इस बात का अंदाजा ही वे नहीं लगा पाते.<!--
बेटियों को हमेशा यह विश्वास दिलाये रखें कि वे उनके लिए आजीवन महत्वपूर्ण हैं .उनकी ज़िंदगी परिवार समाज के लिए कीमती है.ऐसे में वे विवाह के बाद भी अगर दुर्भाग्य से घरेलु हिंसा या दहेज़ के दानव का शिकार होने लगें तो उनमें उनका मुकाबला करने की हिम्मत रहेगी . वे कभी भी आत्मघाती कदम नहीं उठाएंगी.अपनी किसी भी परेशानी को आपसे वैसे ही बांटने की हिम्मत और अधिकार रखेंगी जैसे वे विवाह के पहले करती थी.
इन छुटियों में जब मैं शिलौंग गयी तो स्थानीय चालक से एक अच्छी बात पता चली कि वहां दहेज़ जैसी कोई प्रथा नहीं है.उत्तर पूर्व भारत में बेटियाँ विदा नहीं होती लडके उनके घर आते हैं.मुझे इस दहेज़ रहित सामाजिक संरचना पर बेहद नाज़ हुआ.
दरअसल यह सोच और मानसिकता सर्वाधिक रूप में उत्तर भारत के कई राज्यों में प्रचलित है.यहाँ बचपन से ही बेटियों की शिक्षा के सम्बन्ध में भी एतराज़ किया जाता है यह कहकर"अरे इन्हें पढ़ा-लिखा कर क्या फ़ायदा पराई हैं अपने घर चली जाएंगी आपको इनसे क्या मिलेगा"वे यह भी मानते हैं की लड़कियों से वंश नहीं चलता.वे तो सदैव परायों के लिए ही पाली जाती हैं.लोग यह भूल जाते हैं कि यही बेटियाँ बहु बन कर वंश वृद्धि में सहायक बनती हैं.और सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह कि उसी राज्य उत्तर प्रदेश में जवाहर लाल नेहरु जी का वंश आज भी फलित पुष्पित हो रहा है जबकि उनकी एकलौती संतान बेटी (इंदिरा प्रियदर्शिनी )ही थी.आज भी सर्वाधिक जाना पहचाना गांधी वंश उन्ही(इंदिरा जी) से ही आगे बढ़ रहा है.वे तो कभी पराई नहीं मानी गयीं.
मैं स्वयं भुक्तभोगी हूँ.जब अपने गाँव जाती तो पापा को घर पर सब कहते,"कलक्टर बनवाना है क्या बेटी को ?बन भी गयी तो आपके किस काम की?? सारा राज भोग तो ससुराल वाले करेंगे"मैं बहुत चकित होती यह सोचती कि क्या समाज हमारी शिक्षा से लाभान्वित हो यह ज़रूरी नहीं?? यह अपना घर; पराया घर क्या है, इसकी परिभाषा तो उन दिनों समझ नहीं पाती,हाँ चुनौती समझ कर और भी जुनून तथा मेहनत से पढ़ती.

मेरी बड़ी दीदी एक सशक्त उदाहरण है उन्होंने और उनके परिवार(ससुराल) वालों ने पापा की कई जिम्मेदारियों को बखूबी अंजाम दिया और आज भी घर की ज़िम्मेदारी में सबसे पहले वही सलाह मशवरा देती हैं.यह पिता और पिता तुल्य ससुर जी के संबंधों का विस्तार था.प्रशंसनीय बात यह कि उनकी शादी  पान पत्ते पर मात्र सवा रुपये रखा कर की गयी थी.वज़ह उनके ससुर जी को दहेज़ शब्द से ही नफरत थी,वे बस एक सुशील बहु की आकाक्षा रखते थे.पर अफ़सोस की बात यह है कि दीदी को अपनी दोनों बेटियों के विवाह में दहेज़ देने पड़े,जबकि छोटी बेटी सरकारी नौकरी करती थी.यह इस समाज का विरोधाभासी कटु और स्याह पक्ष है.हाँ, उन्होंने बेटियों को परायेपन का टैग नहीं आत्मविश्वास का टैग लगा कर विदा किया था कि जब भी कोई मुसीबत आये अपनी अच्छी शिक्षा और संस्कार का सहारा लेना; फिर भी समाधान ना हो तो घर का हर सदस्य तुम्हारे साथ है.बेहिचक चली आना या हमें सूचित करना.
माता-पिता को बेटी को कभी यह सन्देश नहीं देना चाहिए कि वह उनके पास पराई अमानत है.बल्कि हर कदम पर बताना चाहिए ," वे उन्ही का अंश होती हैं और उनके लिए वे आजीवन बेहद महत्वपूर्ण हैं." उन्हें शिक्षित कर स्वावलंबी बनाना माता-पिता की उनके प्रति पहली ज़वाबदेही है.विवाह व्यवस्था समाज में आपसी संबंधों के विस्तार के लिए की गयी है.फिर भला शादी के उपरान्त माता-पिता के घर से बेटियों का नाता क्यों टूटे?जिस बेटी को पाल पोस कर हर सुख-दुःख में भागीदार बनाया वह पराई क्यों और कैसे हो सकती है?इस बात का हमेशा ख्याल रखा जाना चाहिए. कि समाज में मान-सम्मान प्रतिष्ठा से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है बच्चों की खुशी ,सुख और उनकी समाज और परिवार में सुरक्षा.

दरअसल ये रिश्ते इतने जटिल होते नहीं जितने बना दिए जाते हैं वज़ह है अहम् भाव .सबसे प्रथम कड़ी शुरू होती है इस अहम् से कि बहु
बार -बार मायके क्यों जाए,उसकी ज़रूरत पहले ससुराल में है
.अब ज़रा सा गौर किया जाए तो स्पष्ट है ------- क्या उस बहु के ससुराल आने के पूर्व घर नहीं चल रहा था?अगर माता-पिता को ज़रूरत है तो क्या ससुराल वालों की सहयोगपूर्ण जिम्मेदारी नहीं बनती कि उसे (बहु) वहां(मायके) भेजें?यकीन मानिए इससे उस बहु के मन में सम्मान की भावना जागृत होगी और वह दो घरों को जोड़ने के लिए एक मजबूत सेतु का काम करेगी.

हाँ, यहाँ बेटी के माता-पिता को थोड़ी सावधानी रखनी होगी कि प्यार के वशीभूत हो बार-बार उसे अनावश्यक रूप से ना बुलाएं .आखिर बेटी जब पढ़ने के लिए उनसे दूर जाती है तब भी तो वे उसके बगैर रह रहे थे न !तब उन्होंने बेटी को पढ़ाई में विघ्न ना हो ये ख्याल कर अपने से दूर रखा . अब भी वह कुछ जिम्मेदारी निभाने की राह पर ही तो बढ़ रही है.

यहाँ एक बात मैं और देखती हूँ कि कुछ बेटियाँ शादी के उपरान्त स्वयं को ससुराल में इतना व्यस्त कर लेती हैं कि माता-पिता के प्रति कर्त्तव्य को यह कह कर टाल देती हैं ," अब वहां हमारा क्या काम है? भैया-भाभी हैं ,उनकी(माता-पिता) सेवा करने के लिए,मैं अपनी ससुराल के लिए हूँ."ससुराल वालों के प्रति अपने कर्त्तव्य निभाना बहुत अच्छी बात है पर ज़रूरत पड़ने पर भाई-भाभी की मदद करना बेटियों को सदा परिवार के करीब रखने में भी सहायक होता है .साथ ही दो परिवार के स्नेह डोर की मजबूती भी इससे बनी रहेगी.भाई-भाभी भी बेटियों(बहनों) को पैत्रिक सम्पति पर हक के प्रतिद्वंदी के तौर पर कभी ना समझें.
बेटियों से भी मैं यही कहना चाहूंगी कि परम्पराओं ने भी उन्हें कभी पराया नहीं बनाया है;उन्हें ज़रूरत अपने वजूद,अपने अस्तित्व को मजबूती के साथ समाज के समक्ष रखने की है.यकीन करिए जब तक आप पूर्ण विश्वास के साथ स्वयं को दोनों घरों से जुडा मानती रहेंगी सभी को आप प्रिय और अपनी लगेंगी और यही अपनापन सर्वाधिक प्रिय होता है,जिसे अपना मानो वही प्रिय हो जाता है.अपना स्थान बेटियाँ समाज,परिवार,देश में खुद स्थापित कर लेती हैं,यही उनके आत्मविश्वास की दिव्य ज्योति है.


"दो घरों को जोड़ने वाली एक मजबूत सेतु और इज्ज़त है बेटी
अपनेपन से एक नहीं दो आशियाने को करती ज़न्नत है बेटी."

एक बार एक कार्यक्रम के दौरान counsellor ने हम सभी महिलाओं से प्रश्न किया,"अगर एक ही वक्त में आपके ससुराल और मायके दोनों जगह विवाह समारोह का आयोजन रखा गया हो तो आप का निर्णय किस स्थान पर जाने का होगा?"कई ज़वाब थे .मेरा ज़वाब था,"जहां मेरी ज्यादा ज़रूरत होगी मैं वहां जाने का निर्णय लूंगी."कभी-कभी ऐसा होता है कि ससुराल पक्ष में कोई ज़िम्मेदार हेल्पिंग हैण्ड ना हो और मायके में कई सहायक हों,या फिर हालात इसके ठीक विपरीत भी हो सकते हैं ऐसे में महज़ एक दर्शक की भूमिका निभाने से ज्यादा अच्छा है ज़िम्मेदारी निभाना.
अगर दोनों ही जगह हेल्पिंग हैण्ड की कमी नहीं है तो विवाह समारोह में एक जगह जाएं और reception में दूसरी जगह .वह भी ज़रूरत के हिसाब से पति-पत्नी(दोनों पक्ष) सहयोगिता पूर्ण माहौल में निर्णय ले लें.
बस समझदारी से अपनी बिटिया की परवरिश अभिभावक करते रहे तो परायेपन का यह शब्द उनकी बिटिया की ज़िंदगी के शब्दकोष से नदारद होगा.और उनकी बिटिया अपने नुपुर के रुनझुन की मधुर आवाज़ से दोनों घरों में संगीत लहरी बिखेरती रहेगी और गायेगी----

"माँ ने तो हमें जन्म दिया,सासू ने दिया हमें प्यारा पिया
रोशन हो दो घर मुझसे,मैं बन सकूँ ऐसा एक दीप्त दिया"

बेटियाँ पराई नहीं होती हैं ;अपने पराये के दायरे से कोसों दूर बेटियाँ भी तो बस अपना ही अंश होती हैं. जिस भारतीय संस्कृति की परम्पराओं के तहत ये दुहाई दी जाती है कि "बेटियाँ पराई होती हैं"वास्तव में दोष उस संस्कृति की परम्पराओं का नहीं ;दोष उस पर अमल करने वालों की सोच और समझ का है.


ठीक उस तरह जैसे अपने चहरे पर अवांछित तत्त्व की मौजूदगी से बेखबर होकर अपने आईने को दोष देना.
एक मशहूर शेर अर्ज़ करती हूँ
"यकीन मानिए हमारे ही चहरे पर धुल है
इलज़ाम लगाना आईने पर फ़िज़ूल है."