Friday, November 4, 2011

anubhav

कल चेतन भगत के लाइव चाट के द्वारा पता चला की उनकी पहली बुक को प्रकाशक ने नकार दिया था.पर आज वे युवा पाठकों के सबसे चहेते लेखक हैं.दैनिक jagरन के सप्तरंग ३ नवम्बर २०११ के पृष्ठ में मैंने पढ़ा की जब १९३१ में फिल्मों ने बोलना शुरू किया टी फिल्म आलामारा में पृथ्वीराज कपूर की आवाज को लोगों ने दोषमुक्त बताया .बाद में वे लोग ही उनकी आवाज के कायल हो गए.कहीं पर येभी पढ़ा था कि अमिताभ बच्चन की आवाज को एक रेडियो आयोजक ने नकार दिया था पर आज दुनिया जानती है कि बच्चन जी की आवाज में एक जादू,एक कशिश है.
इन सारीबातो  से सीख मिलती है कि अगर किन्ही कारणों से आपकी कृति या अच्छे कार्य भी नकार दिए जायें तो वह आपकी असफलता नहीं बल्कि भावी सफलता की शुरुआत हो सकती है,बशर्ते आप उस अस्वीकृति को जिंदगी की सबसे बड़ी असफलता न मान बैठें.

अपने आँगन से जितना बड़ा आकाश दिखाई देता  है क्या वही उसकी सीमा है? नहीं,आकाश  असीमित है पर इसका ज्ञान तो तब होगा जब हम घर से बाहर आएगें और उस विस्तार से रूबरू होंगे.

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