Friday, March 7, 2014

RED DIARY

1)


RED DIARY


the gentleman...
completely drowned in love
his word,anxiety,care
was only for her sweet heart
but entirely intangible
moreover to people ...negligible
as it was love of post age
who cares love of this stage ?
word by word....
his feelings..his worries...his love
were used to be taken shape
in ink ..crawling...on blank page
where was the existence
of the lady 75 yrs old..
it was only within
the gentleman of 79 yrs old
Alas !he is no more
but their love with crystal clear
her existence is still alive
physically lies with near & dear
emotionally in RED DIARY's dive.
2)


UTTER SILENCE


In utter silence...
she speaks with self
dwindled...uplifted..
dives to depth.
Evidences...
every hustle-bustle
of world outside
with tranquility
rooted  inside .
Making the castles
in the air...
every difference
shoutes @ other
she wants to interrupt
as it's not fair
her thought is
stepped on without care.
So......what ?????
This ignorance ..
cann't bury her thought
a wonderful land
has to be sought
she doesn't lose
her innocent spirit
takes her flight
beyond the limit.
Beyond this GLOBE
she has her own WORLD
freely she wanders around
some one is there to be found .
Someone.........who....
might listen & understand...
feeling the tranquility in real sense
mystic language of this utter silence.
3)
Life :an endless journey of fortune
cann't say....
where,when,why & who
would we meet
the experience would be
sour or sweet
imprinted in mind
as good or bad
cherished by us
as joyous or sad....
yet for a purpose or purposeless
we've to meet
but acquaintance should be
clean & neat
as life is an endless
journey of fortune
it's extremely difficult
to walk in solitude
it's true that
life stationed once & again
one day we meet
an immensely likeable man
who would go with
to the same destination
promise,commitment.....
need not to mention
sharing..caring...
enjoying the journey
making the life
as sweet as honey
it's the very station
of utter happiness
definitely it's the
destination of togetherness.
4)



Girls ...naturally matured girls'.....
life always seems as maze
gain the maturity @ early stage

the first game in their childhood
played is always of motherhood
they play the role of moms of doll
or little teachers call the roll
that's all about the creation
sacrifice,love,care & affection
they have never been a child
naturally grow mature & mild .
5)

The Embarrassed Eagle


There was a vast & open blue sky to soar
the excited eagle ignored even plane's roar
it was very beginning of its flight
having faith on wings see was out of sight
people saw only a small point ......
in the sky where was the giant ???
After each flight it used to land
but couldn't see scissors in a hand
the scissors cut its powerful wing
as it was flying with utmost zing.
Oh ! it cut the wings close to heart
the eagle became a flightless bird ....
as an ostrich with its head to be legged
tormented one ; now no more a fledged
I feel pity for the embarrassed eagle
but how can stop others to giggle ?
-yamuna pathak

नारी सशक्तिकरण नहीं 'मैं हूँ' का संज्ञान

जब कभी भी महिला सशक्तिकरण की चर्चा होती है ,मैं अपने आस-पास के पारिवारिक ,सामाजिक परिचित से रिश्तों के कैनवास पर घंटों रोटी बेलती,पापड -बड़ी अचार बना कर बेचती,सिलाई मशीन पर आँखें जमाये घर परिवार के लिए सुखद स्वप्न की आस लिए,दफ्तर जाते पति के लिए सारी तैयारियां जुटाती,बच्चों को स्कूल भेजती,घर और कार्यस्थल के बीच संतुलन बिठाती सैकड़ों महिलाओं और दूर दराज़ बसी नामचीन अज़नबी रिश्तों के कैनवास पर उभरती ...अखबार की सुर्खियां बनती ...समाज,देश ,विश्व के लिए उपलब्धियां हासिल करती अनेकानेक महिलाओं की विभिन्न तस्वीरों की ना चाहते हुए भी तुलना करने को बाध्य हो जाती हूँ....ध्यान से कैनवास पर देखने के क्षण ... वे सभी तस्वीरें मुझ पर ही हंसती सी प्रतीत होती हैं क्योंकि सब एक ही बात कहती हैं ...महिला सशक्तिकरण को हम सब नहीं मानती....हमें महिला होने के संज्ञान से भी अधिक 'मैं हूँ' के संज्ञान पर विश्वास है.यह तो अमनुष्य स्त्री और पुरुषों की दुनिया है जो हमें अबला (कविताओं में 'अबला जीवन तुम्हारी ..कहानी) भाषणों में सबला...दुष्कृत्य कर पीड़िता...सत्कर्म की आस में साध्वी...जैसे ना जाने कितने विशेषणों में सुसज्जित करता है ....जब चाहा मातृ शक्ति बना पूजा की वेदी पर बिठा दिया ...जब चाहा डायन करार दे निर्वस्त्र घूमा कर सरेआम जला दिया ....इन सब घटना क्रम में कभी भी यह पूछने की ज़हमत ही नहीं उठाया कि मैं या हम सब क्या महसूस करती हैं...हमें मातृ शक्ति का सम्मान ..डायन का अपमान चाहिए भी या नहीं.एक महिला होने के भान की बजाय संपूर्ण रूप से एक मनुष्य होने के संज्ञान में जीवन गुज़ारती ...मैं प्रत्येक महिला दिवस पर महिला सशक्तिकरण जैसे शब्द मृग मरीचिका से खिन्न हो जाती हूँ .
माँ.बहन,बेटी.पत्नी,बहू,देवरानी,जेठानी,के विभिन्न रिश्ते निभाती अपने पारिवारिक वातावरण की तमाम महिलाएं और स्वयं भी इन्ही पारिवारिक सामाजिक रिश्तों को निभाते हुए एक ही बात मैं महसूस करती हूँ ..पुरुष का महिला से या महिला का पुरुष से कोई बैर नहीं एक समझदार,सुशिक्षित ,सुसंस्कृत महिला ना शोषण करना पसंद करती है ..ना ही किसी को या स्वयं को शोषित होना देखना पसंद करती है क्योंकि वह महिला होने से भी ज्यादा एक मनुष्य होने के संज्ञान से भरी होती है.स्वस्तित्व का ज्ञान.. स्वकार्य का भान उसे सशक्तिकरण अबला सबला ...जैसे शब्दों की संकीर्ण सीमाओं से बहुत दूर ले जाता है .वह जानती है जब कभी परिस्थितियां सम होंगी वह उस अनुकूलता को अपने मनुष्य होने के संज्ञान से पूरे परिवार समाज या पृथ्वी को सुसज्जित कर देगी...जब कभी परिस्थितियां विषम होंगी वह अपने बुद्धि कौशल ,मेधा ,प्रज्ञा ,प्रतिभा और समझदारी से उसे अनुकूल बना कर परिवार समाज या सम्पूर्ण कायनात का पतन होने से रोक सकेगी और यह करने के लिए उसे सशक्तिकरण की नहीं संज्ञान की ज़रुरत है.एक व्यक्ति के रूप में अगर अपने कर्त्तव्य की सही व्याख्या समझ सके...अपने सम्मान,अपने वज़ूद को कायम रख सके तो इस संज्ञान से बढकर कोई सशक्तिकरण हो ही नहीं सकता.
घर में जन्मी पांचवी पुत्री संतान ...ससुराल में पांचवी बहू ...और एक दकियानूसी समाज ...जहां स्त्री की मेधा बुद्धि प्रतिभा दक्षता की सर्वथा उपेक्षा की जाती हो मैंने हमेशा वही किया जो मुझे अच्छा लगता है और यह ध्यान अवश्य रखती हूँ कि मेरे उस कृत्य से किसी का अहित नहीं होता ..एक मनुष्य होने का संज्ञान मुझे हमेशा सही राह पर चलने की प्रेरणा देता है .मैंने महसूस किया है कि क्षेत्र चाहे परिवार स्थल हो ,कार्यस्थल या समाज स्थल एक जिम्मेदार और मूल्यपरक महिला को कोई पुरुष महिला के रूप में नहीं एक मनुष्य के रूप में ही देखता है....उसकी अस्मिता से खिलवाड़ करने का साहस कोई स्त्री या पुरुष नहीं कर सकता है यह एक दिव्य शक्ति है जो उसे मनुष्य होने के नाते प्राप्त है किसी मातृ शक्ति या साध्वी होने के नाते नहीं.
जब जन्म से पूर्व ही मार दी जाने वाली पुत्री संतान ,दहेज़ प्रथा के लिए बलि चढ़ती नवयौवनाओं,भाई-बहन की परवरिश की विषमता,अस्मिता का हनन,विचारों के प्रवाह से उत्पन्न पुरुष मित्रता के लिए प्रदूषित नामकरण , डायन ,रखैल के नाम पर शोषण,चीर हरण,तेज़ाब अटैक,तंदूर पर जलाया जाना,वैधव्य का तिरस्कार ,तलाक शुदा ,परित्यक्ता,दूसरी औरत का दंश झेलती ,देह व्यापारमें उलझी , कठपुतली सी नाचती,बाज़ारों में उत्पाद बेचने के लिए देह प्रदर्शन करती,महिलाओं को देखती हूँ तो इसके पीछे कारण के रूप में मैं पुरुष और स्त्री समाज के विभेदीकरण से भी ज्यादा मनुष्य और अमनुष्य का भेद देख पाती हूँ .इसी पुरुष प्रधान समाज में हमारी माता जी,बड़ी बहन ,सासु माँ,कल्पना चावला,पी.टी उषा,कर्णम मलेश्वरी,मृदुला गर्ग,अमृता प्रीतम ,चन्दा कोचर,इंदिरा नूयी,अरुंधती भट्टाचार्य,निशी वासुदेवन,जैसी कई महिलाओं ने अपने अस्तित्व का सबूत दिया ....एक मनुष्य होने का ...अपने कर्त्तव्य और किरदार में संतुलन रख जीवन जीने का रास्ता खोज आगे बढती गईं ....ज़रुरत यह है कि किसी भी महिला को महिला होने के भी पूर्व एक मनुष्य माना जाए ...समाज का दोनों ही वर्ग जिसे तथाकथित समाज स्त्री-पुरुष कहना पसंद करता है पर मैं मनुष्य और अमनुष्य कहना पसंद करती हूँ ...स्त्री के विचारों ,उसकी मेधा को सम्मान दे उसे हाड मांस का पुतला ना समझे .....हाड मांस के अंदर अदृश्य रूप में छुपी उसकी आत्मा को भी समझे यही महिला दिवस का सबसे बड़ा उपहार होगा ....एक मनुष्य के द्वारा एक मनुष्य को ना कि तथा कथित पुरुष प्रधान समाज के द्वारा स्त्री को या स्त्रियों के द्वारा स्वयं को ...
मुझे इस बात का मलाल हमेशा रहता है कि एक विचारवान तबका जिन तक हमारी पहुँच है वे तो इस मनुष्यता को समझ पाते हैं पर नारी सशक्तिकरण के शब्द मृग मरीचिका में उलझे और विचारों की दुनिया से सर्वथा अछूते लोग नारी संज्ञान से भी ज्यादा नारी के 'मैं हूँ' के संज्ञान से रूबरू नहीं हो पाते.
तुम मेरे सशक्तिकरण का देते रहना नारा
'मैं नारी हूँ' कह कर देते रहना नज़राना

मैं कहती हूँ 'मैं हूँ' यह संज्ञान है काफी




मत निकालो हर '८ मार्च' को मेरी झांकी.