ये अक्सर सुनते हैं हम कि समाज में, विकृतिता जोरों से बढ़ रही है
पर यक्ष प्रश्न यह है कि हमारी पीढ़ी,नयी पीढ़ी को कितना गढ़ रही है
हम अपने ही सुरक्षा कवच में,आज इस कदर क्यों सिमटे हुए हैं ?
नयी तकनीक के चकाचौध की,रंगीन चादर में क्यों लिपटे हुए हैं?
दूसरों की दुःख,वेदना,व्यथा, अब कहाँ दिखती है कहो हमें भला ?
किसी से मिलने से पहले सोचते हैं,कैसे हटाओ सर से ये बुरी बला ?
एक बेहतर समाज की आशा भला ,इस माहौल में कैसे करें हम?
काली रोशनी के पीछे का घना अन्धेरा,दूर कैसे हो ये विचित्र तम ?
स्वयं का सुरक्षा कवच भी सोचो ,हमें आखिर कब तक बचा पायेगा ?
नयी पीढ़ी के सुनहरे भविष्य का ,कहो इतिहास कैसे रचा जायेगा?
मत सिमटो स्वयं में ,सुगंध अपनी जग की बगिया में बिखरने दो
गुणों से भरपूर ये पैमाना,समाज हित में जी भर कर छलकने दो
जानती हूँ विचलित समाज में ,हो सकते हैं हम उपहास के पात्र
कदम पीछे करने को हमारे,क्या यही होगा बोलो कारण एकमात्र
लाखों के हुजूम में एक ही तो,रविन्द्र ,गाँधी आदि जैसे होते हैं
जागृत करने सुप्त समाज को,भला अपनी नींद ये कब सोते हैं?
क्या होता रूप समाज का,अगर ये भी हो जाते स्वयं तक सीमित
बनो अग्रदूत ले प्रेरणा इनसे,है तुममे भी संभावना अपरिमित
जहाँ खड़े हो उठाओ वहीँ से ,नव निर्माण का प्रथम सशक्त कदम
सुकार्य करने का है यही समय,न मिलेगा हर बार हमें मनुष्य जनम
पर यक्ष प्रश्न यह है कि हमारी पीढ़ी,नयी पीढ़ी को कितना गढ़ रही है
हम अपने ही सुरक्षा कवच में,आज इस कदर क्यों सिमटे हुए हैं ?
नयी तकनीक के चकाचौध की,रंगीन चादर में क्यों लिपटे हुए हैं?
दूसरों की दुःख,वेदना,व्यथा, अब कहाँ दिखती है कहो हमें भला ?
किसी से मिलने से पहले सोचते हैं,कैसे हटाओ सर से ये बुरी बला ?
एक बेहतर समाज की आशा भला ,इस माहौल में कैसे करें हम?
काली रोशनी के पीछे का घना अन्धेरा,दूर कैसे हो ये विचित्र तम ?
स्वयं का सुरक्षा कवच भी सोचो ,हमें आखिर कब तक बचा पायेगा ?
नयी पीढ़ी के सुनहरे भविष्य का ,कहो इतिहास कैसे रचा जायेगा?
मत सिमटो स्वयं में ,सुगंध अपनी जग की बगिया में बिखरने दो
गुणों से भरपूर ये पैमाना,समाज हित में जी भर कर छलकने दो
जानती हूँ विचलित समाज में ,हो सकते हैं हम उपहास के पात्र
कदम पीछे करने को हमारे,क्या यही होगा बोलो कारण एकमात्र
लाखों के हुजूम में एक ही तो,रविन्द्र ,गाँधी आदि जैसे होते हैं
जागृत करने सुप्त समाज को,भला अपनी नींद ये कब सोते हैं?
क्या होता रूप समाज का,अगर ये भी हो जाते स्वयं तक सीमित
बनो अग्रदूत ले प्रेरणा इनसे,है तुममे भी संभावना अपरिमित
जहाँ खड़े हो उठाओ वहीँ से ,नव निर्माण का प्रथम सशक्त कदम
सुकार्य करने का है यही समय,न मिलेगा हर बार हमें मनुष्य जनम