Friday, March 2, 2012

२६ फरवरी २०१२ "दैनिक जागरण"के मुख्य पृष्ठ में एक अच्छी खबर पढने को मिली-"पोलिओ मुक्त हुआ  भारत"शायर दुष्यंत साहब का एक शेर याद आया"कौन कहता है कि आकाश में सुराख नहीं होता,एक पत्थर तो तबियत से उछालो मेरे दोस्त"सच है इस कामयाबी के पीछे छुपी है वर्षों की मेहनत,अथक प्रयास,किसी ने तो सोचा होगा कि यह कर दिखाना है और तभी पुरी लगन से किया गया यह अभियान संभव हुआ.मुझे एक सच्चे भारतीय होने के नाते ही उस रात बड़ी अच्छी नींद आयी,पर यह क्या? नींद में एक दुस्वप्न देखा-एक वीभस्त सी आकृति घिसटते हुए बढ़ रही है,मैं जितना उसे पकड़ने की कोशिश करती वह घिसटने के बावजूद मुझसे आगे बढ़ जाता और स्वप्न में आप कितनी भी तेज दौड़ने की कोशिश करें, यूँ लगता है मानो पैर जड़ हो गए हैं.मैं चीख पड़ी"कौन हो तुम?तुम्हे क्या हुआ है?प्रत्युत्तर में कहीं ज्यादा जोर से चीखने की आवाज़ आयी"ए, हेलो,दिखता नहीं मैं पोलिओग्रस्त हूँ,हाँ !मैं तुम्हारा समाज हूँ ....घिसटता समाज" मैंने सांत्वना दी"रुको,'दो बूंद ज़िन्दगी की'वाला drops लाती हूँ.उसने कहा"अब देर हो गयी है" और बस इतने में मेरी आँखें खुल गयी.
इसलिए ,पाठकों आज मैं इस मंच पर 'एक  घूंट अमृत का'नारा ले कर आयी हूँ इस समाज में बढ़ते नैतिक पतन की समस्या के समाधान के लिए ..........
पिछले कई दिनों से एक ही खबर सबसे अधिक सुनने,पढने को मिल रही है"महिलाओं की इज्ज़त पर आंच"आधुनिक समाज बलात्कार,bhrashataachaar ,अपहरण जैसे ना जाने कितने विषाणुओं से अपाहिज हो चुका है.कचरे के पास कुर्सी लगाकर बैठ कचरे की ही आलोचना करने को मेरा संवेदनशील मस्तिष्क कभी गवाही नहीं देता.कचरे का स्रोत पता कर उसे हटाना मैं ज़रूरी समझती हूँ.
इस नैतिक पतन को मैं "मूल्यों की शिक्षा"से जोड़कर समाधान खोजना शुरू करती हूँ.मशहूर शायर सुदर्शन फाकरी साहब के इस शेर से आप सब वाकिफ होंगे"यह दौलत भी ले लो,ये शोहरत भी ले लो.....मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी"पर कहाँ है वो बचपन?वो तो आज बंद कमरे में vedio गेम,इन्टरनेट,मोबाइल पर व्यस्त है?पर दोस्तों, मैं इसके लिए इनमें से किसी भी आविष्कार को दोष नहीं दूंगी?जब आदि मानव ने आग की खोज की थी तो यह उसकी आवश्यकता ही थी,अब यह तो मनुष्य की सोच पर निर्भर है वह इस अग्नि का प्रयोग इंधन के रूप में करे या किसी का घर जला दे.एक चाक़ू डॉक्टर के हाथ में है तो  घायल की जान बचा देती है पर वही चाक़ू अगर किसी गलत हाथ में आ जाए तो????अल्फ्रेड नोब्ले ने कहाँ सोचा था की daynamite का इस तरह भी प्रयोग हो सकता है,तो यह तो मनुष्य की सोच,उसके विचार ही जिम्मेदार होते हैं.
कहाँ गए वो नैतिक मूल्यों को समझाती दादा-दादी की कहानियाँ ? वे बुजुर्ग ही तो आज हाशिये पर कर दिए गए हैं,उपभोक्तावादी समाज में स्त्री-पुरुष दोनों ही ,अधिकाधिक की लालसा में अर्जन करने को ,घर से बाहर काम करने को  विवश हैं.बच्चे माता के स्नेहसिक्त स्पर्श के बिना बड़े हो रहे हैं.ये न तो माली के द्वारा सँवारे बगीचे के पौधों सरीखे बढ़ पाते हैं;न ही  वनों में उपयुक्त जल'प्रकाश पाते हुए विशाल वृक्ष के तरह.फिर ऐसे बच्चों से संवेदनशीलता के कामना पत्थर से पानी निकालने का प्रयास ही तो है.अब आप पूछेंगे " महिलाएं पढ़-लिख कर अर्जन न करें तो शिक्षा पर लगाया गया निवेश व्यर्थ न  हो जाएगा?" ठीक है ;अगर वाकई घर पर ज़रूरत है तो निश्चय ही उन्हें नौकरी करनी चाहिए,पर सिर्फ शौक के लिए,या पढ़ाई के सदुपयोग की मंशा से काम पर  जाना है, यह सोच एक ज़रूरतमंद बेरोजगार का भी हक नहीं छिनती क्या??प्रसिद्ध लेखक रूबी मेनिकन ने लिखा है"यदि तुम एक पुरुष को शिक्षित  करते हो तो एक व्यक्ति को शिक्षित करते हो,पर अगर एक नारी शिक्षित को करते हो तो पुरे समाज को शिक्षित करते हो"नारी अपनी शिक्षा से परिवार,समाज को सुसंस्कृत बना सकती है.
आज मैं पूछती हूँ कहाँ है वह आत्मीयता भरा स्पर्श; जो असीम वेदना को अपने मजबूत कन्धों पर सर रखकर छलकने को बाध्य करता था? ये वेदनाएं उन मजबूत कन्धों के अभाव में  आज बाँध में एकत्रित जल की तरह होती जा रही हैं जिनकी अतिशयता अपनी ही मजबूत दीवारें तोड़कर जीवन को बहा ले जायेंगी.
माता-पिता यह न सोचे कि हमारे बच्चे होशियार हो गए हैं स्वयं ही सारे काम कंप्यूटर पर कर लेते हैं.एक शायर ने लिखा है"जुगनू को दिन के उजाले में परखने की जिद करते हैं ;बच्चे हमारे दौर के चालाक हो गए हैं"पर हम माता-पिता जानबूझ कर नासमझ क्यों बनते जा रहे हैं?अवयस्क बच्चों को मोबाइल,इन्टरनेट का प्रयोग,वाहन देना कहाँ तक उचित है?मोबाइल,नेट आदि पर मोनिटरिंग ज़रूरी है.उनके friend बनने का ढोंग नहीं करें ;यह शब्द END से ही ख़त्म हो जाता है माता-पिता बन कर ही हम सही दिशा निर्देशन दे सकते हैं.घर से बाहर जाते समय माँ अपने और अपनी बच्ची की पोशाक पर अवश्य  एक नज़र रखे,हम शालीनता से भी फैशन को अपना सकते हैं.हम रिश्तों की डोर घर की चारदीवारी तक ही सीमित रखें.घर से बाहर अन्यत्र कोई पिता,भाई,बहन,इत्यादि नहीं होता रिश्तों के ये बाहरी नाम ही इन्हें सर्वाधिक चोट पहुंचाते हैं क्योंकि इसमें असलियत कहीं होती ही नहीं है.....
"You know that the beginning is the most important part of any work, especially in the case of a young and tender thing; for that is the time at which the character is being formed and the desired impression is more readily taken..." Plato's Republic

एक विद्यालय में जब मैं सेवारत थी एक वाकया हुआ,6th क्लास के विद्यार्थी ने अपने दोस्त से कहा"अगर १०० कैडबरी chocolate  के बदले कोई माँ को भी मारने को कहे तो मैं तैयार हो जाउंगा,मुझे कैडबरी बहुत पसंद है" जब मैंने यह सुना दुखी भी हुई,ग्लानी भी महसूस किया पर अब आप सोच रहे होंगे क्या किया होगा?अगले दिन प्रार्थना सभा में माता-पिता पर आधारित एक नैतिक अनुच्छेद प्रस्तुत कराया और उसी बच्चे से.उसे कोई सज़ा नहीं दी .आखिरी में एक भजन की पंक्ति को मैंने जोड़ा था ,जब उसने इसे गाया तो उसकी आँखें छलक आयी थीं
"जिस माँ ने हमको जन्म दिया,उसे कभी रुलाना न चाहिए
जिस पिता ने हमको पाला है ,उसे कभी सताना न चाहिए "

वो बच्चा रोता हुआ आया और कहा"mam ,अब मैं कभी ऐसी बात नहीं करूंगा ,माँ मुझे बहुत प्यार करती है"ज़ाहिर सी बात थी ,बच्चे को माँ का महत्व पता था पर इस बात का ज्ञान नहीं था कि किसी रिश्तों को लेकर मज़ाक में भी अनैतिक बात नहीं करना चाहिए.

बच्चों के सबसे बड़े रोल  मॉडल माता-पिता होते हैं .जब बच्चे उन्हें सकारात्मक कार्यों को सुचारू रूप से करते देखते हैं तो वे भी समय की कीमत समझते हैं और रचनात्मक कार्यों के ओरे उन्मुख होते हैं.

पाठकों, "अगर ज़िन्दगी एक प्यास है तो उसे बुझाने के लिए भौतिकता,चमक-दमक जैसे खारे समुद्र की ज़रूरत नहीं है ;इसे जितना पीओ प्यास उतनी  ही बढ़ती जायेगी.नैतिक मूल्यों.संस्कार,सही दिशानिर्देशन जैसे झरने के चुल्लू भर पानी पीकर भी तृप्त हुआ जा सकता है."
और यह एक कविता . यह तलाशने के लिए कि ....... आज के समाज में  गलती कहाँ हो रही है हम सबों से?


कस्बाई माहौल छोड़,बड़े शहरों में आकर,
खुद अपने-आप में सिमट रही ज़िन्दगी.

आम्रवृक्ष के सघन, आश्रय को भूलकर,
कंक्रीट विस्तार में,घिसट रही ज़िन्दगी

माँ के स्नेहिल बाँहों का, पालना है कहाँ पर ?
चाइल्ड केयर क्रेच में,सिसक रही ज़िन्दगी

सात जन्मों का साथ,कोरा ढकोसला सोचकर
दाम्पत्य की दरकन में, ठिठक रही ज़िन्दगी

जीवन वाटिका में सारे,भाव पुष्प कुचल कर
अधखिली किसी कली सी,चिटक रही ज़िन्दगी

भौतिक आकर्षणों से,घर को महल बनाकर
स्वमन  के टूटे खंडहर में,अटक रही ज़िन्दगी

दया,करूणा,धर्मं की,शंमा को बुझाकर
तेल रहित लालटेन सी, लटक रही ज़िन्दगी

गाँव की अमराइयाँ,चौपालों को छोड़कर
facebook  और you tube में,दमक रही  ज़िन्दगी

आध्यात्मिक चिंतन की, ऊर्जा सारी दफ़न कर
देख डिस्को क्लब में कैसे, मटक रही ज़िन्दगी

भ्रष्टाचार को शिष्टाचार, का चोला पहनाकर
खुद के ही कफ़न में, लिपट गयी ज़िन्दगी

नैतिक मूल्यों की घुट्टी,मुंह से उगलकर
झूठ,फरेब की सुरा,गटक रही ज़िन्दगी

वृद्ध माता-पिता के,स्नेह दीप फूंककर
अंधेरी गलियों में, भटक रही ज़िन्दगी

अपनत्व के शीतल, स्पर्श को तजकर
उष्ण हो कांच सी, चटक रही ज़िन्दगी

आधुनिकता की इस, बदलाव में उड़-उड़ कर
अमर्यादित हो बेशर्म,चहक रही ज़िन्दगी


भोले-भाले चेहरों से भी, हंसी को गुम कर
वहशीपन की ताप में, दहक रही ज़िन्दगी


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Thursday, March 1, 2012

8th मार्च को हम अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने जा रहे हैं.मैं आज इस मंच से वर्तमान समाज के सर्वाधिक ज्वलंत समस्या का समाधान आपके समक्ष रख रही हूँ .
इस समस्या से  नारी को अपने सबसे प्रारम्भिक दौर यानि उसके इस खूबसूरत दुनिया में कदम रखने से और कभी-कभी तो कदम रखने के पूर्व ही रूबरू होना पड़ता है जिसका उसे कोई पूर्वाभास तक नहीं हो पाता.वह समस्या है ----" गर्भ में ही उसे सुला दिया जाना और अगर वो इस जगत में आ भी जाए तो उसे भरपूर ख़ुशी से ना अपनाना" .
कहीं हम भी इस समस्या का कारण या परिणाम तो नहीं .?जानने के लिए पढ़िए यह ब्लॉग..............................
दोस्तों, हम सब इस सच्चाई से वाकिफ हैं कि हमारे देश भारत में लिंगानुपात संतोषजनक नहीं है.यह ठीक है कि सन 2000  में यह 927 /1000  था और अब 2001  में यह 933/1000 हो गया है पर आज भी कुछ राज्य ऐसे हैं जहाँ लड़कियों की संख्या गिरती जा रही है हरियाणा में यह 820/1000  है तो पंजाब में यह लिंगानुपात 793/1000 है.हमारा समाज एक पुरुष प्रधान समाज माना जाता है पर मैं आप सभी से एक प्रश्न पूछना चाहती हूँ.क्या महिलाओं से जुडी हर समस्या की वज़ह केवल पुरुष ही है?क्या महिलाएं कुछ अंश के लिए भी  इन समस्याओं के लिए जिम्मेदार नहीं हैं?यहाँ मैं स्वयं से जुडी अनुभूति का ज़िक्र करना चाहती हूँ .
बात सन 1998 की है जब मुझे प्रथम  बार जननी बनने का सुख प्राप्त हुआ .आप सोच रहे होंगे इसमें कौन सी नयी बात है?हर विवाहिता, माँ बनकर ही संपूर्ण नारी बनती है.ठीक सोचा आपने;; पर मेरे लिए यह बात किसी गहरी परिणति से जुड़ गयी थी . अस्पताल के ऑपरेशन theater में अर्ध्चेत्नावस्था में जब मुझे ज्ञात हुआ कि इस दुनिया में आने वाला शिशु एक कन्या है तो मेरी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली,एक तो surgery की असहनीय पीड़ा और उससे भी ज्यादा एक पुत्री होने के अतीत का कटु अनुभव---"बचपन में मैं कुशाग्रबुधि थी, दसवीं की कक्षा में टॉप किया था, विज्ञान शाखा से पढ़ना चाहती थी पर पुत्री के पिता  होने से उपजे डर ने उन्हें एक  कठोर  निर्णय लेने पर विवश किया "मैं तुम्हे आगे पढने के लिए बाहर नहीं भेज सकता" मेरे सारे मंसूबों ने दम तोड़ दिया. मैंने उस कठोर  फैसले तथा उसके बाद की पापा की नसीहत "बिटिया लडकी की इज्ज़त उस कांच के सदृश होती है जिस में अगर एक बार दरार आ गयी तो वह उम्र भर के लिए विकृत ही माना जाता है"की गहराई पर उस वक्त लेश मात्र भी ध्यान नहीं दिया था,पर आज उस नसीहत और फैसले की नजाकत को समझ सकती हूँ .पापा की प्रेरणा और हौसलाफजाई से बारहवीं मैंने कला संकाय से पूरा किया c .b.s e से टॉप दस विद्यार्थियों में स्थान पाया merit  certificate  भी प्राप्त हुआ; उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाना चाहती थी पर फिर वही कठोर  निर्णय.मैंने भी समझौता कर लिया पर आगे की पढ़ाई में भी सर्वोत्तम देने के जुनून को विराम नहीं दिया ;पिता का दुःख समझ सकती थी.मैंने अर्थशास्त्र से M A की डिग्री ली और फिर B ed पूरा किया .एक अध्यापिका बन कर ही सर्वोत्तम देने कि पूरी कोशिश की."खैर .............
जब आँखें खुली तो बच्ची को उसके पिता  की गोद में पाया उनकी आवाज़ सुनाई दी"देखो,इसकी आँखों में कैसी गहरी चमक है"मैंने बच्ची की तरफ देखा यकीनन  "" एक पुरुष के प्रथम बार पिता बनकर हर्षातिरेक में की गयी ये भावपूर्ण अनुभूति की सजीव अभिव्यक्ति और एक  माँ की छुपी हुई चिरस्थायी ममता का गहन प्रभाव ही था "मुझे सच में उसकी आँखों में गहरी चमक दिखाई दी .लबों से आहिस्ता  से एक शब्द बाहर आया "दीप्ताक्षी,दीप्त +अक्षि (shinning eyes )तब तक पिताजी(father -in -law ) भी आ चुके थे उन्होंने मेरी नम  आँखें देख वज़ह पूछा .मैंने कहा" असहनीय पीड़ा की वज़ह से रोना आ गया".पर ये सच कहा जाता है" माता-पिता की आँखें कभी धोखा नहीं खाती" उन्होंने जिंदगी की कशमकश में  काफी अनुभव एकत्र किया होता है. यही वज़ह थी कि पापा की अनुभवी आँखों को भी मेरी आंतरिक पीड़ा समझते देर नहीं लगी.
एक सप्ताह बाद जब हॉस्पिटल से  मैं घर आई तो देखा घर में बहुत सी स्त्रियाँ सोहर (उत्तर प्रदेश में गाया जाने वाला एक लोकगीत जो कि घर पर पुत्र होने की ख़ुशी में गाया जाता है)गा रही थी .पंडाल सजे थे .पता चला कि पिताजी और घर पर  सभी भाइयों ने बच्ची के जन्म की ख़ुशी में एक शानदार पार्टी का आयोजन किया है वो सबके लिए अनमोल थी. पापा ने एक ही फैसला लिया"इस बच्ची की प्रतिभा की राह में कोई सामाजिक
भय,दकियानूसी परम्पराएं,अभाव कभी अवरोधक नहीं बनेगें"
मैं बचपन से इंदिरा गांधीजी से बहुत प्रभावित थी कोई मुझे पूछता था "बड़ी होकर क्या बनना चाहोगी?" मेरा ज़बाब होता था "इंदिरा गाँधी" यकीनन इंदिरा प्रियदर्शिनी का प्रभाव अब भी खत्म नहीं हुआ था .और उस दिन हम दोनों ने एक निर्णय लिया," यही हमारी पहली और आखिरी संतान होगी और मैंने उसे  नाम दिया  "प्रियदर्शिनी"..
अब आप ही बताइये, मेरी सोच को एक नवीन  आयाम देने वाले इसी घर ,परिवार,समाज के पुरुष ही तो थे. पापा आज इस दुनिया में नहीं हैं;इसी सितम्बर महीने में वे चिरनिद्रा में सो गए मगर उनकी ख्वाहिश थी कि उनकी यह पोती एक सफल डॉक्टर बने.यह मेरी जिंदगी कि सबसे अहम् घटना थी इसलिए सही सोच वाले पुरुषों के प्रति समाज हमेशा नतमस्तक रहता है ;वे ही समाज को एक नयी दिशा देते हैं ;अगर एक नारी माँ,बहन ,बेटी बनकर अपनी जिम्मेदारी निभाती हैं तो एक पुरुष भी पिता,भाई ,पुत्र, बनकर अपनी जिम्मेदारी सफलता पूर्वक निभाता है .सच तो ये है कि इसमें हर रिश्ता क्रमशः एक-दूजे का पूरक है........

बस इसलिए इस अनुभव से प्रेरित होकर मैंने यह कविता लिखी है "कस्तूरी की खोज में मृग की भटकन सी बेटी "

भोर में खिले ताज़े फूल पर पड़ी, ओस सी होती है बेटी .
दरख्त की शाख पर उगी नाजुक, कोंपल सी होती है बेटी
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पूनम की रात को रोशन करती ,पूर्ण चाँद सी होती है बेटी
प्यार से पनाह दो तुम इसे, तुम्हारा अंश ही होती है बेटी

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तुम्हारे आशियाने को अपनी  खुशबु से महकाती,फूल सी है बेटी
हर क्षण घर को अपने मधुर संगीत से चह्काती,बुलबुल सी है बेटी

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दो घरों को जोड़ने वाली मजबूत, सेतु और इज्ज़त है बेटी
खुशियों से एक नहीं दो , आशियाने को करती ज़न्नत है बेटी
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यह ज़रूर है कि हर मंदिर,हर दरगाह की नहीं होती मन्नत है बेटी
पर समझ लो खुदा के घर से तुम्हारे दर, खुद ही आई नेमत है बेटी
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घर-चौखट की मर्यादा बनने को, हर सांचे में ढलती है बेटी
दरिया सी हरदम आगे ही अपने, मंजिल तक बढ़ती है बेटी
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काश भर लेते अंक में हमें कभी, इसी ख्वाहिश में जीती है बेटी
उन्नत समाज की विडम्बना कि गर्भ में ही सुला दी जाती है बेटी
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रीति-रिवाज़ की वेदी पर क्यों, हम ही चढ़े ?आज  पूछती है बेटी
हुनर होने पर भी क्यों आगे  हम न बढे? कहकर सिसकती है बेटी
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हमारे ही लिए क्यों सवालों के सारे घेरे ? दुःख से चीखती है बेटी
दहेज़ जैसे अभिशाप के दंश,क्यों हम सहें ? मूक ये सोचती है बेटी

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बेपरवाह परिंदों सा उड़ना है, खुला आसमान चाहती है बेटी
अपनी संभावनाओं को स्वयं के, सहारे ही  तलाशती है बेटी
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समेटो न हमें दकियानूसी लकीरों में, लगाती गुहार है बेटी
 तुम तो हमें ख़ुशी से अपनाओ माँ, करती मनुहार है बेटी


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जीवन को कंटीली राह बनाने वाली,नहीं होती कभी शूल है बेटी

सृष्टि का सृजन करने के लिए भी क्या नहीं अनिवार्य मूल है बेटी ?
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अब भी सम्हल जाओ ,सुनो आहट आने वाले कल की क्योंकि...........?!!!!!!!!
फिर,ज्येष्ठ की कडकती तपन में, छांह सी खोजी जाएगी बेटी
तपते मरुभूमि में बूंद भर जल की चाह सी, तलाशी जाएगी बेटी
भूले-भटके बियाबान जंगल में सही राह सी, कहीं खो जायेगी बेटी
कस्तूरी की खोज में भटकते  मृग की, बस चाह सी हो जायेगी बेटी ............

एक नवीन आयाम ,एक नयी सोच की सुक्ष्म सी रोशनी के साथ
यमुना पाठक का आप सबको कोटि-कोटि धन्यवाद