Friday, July 26, 2013

'सन्देश' एक घयाल सैनिक का -परिवार के लिए

आज कारगिल दिवस पर उन सारे जांबाज़ शहीदों की शहादत को हम सब का शत-शत नमन जिन्होंने प्रत्येक अवसर पर हमारी रक्षा की हम सुख की नींद सोते रहे और वे हमारी हिफाज़त करते रहे .सैनिक देश की रक्षा के लिए अपने परिवार के सदस्यों के प्रति कर्त्तव्य नहीं पूरा कर पाने की कशमकश और पीड़ा से भी गुजरते हैं पर इस दर्द का एहसास हम आम जनता नहीं कर पाते इस ब्लॉग को लिखने का मकसद उस एहसास को जुबां देना है.
उत्तर प्रदेश प्रांत में एक लोक गीत शहीद की जुबां में कुछ इस तरह से गाया जाता है ........

हमरी मरनी खबर जिन कहेया मित्र घर जाई...
छुपाई लीहा सारा भेदवा .....
तू जब जईबा हमरे द्वारे तोहसे मिलिहें पिता हमारे
ओनकर जलता दीपक फ़ौरन दिहा बुझाई...
छुपाई लीहा सारा भेदवा
जब तू जईबा हमारे द्वारे तोहसें मिलिहें मात हमारी
ओनके नैनं में आंसू फ़ौरन दिहा तू लाई ...
छुपाई लीहा...सारा भेदवा
जब तू जईबा हमारे द्वारे तोहँसे मिलिहें भाई हमारे
ओनकी दाहिनी बाजू फ़ौरन दिहा झुकाई...
छुपाई लीहा.....सारा भेदवा
जब तू जईबा हमारे द्वारे तोहँसे मिलिहें पत्नी हमारी
ओनके मांग के सिन्दूर फ़ौरन दिहा मिटाई...
.छुपाई लीहा...सारा भेदवा
एक पाती घायल सैनिक की ...

माँ से ...
माँ तुम्हारा लाडला रण में अभी-अभी घायल हुआ है
पर देख उसकी शूरता खुद शत्रु भी कायल हुआ है
रक्त की होली रचाकर मैं प्रलयकर दिख रहा हूँ
माँ उसी शोणित से तुम्हे पत्र अंतिम लिख रहा हूँ
युद्ध भीषण था मगर ना एक इंच भी पीछे हटा हूँ
माँ तुम्हारी थी शपथ मैं आज इंचों में कटा हूँ
एक गोली वक्ष पर कुछ देर पहले ही लगी है
माँ कसम दी थी जो तुमने आज मैंने पूरी की है
छा रहा है सामने अब मेरी आँखों के अँधेरा
पर उसी में दिख रहा है मुझे वह नूतन सवेरा
कह रहे हैं शत्रु भी मैं जिस तरह से सैदा हुआ
लग रहा है सिंहनी के कोख से था मैं पैदा हुआ
यह ना सोचो माँ की मैं चिर नींद लेने जा रहा हूँ
मैं तुम्हारी कोख से फिर जन्म लेने आ रहा हूँ
पिता से ............
मैं तुम्हे बचपन में पहले ही दुःख बहुत दे चुका हूँ
और कंधों पर तेरे खडा हो आसमां सर ले चुका हूँ
तुम सदा कहते थे ये ऋण तुम्हे भरना पडेगा
एक दिन कंधों पे अपने ले मुझे चलना पडेगा
पर पिता मैं भार अपना तनिक हल्का ना कर सका
तुम मुझे करना क्षमा मैं पितरी ऋण ना भर सका
हूँ बहुत मजबूर यह ऋण ले मुझे मरना पडेगा
अंत में भी आपके काँधे ही मुझे चढ़ना पडेगा
भाई से.....
सुन अनुज रणवीर! गोली बांह में जब आ समाई
ओ मेरी बाईं भुजा !उस वक्त तेरी बहुत याद आई
मैं तुम्हे बाहों से अब सारा आकाश दे सकता नहीं
लौट कर घर आ सकूंगा यह विश्वास दे सकता नहीं
पर अनुज विश्वास रखना मैं थक कर नहीं पडूंगा
भरोसा रखना वतन खातिर सांस अंतिम तक लडूंगा
अब तुम्ही को सब सौंपता हूँ बहन का ध्यान रखना
जब पड़े उसको ज़रुरत वक्त पर उसका सम्मान करना
तुम उससे कहना कि रक्षा पर्व में यह भाई भी आयेगा
देख सकोगी तो अम्बर में नज़र आशीष देता आयेगा
पत्नी से.....
अंत में प्रिय मैं आज भी तुमसे कुछ चाहता हूँ
है कठिन देना मगर हो निष्ठुर मैं ये माँगता हूँ
तुम अमर सौभाग्य की बिंदिया सदा माथे सजाना
हाथ में चूड़ी की खनक संग पाँव में महावर रचाना
तुम नहीं कोई वैधव्य प्रतिमूर्ति ना ही कोई साधिका हो
अपितु अमर बलिदान की पुस्तक की पावन भूमिका हो
बर्फ की ये ऊंची चोटियाँ यूँ तो बहुत शीतल लगी थीं
तेरे प्यार की उष्णता से वे हिम शिला गलने लगी थीं
तुम अकेली नहीं धैर्य अपना एक पल भी ना खोने देना
भर उठे दुःख से ह्रदय पर आँख नम ना होने देना
शास्रानुसार सप्त पद की यात्रा से तुम मेरी अर्धांगिनी हो
सात जन्मों तक बजे जो तुम वह अमर रागिनी हो
इसलिए अधिकार तुमसे आज बिन बताये ले रहा हूँ
मांग का रक्तिम सिन्दूर तेरा मैं मातृभूमि को दे रहा हूँ .
(दोस्तों यह कविता मेरे एक मित्र के द्वारा लिखी गई थी )
जय हिन्द

Saturday, July 13, 2013

गुण,मात्रा या फिर दोनों ??

प्रिय पाठकों
अगर हम सभी को मात्रा या गुण में से किसी एक का चयन करना हो तो हम में से अधिकाँश गुण का ही चुनाव करेंगे.11july विश्व जनसँख्या दिवस के अवसर पर मैं जनसँख्या के गुणात्मक और मात्रात्मक पहलू पर ध्यानाकर्षित करना चाहती हूँ.
जब एडम स्मिथ ने अपनी पुस्तक Wealth Of Nation लिखी तब से आर्थिक वृद्धि पर जनसंख्या वृद्धि के परिणाम अर्थशास्त्रियों का ध्यान आकर्षित करते रहे हैं.उन्होंने लिखा,"प्रत्येक राष्ट्र का वार्षिक श्रम ऐसी निधि है जो मूल रूप से उसके लिए जीवन की सब आवश्यकताओं और सुविधाओं की पूर्ति करता है."यह बात सही है पर इस बात से कभी इनकार नहीं किया जा सकता कि जनसंख्या वृद्धि उन्ही देशों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए ज़रूरी है जहां श्रम शक्ति की दुर्लभता तथा पूंजी प्रचुरता के साथ संसाधनों की उपलब्धता भी हो जनसँख्या के दोनों पहलू ज़रूरी हैं पर यह देश की आर्थिक संरचना पर निर्भर करता है.इसे हम the theory of demographic transition के द्वारा समझ सकते हैं.यह सिद्धांत पश्चिम के औद्योगिक देशों के वास्तविक अनुभवों पर आधारित है.
जनसंख्या की प्रथम अवस्था -जब कोई देश पिछड़ा और अल्पविकसित होता है,कृषि मुख्य व्यवसाय होते हैं,उद्योग धंधे विकसित नहीं होते,व्यापार अल्पविकसित होता है,ऐसी स्थिति में जन्म दर और मृत्यु दर दोनों ही ऊंची होती है.समाज में प्रचलित रीति-रिवाजों तथा मान्यताओं के वशीभूत लोग बच्चों की संख्या को अधिकाधिक बढ़ाना चाहते हैं.बच्चे देयता नहीं बल्कि परिसंपत्ति माने जाते हैं 10 या 15 वर्ष का बच्चा भी अर्जक बना दिया जाता है . 'जितने मुंह उतने हाथ' जैसी सोच,वंश परम्परा तथा धार्मिक संस्कारों में पुत्र संतान का महत्व,चिकित्सा सुविधा के अविकसित होने के कारण बच्चों की जीवन प्रत्याशा के प्रति नकारात्मक सोच जैसी धारणाएं जन्म दर ऊंचा रखते हैं वहीं पिछड़ेपन तथा अल्पविकास के कारण घटिया किस्म का अल्प आहार,कुपोषण,भुखमरी ,अल्पविकसित सफाई व्यवस्था,मेडिकल सुविधाओं का अभाव,मानवीय जीवन की क्षति कर मृत्यु दर को भी ऊंचा रखता है.ऐसे देशों में जनसंख्या नियंत्रण या परिवार नियोजन जैसी सोच बेमानी है. अफ्रीका के कई देश इस श्रेणी में आते हैं. भारत देश में भी कुछ वर्ग इस सोच के शिकार हैं.
दूसरी अवस्था -इस अवस्था में देश आर्थिक दृष्टि से विकसित हो रहा होता है,खाद्यान्नों की नियमित उपलब्धि,चिकित्सा सुविधाओं के प्रसार तथा जीवन रक्षक दवाईयों की उपलब्धि से बीमारियों महामारियों पर नियंत्रण,स्वास्थ्य चेतना,शिक्षा के प्रसार से मृत्यु दर तो एक हद तक निम्न हो जाती है पर ग्रामीण अंचलों तथा जिन क्षेत्रों में शिक्षा का प्रसार पूर्णतः नहीं हो पाता वहां सामाजिक मान्यताएं ,रीति-रिवाज़ को बदलने में पर्याप्त वक्त लग जाता है अतः जन्म दर ऊंची ही रहती है जो जनसंख्या वृद्धि दर को बढ़ा देती है.कभी-कभी तो जनसंख्या विस्फोट (population explosion)की समस्या का भी सामना करना पड़ जाता है.जन संख्या का एक वर्ग हताशा और अभाव में जीने को अभिशप्त हो जाता है.भूमि पर जनसंख्या का दबाव बढ़ता है,पूंजी निर्माण तथा प्रतिव्यक्ति आय घट जाती है,आर्थिक विकास होते हुए भी उसके प्रभाव धूमिल पड़ जाते हैं.यह समस्या भारत और चीन जैसे देशों में दृष्टि गोचर होने की वजह से इन देशों में परिवार नियोजन तथा जनसँख्या नियंत्रण की सर्वाधिक ज़रुरत महसूस की गई .चीन ने एकल संतान की नीति को सख्ती से पालन किया और अब वहां की जनसंख्या स्थिर है हाल ही में वहां इस नीति को हटाने की मांग प्रबल हो गई है.भारत में शिक्षित वर्ग में एकल या दो संतान तक सीमित होने की भावना दिखती है पर अशिक्षित वर्ग आज भी इस सिद्धांत को मानने को राजी नहीं है.साथ ही कुछेक धर्मं में परिवार नियोजन के कृत्रिम संसाधनों को अपनाना धर्मं विरुद्ध माना जाता है तो कुछ धर्म अपने समुदाय की संख्या बढाने पर जोर देते हैं .हालांकि जनसँख्या का अधिक होना किसी देश या धर्मं समुदाय की शक्ति का द्योतक नहीं है .आज वही देश शक्ति सम्पन्न है जिसके पास संसाधन के साथ गुणात्मक जनसँख्या शक्ति है.वैज्ञानिक प्रगति ने मशीन को जन्म दिया ,इंसान सोचता है ,मशीनें काम करती हैं जहां 50 इंसान काम करते थे आज वही काम एक प्रबुद्ध तथा प्रशिक्षित इंसान के द्वारा मशीन से सम्पन्न करा लिया जाता है.हम महाभारत युद्ध के लाखों योद्धा के युग से पानीपत के युद्ध में बाबर द्वारा तोप के प्रयोग से उतरोत्तर योद्धाओं की कमी को इतिहास में पढ़ते हुए हिरोशिमा नागासाकी के एक बम के प्रयोग की ताकत को बखूबी समझ चुके हैं.(यहाँ मैं किसी हिंसा या युद्ध का समर्थन ना करते हुए महज़ वैज्ञानिक प्रगति के ऐतिहासिक उदहारण को दृष्टांत के रूप में प्रस्तुत कर रही हूँ)
ऐसे कोई भी देश जो जनसंख्या वृद्धि की दूसरी अवस्था में हैं,वहां तब तक परिवार नियोजन अनिवार्य कर देना चाहिए जब तक की जनसँख्या संतुलित ना हो जाए .अधिक जनसँख्या के लिए देश रोटी,कपड़ा,मकान के आलावा शिक्षा रोजगार जुटाने में इस कदर संलग्न हो जाता है कि वैज्ञानिक प्रगति या वैज्ञानिक रूप से प्रशिक्षित लोगों को तैयार करने में एक हद तक असफल रहता है .इसके आलावा शिक्षित वर्ग या प्रबुद्ध प्रतिभाओं के लिए अशिक्षित वर्ग हमेशा खतरे के रूप में उपस्थित रहता है .समाज वर्गों में विभाजित हो जाता है.अतः परिवार नियोजन के महत्व को सभी लोगों में प्रचार-प्रसार कर अनिवार्यता से लागू करना निहायत ज़रूरी है.
तीसरी अवस्था में जब देश विकास के उच्च स्तर पर पहुँच जाता है तब साक्षरता,शिक्षा विशेष रूप से स्त्री शिक्षा का प्रसार होने से छोटे परिवार का महत्व स्वयं ही लोगों की समझ में आ जाता है.तब बच्चे परिसंपत्ति नहीं देयता बन जाते हैं.बड़े शहरों ..कस्बों से होते हुए ग्रामीण अंचलों तक भी लोग परिवार के मात्रात्मक पक्ष की तुलना में गुणात्मक पक्ष के महत्व को समझने लगते हैं और जन्म दर घट जाती है.साथ ही जनसंख्या के पालन पोषण में लगने वाले संसाधन का प्रवाह चिकित्सा स्वास्थय,सफाई शिक्षा वैज्ञानिक प्रगति की ओर होने से मृत्यु दर भी घट जाती है और जनसंख्या स्वयं संतुलित हो जाती है.हाँ ऐसे विकसित देशों को भी इस अवस्था के चरम पर आते ही श्रम शक्ति की कमी महसूस होती है तब वे जन्म दर को बढ़ाना ज़रूरी समझते हैं. जैसा कि वर्त्तमान में ऑस्ट्रेलिया देश की सरकार का प्रयास है.
इस प्रकार जनसंख्या का मात्रात्मक पक्ष या यह कहाँ कब और कितनी ज़रूरी है यह उस देश के संसाधन उसके प्रयोग के लिए कुशल व्यक्ति की उपलब्धता तथा आर्थिक विकास पर निर्भर करता है.पर एक बात गौर तलब है कि जनसंख्या के गुणात्मक पक्ष की ज़रुरत हमेशा बनी रहेगी.
अगर आप एक अच्छे अभिभावक हैं तो अपने जैसे अधिकाधिक बच्चों को जन्म देने की बेबुनियादी सोच कभी ना रखें बल्कि मेरा मानना है कि आप समाज में से ऐसे बच्चे जो वंचित ,अशिक्षित कुपोषित हैं उन्हें अपने उपलब्ध संसाधनों से बेहतर बनाएं और अपने एक या दो जन्में बच्चों को भी यही शिक्षा दें कि वह इस दिशा में आगे बढे और समाज के ज़रूरतमंद बच्चों को अपने संसाधन का एक हिस्सा देकर बेहतर समाज की स्थापना में सहायक हो .क्योंकि किसी भी समाज में अगर HAVES और HAVES NOT  का परिदृश्य है तो वह सिर्फ HAVES NOT  के लिए ही नहीं बल्कि HAVES  के लिए भी THREATENING  है.


जनसंख्या वृद्धि उन समुदायों/परिवारों के लिए आर्थिक कठिनाइयां लाती है जो परम्परागत विधियों में बंधा जीवन व्यतीत करते हैं क्योंकि अधिक जनसंख्या...रोटी कपड़ा जैसी बुनियादी ज़रूरतों पर व्यय ...अधिक संसाधन का प्रयोग ...शिक्षा ,मनोरंजन,रचनात्मक कार्य के रूख की उपेक्षा...हताशा में यौन संतुष्टि में ही मनोरंजन की चेष्टा और पुनः अधिक जनसँख्या ....का दुष्चक्र चलता रहेगा परन्तु अगर वहां अल्प संख्या में भी शिक्षित,संवेदनशील और कुशल प्रशिक्षित जनसंख्या मौजूद है तो उनमें इतनी सामर्थ्य है कि इस प्रकार के परिवार/समुदाय से उनके तरीके और सोच को बदलवा सकती है और दीर्घकाल में उन्हें बहुत अधिक उन्नत तथा उत्पादनकारी परिवार/समुदाय में परिवर्तित होने में सहायक हो सकती है. आप सब को मेरे ब्लॉग सिर्फ एक ही बुलबुल काफी है की याद दिलाना चाहूंगी.हालांकि अधिकाँश लोग इस ब्लॉग की विषय-वस्तु से असहमत थे फिर भी मेरा मानना है कि जब तक हमारा देश भारत आर्थिक विकास की संतोषजनक बिंदु को प्राप्त ना कर ले तब तक एकल संतान की विचारधारा को ही अपनाया जाए.ग्रामीण अंचलों,कस्बों तथा अशिक्षित वर्ग में भी इस बात के महत्व को बताया जाए .ऐसा करने पर कुछ दशकों में देश जनांकिकीय संक्रमण सिद्धांत के जनसंख्या की तीसरी अवस्था के शुरुआती दौर में पहुँच जाएगा और तब पुनः दो संतान की नीति अपनाई जा सकती है.
आज जनसंख्या शक्ति नहीं है हाँ उसका गुणात्मक पक्ष अवश्य शक्ति शाली है जनसंख्या,क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से भारत ,चीन कितना भी बड़े हों वे अमेरिका या छोटे से देश इंग्लैण्ड या जापान के सामान विकसित नहीं हैं और तब तक नहीं होंगे जब तक वे जनसंख्या वृद्धि की तीसरी अवस्था में ना पहुँच जाएं.
Few roses are better  than the weeds in the  garden.
qualitative aspect of population is never  a burden
lets give a thought for our nation's development
taking' small family happy family' as a  commitment.

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Wednesday, July 3, 2013

मानव अपने विकास का,अब अंजाम देख ले

मेरे प्रिय पाठकों
उत्तराखंड में भीषण त्रासदी से प्रभावित लोगों के दुःख से हम सब दुखी हैं ,ईश्वर मृतकों की आत्मा को शान्ति दें तथा वहां फंसे लोग जल्द सही सलामत अपने घरों को वापस आ जाएं .वहां के स्थानीय निवासियों की रोजी रोटी पुनः स्थापित हो सके ....यही हमारी प्रार्थना है.इसके साथ ही सेना (आर्मी/ आई टी बी पी/ सी आई एस ऍफ़ /बी एस ऍफ़/ बी आर ओ / एयर फ़ोर्स )के बहादुर जांबाजों को उनके अनमोल योगदान के लिए शत-शत नमन है.
आज ज़िंदगी के फलसफे से सम्बंधित एहसास और भी प्रबल हो गया कि ......
बहा ले जाते हैं सैलाब किस कदर सब कुछ
उन्हें क्या पता कि कौन, कहाँ और किधर के हैं लोग ......

आपदाएं जब भी आती हैं बिना भेद-भाव के सब कुछ अपने साथ बहाती और मिटाती जाती हैं किसी ने सच कहा है...
चिराग घर का हो,महफ़िल का हो कि,मंदिर का
हवा के पास कोई मसलहत नहीं होती...

इस आपदा ने हम सब को सोचने पर मजबूर कर दिया है .क्या यह हम मनुष्य द्वारा प्रकृति से छेड़छाड़ की गुस्ताखी का भयंकर परिणाम नहीं ?? धरती सब कुछ चुपचाप सहती है पर एक सीमा तक ...उस सीमा का उल्लघन होते ही भूकंप,बाढ़,सुनामी.....के रूप में वह कहर ढाने को मजबूर हो जाती है.
ऐसे स्थल जहां लाखों की संख्या में लोग दर्शनार्थ जाते हैं ....केदारनाथ ,बद्रीनाथ या ऐसे ही कई पहाडी स्थानों पर ....क्या पर्यटन के रूप में विकसित इन स्थानों की अधोसंरचना और विकास के वक्त वैज्ञानिक विधि का ध्यान रखा जाता है? नहीं ....चट्टानों को काट कर सड़क बनाने की बजाय ,जमा हुए मलबों पर ही सड़क का निर्माण...या फिर चट्टानों को विस्फोट कर फिर सड़क बनाने की कवायद...एक तरफ पहाड़ ..... तो एक तरफ गहरी खाई और फिर उन सर्पिलाकार सडकों पर विषैले गैस उत्सर्जित करते अत्यधिक वाहनों का आवागमन.... और उन वाहनों पर मौत को हाथ में लिए यात्रियों की यात्रा...वाहन और यात्रियों दोनों की संख्या में वृद्धि कर पहाड़ों की क्षमता के साथ समझौता ......इससे जनित प्रदूषण .....वनों का अति कटाव कर होटल,सराय,धर्मशाला के अलावा रिहायशी मकान भी बना देना ... रोजगार सृजन के लिए उद्योग धंधों की स्थापना ..वनों को काट कर अधिकाधिक भूमि को सीढ़ीदार खेतों में तब्दील कर देना...जल विद्युत् परियोजनाओं को रूप देना...पहाडी नदियों पर अवैज्ञानिक रूप से बाँध बना देना...पर्यटन उद्योग के नाम पर स्थानीय संसाधनों का ज़रुरत से अधिक और विवेकहीन दोहन ....प्लास्टिक की बोतलों,खाद्य सामग्री के पैकेट इत्यादि का इधर -उधर बिखराव कर पहाड़ों के नैसर्गिकता के साथ खिलवाड़....पहाड़ों के नीचे ही घर बना लेना... प्रकृति को चुनौती देना ,उसकी सरासर उपेक्षा नहीं तो और क्या है ? ??गोविन्दघाट पर 3000 कार खडी करने के लिए पार्किंग स्थल बनाने की विवेकहीनता मनुष्य की है ...कुदरत की नहीं. देल्ही,मुम्बई के बड़े-बड़े व्यवसायी पहाड़ों को व्यवसाय के दृष्टिकोण से सर्वोत्तम मान उन्हें खरीदने में रुचि रखते हैं. कुछ बिल्डर्स तो नियमों की सर्वथा अवहेलना करते हुए कई मंजिला इमारतें बनाने से भी गुरेज़ नहीं करते.हिमालय यूँ भी नवीन पर्वत श्रींखलाओं में से एक है.ये पर्वत विकास की अन्धाधुन दबाव को झेल नहीं सकते....विस्फोट ,खनन प्रक्रिया जैसी गतिविधियों से भी ये धीरे-धीरे अन्दर ही अन्दर भुरभुरे होते जाते हैं और फिर ढाल पर तेजी से बहती पहाडी नदियों के संपर्क में आते ही भूस्खलन या चट्टान खिसकने जैसी आपदाओं का कारण बन जाते हैं.

अर्थशास्त्र की छात्रा रह चुकने के कारण ,इस विपदा पर उपजी संवेदनशीलता के बीच supermoon जैसी ज्योतिष अवधारणा से परे मैं माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत के मापदंड पर आकलन करना चाहूंगी.हालांकि इस सिद्धांत की कई बातें आलोचनाओं का शिकार हुई थीं और नव माल्थसवाद और इष्टतम जनसंख्या सिद्धांत के रूप में नए सिद्धांतों का प्रतिपादन भी हुआ था.
टॉमस रोबर्ट माल्थस ने 18 वीं शताब्दी में यूरोप के विभिन्न देशों के जनसंख्या विकास का गहन अध्ययन किया था और यूरोपीय देशों की आकस्मिक एवं त्वरित जनसंख्या वृद्धि तथा उपजे विकास प्रक्रिया से वे आतंकित हो उठे थे.उन्हें मानव का भविष्य अंधकारमय दिखाई दिया.उन्होंने जनसंख्या वृद्धि को कड़े नियंत्रण में रखने की वांछनीयता पर बल दिया.उन्होंने अपनी पुस्तक में सिद्धांत की चर्चा में कुछ मुख्य बातें की हैं...
जो इस प्रकार हैं ...
1 ) उपजीविका प्रदान करने की भूमि की शक्ति की तुलना में जनसंख्या की शक्ति निस्सीम या अनंत है.
2) अनियंत्रित जनसंख्या ज्यामित्तिय अनुपात geometrical ratio  (1,2,4,6,8,... )में बढ़ती है जबकि खाद्यान्नों की पूर्ति अङ्कगनितॆय श्रेणी arithmetical progression (1,2,3,4,5,6....) से बदती है.फलस्वरूप प्रकृति में असंतुलन उत्पन्न हो जाता है.
"This natural inequality of the two powers of population and of production in the earth and that great law of our nature which must constantly keep their effects equal,forms the great difficulty that to me appears insurmountable in the way to the perfectiability of human survival "
- malthas

3)प्रकृति इस असंतुलन के निवारण के लिए अकाल,बाढ़,भूकंप,भुखमरी,महामारी के रूप में स्वयं ही जनवृद्धि पर नैसर्गिक प्रतिबन्ध लगाती है फलस्वरूप अतिरिक्त जनसंख्या मृत्यु का शिकार हो जाती है और जनसंख्या और खाद्य संसाधन संतुलित हो जाते है.
माल्थस नैसर्गिक प्रतिबन्ध को NATURAL CHECKS  के रूप में परिभाषित करते हैं,जो प्रकृति द्वारा तभी लागू होते हैं जब मानव स्वयं अपने द्वारा जनसँख्या की अत्यधिक वृद्धि को रोकने में असमर्थ होता है.नैसर्गिक प्रतिबन्ध वास्तव में मानव के अविवेकपूर्ण कृत्यों का उपचार मात्र है.लेकिन यह भी सत्य है  कि इन नैसर्गिक प्रतिबंधों के कारण मानव को अनगिनत कष्ट और यातनाएं झेलनी पड़ती हैं.
अगर हम थोड़ा गौर करें तो माल्थस के सिद्धांत की बातें अप्रत्यक्ष रूप में सही ही हैं.अत्यधिक जनवृद्धि ...उनके लिए खाद्य सामग्री,पेय जल की व्यवस्था,रोजगार सृजन...आवास,वस्त्र,शिक्षा इत्यादि की व्यवस्था और इन से उपजी आवश्यकताओं के लिए प्राकृतिक संसाधनों का अवैज्ञानिक रूप से अत्यधिक मात्रा में  दोहन.....कुदरत को तांडव करने को विवश कर देता है .अब इसे हम माल्थस के नैसर्गिक प्रतिबन्ध के रूप में समझें या फिर कोई अन्य व्याख्या करें पर हकीकत यही है कि ऐसी विपदाएं मानव की विवेकहीन विकास प्रक्रिया का ही अंजाम होती हैं .25 जून 2009 में पश्चिम बंगाल के सुंदरवन के गाँव आईला नामक चक्रवात की मार झेले ,मार्च 11,2011 में जापान के फुकुशिमा की आपदा, चीन के 2008 के भूकंप ...प्रकृति के ऐसे कितने विनाशकारी रूप से मानव सभ्यता रूबरू हो चुकी है .
पर्यटन केंद्र के रूप में कोई भी पहाडी स्थान खतरे से खाली नहीं है तटीय इलाकों में बिलकुल निचले बाढ़ प्रभावित इलाकों में घर बनाना,भूकंप प्रभावित स्थानों में ईंट-पत्थर के घर बनाना,समुद्र तटों पर बहुमंजिली इमारतें बनाना आपदाओं को खुला आमंत्रण है.हर स्थान की भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रख कर अगर बस्ती बसाई जाए तो ऐसी आपदाओं का हमें सामना भी नहीं करना होगा .....करना भी पडा तो जान माल का इतनी बड़ी संख्या में नुकसान नहीं झेलना पडेगा.यह आपदा जो आज पहाड़ों  के पोर-पोर से बह रहे हैं .....वे अनियोजित विकास के मार झेलती प्रकृति के  नासूर थे और इस विनाश का सृजनकर्ता मनुष्य अपने सामने ही तबाही का मंज़र देखने को विवश है .तकनीक कितनी भी विकसित हो जाए उसका अविवेकपूर्ण प्रयोग सदा विनाश लीला का मंज़र उत्पन्न करता रहेगा.इतनी बड़ी संख्या में फंसे लोगों के लिए कितनी भी उच्च तकनीक का इस्तेमाल किया जाए ....उसकी पहुँच कुदरत की रहमोकरम पर ही निर्भर करेगी.

एक बात गौर तलब यह भी है कि पहले उम्रदराज़ लोग ही ऐसी यात्राओं में निकलते थे और वह भी बहुत कम संख्या में और दुर्गम राहों पर पैदल यात्रा करते थे जबकि आज छोटे-छोटे बच्चों को साथ लिए अधिकाधिक संख्या में लोग ऐसे तीर्थ स्थानों पर जाने लगे हैं.
मानव सभ्यता वैज्ञानिकता के साथ कदम मिलाते हुए विकास की नई-नई इबारतें लिखती गई और कुदरत मानव सभ्यता के 'गुफा युग से अंतरिक्ष युग' तक के विकास की साक्षात गवाह रही है .....विवेकपूर्ण और वैज्ञानिक विधि से होने वाले विकास की सहयोगी भी रही है .पर जब जब अति हुई है मनुष्य ने प्रकृति को खुली चुनौती दी है....तब-तब प्रकृति ने नैसर्गिक प्रतिबन्ध अवश्य लगाया है और यही वज़ह है कि सदियों से ऐसी कई आपदाएं आती रही हैं और आती रहेंगी .इससे पूर्णतः बचा भी नहीं जा सकता. हाँ,विकास की प्रक्रिया को विवेकपूर्ण ढंग से अंजाम देकर ,इसे क्षणिक लोभ के वशीभूत अल्पकालिक विकास का जामा पहना कर महज खानापूर्ति करने की प्रवृति को लगाम देकर ,इसकी तीव्रता ,कम अन्तराल में पुर्नावृति और इससे उपजे भयावह परिणाम को कम ज़रूर किया जा सकता है.
मनुष्य अगर विकास की दिशा में सही और विवेकपूर्ण कदम बढाए तो उसे समझौते करने की ज़रुरत ही नहीं पड़ेगी.हर स्थान पर उस की भौगोलिक परिस्थिति के आधार पर कुछ DO'S and DONT'S  का निर्धारण होना ज़रूरी है.सूदूर पहाडी स्थानों को सडकों के द्वारा जोड़ने का स्वागत किया जाना चाहिए पर वे सड़कें उन स्थानों की ज़रुरत के अनुसार हों .उन्हें मलबों के ऊपर नहीं बल्कि चट्टानों को काट कर बनाया जाए....उन पर चलने वाले वाहनों की संख्या नियंत्रित की जाए...उन पहाड़ों की कुदरती सौंदर्य और सुषमा को स्थानीय स्पर्श तक ही सीमित रखा जाए वहां मॉल,होटल ,बहु मंजिल इमारतें बना कर विनाश के विस्फोटकों पर ना रखा जाए.पहाड़ हों या समुद्र तट .....अपनी मूलावस्था और नैसर्गिकता में ही सुन्दर और सुरक्षित रह सकते हैं.उनमें आधुनिकीकरण की पैबंद उन्हें बदसूरत बनाने के साथ-साथ असुरक्षित भी बना देते हैं जिसका भयंकर परिणाम मानव को झेलना ही पड़ता है.मानव अब भी ना चेते तो इसमें कुदरत का कोई दोष नहीं .हाँ ,वह नैसर्गिक प्रतिबन्ध लगाने से भी गुरेज़ नहीं करेगी यह बात हमें अवश्य ध्यान में रखना होगा.


कुदरत लहुलुहान है ,अब यह शाम देख ले
मानव अपने विकास का,अब अंजाम देख ले

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