प्रार्थना------गंगा 'की' नहीं ;गंगा 'के लिए'
साँझ थी ढल रही...
अलंकृत नभ को कर रही
अस्ताचल सूर्याभा..........
गंगा में थी डूब रही
नयन मेरे अपलक....
गंगा को निहार रहे
मानो पतितपावनी में ....
थे पाप सारे बुहार रहे
दोपहर सा आलोक ना था
पर रोशनी इतनी भी सही
कण कण से गाथा गंगा की
कुदरत में अमृत थी घोल रही
मन ना माना......अंजुली भर
जल अधरों से लगा लिया
भ्रमित हुई खारेपन से मैं
क्या गंगासागर, गंगा से मिला
'उल्टी गंगा बहाना' मुहावरों से
निकल सत्य बन है हुआ खड़ा
या कुदरत ने लेकर करवट
जागरण सुप्त चेतनाओं का किया.
विकल मन के टूटे सितार सी
व्यथित गंगा ही सिसक उठी
गंगासागर के गंतव्य पूर्व ही
प्रदूषण से मैं जूझ रही
मेरी अश्रुधाराएँ ही हैं जो
खारा पानी को कर रही
धर्मानुष्ठान प्रार्थना ही मुझ पर
अब भारी हैं पड़ रही
माता कह कह कर पुत्र ही
दीप सीने पर हैं जला रहे
लावण्य भरी ममता जला कर
मौत असमय हैं बुला रहे
गौमुख की सी वह लावण्यता
फिर तुम मुझे लौटा दो
पाप निज तन मन की स्व में ही
रूपांतरित कर बहा दो
पतित पावन तुम सब बन कर
चलो ! अब मैल मेरे हरो
प्रार्थना 'मेरी' नहीं
अब प्रार्थना 'मेरे लिए' करो
-yamuna
साँझ थी ढल रही...
अलंकृत नभ को कर रही
अस्ताचल सूर्याभा..........
गंगा में थी डूब रही
नयन मेरे अपलक....
गंगा को निहार रहे
मानो पतितपावनी में ....
थे पाप सारे बुहार रहे
दोपहर सा आलोक ना था
पर रोशनी इतनी भी सही
कण कण से गाथा गंगा की
कुदरत में अमृत थी घोल रही
मन ना माना......अंजुली भर
जल अधरों से लगा लिया
भ्रमित हुई खारेपन से मैं
क्या गंगासागर, गंगा से मिला
'उल्टी गंगा बहाना' मुहावरों से
निकल सत्य बन है हुआ खड़ा
या कुदरत ने लेकर करवट
जागरण सुप्त चेतनाओं का किया.
विकल मन के टूटे सितार सी
व्यथित गंगा ही सिसक उठी
गंगासागर के गंतव्य पूर्व ही
प्रदूषण से मैं जूझ रही
मेरी अश्रुधाराएँ ही हैं जो
खारा पानी को कर रही
धर्मानुष्ठान प्रार्थना ही मुझ पर
अब भारी हैं पड़ रही
माता कह कह कर पुत्र ही
दीप सीने पर हैं जला रहे
लावण्य भरी ममता जला कर
मौत असमय हैं बुला रहे
गौमुख की सी वह लावण्यता
फिर तुम मुझे लौटा दो
पाप निज तन मन की स्व में ही
रूपांतरित कर बहा दो
पतित पावन तुम सब बन कर
चलो ! अब मैल मेरे हरो
प्रार्थना 'मेरी' नहीं
अब प्रार्थना 'मेरे लिए' करो
-yamuna