दोस्तों,आपको बता दूँ कि हर बच्चे की तरह मुझे भी बचपन से ही
घूमने-फिरने का बहुत शौक रहा है .हाँ,अन्य बच्चों से मैं एक बात पर अंतर
रखती थी. मुझे रेल यात्रा से अधिक सड़क यात्रा और प्रत्येक बच्चों के
खिड़की के नज़दीक बैठने की शगल से अलग मुझे चालक के पास वाली सीट भाती
थी.इसकी एक खास वज़ह यह थी कि दौड़ते-भागते दृश्यों से भी ज्यादा मुझे
वाहनों के पीछे लिखे सन्देश आकर्षित करते थे.आजकल ये सन्देश इक्का-दुक्का
वाहनों में ही नज़र आते हैं. शायद यह सुरक्षा के दृष्टिकोण को रखकर लिया
गया निर्णय हो क्योंकि पीछे के वाहन का चालक उस सन्देश को पढ़ने के मोह
में पथ से विचलित हो कर दुर्घटना ना कर बैठे.पर मुझे लगता है कि कम से कम
उस सन्देश को पढ़ने के लोभवश ही वाहन चालक अपने आगे की गाडी को overtake
नहीं करता और दुर्घटनाएं कम होती.खैर.........
बचपन की रोचक आदतें हमारी शेष ज़िंदगी में भी ज्यों की त्यों शामिल हो जाती हैं.वाहन के पीछे लिखे सन्देश के इस विलुप्त होते प्रचलन के बीच ही दो महीने पूर्व मुझे एक यात्रा के दौरान ट्रक के पीछे लिखा एक बहुत ही संजीदा सन्देश पढ़ने को मिला...
राहों पर दुःख लाख देखे,पर मैं रो न सका
ज़िंदगी मोड़ पर गुज़री,और मैं सो न सका
चूँकि पिछले दो वर्षों से उस राह पर महीने में एक बार जाना हो जाता था इसलिए मुझे यह अंदाज़ा लगाना आसान था कि ठीक आधे घंटे बाद एक चाय की दूकान पर यह ट्रक अवश्य रुकेगी.मेरा अंदाज़ा बिलकुल सही था. हम उस दूकान पर रुके, मेरी बेसब्र निगाहों ने चैन की सांस ली जब पुनः वही सन्देश दिखाई दिया.मैंने अपने पतिदेव से उस ट्रक के चालक से औपचारिक बात करने की आज्ञा ली.अमूमन मेरी ऐसी किसी भी खोज और भावनाओं से वे पूर्णतः वाकिफ होते हैं और इसका मान भी रखते हैं.उन्होंने सहमति में सर हिलाया और चाय की चुस्कियां लेने में व्यस्त हो गए.मैंने उन बुजुर्ग चालक (सरदारजी) की आँखों में कार्य के प्रति गौरव और संतुष्टि की तेज चमक देखी.मैंने उनका अभिवादन कर कहा,"भैया,आपके वाहन के पीछे लिखे सन्देश ने मुझे बेहद प्रभावित किया है,क्या ये शब्द आपके हैं?"उन्होंने कहा,"शब्द की भावनाएं और गाडी दोनों मेरी हैं,मैं पिछले कई दिनों से घर से बाहर हूँ."फिर बेहद संजीदे लहजे में बात की,"मैडम हम ट्रक चालक भी किसी सभ्य की तरह रोटी कमाने के लिए घर से निकलते हैं,हमें भी अपने बच्चों और परिवार की बेहद फ़िक्र रहती है पर मुझे अत्यंत दुःख होता है जब छोटी गाड़ियों,दो पहिया वाहनों और कभी-कभी पैदल चलने वालों की असावधानी और सड़क नियमों की अवहेलना का खामियाजा हम बड़े वाहनों के चालकों को भुगतना पड़ता है.नियमबद्ध होने के बावजूद किसी भी दुर्घटना होने के बाद हमारे साथ मार-पीट की जाती है,हमारे वाहन जला दिए जाते है.और हमें एक घृणित टैग और लेबल दे दिया जाता है"पियक्कड़".(मुझे यह सुन कर बेहद दुःख हुआ क्योंकि समाज के प्रति संवेदनशील होने की वज़ह से मैं कहीं भी और किसी भी व्यक्ति,समाज,कम्युनिटी को किसी विशेष तरह के नकारात्मक लेबेल या टैग देने की प्रवृति की सख्त विरोधी हूँ) मैं तो शराब भी नहीं पीता,राह में कई बार घायल को देख कर रो भी नहीं पाता. हाँ,अन्य वाहनों से दुर्घटनाग्रस्त ,सड़क पर पड़े घायलों को अगर देख पाता हूँ तो हॉस्पिटल पहुँचाने में मदद ज़रूर करता हूँ .ऐसे कई चालक मेरे साथ हैं जो मेरी बहुत मदद करते हैं.कुछ महीनों बाद मैं ट्रक चलाना छोड़कर स्थाई तौर पर गाँव में बस जाउंगा और मेरा भतीजा यह काम करेगा.उनकी बातों में आत्मगौरव के साथ घर परिवार से दूर रहने की पीड़ा,सड़क पर असमय काल के ग्रास बनने वालों के परिजनों की वेदना की प्रतिध्वनि सुनी जा सकती थी.उनके अंतिम शब्द ने जीवन को एक सीख दे दी. "मैडम,सच कहूँ,हमारी ज़िंदगी मोड़ और सड़क पर ही व्यतीत हो जाती है."पतिदेव की चाय खत्म हो चुकी थी और वे तनिक जल्दी में थे अतः मुझे अनिच्छा से बातचीत को विराम देना पडा.मैंने उन्हें धन्यवाद देते हुए कहा,"भैया,मैंने स्वयं आप की कही बातों को पिछले कई यात्राओं में एहसास किया है."
शेष मार्ग तय करते वक्त दिल को छू लेने वाली उन दो पंक्तियों के सन्देश के हर लब्ज़ सरदार जी के कहे लब्जों के साथ मिश्रित होकर असरदार औषधि बन, मस्तिष्क की कई स्मृतियों को चलचित्र की भांति प्रस्तुत करने लगे......अलसुबह साईकिल पर कोयले की बड़ी-बड़ी बोरियों को ले जाते लोग जो कोयले के बोझ से कई बार असंतुलित हो जाते थे, तेज गति से बाइक चलाते युवा,सड़क यातायात को बाधित करते रेस लगाते मनचले,overtake करते माचिस की डिब्बी जैसी छोटी-छोटी गाड़ियां जो बारिश के बाद अचानक निकले पतंगों सी लहरा कर भागती थी, क्षमता से भी ज्यादा सवारियों को बिठाये वाहन(संलग्न चित्र में देखा जा सकता है) ....ऐसी कई स्मृतियों के बीच यात्राओं के दौरान 95% स्थितियों में हमारी गाडी को आगे बढ़ने का इशारा देते नियम बद्ध ट्रक चालक मुझे तीव्रता से याद आये.
बचपन की रोचक आदतें हमारी शेष ज़िंदगी में भी ज्यों की त्यों शामिल हो जाती हैं.वाहन के पीछे लिखे सन्देश के इस विलुप्त होते प्रचलन के बीच ही दो महीने पूर्व मुझे एक यात्रा के दौरान ट्रक के पीछे लिखा एक बहुत ही संजीदा सन्देश पढ़ने को मिला...
राहों पर दुःख लाख देखे,पर मैं रो न सका
ज़िंदगी मोड़ पर गुज़री,और मैं सो न सका
चूँकि पिछले दो वर्षों से उस राह पर महीने में एक बार जाना हो जाता था इसलिए मुझे यह अंदाज़ा लगाना आसान था कि ठीक आधे घंटे बाद एक चाय की दूकान पर यह ट्रक अवश्य रुकेगी.मेरा अंदाज़ा बिलकुल सही था. हम उस दूकान पर रुके, मेरी बेसब्र निगाहों ने चैन की सांस ली जब पुनः वही सन्देश दिखाई दिया.मैंने अपने पतिदेव से उस ट्रक के चालक से औपचारिक बात करने की आज्ञा ली.अमूमन मेरी ऐसी किसी भी खोज और भावनाओं से वे पूर्णतः वाकिफ होते हैं और इसका मान भी रखते हैं.उन्होंने सहमति में सर हिलाया और चाय की चुस्कियां लेने में व्यस्त हो गए.मैंने उन बुजुर्ग चालक (सरदारजी) की आँखों में कार्य के प्रति गौरव और संतुष्टि की तेज चमक देखी.मैंने उनका अभिवादन कर कहा,"भैया,आपके वाहन के पीछे लिखे सन्देश ने मुझे बेहद प्रभावित किया है,क्या ये शब्द आपके हैं?"उन्होंने कहा,"शब्द की भावनाएं और गाडी दोनों मेरी हैं,मैं पिछले कई दिनों से घर से बाहर हूँ."फिर बेहद संजीदे लहजे में बात की,"मैडम हम ट्रक चालक भी किसी सभ्य की तरह रोटी कमाने के लिए घर से निकलते हैं,हमें भी अपने बच्चों और परिवार की बेहद फ़िक्र रहती है पर मुझे अत्यंत दुःख होता है जब छोटी गाड़ियों,दो पहिया वाहनों और कभी-कभी पैदल चलने वालों की असावधानी और सड़क नियमों की अवहेलना का खामियाजा हम बड़े वाहनों के चालकों को भुगतना पड़ता है.नियमबद्ध होने के बावजूद किसी भी दुर्घटना होने के बाद हमारे साथ मार-पीट की जाती है,हमारे वाहन जला दिए जाते है.और हमें एक घृणित टैग और लेबल दे दिया जाता है"पियक्कड़".(मुझे यह सुन कर बेहद दुःख हुआ क्योंकि समाज के प्रति संवेदनशील होने की वज़ह से मैं कहीं भी और किसी भी व्यक्ति,समाज,कम्युनिटी को किसी विशेष तरह के नकारात्मक लेबेल या टैग देने की प्रवृति की सख्त विरोधी हूँ) मैं तो शराब भी नहीं पीता,राह में कई बार घायल को देख कर रो भी नहीं पाता. हाँ,अन्य वाहनों से दुर्घटनाग्रस्त ,सड़क पर पड़े घायलों को अगर देख पाता हूँ तो हॉस्पिटल पहुँचाने में मदद ज़रूर करता हूँ .ऐसे कई चालक मेरे साथ हैं जो मेरी बहुत मदद करते हैं.कुछ महीनों बाद मैं ट्रक चलाना छोड़कर स्थाई तौर पर गाँव में बस जाउंगा और मेरा भतीजा यह काम करेगा.उनकी बातों में आत्मगौरव के साथ घर परिवार से दूर रहने की पीड़ा,सड़क पर असमय काल के ग्रास बनने वालों के परिजनों की वेदना की प्रतिध्वनि सुनी जा सकती थी.उनके अंतिम शब्द ने जीवन को एक सीख दे दी. "मैडम,सच कहूँ,हमारी ज़िंदगी मोड़ और सड़क पर ही व्यतीत हो जाती है."पतिदेव की चाय खत्म हो चुकी थी और वे तनिक जल्दी में थे अतः मुझे अनिच्छा से बातचीत को विराम देना पडा.मैंने उन्हें धन्यवाद देते हुए कहा,"भैया,मैंने स्वयं आप की कही बातों को पिछले कई यात्राओं में एहसास किया है."
शेष मार्ग तय करते वक्त दिल को छू लेने वाली उन दो पंक्तियों के सन्देश के हर लब्ज़ सरदार जी के कहे लब्जों के साथ मिश्रित होकर असरदार औषधि बन, मस्तिष्क की कई स्मृतियों को चलचित्र की भांति प्रस्तुत करने लगे......अलसुबह साईकिल पर कोयले की बड़ी-बड़ी बोरियों को ले जाते लोग जो कोयले के बोझ से कई बार असंतुलित हो जाते थे, तेज गति से बाइक चलाते युवा,सड़क यातायात को बाधित करते रेस लगाते मनचले,overtake करते माचिस की डिब्बी जैसी छोटी-छोटी गाड़ियां जो बारिश के बाद अचानक निकले पतंगों सी लहरा कर भागती थी, क्षमता से भी ज्यादा सवारियों को बिठाये वाहन(संलग्न चित्र में देखा जा सकता है) ....ऐसी कई स्मृतियों के बीच यात्राओं के दौरान 95% स्थितियों में हमारी गाडी को आगे बढ़ने का इशारा देते नियम बद्ध ट्रक चालक मुझे तीव्रता से याद आये.