Friday, October 17, 2014

वह एक 'अखंड दीप'

वैचारिक यात्रा के प्रकाशवान पथ के प्रत्येक पथिक को दीपोत्सव की बहुत सारी शुभकामना....
प्रत्येक वर्ष यह पर्व हमें अंधकार से प्रकाश की तरफ जाने की प्रेरणा दे जाता है बचपन में खूब सारे पटाखे निडर होकर जलाती थी ...किशोरावस्था में फूलझड़ी जलाने लगी और अब जब भी दीपावली का त्यौहार आता है ...घर परिवार समाज के तौर तरीकों ,परम्परा संस्कृति में व्यस्त ....मैं एक रहस्य में खो जाती हूँ ....दीपों की माला तो नहीं पर एक अखंड दीप हर व्यक्ति के पास देख सकती हूँ .उस दीप में विवेक,बुद्धि,संवेदनशीलता का तेल जितना ज्यादा डाला जाए दीप की लौ उतनी ही तेज होती है.और मन मस्तिष्क की शुद्धता उस लौ के दर्शन सूर्य की तेज रोशनी में भी कराती है.यह मेरा अपना अनुभव है ....col3
एक दीप है काफी
तम हरने के लिए
हूँ सोचती....
हज़ारों ...लाखों ..अनगिनत दीप भी
क्यों दूर कर पाते नहीं
कालिमा अमावस की
प्रश्न की उज्जवल दामिनी
है मस्तिष्क में कौंध जाती
प्रज्ज्वलित दीप और यह स्याह रात्रि
कौन किस पर हुआ भारी
??
संघर्ष की साक्षी..
बन जाती प्रत्येक संध्या
आँगन की तुलसी समक्ष...
एक दीप है जल उठता
दीवाली तो नहीं ..पर
दीपोत्सव है हर रात मनता
दूर करने को गहन तमस
एक अखंड दीप है जलता

दिवस की आपाधापी
यश की कौंधती रोशनी
सुख वैभव की मरीचिका में
दीप वह अदृश्य रहता .
जैसे-जैसे होती जाती
गहरी और गहरी निशा
आपाधापी ....सुख वैभव के बोध में
छाने लगती स्पष्टता
गलतियों की भयावहता
भाग-दौड़ की असारता
सर्वस्व पाकर भी रिक्तता
यह बोध है भीख मांगता
टुकड़े भर रोशनी की .
याचना गहरी जितनी
झिलमिलाहट दीप के लौ की उतनी
परन्तु अगले दिवस पुनः
मरीचिका यश सुख वैभव की
है परास्त करने लगती
लौ तो है झिलमिलाती
पर बेमानी सी हो जाती

फिर भी है वह अखंड दीप
दिवा की चमक में
चाहे हो जाए बेमानी
उससे एक टुकड़े भर रोशनी की
करता हर मनुष्य याचना
छा जाती जब ...
गहन तमस की निस्तब्धता
देख अखंड दीप की उज्जवलता
चिर सत्य बन यह गूँज उठता


मसो मा ज्योतिर्गमय .

Friday, October 10, 2014

सरहद पर सांसें चलने दो

एक ही ज़मीन से जुड़े दो भाई ...भारत और पाकिस्तान ....सरहद कुरुक्षेत्र बन गया हैं.....सरहद के समक्ष कई सवाल हैं वह अपने साथ हुए बार बार के धोखे से सिसकती रहे ...भाई से आक्रान्त हो शिकायत करे ...या कि सीना तान कर गुस्ताखी का ज़वाब गुस्ताख़ हो कर दे ....ज़ाहिर है इस बार तीसरे विकल्प को अपनाया गया है और हो भी क्यों ना ...पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र की मदद से इस मसले को सुलझाना चाहता है जबकि बेहतर यह होता कि वह किसी भी तीसरी शक्ति को यह बताता ....
अम्नो इन्साफ को गारत नहीं होने देंगे
खूने इंसान की तिज़ारत नहीं होने देंगे
भाई से भाई को हर वक़्त लड़ाने वालों
यहां अब हम महाभारत नहीं होने देंगे

(एक शायर)

आज जब पूरे विश्व के समक्ष भारत पाकिस्तान शान्ति के नोबेल पुरस्कार के सम्मान से नवाज़े जाने के लिए चुन लिए गए हैं तो क्या उपर्युक्त चार पंक्तियाँ प्रत्येक पाकिस्तानी और हिन्दुस्तानी का मूल मंत्र नहीं बन जाना चाहिए ??जब एक विज्ञापन देखती हूँ "भाई को गिराने की आदत थी मुझे बनाने की आज मैं किसी चीज़ से नहीं डरता " तो मुझे ये भारत पाक दो भाईयों की दास्ताँ ही लगती है.यूं तो भारत ने हमेशा ही शान्ति,सुलह और धैर्य का परिचय देकर एक अदद भाई की भूमिका निभाई है पर पाकिस्तान उस बच्चे की तरह व्यवहार कर रहा है जो कंचे के खेल में क्रोध और क्षोभ में अपने सारे कंचे गँवा बैठता है.शिक्षा ,स्वास्थ्य ,विज्ञान के क्षेत्र में करने की बजाये रक्षा सामग्रियों पर खर्च कर वह स्वयं को कितना खोखला कर रहा है इसका उसे भान नहीं है.
तेरी बदहालियाँ ऐ पाके ज़मीं करती कई सवाल तुझसे
ओ बेखबर हुकमरान इस पाके ज़मीं को दोजख ना कर
मुनासिब है ज़रूरी है वतन हक़दार है जिन खुशियों का
ओ मुल्क के हुक्मरानों अवाम को उनसे महरूम ना कर .


उसकी सबसे बड़ी बेचैनी भारत में एक सुदृढ़ सरकार बन जाने से उपजी उसकी हताशा है.भारत एक तरफ विकास के रास्ते पर अग्रसर शिक्षा ,स्वास्थय, खेल ,विज्ञान ,अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में नित्य आगे बढ़ता जा रहा है पाकिस्तान अपने इस भाई के प्रगति पथ से खुश और उसका अनुकरण करने की बजाये कौरवों की तरह अपने ही कुल का नाश करने पर आमादा है .युद्ध से ना उस युग में भलाई हुई थी ना अब होगी ..समस्याएं तलवार से नहीं कलम से सुलझती हैं जिसका सबूत है भारत पाक संयुक्त नोबेल शान्ति पुरस्कार .संयुक्त राष्ट्र संघ में उसके द्वारा कश्मीर के मसले को उठाना ही यह साबित करता है कि पूरे विश्व पटल पर वह भारत को गुनाहगार ठहराना चाहता है.कश्मीर में बाढ़ से आई तबाही पर वहां के बाशिंदों की सहायता के लिए जिस तरह से भारतीय जवानों ने तत्परता दिखाई वह इस बात का बड़ा सबूत है कि भारतीय तलवार बन्दूक गोली बारूद नहीं प्यार और सेवा की भाषा से इत्तिफ़ाक़ रखता है.
यूं भी कश्मीर विभाजन के समय ही भारत का हिस्सा माना जाता रहा है...

हर आँख का तारा है तारा ही रहेगा
ज़न्नत का नज़ारा है नज़ारा ही रहेगा
दहशत से कभी हम ना दबे हैं ना दबेंगे
कश्मीर हमारा है हमारा ही रहेगा


(एक शायर)
कश्मीर के मुद्दे को पाकिस्तानी हुकमरान चुनावी मुद्दा बना देते हैं और फिर ज़ंग की इबारत उस मुद्दे का सबब बन जाता है.आज जब मलाला ने बालिका शिक्षा के पक्ष में आवाज़ बुलंद Copy of Copy of value pageकर शान्ति के नोबल पुरस्कार से पाक की ज़मीं को पूरे विश्व में गौरवान्वित किया है ...तब इस साहसी बिटिया के पैगाम को पाकिस्तान को समझना चाहिए.कितना सुखद होता वह इस बार बार के ज़ंग के रक्त बहाना छोड़ इसे कभी ना ख़त्म होने वाली दोस्ती ,अपनत्व और अहदे वफ़ा की शक्ल में तब्दील कर देता .१७ वर्षीया पाकिस्तान की साहसी मलाला युसूफजाई और ६० वर्षीय हिन्दुस्तानी सिपाही कैलाश सत्यार्थी को संयुक्त रूप से शान्ति नोबल पुरस्कार से नवाज़ा जाना ना सिर्फ भारत पाक दो वतनों के लिए बल्कि शान्ति की स्थापना की दिशा में पहल का स्वागत करने वाले कई और मुल्कों के लिए भी एक बहुत ही सार्थक और सकारात्मक सन्देश बन सकता है.महज़ सत्रह वर्ष और सोच बेहद परिपक्व तभी तो मलाला ने दोनों वतनों के बीच शांति की दिशा में एक खासा पहल की और गुज़ारिश की कि जिस दिन कलम के दो सिपाही शान्ति का नोबेल प्राइज ले रहे हों तो दोनों वतन के हुक्मरान श्रीमान नरेंद्र मोदी जी और श्रीमान नवाज़ शरीफजी साथ साथ वहां ज़रूर मौजूद रहे.
काश यह प्रतीकात्मक एकता एक नए मधुर रिश्ते की ऐसी बीज बो जाए कि वह स्वस्थ मज़बूत वृक्ष बन ना सिर्फ दो मुल्कों को बल्कि पूरी दुनिया को अपनी शीतल छाँव से उपकृत करता रहे.




नींव बन जाए भरोसे की ....छत हो मोहब्बत की...और आपसी सौहाद्र की दीवारें

काश सिसकती सरहद पर खिल जाएं ढेर सारे खूशबू बिखेरते गुलों से तबस्सुम .

Tuesday, October 7, 2014

प्रगति पथ (प्रोग्रेस पाथ )का पी2 पी2 पी2 मॉडल

दोस्तों ,अब जब लाल किले की प्राचीर से योजना आयोग को ख़त्म कर देने की घोषणा हो चुकी है अर्थशास्त्र की छात्रा/शिक्षिका रह चुकने के कारण मैं इस विषय पर गहनता से सोचने को विवश हूँ.मुझे खुशी इस बात की भी है कि एक प्रजातांत्रिक देश के नागरिक होने के अधिकार को सिर्फ वोट देने तक ही सीमित ना रखते हुए प्रधानमंत्री जी ने आम जनता से प्रशासन में भी सुझाव मंगवाने की शुरुआत कर जनभागीदारी को व्यापक क्षितिज दिया और जनतंत्र ,जननीति और जननेता की परिकल्पना को साकार करने की दिशा में ठोस कदम उठाया है. आज जब मैं यह ब्लॉग लिख रही हूँ तो संतुष्ट हूँ कि मेरी अर्थशास्त्र की पढ़ाई धोबी के हिसाब और घरेलू सहायिका के पगार निश्चित करने या अपने बच्चे को घर पर पढ़ा कर ट्यूशन फीस बचाने तक ही सीमित नहीं आज मैं democratically empowered हूँ इस ब्लॉग में निहित सुझाव को mygov.in पर भी भेज सकती हूँ .
यह सच है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय से ही विभिन्न कारणों जैसे द्वितीय विश्व युद्ध से उपजी आर्थिक कठिनाइयाँ ,परतंत्र भारत के संसाधनों के भरपूर दोहन और पूंजी के विदेश चले जाने से उपजे बिखराव के फलस्वरूप एक संस्था की नितांत आवश्यकता महसूस की जा रही थी जो सुनियोजित और चरणबद्ध तरीके से तत्कालीन कठिनाइयों को दूर कर .देश में आशावाद की लहर ला सके और १५ मार्च १९५० को योजना आयोग की विधिवत स्थापना की गई थी
वर्त्तमान परिदृश्य बहुत बदल चुका है .परिवर्तन कुछ इस तरह भी कि आज ही इस अनुपम पेज पर ढ़ा 'मज़बूती का नाम गांधी' बहुत अच्छा लगा.आज देश के हालात बहुत बदल गए हैं हम नन्हे से ग  'G ' -- GRAM (ग्राम) से विशाल ग G --GLOBAL (ग्लोबल) या नन्हे से 'व 'V विलेज (VILLAGE )से विशाल ' व 'V वैश्विक (VAISHAVIK) स्तर पर तक आ गए हैं टेलीग्राम युग से इंटरनेट के सफर ने पुरानी चुनौती के साथ नई चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं .आर्थिक मज़बूती किसी भी देश की सुदृढ़ता के लिए रीढ़ की हड्डी का काम करता है.पर सामाजिक और नैतिक मज़बूती से भी मुख मोड़ा नहीं जा सकता .योजना आयोग के जगह नई संस्था के लिए मैं प्रगति पथ (प्रोग्रेस पाथ )के नाम का ही प्रयोग कर रही हूँ.
कुछ लोगों का मानना है कि नाम वाम से कोई फर्क नहीं पड़ता है पर मैं नाम के प्रभाव पर बहुत विश्वास करती हूँ .आज भारत एक विकासशील देश होने के साथ शक्तिशाली देश भी साबित हो गया है ऐसे परिदृश्य में आज योजना बनाने से ज्यादा प्रगति पथ पर अग्रसर होने पर ज्यादा ज़ोर देने की ज़रुरत है.इस संस्था की संरचना,आत्मा,सोच ,दिशा ,डिज़ाइन नई हो जो एक नए विश्वास के साथ देश को रचनात्मक सोच ,सार्वजनिक निजी सहभागीदारी,केंद्र राज्य सहभागीदारी , ,संसाधन के विवेकपूर्ण प्रयोग के साथ मिनिमम इनपुट मैक्सिमम आउटपुट का किफायती संज्ञान भी दे सके .
सर्वप्रथम बात यह कि योजना आयोग समाप्त कर देने से क्या योजना शब्द का औचित्य भी समाप्त हो गया ? नहीं क्योंकि प्रगति पथ पर बढ़ने के लिए भी किसी बिंदु से शुरुआत करनी होगी या जहां तक पहुँच चुके हैं वहां से नई दिशा की खोज ,उस राह पर आने वाली संभावित बाधाओं से जूझने और आई परिष्टितियों के अनुकूल तैयार होने के लिए योजना बनानी ही होगी.पूर्व निश्चित तथा सुस्पष्ट लक्ष्यों का अल्पकालीन,मध्यकालीन और दीर्घकालीन आवश्यकता और प्राथमिकता के साथ निर्धारण करने ,उनके लिए संसाधनों का आबंटन ,उनकी प्राप्ति (संभावित और वास्तविक)का आकलन इन सबके लिए एक सुस्पष्ट योजना ज़रूरी होगी.हिटलर और मुसोलिनी के समय क्रमशः जर्मनी और इटली में आयोजन का उद्देश्य राजनितिक दृष्टिकोण से देश को शक्तिशाली बनाना था आज भारत देश को प्रगति के पथ पर ले जाने के लिए आर्थिक,सामाजिक राजनितिक ,वैश्विक सभी क्षेत्रों में काम करना है.पूर्ण रोजगार की प्राप्ति,आर्थिक असमानता को काम करना,गरीबी दूर करना,स्वच्छ भारत की स्थापना,वैश्विक पटल पर सुदृढ़ता ,साधनों का युक्तियुक्त विवेकपूर्ण प्रयोग कर अधिकाधिक प्रतिफल पाना,संतुलित क्षेत्रीय विकास ,तकनीक सामरिक आत्मनिर्भरता ,सामाजिक सुरक्षा,आर्थिक स्थिरता जैसे कई बिन्दुओं पर ध्यान देना है.
अब तक योजना आयोग का मुख्य कार्य योजना तैयार करना और उसकी प्रगति का मूल्यांकन करना था .यह केवल परामर्श दे सकता था विकास परियोजनाओं को कार्यान्वित करने का कार्य केंद्रीय तथा राज्य सरकारों का होता था. और लालफीताशाही भ्रष्टाचार तथा अकुशलता की संभावना बनी रहती थी .यह अनेक विभाग तथा उपविभाग के द्वारा काम करता है जो परामर्शदाता मुख्य या सह सचिव के अंतर्गत होते हैं कुछ विभाग निदेशकों के अंतर्गत काम करते हैं योजना आयोग का अध्यक्ष देश का प्रधानमंत्री होता है.प्रशासनिक कार्य एक उपाद्यक्ष तथा आयोग के अन्य नियुक्त तथा वैतनिक सदस्यों के निरीक्षण में होता है.कुछ अंशकालीन सदस्य मंत्री परिषद से भी होते हैं.यह एक सामूहिक समिति के रूप में कार्य करता है.उपाध्यक्ष योजना समन्वय योजना मूल्यांकन प्रशासन तथा आर्थिक विभाग के अंतर्गत विषयों का अधिकारी होता है.पूर्णकालिक सदस्य किसी एक ग्रुप के अधिकारी होते हैं ..उद्योग श्रम यातायात एवं शक्ति ग्रुप,कृषि एवं ग्रामीण विकास ग्रुप,दृष्ट योजना ग्रुप,तथा शिक्षा वैज्ञानिक अनुसंधान एवं सामाजिक सेवा ग्रुप.
नई गठित संस्था के लिए कुछ सुझाव यह हैं..
Copy of MY EXPERIMENTSसर्वप्रथम बात यह कि अब नई गठित संस्था एक स्वायत संस्था हो ; उसका संवैधानिक अस्तित्व अवश्य हो .इसे विभिन्न मंत्रालय के अधिकारियों से अनिवार्य रूप से विचार विमर्श की ज़रुरत ही ना पड़े.सदस्यों की नियुक्ति योग्यता और विशेषज्ञता (तकनीक और बौद्धिक) को ध्यान में रख कर हो.सदस्यों की अपेक्षित योग्यता और नियुक्ति के मानदंड तथा प्रक्रिया का लिखित विवरण अवश्य हो ताकि वे कभी भी मनमाने ढंग से नियुक्त या हटाये ना जा सकें. राजनीति प्रशासन से इसे पूर्णतः अछूता रखा जाए ताकि किसी भी प्रकार के दलगत आरोप प्रत्यारोप से संस्था मुक्त रहे और अपने कार्य की पारदर्शिता बरकरार रख सके.सरकार बदल जाने पर भी इस संस्था में बदलाव ना हो और यह अपने कार्य को निर्बाध पूरा कर सके और लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में अनवरत प्रवाहित रह सके.1) संस्था की रूप रेखा बनाने वाले, 2 )क्षेत्रीय अनुसंधान कर कार्यों और 3)लक्ष्यों की प्राथमिकता तय कर इसे क्रियान्वित करने वाले ,तथा तय समय सीमा के दौरान मॉनिटरिंग और कार्य पूर्ण होने पर मूल्यांकन करने वाले ये तीनों ही विभाग अलग अलग हों .सदस्यों और विभागों का रूप मात्रात्मक नहीं अपितु गुणात्मक हों ताकि संस्था के काम काज में मितव्ययिता बनी रहे.इस के तीन ही विभाग हों..प्रथम संस्था के निर्माण और रूप रेखा से सम्बंधित...दूसरा,मूल्यांकन और नियंत्रण से सम्बंधित और तीसरा प्रशासनिक कार्यों से सम्बंधित विभाग हों.प्रोफ़ेसर श्री मन्ना नारायण जी की मानें तो "लोगों को इस बात का पूर्ण विश्वास होना चाहिए कि कराधान तथा सेवा शुल्क वगैरह के माध्यम से उनके द्वारा दी गई प्रत्येक पाई का उन के कल्याण और विकास के लिए समुचित रूप से व्यय होगा...."सबसे मुख्य बात साधनों के बंटवारे की होती है .चूँकि वित्त मंत्री बजट से सीधे तौर पर जुड़े होते हैं यह कह कर साधनों का वित्तीय बंटवारा उनकी जिम्मेदारी में दे देना उचित नहीं .अभी तक वित्तीय साधनों का बंटवारा वित्तीय आयोग की सिफारिशों पर किया जाता है पर कुछ मामलों में बंटवारा योजना आयोग भी कर देता है अतः वित्तीय साधनों के आबंटन में दुहरापन आ जाता है .इसके लिए किसी अन्य बौद्धिक वित्तीय विशेषज्ञ समिति को यह कार्य सौंपा जाए.यह एक लचीली संस्था हो जिसमें तेजी से आये वैश्विक और राष्ट्रीय स्थानीय परिवर्तनों के साथ समुचित परिवर्तन किया जा सके चाहे वह लक्ष्य निर्धारण से सम्बंधित हो या साधनों के आबंटन से सम्बंधित और ऐसा तभी संभव है जब इसे राजनीतिक प्रभाव से दूर रखा जाए.इसे सलाह मशवरा देने ,नियंत्रण रखने और दिशा निर्देशन के लिए एक निकाय की स्थापना हो जिसमें एक एक आर्थिक,सामाजिक,राजनितिक,वैश्विक,तकनीक विशेषज्ञ हों और चार या पांच थिंक टैंक हों ..देश में ईमानदार तथा दक्ष मनुष्यों की वृद्धि किये बिना बड़े पैमाने पर कोई भी कार्य करना और उसका समुचित प्रतिफल पाना संभव नहीं.इस संस्था के अध्यक्ष के रूप में कोई एक ऐसा व्यक्ति हो जो अर्थशास्त्री,वित्तीय विशेषज्ञ,तकनीक जानकारी,समाजशास्त्री होने के साथ साथ एक उच्च कोटि का जननीतिज्ञ भी हो .इस पद को देश का प्रधानमंत्री ही बखूबी निभा सकता है क्योंकि वह जनता के ही फैसले से आता है और उस जनता के कल्याण के प्रति उसकी पूर्ण जवाबदेही होती है.
संस्था के निर्माण में सार्वजनिक उत्साह और सहयोग की कोई कमी ना हो क्योंकि जैसा कि प्रोफ़ेसर लुइस कहते हैं ,"सार्वजनिक उत्साह किसी भी योजना को चिकनाने वाला तेल और आर्थिक विकास का पेट्रोल दोनों ही है-अर्थात एक गत्यात्मक शक्ति जो सब कुछ संभव बनाती है." और सबका साथ ;सबका विकास 'के लक्ष्य के मद्देनज़र हमारे माननीय प्रधान मंत्री जी ने इस सार्वजनिक उत्साह से जन जन को लबरेज़ कर दिया है.
नई सोच की दिशा में एक नया कदम
नवदृष्टि लिए संस्था का हो नव रूपांतरण
विकास के सुगन्धित फूलों से अब
महक उठेगा अपना यह गुलशन
हमारा अभियान प्रगति पथ
सपनों ने है भर ली एक नई उड़ान
एक ही दिशा में हैं सबके चिंतन
सहयोगिता और सहभागिता ही
बन गई है हर दिल की धड़कन
हमारा अभियान प्रगति पथ

Friday, October 3, 2014

सिर्फ रावण ही क्यों जले !!!

वज़ूद औरतों का भी बचा कर रखिये

सिर्फ मर्दों से ही कुदरत चला नहीं करती
Backgrounds
पराई अमानत नहीं;तुम्हारी अपनी बेटी
नारी के मान सम्मान को बढ़ाता नवरात्रि का यह पर्व हर वर्ष दो बार स्त्रियों के प्रति हमें बहुत संवेदनशील कर देता है ..दहेज़ प्रथा,बलात्कार,घरेलू हिंसा,यौन अत्याचार,जैसे ना जाने कितने महिषासुर को खत्म करने के संकल्प से भारतीय समाज की भुजाएं फड़कने लगती हैं....इस अवसर पर कन्याओं का विशेष सम्मान उनकी पूजा... करता भारतीय समाज कन्या भ्रूण हत्या ,बाल विवाह जैसे शुम्भ निशुम्भ को मार गिराने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई देता है....पर अफ़सोस यह कि भारतीय समाज बेहद विरोधाभासी है.एक तरफ कन्या जन्म पर पांच वृक्ष लगाकर विवाह का खर्च उठाने की बात कर अनजाने ही दहेज़ के दानव को मरने नहीं देता दूसरी तरफ लिंग असमानता पर अफ़सोस भी करता है .आप ही बताइये क्या दहेज़ प्रथा के कारण भी कन्या का जन्म वित्तीय बोझ नहीं माना जाता ...परिवार में दो पुत्र का जन्म हो जाएं तो कोई बात नहीं दो पुत्रियां हों तो दस वृक्ष ज़रूर लगा लेना ताकि उनके विवाह के समय दहेज़ लोलुप पुत्रों को उनके अभिभावक को संतुष्ट कर सकें ....फिर स्त्री पुरूष लिंगानुपात कैसे संतुलित रह सकता है ....या तो उन्हें जन्म ना लेने दो या फिर जन्म लें तो दहेज़ की बलि चढ़ जाने दो ....ऐसा क्यों ना हो कि वर और वधू दोनों के माता पिता पाँच- पाँच वृक्ष लगाएं और सहभागिता से विवाह का खर्च आधा आधा बाँट लें ....ऐसा ही उचित है क्योंकि आज माता पिता पुत्री को भी वही शिक्षा दे रहे हैं जो पुत्रों को मिल रही है.संतान पुत्र हो या पुत्री हमें लिंग विभेदीकरण के भाव से ऊपर उठना ही चाहिए ...वह सिर्फ संतान है ना पुत्र ना ही पुत्री ...और यह भाव सबसे पहले घर की स्त्री ही उत्पन्न कर सकती है .. ऐसे निर्णयों और भाव के साथ उसकी प्रतिबद्धता को कोई चुनौती नहीं दे सकता .बेटियों की शिक्षा के बावजूद दहेज़ देने की मज़बूरी क्यों रहती है.हमारे समाज में बेटियों के विवाह में दहेज़ का विरोध करने वाले ही बेटों की शादियों में खुल कर दहेज़ की मांग करते हैं. गलती तो यहीं से शुरू हो जाती है.हाल ही में मेरे एक रिश्तेदार की बेटी ने (बैंक में पी ओ ) जिसका विवाह भी बैंक में पी ओ के पद पर आसीन लडके से तय हुआ था जब होने वाले श्वसुर से कहा ,"आप मेरे माता -पिता से दहेज़ में कार और नगद की मांग कर रहे हो जब कि मैं स्वयं कमा रही हूँ ..मैं इस शादी से इंकार करती हूँ ...तो लगभग सभी ने उस बेटी का ही विरोध किया पर उसने भी स्पष्ट कह दिया ,"मुझे अपनी ज़िंदगी जीने का अधिकार है.पर सवाल वही कि ऐसा कब तक चलता रहेगा ??दहेज़ के इस दानव को समाप्त करना बहुत आवश्यक है. Backgrounds3विजयादशमी के अवसर पर प्रतिवर्ष रावण दहन की परम्परा तो मुझे और भी ज्यादा उद्वेलित करती है .रावण प्रकांड विद्वान और शिव भक्त भी था .और उसे आज तक गलती की सज़ा दी जा रही है ...सच कहूँ तो जब एक बार उसे राम जी द्वारा मार दिया गया तो पुनः हर वर्ष उसे मारने की परम्परा बुराई की संरचना कर उसका प्रतिकार करते रहने का एक दुष्चक्र के सिवा कुछ और नहीं है. रावण दहन के साथ दहेज़,अनाचार,अत्याचार,उत्पीड़न के ऐसे दानव जिनका दहन नहीं होता बल्कि वे दर्द की तपन देते हैं क्या उन्हें समूल नष्ट करने की इच्छाशक्ति की कोई अग्नि समाज प्रज्ज्वलित करता है ???क्या हर बेटी यह कहती सुनाई देती है 'मैं पराई अमानत नहीं;तुम्हारी अपनी बेटी हूँ '....क्या रावण दहन कर हम अपने अंदर के रावण को समाप्त कर पाते हैं ? ??कल बच्चों की एक फैन्सी ड्रेस प्रतियोगिता में एक सात वर्ष के बच्चे को रावण बने देखा .मज़े की बात यह कि उसके नौ सिर ही थे ..बीच में उसके स्वयं के सिर के दोनों तरफ चार चार सर ..मुझे अच्छा लगा क्योंकि वह ऐसा कर संतुलित रह पा रहा था ...रावण के दस सिरों में संतुलन .कैसे हो सकता है ...ठीक मध्य में तो कोई भी सिर नहीं था .....यह भी प्रतीकात्मक है जब हमारी बुद्धि विवेक में संतुलन नहीं होता तब हम पथ भ्रष्ट होने लगते हैं...रावण के दस सर तो फिर भी दृष्टिगोचर होते हैं पर हम में से प्रत्येक के एक सर के पीछे छुपा नौ सर प्रत्येक रावण दहन के अवसर पर और भी ज्यादा अहंकारी हो उठता है यह क्यों नहीं दिखाई देता ? ????? एक पापी को पत्थर मारने के सवाल पर जब यह बात सामने आती है कि पहला पत्थर वही उठाये जिसने कभी कोई पाप नहीं किया तो पत्थर लिए हज़ारों हाथ क्यों झुक जाते हैं ....चलो अच्छा है उस मूवी में हाथों में पत्थर लिए लोगों में कम से कम इतनी ईमानदारी तो है कि वे इस प्रश्न की नैतिकता से जुड़ जाते हैं हाथ नीचे कर लेते हैं .पर रावण को जलाने वाले हज़ारों लाखों हाथ क्या अपने निष्पाप होने के आत्मविश्वास से भरे होते हैं ????तो फिर सिर्फ रावण ही क्यों जले ??/प्रतीकात्मक ही सही प्रत्येक घर में अपना  भी एक पुतला बना कर जलाया जाए.
जब रामायण की शुरुआत की बात करें तो राजा दशरथ की रानी कैकेयी भी नारी समाज को मार्ग दिखाती है. .एक बुद्धीजीवी स्त्री होने के बावजूद वे मंथरा जैसी दासी के बहकावे में आ गईं अपने विवेक बुद्धि से अपने परिवार के हित की बात उन्हें नहीं सूझी .स्त्रियां प्यार,समर्पण त्याग करूणा की मूरत होती हैं पर कैकेयी ने तो अपने प्यार और सेवा के बदले दशरथ जी से स्वकेंद्रित होकर मांग रखी ...परिवार हित या समाज हित को विस्मृत कर गईं .जो स्वीकार्य नहीं हो सकता.आज समाज में कुछ स्त्रियों के उदाहरण मिल जाते हैं जो घरेलू सहायिकाओं के बातों में आकर अपना घर परिवार बिगाड़ बैठती हैं .कुछ अपने पति से प्रेम और समर्पण के बदले उनसे कुछ अस्वीकार्य मांग कर बैठती हैं जो परिवार के हित में सही साबित नहीं होता .कैकेयी के किरदार के द्वारा हमें यह समझने की ज़रुरत है कि हम अपने पति से ऐसी कोई मांग न करें जो परिवार के हित में न हो. एक बात यह भी गौर तलब कि सीता जी के स्वर्ण मृग को देख कर उसे लाने का आग्रह करना भी हम स्त्रियों के लिए एक प्रतीकात्मक शिक्षा देता है...कोई वस्तु कितनी भी लुभावनी ,मनमोहक हो उसे हासिल करने की हमारी लालसा हमारे परिवार जनों को किसी बड़ी परेशानी में डाल सकती है.आज कुछ स्त्रियां जिन्हे आवश्यकता और लालसा में फर्क नहीं समझ आता ;सोने चांदी के आभूषणों ,आकर्षक वस्तुओं की खरीदारी के लिए या महज़ अपने शौक की पूर्ति और आपसी प्रतियोगिता के लिए घर के पुरुषों को गलत ढंग से आय अर्जित करने के लिए प्रेरित कर देती हैं. स्त्रियों को इस प्रवृत्ति से दूर रहने की आवश्यकता  है . (नोट : भारतीय संस्कृति के महान आदर्श और त्याग की प्रतीक देवी सीता मेरे लिए पूजनीय हैं मैं उनके प्रति असीम श्रद्धा भाव रखती हूँ कृपया इसे सहजता से स्वीकारा जाए ) वरात्रि ,विजयादशमी जैसे पर्व त्यौहार से जुडी परम्पराओं का निर्वाह संस्कृति की शाश्वतता के लिए आवश्यक है तो इसे सही विधि से स्वपरिष्करण का साधन मानना इसे प्रासंगिक बनाये रखने के लिए अपरिहार्य है.घर परिवार समाज में सृजन का अधिकार कुदरत ने स्त्री को ही दिया है.ज़रुरत है वह सृजन के साथ परिष्करण भी करती रहे.चूँकि स्त्री भावप्रधान होती है अतः वह अपने प्यार सद्बुद्धि शक्ति से सही दिशा निर्देशन की क्षमता भी रखती है.वह समाज की प्रत्येक विकृति की कॉस्मेटिक सर्जरी करने वाली कुशल सर्जन बन सकती है ..बस ज़रुरत है एकता ,दृढ़ता और सही अर्थों में नारी शक्ति प्रदर्शन की ...इस के लिए उसे पुरुषों से ना तो आचार विचार उधार लेने की ज़रुरत है ना ही खान पान और पहनावा की...वह अपने नारी स्वरुप में ही जहां खड़ी हो जाए वहां वह ना + अरि है ...ना किसी की दुशमन ...ना कोई उसका दुश्मन ... ज ज़रुरत है स्त्री अपने बुद्धि ,विवेक ,प्रज्ञा का घर परिवार समाज के सही दिशा निर्देशन में प्रयोग करे.आज स्त्रियों के शक्ति का सूर्य स्वयं के अस्तित्व ,सुरक्षा ,मान सम्मान के प्रति एक भय संशय अनिश्चितता के मेघों से ढक गया है जिसे दूर करने के लिए एकता स्वज्ञान स्वशक्ति के भान की तेज हवा की ज़रुरत है.....


आज उसे कुछ याद नहीं कि कौन सा ये साल है
पर पूछती स्वयं से क्यों अस्मिता मेरी हलाल है ....
कल तक थी शांत धरा आज भयंकर भूचाल है




शान्ति की मूरत थी कभी अब हाथ में करवाल है .....

शोलों सी जलती आँखें लब पर एक ही सवाल है
समाज में इतनी विकृतिया कहाँ क़ानून बहाल है ....
क्रान्ति का जब करती नाद न परिवार बना ढाल है
परित्यकता हो कर भी समक्ष समाज के विकराल है .....
चुप रहे आखिर कब तक जब समाज का ये हाल है
शांत दरिया के उफान पर फिर क्यों करे कोई मलाल है.....
देख लो हर रिश्ते में वह चाहे वृक्ष से टूटी एक डाल है
बुझी किस्मत रोशन करने हाथ में ली जलती मशाल है ....
दीन दुखी अबला कब ; वह आज भी साक्षात त्रिकाल है
नारी सदियों से रही सशक्त स्वयं में ही एक मिसाल है ......
बदलती है रूप तस्वीर का जिस पर अत्याचार का जाल है




यह कमल खिल उठता वहीं कीचड से भरा जहां ताल है ....

नाद गूंजे 'विजयी भव 'का चहुँ ओर ऐसा एक बवाल है

यह वह हर वक़्त तुम्हारा, सबला तुमसे ही हर काल है.



शुभ नवरात्रि शुभ विजयादशमी